रोग और ज्योतिष

आयुर्वेद के अनुसार कुछ जटिल रोग पूर्वजन्मों के दोष के कारण शरीर के लिए कष्टकारी होते हैं –

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in Delhi)

आयुर्वेद और ज्योतिष शास्त्र का चोली-दामन का संबंध रहा है, पूर्वकाल में हर वैद्य आयुर्वेद के साथ ग्रह-नक्षत्रों का भी अच्छा खासा ज्ञान रखता था। औषधि किस मुहूर्त में ग्रहण करनी है, और किस नक्षत्र में रोगी को सेवन करना आरम्भ करनी है? रोग किस नक्षत्र में आरम्भ हुआ है, वह साध्य होगा या असाध्य अथवा कष्ट साध्य होगा, इस का अच्छा-खासा ज्ञान वैद्य को होता था। वात-पित्त-कफ तीनों प्रकृतियों के साथ ग्रहों का सम्बन्ध, शरीरांगों में राशियों एवं ग्रहों का विनिवेश, बालारिष्ट, आयु आदि विषयों का ज्योतिषीय विश्लेषण, रोग की स्थिति में महत्वपूर्ण उपाय प्राप्त करने के लिए मंत्र-अनुष्ठान व दान अथवा रत्न धारण, यह सब औषधियों के सहायक अंग हैं। ज्योतिष में रोगों का वर्गीकरण, लक्षण (ग्रहयोग) तथा ज्योतिष शास्त्र ग्रहों की प्रकृति, धातु, रस, अंग, अवयव, स्थान, बल एवं अन्यान्य विशेषताओं के आधार पर रोगों का निर्णय करता है, तथा निदान के ज्योतिषीय उपाय भी इस शास्त्र में बताये गये हैं। ज्योतिष शास्त्र ही एक ऐसा शास्त्र है, जिसकी सहायता से भविष्य में होने वाले किसी भी रोग की सूचना प्राप्त हो सकती है। इस प्रकार रोग का पूर्व ज्ञान प्राप्त कर तथा उसके लिये ग्रहोपचार द्वारा अथवा सावधान रहकर मनुष्य उस रोग के कष्ट से किसी सीमा तक सुरक्षित रह सकता है।

ब्रह्माण्ड और मानव शरीर की समानता पर पुराणों व अन्य धर्मग्रन्थों में व्यापक विचार हुआ है। जो ब्रह्माण्ड में है, वह मानव शरीर में भी है। ब्रह्माण्ड को समझने का श्रेष्ठ साधन मानव शरीर ही है। वैज्ञानिको ने भी सावययी-सादृश्यता के सिद्धांत को इसी आधार पर निर्मित किया है। मानव शरीर व संपूर्ण समाज को एक दूसरे का प्रतिबिंब माना गया है। आज का मानव सौर मंडल को भली-भांति जानता है, इसी सौरमंडल में व्याप्त पंचतत्वों को प्रकृति ने मानव निर्माण हेतु पृथ्वी को प्रदान किया है। मानव शरीर जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु व आकाश तत्व से निर्मित हुआ है। ज्योतिष ने सौरमंडल के ग्रहों, राशियों तथा नक्षत्रों में इन तत्वों का साक्षात्कार कर प्राकृतिक सिद्धांतो को समझा है।
ज्योतिष का फलित भाग इन ग्रह, नक्षत्रों व राशियों के मानव शरीर पर पढ़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करता है, जो पंचतत्व इन ग्रह नक्षत्र व राशियों में हैं। वही मानव शरीर में भी हैं, तो निश्चित ही इनका मानव शरीर पर गहरा प्रभाव होगा ही।
वैदिक ज्योतिष ने सात ग्रहों को प्राथमिकता दी है। सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि। राहु व केतु छाया ग्रह हैं। पाश्चात्य ज्योतिष जगत में युरेनस, नेप्चयुन व प्लुटो का भी महत्व है। ज्योतिष ने पंचतत्वों में प्रधानता के आधार पर ग्रहों में इन तत्वों को अनुभव किया है, सूर्य व मंगल अग्नि तत्व प्रधान ग्रह हैं। अग्नि तत्व शरीर की ऊर्जा व जीने की शक्ति का कारक है। अग्नि तत्व की कमी शरीर के विकास को अवरूद्ध कर रोगों से लड़ने की शक्ति को कम करती है। शुक्र व चंद्रमा जल तत्व प्रधान ग्रह हैं, शरीर में व्याप्त जल पर चंद्रमा का आधिपत्य है। शरीर में स्थित जल शरीर का पोषण करता है। जल तत्व की कमी आलस्य या तनाव उत्पन्न कर, शरीर की संचार व्यवस्था पर विपरीत प्रभाव डालती है। जल व मन दोनो की प्रकृति चंचल है, इसलिये चंद्रमा को मन का कारकत्व भी प्रदान किया गया है। उदाहारणार्थ देखें:- शुक्राणु जो तरल में ही जीवित रहते हैं, और यह सृष्टि के निर्माण में व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शुक्र काम जीवन का कारक है, यही कारण है कि, शुक्र के अस्त होने पर विवाह के मुहुर्त नहीें निकाले जाते। बृहस्पति व राहु आकाश तत्व से सम्बंध रखते हैं। यह व्यक्ति के पर्यावरण व आध्यात्मिक जीवन से सीधा सम्बंध रखते हैं। बुध पृथ्वी तत्व का कारक ग्रह है। यह बुद्धिमता व निर्णय लेने की शक्ति शरीर को देता है। इस तत्व की कमी बुद्धिमता व निर्णय लेने की शक्ति पर विपरीत असर डालती है। शनि वायु तत्व प्रधान ग्रह है। शरीर में व्याप्त वायु तत्व पर इसका पूर्ण आधिपत्य है। केतु को मंगल की तरह माना गया है।
मानव जीवन के कुछ गुण मूल प्रकृति के रूप में भी मौजूद होते हैं। प्रत्येक मनुष्य में प्राकृतिक रूप से आत्मा, मन, वाँणी, ज्ञान, काम, व दुखः विद्यमान होते हैं। यह उसके जन्म समय की ग्रहस्थिति पर निर्भर करता है, कि किस मानव में इनकी प्रबलता कितनी है? विशेष रूप से प्रथम दो तत्वों को छोड़कर क्योंकि आत्मा से ही शरीर है। यह सूर्य का अधिकार क्षेत्र है। मन चंद्रमा का, बल मंगल का, वाँणी बुध का, ज्ञान बृहस्पति का, काम शुक्र व दुखः पर शनि का आधिपत्य है। आधुनिक मनोविज्ञान मानव की चार मूल प्रवृत्तियाँ मानता है- भय, भूख, यौन व सुरक्षा। भय पर शनि व केतु का आधिपत्य है। भूख पर सूर्य व बृहस्पति का, यौन पर शुक्र तथा सुरक्षा पर चंद्र व मंगल का। मानव शरीर के विभिन्न धातु तत्वों का भी बह्माण्ड के ग्रहों से सीधा सम्बंध है। शरीर की हड्ढियों पर सूर्य, रक्त की तरलता पर चंद्रमा, शरीर के माँस व गर्मी पर मंगल, त्वचा पर बुध, चर्बी पर बृहस्पति, वीर्य पर शुक्र तथा स्नायुमंडल पर शनि का अधिपत्य है। राहु एवं केतु चेतना से सम्बंधित ग्रह हैं। शरीर क्रिया-विज्ञान के अनुसार मानव शरीर त्रिदोष से पीड़ित होता है, जो विभिन्न रोगों के रूप में प्रकट होते हैं। वात-पित्त-कफ, सूर्य, मंगल, पित्त, चंद्रमा व शुक्र कफ, शनि वायु तथा बुध त्रिदोष; यह प्रतीकात्मक हैं। नेत्र व्यक्ति को अच्छा या बुरा देखने व समझने का शक्तिशाली माध्यम है। आंतरिक व बाह्य रहस्यों को देखने में नेत्रों की भूमिका महत्वपूर्ण है। प्राचीन ज्योतिष के सभी सिद्धांत योगियों व ऋषियोें ने सिर्फ नेत्रों से देखकर व योगमार्ग से अनुभव करके बनाये हैं। बिना कोई वैज्ञानिक यंत्रों की सहायता से यह अपने आप में आंतरिक व बाह्य रहस्यों में ज्योतिष के महत्व को स्पष्ट करने के लिये पर्याप्त हैं। सूर्य व चंद्रमा साक्षी हैं, अतः ज्योतिष के विज्ञान या सत्य होने में कोई संदेह नही है।

