नारायण नागबली

नारायण नागबली (संतान बाधा निवारण हेतु पितृ दोष का प्रभावशाली उपाय):-

Dr.R.B.Dhawan astrological consultant, top Best Astrologer in Delhi,

नारायण नागबली छविनारायण नागबलि ये दोनो अनुष्ठान पद्धतियां संतान सुख की अपूर्ण इच्छा, कामना पूर्ति के उद्देश से किय जाते हैं, इसीलिए ये दोनो अनुष्ठान काम्य प्रयोग कहलाते हैं। वस्तुत: नारायणबलि और नागबलि ये अलग-अलग पूजा अनुष्ठान हैं। नारायण बलि का उद्देश मुखत: पितृदोष निवारण करना है। और नागबलि का उद्देश सर्प शाप, नाग हत्या का दोष निवारण करना है। इन में से केवल एक नारायण बलि या नागबलि अकेले नहीं कर सकते, इस लिए ये दोनो अनुष्ठान एक साथ ही करने पड़ते हैं।

पितृदोष निवारण के लिए ही नारायण नागबलि अनुष्ठान करने के लिये शास्त्रों मे निर्देशित किया गया है । प्राय: यह अनुष्ठान जातक के पूर्वजन्म के दुर्भाग्य संबधी दोषों से मुक्ति दिलाने के लिए किये जाते हैं। ये अनुष्ठान किस प्रकार व कौन इन्हें कर सकता है? इसकी पूर्ण जानकारी होना आवश्यक है। ये अनुष्ठान जिन जातकों के माता पिता जिवित हैं, वे भी विधिवत सम्पन्न कर सकते हैं, यज्ञोपवीत धारण करने के बाद कुंवारा ब्राह्मण यह अनुष्ठान सम्पन्न करा सकता है। संतान प्राप्ति एवं वंशवृद्धि के लिए ये अनुष्ठान सपत्नीक करने चाहीयें। यदि पत्नी जीवित न हो तो कुल के उद्धार के लिए पत्नी के बिना भी ये कर्म किये जा सकते हैं। यदि पत्नी गर्भवती हो तो गर्भ धारण से पाचवें महीने तक यह अनुष्ठान किया जा सकता है। घर में कोई भी मांगलिक कार्य हो तो ये अनुष्ठान एक साल तक नही किये जाते हैं। माता या पिता की मृत्यु् होने पर भी एक साल तक ये अनुष्ठान करने निषिद्ध माने गये हैं।

दोनों प्रकार यह अनुष्ठान एक साथ और निम्नलिखित इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए किये जाते हैं :-

1. काला जादू के प्रभाव से मुक्ति पाने के लिए।
2. संतान प्राप्ति के लिए।
3. भूत प्रेत से छुटकारा पाने के लिए।
4. घर के किसी व्यक्ति की दुर्घटना के कारण मृत्यु होती है (अपघात, आत्महत्या, पानी में डूबना) इस की वजह से अगर घर में कोई समस्याए आती है तो, उन समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए यह अनुष्ठान किया जाता है।

संतान प्राप्ति के लिए :-
सनातन मान्यता के अनुसार प्रत्येक दम्पत्ती की कम से कम एक पुत्र संतान प्राप्ति की प्रबल इच्छा होती है, और इस इच्छा की पूर्ति न होना दम्पत्ती के लिए बहुत दुःखदाई होता है, हालांकि इस आधुनिक युग में टेस्ट ट्यूब बेबी जैसी उपचार पद्धतियां उपलब्ध हैं, लेकिन कुछ जोड़ों की कमाई के हिसाब से यह बहुत खर्चीली होती हैं। इस लिये बहुत से लोग इन महेंगे उपचारों के कारण खर्च करने में समर्थ नहीं होते, और कुछ इस के लिए कर्जा लेते हैं, लेकिन जब कभी इस महेंगे उपचारों का भी कोई लाभ नहीं होता, तब यह जोड़े ज्योतिषीयों के पास जाते हैं, और एक अच्छा अनुभवी ज्योतिषी ही इस समस्या का समाधान और उपचारों की विफलता का कारण बता सकता है।