रोग निर्णय-
सूर्य- जब सूर्य रोगकारक ग्रह होता है, तब निम्नलिखित रोगों की संभावना होती है, या यह समझिये कि सूर्य निम्नलिखित रोग और क्लेशों का कारक है- पित्त, उष्ण ज्वर, शरीर में जलन रहना, अपस्मार (मिर्गी), हृदय रोग (हार्ट डिजीज), नेत्र रोग, नाभि से नीचे प्रदेश में या कोख में बीमारी, चर्मरोग, अस्थि श्रुति, शत्रुओं से भय, काष्ठ अग्नि, अस्त्र या विष से पीड़ा, स्त्री या पुत्रों से पीड़ा, चोर या चैपायों से भय, सर्प से भय, राजा, धर्मराज (यम) भगवान् भूतेश (रूद्र) से भय होता है।

चन्द्रमा- चन्द्रमा निम्नलिखित रोग या कष्ट उत्पन्न करता है- निद्रा रोग या तो नींद न आयेगी या बहुत नींद आयेगी, अथवा सोते सोते चलना इसे संन्यास रोग भी कहते हैं। आलस्य, कफवृद्धि, अतिसार (संग्रहणी), पिटक, कारबंकिल, शीतज्वर (ठंड देकर जो बुखार आता है) या ठंड के कारण जो बुखार हो। सींग वाले जानवर या जल में रहने वाले जानवर मगरमच्छ आदि से भय, मंदाग्नि (भूख न लगना), अरुचि (यह भी मन्दाग्नि का एक प्रकार है) जब जठराग्नि के मंद हो जाने से भूख नहीं लगती है तो, भोजन की इच्छा नहीं होती है। स्त्रियों से व्यथा, पीलिया, खून की खराबी, जल से भय, मन की थकावट, बाल ग्रह-दुर्गा-किन्नर-धर्मराज (यम) सर्प और यक्षिणी से भय होता है।

मंगल- जब मंगल रोग और क्लेश उत्पन्न करता है- तृष्णा (बहुत अधिक प्यास लगना) प्रकोप (वायु जनित या पित्त प्रकोप), पित्तज्वर, अग्नि, विष या शस्त्र से भय, कुष्ठ (कोढ़), नेत्र रोग, गुल्म (पेट में फोड़ा या एपिन्डिसाइटीज), अपस्मार (मिर्गी), मज्जा रोग (हड्डी के अन्दर मज्जा होती है, उसकी कमी से जो रोग हो जाते हैं), खुजली, चमड़ी में खुर्दरापन, देह-भंग (शरीर का कोई भाग टूट जाना), राजा, अग्नि और चोरों से भय, भाई, मित्र, पुत्रों से कलह, शत्रुओं से युद्ध, राक्षस, गन्धर्व घोर ग्रह से भय और शरीर के ऊपर के भाग में बीमारियाँ होती हैं।

बुध- बुध नीचे लिखे हुये रोग और कलेश उत्पन्न करता है- भ्रान्ति (बहम), सोचने में अव्यवस्था हो जाना, विचार में तर्क शक्ति का आभाव, व्यर्थ की चिंता से मन उलटा-पुलटा सोचने में लग जाना, मन में मिथ्या चिन्ता, बिना कारण भय, आशंका बनी रहे, जो बात यथार्थ हो उसको भूल कर गलत बात याद रहे या गलत धारणा हो जाती है, यह सब भ्रान्ति के लक्ष्ण हैं। दुर्वचन बोलना, नेत्र-रोग, गले का रोग, नासिका रोग, वात-पित्त-कफ इस त्रिदोष से उत्पन्न ज्वर, विष की बीमारी, चर्मरोग, पीलिया, दुःस्वप्न, खुजली, अग्नि में पड़ने का डर, (लोग जातक के साथ अपरुषता का व्यवहार करते हैं), श्रम (अधिक परिश्रम वाला काम करना पड़े), गन्धर्व आदि से उत्पन्न रोग। यह सब बुध के कारण होने वाले रोग हैं।

बृहस्पति- बृहस्पति के कारण जो रोग, क्लेश आदि होते हैं- गुल्म, पेट का फोड़ा-रसोली आदि का रोग, एपिन्डसाइटीज, अंतड़ियों का ज्वर (टायफाईड़), मूच्र्छा यह सब रोग कफ के दोष से होते हैं, क्योंकि कफ का अधिष्ठाता बृहस्पति है, कान के रोग, देव स्थान सम्बंधी पीड़ा अर्थात मंदिर आदि की जायदाद लेकर मुकद्दमेबाजी, ब्राह्मणों के शाप से कष्ट, किसी खजाने, ट्रस्ट या बैंक के मामलों के कारण कलह, या अदालती कार्रवाई, विद्याधर, यक्ष-किन्नर, देवता, सर्प आदि के द्वारा किया हुआ उपद्रव, अपने गुरुओं माननीयों तथा बड़ों के साथ किया हुआ अभद्र या अशिष्ट अव्यवहार या उनके प्रति कत्र्तव्य पालन न किया हो तो उस अपराध का दंड बृहस्पति की दशा, अन्तर्दशा में होता है, यह दैवी नियम हैं।

शुक्र- शुक्र ग्रह के कारण क्या रस-रक्त की कमी, ओजक्षय के कारण पीलापन, कफ और वायु के दोष से नेत्र रोग, प्रमेह, जननेन्द्रिय आदि में रोग, पेशाब करने में कठिनता या कष्ट (उपदंश, सुजाक आदि के कारण या प्रोस्टेट ग्लैण्ड बढ़ जाने की वजह से), वीर्य की कमी, संभोग में अक्षमता, अत्यंत संभोग के कारण शरीर में कमजोरी तथा चेहरे पर कान्ति हीनता, शोष (शरीर का सूखना), योगिनी, यक्षिणी एवं मातृगण से भय, शुक्र क्लेश कारक होने से मित्रों से मित्रता भी टूट जाती है।

रोग जो शनि के कारण उत्पन्न होते हैं- वात और कफ के द्वारा उत्पन्न रोग, टांग में दर्द या लंगड़ाना, अत्यधिक श्रम के कारण थकान, भ्रांति। कुक्षि (कांख के रोग), शरीर के भीतर बहुत उष्णता हो जाती है, नौकरों से कष्ट, नौकर नौकरी छोड़ कर चले जायें या धोखा या दगा दें, भार्या और पुत्र सम्बंधी विपत्ति, अपने शरीर के किसी भाग में चोट, हृदय ताप (मानसिक चिंता), पेड़ या पत्थर से चोट, पिशाच आदि की पीड़ा, आपत्ति।

राहु ग्रह के कारण होने वाले रोग- क्लेश, रोग व चिन्ता आदि- हृदय रोग, हृदय में ताप (जलन), कोढ़, दुर्मति, भ्रांति, विष के कारण उत्पन्न हुई बीमारियाँ, पैर में पीड़ा या चोट, स्त्री, पुत्र को कष्ट या उनके कारण कष्ट, सर्प और पिशाचों से भय।

केतु क्या कष्ट उत्पन्न करता है- ब्राह्मणों और क्षत्रियों से कलह के कारण कष्ट, शत्रुओं से भय।

गुलिक के कारण होने वाले कष्ट- गुलिक को ही मान्दि भी कहते हैं। गुलिक यदि छठे घर में हो या छठे ग्रह के स्वामी के साथ हो तो शरीर में पीड़ा, किसी स्वजन की मृत्यु और प्रेत से भय होता है।

रोगों के कुछ अन्य कारण हैं-
1. यदि चन्द्रमा और सूर्य बारहवें या दूसरे स्थान में हों, और उनको मंगल और शनि देखते हों तो, नेत्र रोग होता है। यहाँ यह ध्यान रखना चाहिये कि यदि सूर्य, चन्द्र दोनों एक साथ या एक दूसरे के घर में हों, और उनको मंगल और शनि दोनों पूर्ण दृष्टि से देखते हों तो, संभवतः उस आंख से दिखाई देना बिल्कुल बन्द हो जायेगा। दूसरा स्थान दाहिने नेत्र का है। इस कारण दाहिने नेत्र में रोग होगा। ऊपर जो योग बताया गया है, वह यदि बारहवें घर में होगा तो बायें नेत्र की दृष्टि नष्ट होगी। इसी प्रकार यदि सूर्य और चन्द्रमा इन दोनों में से कोई एक-दूसरे या बारहवें घर में बैठा हो, और उसको शनि या मंगल देखते हों तो, दूसरे में सूर्य या चन्द्र बैठने से दाहिने नेत्र का रोग होगा, और बारहवें घर में सूर्य या चन्द्र बैठने से और उसको मंगल या शनि के देखने से बायें नेत्र में रोग होगा। दूसरे और बारहवें घर को नेत्र स्थान कहते हैं। नेत्र स्थान में बैठे हुये सूर्य या चन्द्र को केवल मंगल या केवल शनि देखें तो थोड़ा कष्ट और यदि मंगल और शनि दोनों देखें तो, विशेष कष्ट समझाना चाहिये। यदि नेत्र स्थान में सूर्य, चन्द्र न भी बैठे हों अन्य पाप ग्रह बैठे हों या पाप ग्रह की दृष्टि भी हो तो भी नेत्र की दृष्टि में कमी हो जाती है।

2. यदि तीसरे और ग्यारहवें घर और बृहस्पति-मंगल शनि से युक्त या दृष्ट हों तो, कान का रोग होता है। तीसरे से दाहिने कान का विचार किया जाता है, ग्याहरवें से बांये कान का। सुनना (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध इन पांचो गुणों में से) शब्द से सम्बंध रखता है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश यह पांच तत्त्व हैं। सूर्य और मंगल ग्रह का अग्नि तत्त्व, चन्द्रमा और शुक्र का जल तत्त्व, बुध का पृथ्वी तत्त्व, शनि का वायु तत्त्व और बृहस्पति का आकाश तत्त्व है। शब्दगुण का अधिष्ठाता आकाश तत्त्व है। आकाश तत्त्व बृहस्पति से संबंधित होने के कारण यह कहा गया है कि, यदि बृहस्पति, मंगल, शनि से (मंगल से या शनि से या शनि, मंगल दोनों से) पूर्ण दृष्टि से देखा जाता हो, या मंगल, शनि के साथ हो तो कान के रोग अथवा बहरापन होता है। यहाँ तारतम्य से यह विचार कर लेना चाहिये कि तृतीय और एकादश घर जितने निर्बल होंगे, और जितनी अधिक पाप दृष्टि इन दोनों पर पड़ेगी-या जितने अधिक पाप ग्रहों के साथ ये तथा बृहस्पति (शब्द गुण का अधिष्ठाता होने के कारण), होंगे उतना ही तीव्र (अधिक) कान का रोग होगा। मंगल पित्त प्रधान है, इसलिये मंगल की युति या दृष्टि पित्त के कारण या फोड़ा-फुंसी, रक्त स्राव आदि का रोग कान में करेगा। शनि वायु प्रधान है, इस कारण, शनि जब कान के रोग उत्पन्न करेगा तो वात के कारण। वात, पित्त, कफ यही तीन दोष आयुर्वेद के अनुसार त्रिदोष हैं। जिनके कुपित हो जाने से या असांमजस्य से शरीर में रोग होते हैं।

(3) मंगल पंचम में होने से उदर (पेट के विकार) करता है। इनमें से कोई भी उग्र ग्रह सूर्य, मंगल, शनि, राहु, केतु पंचम में होने से पेट में पीड़ा करता है, पांचवा स्थान पेट का है।