शास्त्र कहते हैं :- जहां रोग है, वहां उपचार भी है। इसी नियम को ध्यान में रखते हुऐ हमारे पूर्वज ऋषियों ने इन समस्याओं के समाधान हेतु ज्योतिष शास्त्र में कुछ विशेष उपाय सुझाए हुए है, सब से पहेले ज्योतिषी यह देखते हैं की इस की पीड़ित दंपति की जन्म कुंडली में संतान प्राप्ति का योग है या नहीं? अगर है, तो गर्भधारण करने में समस्या का कारण क्या है? जैसे की पूर्व जन्म के पाप, पितरों का श्राप, कुलविनाश का योग, इनमें से कोई विशेष कारण पता चलने के बाद वह उस समस्या का निराकरण सुझाते खोजते हैं। इन उपायों में से नारायण नागबली सर्वश्रेष्ठ उपाय माना जाता है। यदि यह अनुष्ठान उचित प्रकार से और मनोभाव से किया जाए, तो संतानोत्पत्ति की काफी संभावनाए हो जाती हैं।

भूत-प्रेत बाधा के कारण संतानोत्पत्ति में रूकावटें :-
कोई स्थाई अस्थाई संपत्ति जैसे के, घर जमीन या पैसा किसी से जबरन या ठग कर हासिल की जाती है तो, मृत्यु पश्चात् उस व्यक्ति की आत्मा उसी संपत्ति के मोह रहती है, उस व्यक्ति को मृत्यु पश्चात् जलाया या दफनाया भी जाए तो भी उस की इच्छाओं की आपूर्ति न होने के कारण उस की आत्मा को माया से मुक्ति नहीं मिल पाती, और वह आत्मा प्रेत योनी में भटकती है, और उस के पतन के कारण व्यक्ति को वह पीड़ा देने लगती है, यदि किसी शापित व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात् उसकी अंतेष्ठि विधि शास्त्रों अनुसार संपन्न न हो, या श्राद्ध न किया गया हो, तब उस वजह से उस से सम्बंधित व्यक्तिओं को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है, जैसे कि– संतति का आभाव, यदि संतान होती भी है, तो उस का अल्प जीवी होना
संतति का ना होना ही है।

1. काफी कष्टों के बावजूद आर्थिक अड़चनों का सामना करना
खेती में नुकसान।
2. व्यवसाय में हानि, नौकरी छूट जाना, कर्जे में डूब जाना,
परिवार में बिमारीयाँ।
3. मानसिक या शारीरिक परेशानी, विकलांग संतति का जन्म होना, या अज्ञात कारणों से पशुधन का विनाश।
4. परिवार के किसी सदस्यों को भूत बाधा होना।
5. परिवार के सदस्यों में झगड़े या तनाव होना।
6. महिलाओं में मासिक धर्म का अनियमित होना, या गर्भपात होना।
ऊपर लिखे हुये सभी या किसी भी परेशानी से व्यक्ति झूंज रहा हो तोतो, उसे नारायण-नागबली करने की सलाह दी जाती है।

श्राप सूचक स्वप्न :-
कोई व्यक्ति यदि निम्नलिखित स्वप्न देखता है, तो वह पिछले या इसी जन्म में श्रापित होता है :-
1. स्वप्न में नाग दिखना, या नाग को मारते हुवे दिखना, या टुकड़ो में कटा हुवा नाग दिखना।
2. किसी ऐसी स्त्री को देखना, जिसके बच्चे की मृत्यु हो गई है, वह उस बच्चे के प्रेत के पास बैठ कर अपने बच्चे को उठने को कह रही है, और लोग उसे उस प्रेत से दूर कर रहे है।
3. विधवा या किसी रोगी सम्बन्धी को देखना।
4. किसी ईमारत को गिरते हुए देखना।
5. स्वप्न में झगड़े देखना।
6. खुद को पानी में डूबते हुये देखना।
इस प्रकार के स्वप्नों से मुक्ति पाने के लिए नारायण-नागबली अनुष्ठान किया जाता है। धर्मसिंधु और धर्मनिर्णय इन प्राचीन ग्रंथो में इस अनुष्ठान के विषय में लिखा हुआ है।