(4) शुक्र यदि सप्तम या अष्टम स्थान में हो तो वीर्य सम्बंधी प्रमेहादि या मूत्ररोग करता है।

(5) यदि षष्ठेश या अष्टमेश, सप्तम में या षष्ठेश अष्टम में हो तो, गुदा रोग होता है। सप्तम स्थान गुह्य जननेन्द्रिय प्रदेश, अष्टम गुदा का स्थान है। यहाँ पाप ग्रह बैठे हों, या दुःस्थान (छठे आठवें) के स्वामी बैठे हों, तो शरीर के उस भाग में रोग उत्पन्न करते हैं।
यदि छठे या आठवें घर में सूर्य हो तो, ज्वर (बुखार) का भय, यदि छठे या आठवें घर मंे मंगल या केतु हों तो व्रण (घाव, चोट, जख्म), छठे या आठवें घर में शुक्र हो तो, जननेन्द्रिय प्रदेश में रोग (उदाहरण के लिये मूत्र रोग, वीर्य रोग, सुजाक, आतशक आदि), यदि छठे या आठवें घर में बृहस्पति हो तो (यक्ष्मा, टी. बी. आदि), यदि छठे या आठवें शनि हो तो वात (वायु रोग), यदि छठे या आठवें मंगल राहु हों, या उस पर मंगल की दृष्टि हो तो पिटिका (अदीठ आदि फोड़ा या सामान्य फोड़ा), यदि छठे या आठवें घर में चन्द्रमा और शनि एक साथ हों तो गुल्म (तिल्ली के कारण तथा तिल्ली बढ़ जाने के कारण पेट में पसलियों के नीचे-दाहिनी ओर यकृत (जिगर) और बाँयी और प्लीहा (तिल्ली होती है), यदि कृष्ण पक्ष का क्षीण चन्द्रमा पाप ग्रह के साथ हो, और जिस राशि में छठे या आठवें हों तो, अम्बुर्द रोग (पेट या शरीर के अन्य भाग में पानी भर जाना, जलोदर) या क्षय (यक्ष्मा टी. बी.) का रोग होता है।जो ग्रह अष्टम में होते हैं, या अष्टम को देखते हैं, उनमें जो बलवान होता है, उस ग्रह के रोग से जातक की मृत्यु होती है। आठवाँ आयु का स्थान है। ऊपर बताया जा चुका है कि, कौन-सा ग्रह किस रोग का कारक है। यदि आठवें भाव में ग्रह हों, या ग्रह देखते हों, तब किस प्रकार के रोग से मृत्यु होगी यह ऊपर बताया गया है, परन्तु आठवें घर में कोई ग्रह न हो, और न कोई ग्रह आठवें घर को देखता हो; ऐसी स्थिति में किस रोग से मृत्यु होगी? आठवें घर के जो रोग बताये गये हैं, उनसे या आठवें घर का मालिक जिस राशि या भाव में बैठा हो, उसके दोष से, उदाहरण के लिये आठवें घर का मालिक पांचवे घर में हो तो, उदर (पेट के) रोग से, चैथे घर में बैठा हो तो, हृदय रोग से यदि अष्टमेश सूर्य या मंगल हो तो, पित्तज रोग से, शनि हो तो वात रोग से इत्यादि। जन्म लग्न (द्रेष्काण) से जो 22वां द्रेष्काण होता है, उसका स्वामी भी मृत्यु कारक होता है। ऊपर जो योग अष्टम भाव संबंधी बताये गये हैं कि, वह लागू न हों तो जन्म द्रेष्काण से जो 22वां दे्रष्काण हो उस 22वें द्रेष्काण का जो स्वामी हो, उस स्वामी के जो रोेग हों, उनमें से किसी रोग के कारण मृत्यु होती है। जो ग्रह आठवें घर में हो, या आठवें घर को देखते हैं, उन ग्रहों में जो बलवान हो, उसके रोग या दोष से मृत्यु होती है। यदि कोई ऐसा ग्रह न हो, तो अष्टम भाव में जो राशि हो उसके रोग के कारण मृत्यु होती है।

सूर्य- अग्नि, उष्ण ज्वर, पित्त या शस्त्र से मृत्यु करता है।

चन्द्रमा- विषूचिका (हैजा), जलोदर (इस रोग में हाथ, पैर या अन्य स्थान में पानी इकट्ठा हो जाता है) जल की बीमारियाँ (प्ल्यूरेसी या अन्य बीमारी जिसमें जल कहीं इकट्ठा हो जावे, यक्ष्मा, टी. बी. आदि रोगों से आयु समाप्त करता है।)

मंगल- जलने से (अग्नि प्रकोप, बिजली आदि भी इसी के अन्तर्गत आ जाती है), रक्त विकार या रक्त बहने से, क्षुद्र अभिचार (जादू, टोना, मारण आदि के अनुष्ठानों आदि) के कारण, मृत्यु करता है।

बुध- पाण्डु (पीलिया) या रक्त की कमी, भ्रांति (स्नायु संबंधी विकार) आदि रोगों से जातक के प्राण हरण करता है। रक्त का कम बनना जिससे ‘पाण्डु’ आदि रोग होते हैं, यकृत की खराबी इत्यादि।

बृहस्पति- कफ का अधिष्ठाता है, और कफ से मृत्यु करता है। इसमें विशेष कष्ट नहीं होता।

शुक्र- जब प्राण हरण करता है, तो इसमें कारण अति स्त्री प्रसंग, वीर्य की कमी से शरीर निस्तेज हो जाना होता है। धातुक्षय इत्यादि बीमारी का शिकार होना, मूत्र रोग, जननेन्द्रिय सम्बंधी रोग शुक्र के अन्तर्गत आते हैं।

शनि- सन्निपात, वातरोग (लकवा आदि के द्वारा) आदि से मृत्यु करता है।

राहु- कुष्ठ (कोढ से) या, आंत्रशोथ, फूड प्रोसेसिंग विष या जम्र्स (रोग कीटाणु) युक्त वस्तु खाने से, सर्प आदि विषैले जन्तुओं के काटने से, जिस रोग में शरीर पर ददोड़े, फुंसियाँ हो जाते हैं, उसमें मृत्यु करता है।

केतु- मृत्यु का कारण दुर्मरण होता है, दुर्मरण का अर्थ है, अपमृत्यु (जैसा आकस्मिक मोटर, रेल आदि से, मकान के गिरने से, कुचल जाने से, कोई कर दे, यह सब दुर्मरण के उदाहरण हैं)। शत्रुओं के विरोध से, कीड़ों या शरीर में किसी कीड़े या जन्तु काटने से सेप्टिक हो जाने या भोजन आदि के द्वारा विषाक्त कीटाणु शरीर में प्रवेश कर जायें। कुण्डली के आठवें घर से जो दोष या रोग सूचित हों, उनसे (इसमें आठवें घर का मालिक, आठवें, घर को जो देखते हैं, वे सभी आ जाते हैं, या आठवें घर का मालिक जिस नवांश में बैठा हो, उस नवांश राशि के रोग स्वाभाविक हैं-

मेष- पित्त के कारण ज्वर, उष्णता (गर्मी के कारण उत्पन्न रोग लू लगना आदि, जठाराग्नि, पेट में भोजन पचाने वाली जो अग्नि है) के रोग।

वृष- त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) के उत्पात से, शस्त्र से, अग्नि से जलने के कारण।

मिथुन- श्वास की बीमारी, दमा, उष्ण शूल (पित्त के कारण जो तीव्र दर्द होते हैं)।

कर्क- पागलपन, उन्माद, वात के कारण रोग, अरुचि (भोजन में अरुचि आदि लक्ष्ण वाले रोग, ऐनोरेक्सिया)।

सिंह- जंगली पशुओं के कारण, मृत्यु, ज्वर, स्फोट (फोड़ा) शत्रुओं के कारण।

कन्या- स्त्रियों के कारण, गुप्तरोग (मूत्रेन्द्रिय या जननेन्द्रिय सम्बंधी रोग), ऊपर से गिरने से।

तुला- मस्तिष्क ज्वर (ब्रेन फीवर) सन्निपात।

वृश्चिक- प्लीहा (तिल्ली) संग्रहणी, पाण्डु (पीलिया) रोग।

धनु- पेड़ के कारण (पेड़ से गिरने, या अपने ऊपर पेड़ गिर जाने से), जल लकड़ी के कारण (लकड़ी चीरते समय, या लकड़ी की चोट से), शस्त्र से।

मकर- शूल (पेट का दर्द, एपिण्डीसाइटिज आदि, पेट में फोड़ा, आदि, कोलिक दर्द) अरुचि, मंदाग्नि या बुद्धिभ्रम (नर्वस स्नायु मंडल की अव्यवस्था या रोग के कारण संयत विचार करने की शक्ति जब नष्ट हो जाती है) आदि से।

कुम्भ- खांसी, ज्वर, क्षय।

मीन- पानी से, पानी में डूबने से, जल रोगों से।
यदि आठवें घर का मालिक पापग्रह हो, और आठवें घर में पापग्रह बैठे भी हों (या एक भी पापग्रह अष्टम में हो) तो शस्त्र, अग्नि, व्याघ्र, सर्प आदि की पीड़ा होती है। यदि केन्द्र में बैठे हुये दो पाप ग्रह एक दूसरे को पूर्ण दृष्टि से देखते हों, तो सरकार की नाराजगी से, शस्त्र, विष, अग्नि आदि के कारण मृत्यु होती है।
यदि बारहवें घर का मालिक सौम्य ग्रह की राशि या सौम्य ग्रह के नवांश में हो, या सौम्य ग्रह के साथ बैठा हो, अथवा बारहवें घर में सौम्य ग्रह बैठा हो, और बारहवें घर का मालिक भी सौम्य ग्रह हो तो, मरते समय विशेष क्लेश या पीड़ा नहीं होती। यदि उसे उल्टा हो अर्थात बाहरवें घर का मालिक क्रूर ग्रह की राशि या क्रूर ग्रह के नवांश में बैठा हो या क्रूर ग्रह के साथ हो, अथवा बारहवें घर में क्रूर ग्रह बैठा हो, बारहवें घर को क्रूर देखते हों तो कष्ट, पीड़ा क्लेश के साथ मृत्यु होती है। कफ-वात-पित्त तीनों प्रकृतियों के साथ ग्रहों का सम्बन्ध, शरीरांगों में राशियों एवं ग्रहों का विनिवेश, बालारिष्ट, आयु आदि विषयों की प्राप्ति, रोग की स्थिति में महत्वपूर्ण उपाय प्राप्त हैं। ज्योतिष में रोगों का वर्गीकरण, लक्षण (ग्रहयोग) तथा ज्योतिष शास्त्र ग्रहों की प्रकृति, धातु, रस, अंग, अवयव, स्थान, बल एवं अन्यान्य विशेषताओं के आधार पर रोगों का निर्णय करता है, तथा निदान के ज्योतिषीय उपाय भी बताये गये हैं। लेख के अंत में यही कहना चाहूंगा कि ज्योतिष शास्त्र ही एक ऐसा शास्त्र है, जिसकी सहायता से भविष्य में होने वाले किसी भी रोग की सूचना प्राप्त हो सकती है। इस प्रकार रोग का पूर्व ज्ञान प्राप्त कर तथा उसके लिये ग्रहोपचार द्वारा अथवा सावधान रहकर मनुष्य उस रोग के कष्ट से किसी सीमा तक बच सकता है।

मानव शरीर और ज्योतिष-
ब्रह्माण्ड और मानव शरीर की समानता पर पुराणों व अन्य धर्मग्रन्थों में व्यापक विचार हुआ है। जो ब्रह्माण्ड में है, वह मानव शरीर में भी है। ब्रह्माण्ड को समझने का श्रेष्ठ साधन मानव शरीर ही है। वैज्ञानिको ने भी सावययी-सादृश्यता के सिद्धांत को इसी आधार पर निर्मित किया है। मानव शरीर व संपूर्ण समाज को एक दूसरे का प्रतिबिंब माना गया है।

आज का मानव सौर मंडल को भली-भांति जानता है, इसी सौरमंडल में व्याप्त पंचतत्वों को प्रकृति ने मानव निर्माण हेतु पृथ्वी को प्रदान किया है। मानव शरीर जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु व आकाश तत्व से निर्मित हुआ है। ज्योतिष ने सौरमंडल के ग्रहों, राशियों तथा नक्षत्रों में इन तत्वों का साक्षात्कार कर प्राकृतिक सिद्धांतो को समझा है। ज्योतिष का फलित भाग इन ग्रह, नक्षत्रों व राशियों के मानव शरीर पर पढ़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करता है। जो पंचतत्व इन ग्रह नक्षत्र व राशियों में हैं। वही मानव शरीर में भी हैं, तो निश्चित ही इनका मानव शरीर पर गहरा प्रभाव होगा ही।

वैदिक ज्योतिष ने सात ग्रहों को प्राथमिकता दी है। सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि। राहु व केतु छाया ग्रह हैं। पाश्चात्य ज्योतिष जगत में युरेनस, नेप्चयुन व प्लुटो का भी महत्व है। ज्योतिष ने पंचतत्वों में प्रधानता के आधार पर ग्रहों में इन तत्वों को अनुभव किया है, सूर्य व मंगल अग्नि तत्व प्रधान ग्रह हैं। अग्नि तत्व शरीर की ऊर्जा व जीने की शक्ति का कारक है। अग्नि तत्व की कमी शरीर के विकास को अवरूद्ध कर रोगों से लड़ने की शक्ति को कम करती है। शुक्र व चंद्रमा जल तत्व प्रधान ग्रह हैं। शरीर में व्याप्त जल पर चंद्रमा का आधिपत्य है। शरीर में स्थित जल शरीर का पोषण करता है। जल तत्व की कमी आलस्य या तनाव उत्पन्न कर, शरीर की संचार व्यवस्था पर विपरीत प्रभाव डालती है। जल व मन दोनो की प्रकृति चंचल है, इसलिये चंद्रमा को मन का कारकत्व भी प्रदान किया गया है। उदाहारणार्थ देखें शुक्राणु जो तरल में ही जीवित रहते हैं, और यह सृष्टि के निर्माण में व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

शुक्र काम जीवन का कारक है, यही कारण है कि, शुक्र के अस्त होने पर विवाह के मुहुर्त नहीें निकाले जाते। बृहस्पति व राहु आकाश तत्व से सम्बंध रखते हैं। यह व्यक्ति के पर्यावरण व आध्यात्मिक जीवन से सीधा सम्बंध रखते हैं। बुध पृथ्वी तत्व का कारक ग्रह है। यह बुद्धिमता व निर्णय लेने की शक्ति शरीर को देता है। इस तत्व की कमी बुद्धिमता व निर्णय लेने की शक्ति पर विपरीत असर डालती है। शनि वायु तत्व प्रधान ग्रह है। शरीर में व्याप्त वायु पर इसका पूर्ण आधिपत्य है। केतु को मंगल की तरह माना गया है।
मानव जीवन के कुछ गुण मूल प्रकृति के रूप में भी मौजूद होते हैं। प्रत्येक मनुष्य में प्राकृतिक रूप से आत्मा, मन, वाँणी, ज्ञान, काम, व दुखः विद्यमान होते हैं। यह उसके जन्म समय की ग्रहस्थिति पर निर्भर करता है, कि किस मानव में इनकी प्रबलता कितनी है? विशेष रूप से प्रथम दो तत्वों को छोड़कर क्योंकि आत्मा से ही शरीर है। यह सूर्य का अधिकार क्षेत्र है। मन चंद्रमा का, बल मंगल का, वाँणी बुध का, ज्ञान बृहस्पति का, काम शुक्र व दुखः पर शनि का आधिपत्य है।

आधुनिक मनोविज्ञान मानव की चार मूल प्रवृत्तियाँ मानता है- भय, भूख, यौन व सुरक्षा। भय पर शनि व केतु का आधिपत्य है। भूख पर सूर्य व बृहस्पति का, यौन पर शुक्र तथा सुरक्षा पर चंद्र व मंगल का। मानव शरीर के विभिन्न धातु तत्वों का भी बह्माण्ड के ग्रहों से सीधा सम्बंध है। शरीर की हड्ढियों पर सूर्य, रक्त की तरलता पर चंद्र्रमा, शरीर के माँस व गर्मी पर मंगल, त्वचा पर बुध, चर्बी पर बृहस्पति, वीर्य पर शुक्र तथा स्नायुमंडल पर शनि का अधिपत्य है। राहु एवं केतु चेतना से सम्बंधित ग्रह हंै। शरीर क्रिया-विज्ञान के अनुसार मानव शरीर त्रिदोष से पीड़ित होता है, जो विभिन्न रोगों के रूप में प्रकट होते हैं। वात, पित्त व कफ! सूर्य, मंगल, पित्त, चंद्रमा व शुक्र कफ, शनि वायु तथा बुध त्रिदोष; यह प्रतीकात्मक हैं। नेत्र व्यक्ति को अच्छा या बुरा देखने व समझने का शक्तिशाली माध्यम है। आंतरिक व बाह्य रहस्यों को देखने में नेत्रों की भूमिका महत्वपूर्ण है। प्राचीन ज्योतिष के सभी सिद्धांत योगियों व ऋषियोें ने सिर्फ नेत्रों से देखकर व योगमार्ग से अनुभव करके बनाये हैं। बिना कोई वैज्ञानिक यंत्रों की सहायता से यह अपने आप में आंतरिक व बाह्य रहस्यों में ज्योतिष के महत्व को स्पष्ट करने के लिये पर्याप्त हैं। सूर्य व चंद्रमा साक्षी हैं, अतः ज्योतिष के विज्ञान या सत्य होने में कोई संदेह नही है।

यह थे, लेखक की पुस्तक :- “रोग एवं ज्योतिष” के कुछ अंश।

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संतान का योग

Dr.R.B.Dhawan

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“संतान होगी या नही?” इस विषय पर ज्योतिष शास्त्र में महर्षि पराशर ने बहुत स्टीक ग्रह गणना पद्धति प्रस्तुत की है। पुरुष के लिए “बीज स्फुट” और स्त्री के लिए “क्षेत्र स्फुट”। हालांकि इस ग्रह गणना के परिणाम कोई अंतिम और निर्णायक नहीं हो सकते, किन्तु फिर भी, संतानोत्पत्ति के प्रश्न का उत्तर काफी हद तक स्पष्ट हो जाता है। वृहदपराशर होरा शास्त्र में महर्षि पराशर कहते हैं- पुरूष का शुक्राणु (वीर्य) संतानोत्पत्ति के लिए योग्य है, अथवा अयोग्य! और यदि योग्य है, तो उत्तम है, या मध्यम श्रेणी का‌ है! इस प्रश्न का उत्तर बीज स्फुट गणना से देखना चाहिए-।

इसी प्रकार स्त्री के लिए “क्षेत्र स्फुट” ग्रह गणना से अनुमान हो सकता है कि स्त्री का गर्भाशय संतानोत्पत्ति के लिए योग्य है, अथवा उत्तम या मध्यम है, या फिर अयोग्य है। महर्षि ने वृहद पराशर होरा शास्त्र में उल्लेख किया है कि जिस प्रकार उपजाऊ भूमि में उत्तम बीज बोया जाये तो अच्छी फसल होती है, मध्यम भूमि में उत्तम बीज से मध्यम श्रेणी की फसल होती है, और मध्यम भूमि में मध्यम श्रेणी का बीज परिणाम इसी अनुसार होता है। और इसी प्रकार बंजर भूमि में कितना ही उत्तम बीज बोने से परिणाम शून्य ही होता है। और मध्यम बीज से भी परिणाम शून्य होता है, इसी प्रकार स्त्री के गर्भाशय को महर्षि ने क्षेत्र बताते हुए कहा है कि, इस ज्योतिषीय गणना पद्धति से देखना चाहिए कि स्त्री का गर्भाशय स्वस्थ (गर्भ धारण योग्य) है या नहीं।

डाॅक्टर विभिन्न प्रकार कि जाँच करने के बाद भी जो नही बता पाते, वो ज्योतिषी चंद मिनटों मे गणना करके बता सकते हैं। दम्पत्ती के जीवन मे संतान होने या ना होने के विचार के लिये ज्योतिष मे पंचम भाव, पंचमेश, संतान कारक बृहस्पति आदि पर विचार करने के ज्योतिषीय नियम बताये गये हैं, किन्तु महर्षि पाराशर ने संतान के विषय में एक क्रान्तिकारी ज्योतिषीय सूत्र दिया है, सूत्र यह है- पुरूष कि जन्म कुण्डली मे बीज स्फुट कि गणना, तथा स्त्री कि जन्म कुण्डली मे क्षेत्र स्फुट कि गणना करना। डाॅक्टर अनेक प्रकार कि जाँच करने के बाद भी यह ठीक से निर्णय नही कर पाते हैं कि समस्या पुरूष के शुक्राणुओं मे है, या स्त्री के गर्भाशय में। डाॅक्टर अनेक बार शारीरिक तौर पर पति-पत्नी को फिट बताते हैं, लेकिन फिर भी संतान के जन्म में बाधा उत्पन्न हो जाती है। लेकिन बीज स्फुट ओर क्षेत्र स्फुट कि गणना करके नि:संतान दंपत्ति को यह स्पष्ट रूप से बताया जा सकता है कि, रोग किसके शरीर में है।

क्या मेडिकल कि सहायता से संतान का जन्म हो सकेगा? बीज के वृक्ष बनने के लिये उसे उपजाऊ भूमि कि आवश्यकता होती है, अगर भूमि बंजर है तो बीज वृक्ष ना बन सकेगा। स्त्री कि जन्म कुण्डली मे क्षेत्र स्फुट कि गणना गर्भ के ठीक भूमि कि तरह उपजाऊ, बंजर या मध्यम होने का पता लगाने जैसा है। अगर स्त्री कि जन्मकुंडली मे क्षेत्र स्फुट सही आता है ओर पुरूष कि जन्म कुण्डली मे बीज स्फुट मध्यम आता हो या सही नही आता है तो मेडिकल ओर ज्योतिषीय उपाय वहाँ निःसंतान दंपत्ति कि सहायता कर सकते है। लेकिन क्षेत्र स्फुट के खराब होने पर मेडिकल ओर ज्योतिषीय उपाय सहायक नही हो पाते है।

आज के समय मे चिकित्सा विज्ञान के साथ यदि ज्योतिष विज्ञान को जोड़कर कार्य किया जाये तो चिकित्सा विज्ञान ओर अधिक सरल बन सकेगा। कुंडली में संतानोत्पत्ति और संतान सुख के लिए विशेष तौर पर पंचम भाव से देखा जाता है, किंतु कुंडली विश्लेषण करते समय हमें बहुत से तथ्यों पर ध्यान देना बहुत ही आवश्यक है। संतान के सुख-दु:ख का विचार सप्तमेश, नवमेश, पंचमेश तथा गुरु से किया जाता है। नवम स्थान जातक का भाग्य स्थान भी है, और पंचम स्थान से पांचवा स्थान भी होता है, इस कारण भी नवमेश पर दृष्टि रखना बतलाया गया है। बृहस्पति संतान और पुत्र का कारक है, अतएव बृहस्पति पर दृष्टि रखना आवश्यक है।

इसके अलावा एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि पुराने शास्त्रों में एक मंत्र लिखा है, कारकों भावः नाशयः इसका अर्थ यह हुआ कि जिस भाव का जो कारक होता है, वह उस भाव में स्थित हो तो, उस भाव का नाश करता है। इसलिए गुरु यदि पंचम भाव में हो तो बहुत बार देखा गया है कि संतान संबंधी चिंता व कष्ट रहते हैं। लग्न, चंद्रमा और बृहस्पति से पंचम भाव यदि पाप ग्रहों से युत अथवा दृष्ट हो, शुभ ग्रहों से युति या दृष्ट ना हो तो तीनो पंचम भाव पापग्रहों के मध्य पापकर्तरी स्थित हो तथा उनके स्वामी त्रिक 6 8 12 वे भाव में स्थित हो तो, जातक संतानहीन होता है। फलित शास्त्र के सभी ग्रंथो में इसका उल्लेख मिलता है।

अनेक प्राचीन विज्ञजनों ने यह लिखा है कि, यदि पंचम भाव में वृषभ, सिंह, कन्या अथवा वृश्चिक राशि हो तो, अल्प संतति होती है, या दीर्घ अवधि के बाद संतान लाभ मिलता है। ज्योतिष में हर विषय पर बहुत ही विस्तृत और बहुत ही बड़ा साहित्य मिलता है, और अनेक प्रकार के उपाय या विधियां दी हुई हैं, लेकिन मुख्य तौर पर कुछ सूत्र हैं, जिनके आधार पर हम संतान योग को अच्छी तरह से पता लगा सकते हैं, इसमें सबसे बड़ा सूत्र है बीज स्फुट और क्षेत्र स्फुट। बीज स्फुट से तात्पर्य पुरुष की कुंडली के ग्रहो की स्तिथि से है। अगर कोई फसल बोई तो बीज हमको उत्तम चाहिए यदि बीज अच्छा नहीं होगा तो कभी भी फसल अच्छी नहीं होगी। इसी प्रकार क्षेत्र स्फुट मतलब हम खेत से भी समझ सकते हैं,‌ यदि खेत अच्छा नहीं होगा तो कितने भी अच्छे बीज बो देवें उसके अंदर फसल अच्छी नहीं होगी, अतः पुरुष की कुंडली में बीज स्फुट और स्त्री की कुंडली मे क्षेत्र स्फुट की गणना बतलाई गयी है, जिससे भी संतान योग का अंदाज लगाया जा सकता है।

बीज स्फुट की गणना में हम पुरुष की कुंडली में सूर्य गुरु और शुक्र के भोगांश को जोड़कर एक राशि निकालते हैं, यदि वह राशि विषम होगी और नवांश में भी उसकी विषम में स्थिति होगी तो बीज शुभ होगा, और साथ ही यदि एक सम और दूसरा विषम है तो, मध्यम फल होंगे और दोनों सम राशियां होगी तो, अशुभ फल होंगे, और बीज अशुभ होगा।
स्त्री की कुंडली में क्षेत्र स्फुट की गणना में हमें चंद्रमा मंगल और गुरु के भोगांशों को जोड़ना पड़ेगा, और भोगांशो को जोड़ने के बाद जो राशि आएगी वह राशि यदि सम होगी और नवमांश में भी उसकी सम स्थिति होगी तो, क्षेत्र स्फुट अच्छा होगा साथ ही एक सम व दूसरी विषम है तो, मध्यम फल होंगे और दोनों विषम हुई तो अशुभ फल होंगे व स्त्री सन्तान उत्पन्न करने में सक्षम नही होगी।

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सैक्स और ज्योतिष

Dr.R.B.Dhawan

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इस आलेख में कुछ ऐसे ज्योतिषीय योगों का उल्लेख कर रहा हूं, जो किसी जातक की कुंडली में यदि हैं, तो उस योग को बनाने वाले ग्रह जातक को सामान्य से अधिक कामुक sexy होने का संकेत देते हैं –

1. किसी भी जातक की लग्न कुंडली में मंगल+शुक्र की युति काम वासना को उग्र कर देती है, जन्म के ग्रह जन्मजात प्रवृति की ओर इशारा करते हैं, और वह जातक इस के प्रभाव से आजीवन प्रभावित-संचालित होता है। किसी व्यक्ति में इस भावना का प्रतिशत कम हो सकता है, और किसी में ज्यादा हो सकता है। ज्योतिष के विश्लेषण के अनुसार यह पता लगाया जा सकता है की जातक में काम भावना किस मात्रा में विद्यमान है।

लग्न / लग्नेश :
1. यदि लग्न और बारहवें भाव के स्वामी एक हो कर केंद्र /त्रिकोण में बैठ जाएँ या एक दूसरे से केंद्रवर्ती हो या आपस में स्थान परिवर्तन कर रहे हों तो पर्वत योग का निर्माण होता है । इस योग के चलते जहां व्यक्ति भाग्यशाली , विद्या -प्रिय ,कर्म शील , दानी , यशस्वी , घर जमीन का अधिपति होता है, वहीं अत्यंत कामी और कभी कभी पर स्त्री गमन करने वाला भी होता है ।

2. यदि लग्नेश सप्तम स्थान पर हो, तो ऐसे व्यक्ति की रूचि विपरीत सेक्स के प्रति अधिक होती है । उस व्यक्ति का पूरा चिंतन मनन ,विचार व्यवहार का केंद्र बिंदु उसका प्रिय ही होता है ।

3.तुला राशि में चन्द्रमा और शुक्र की युति जातक की काम वासना को कई गुणा बड़ा देती है । अगर इस युति पर राहु/मंगल की दृष्टि भी तो जातक अपनी वासना की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।

4 तुला राशि में चार या अधिक ग्रहों की उपस्थिति भी is baat का कारण बनती है ।

5 सप्तम भाव में शुक्र की उपस्थिति जातक को कामुक बना देती है ।
शुक्र के ऊपर मंगल /राहु का प्रभाव जातक को काफी लोगों से शरीरिक सम्बन्ध बनाने के लिए उकसाता है ।

6.शुक्र/मंगल के साथ युति जातक में काम वासना को काफी बड़ा देती है ।

7 शुक्र मंगल की उपस्थिति 8 /12 भाव में हो तो, जातक कामुक होता है ।

8. कामवासना बढ़ाने में द्वादश भाव के स्वामी का मुख्य रोल होता है अगर इस का स्वामी सप्तम भाव में आए या लग्न में आजाये और वह मुख्यत: शुक्र या मंगल हो, ऐसा जातक स्वभाव से लंपट और बहुत सारी स्त्रियों से रिश्ता रखता है 4 7 या 12वे में हो, अथवा ईन दोनों ग्रहों का संबंध बन रहा हो तो, यह जातक के अत्यंत कामी sexy होने का संकेत है। ये ग्रह अधिक बलवान हों तो, जातक समय और दिन-रात की मर्यादा भूलकर सदैव सेक्स sex को आतुर रहता है। मंगल जोश है, और शुक्र भोग अतः इन दोनों की युति होने पर अधिकांश कुंडलियों में ये प्रभाव सही पाया गया है। ये बात वैध और अवैध दोनों संबंधो पर लागू होती है।

9. कुंडली का चतुर्थ भाव सुख का होता है, सातवा भाव गुप्तांग secret part को दर्शाता है और 12वां भाव शय्या सुख…! अतः सप्तमेश और व्ययेश की युति 4, 7 या 12 में हो तो, जातक/जातिका अतिकामुक होते हैं।

10. जातिका की कुंडली में यदि सप्तम में शुक्र+राहू या चंद्र+राहू हो और 12वें में गुरु हो तो, अधिकतर मामलो में पाया गया है कि शादी के बाद भी अवैध शारीरिक संबंध बनते हैं। तब संभावना और बड़ जाती है यदि वे सरकारी/प्राइवेट नौकरी में हो।

11. जातक/जातिका की कुंडली में गुरु और शुक्र समसप्तक हो तो भी वे अतिकामुक योग है, और ये योग वैवाहिक जीवन married life के निजी सुखो personal relationship में वृद्धि करता है। जातक के मामले में यदि मंगल और शुक्र समसप्तक हो तो ये योग की सार्थकता सिद्ध होती है।

12. नपुसंकता में सबसे बड़ा योगदान शनि और बुध का है, अतः यदि ये दोनों ग्रह सप्तम में हैं, या सप्तम पर दृष्टि दे रहे हैं तो, जातक/जातिका सेक्स sex के मामले में नीरस और अयोग्य होते हैं। जातक में उत्तेजना की कमी होती है। यदि 12वे भाव में ये युति हो या इन दोनों ग्रहों का दृष्टि संबंध हो तो, जातक शीघ्रपतन का रोगी होता है। और जतिका के मामले में वे ठंडी होती है। ये स्थिति और भी गंभीर हो सकती है, यदि राहू 1,7, 8 में हो तो,जातक व्यसन का आदि होकर अपनी जवानी धुएँ में उड़ा देता है।

13. जातक की कुंडली में यदि सप्तम में राहू+शुक्र हों तो जातक के शुक्राणु sperm तेजहीन होते हैं, और संतान प्राप्ति हेतु बहुत संघर्ष करना होता है। संतान “दिव्यांग” भी पैदा हो सकती है।

14. जातिका की कुंडली में यदि सप्तम में मंगल+राहू हो या इन दोनों का एक साथ दृष्टि संबंध सप्तम में हो तो, जातिका को श्वेतप्रदर और अनियमित माहवारी period का कष्ट होता है। यदि मंगल ज्यादा बलवान हो तो माहवारी period के दौरान बहुत अधिक रक्तश्राव bleeding होता है।

नोट- ये ज्योतिषीय योग हर मामले में लागू नहीं होते, ज्योतिष में भी कुछ मामले अपवाद होते हैं।

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