दुर्मरण :-
किसी भी प्रकार से दुर्घटना यदि मृत्यु का कारण हो, और अल्पायु में मृत्यु होना दुर्मरण कहा जाता है। किसी मनुष्य की इस प्रकार से मृत्यु उस मनुष्य के परिवार के लिए अनेक परेशानियों का कारण बनती है। निम्नलिखित कारण से आने वाली मृत्यु दुर्मरण कहलाती है :-

1. विवाह से पहले मृत्यु होना।
2. परदेस में मृत्यु होना।
3. गले में अन्न अटक कर श्वास रुकने से मृत्यु होना।
4. पंचक, त्रिपाद या दक्षिणायन काल में मृत्यु होना।
5. आग में जल कर मृत्यु होना।
6. किसी खतरनाक जानवर के हमले से मृत्यु होना।
7. छोटे बच्चे का किसी के हाथों मारा जाना।
8. पानी में डूब जाने से मृत्यु होना।
9. आत्महत्या करना।
10. आकाशीय बिजली गिरने या बिजली के झटके से मृत्यु।
यह सब कारण हैं, जिसके कारण किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो, परिवार में आर्थिक, मानसिक वा शारीरिक परेशानियां हो सकती हैं, इं परेशानियों को दूर करने के लिए परिजनों को नारायण-नागबली करवाने की सलाह दी जाती ।

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संतान का योग

Dr.R.B.Dhawan

(Top astrologer in delhi,best astrologer in delhi)

“संतान होगी या नही?” इस विषय पर ज्योतिष शास्त्र में महर्षि पराशर ने बहुत स्टीक ग्रह गणना पद्धति प्रस्तुत की है। पुरुष के लिए “बीज स्फुट” और स्त्री के लिए “क्षेत्र स्फुट”। हालांकि इस ग्रह गणना के परिणाम कोई अंतिम और निर्णायक नहीं हो सकते, किन्तु फिर भी, संतानोत्पत्ति के प्रश्न का उत्तर काफी हद तक स्पष्ट हो जाता है। वृहदपराशर होरा शास्त्र में महर्षि पराशर कहते हैं- पुरूष का शुक्राणु (वीर्य) संतानोत्पत्ति के लिए योग्य है, अथवा अयोग्य! और यदि योग्य है, तो उत्तम है, या मध्यम श्रेणी का‌ है! इस प्रश्न का उत्तर बीज स्फुट गणना से देखना चाहिए-।

इसी प्रकार स्त्री के लिए “क्षेत्र स्फुट” ग्रह गणना से अनुमान हो सकता है कि स्त्री का गर्भाशय संतानोत्पत्ति के लिए योग्य है, अथवा उत्तम या मध्यम है, या फिर अयोग्य है। महर्षि ने वृहद पराशर होरा शास्त्र में उल्लेख किया है कि जिस प्रकार उपजाऊ भूमि में उत्तम बीज बोया जाये तो अच्छी फसल होती है, मध्यम भूमि में उत्तम बीज से मध्यम श्रेणी की फसल होती है, और मध्यम भूमि में मध्यम श्रेणी का बीज परिणाम इसी अनुसार होता है। और इसी प्रकार बंजर भूमि में कितना ही उत्तम बीज बोने से परिणाम शून्य ही होता है। और मध्यम बीज से भी परिणाम शून्य होता है, इसी प्रकार स्त्री के गर्भाशय को महर्षि ने क्षेत्र बताते हुए कहा है कि, इस ज्योतिषीय गणना पद्धति से देखना चाहिए कि स्त्री का गर्भाशय स्वस्थ (गर्भ धारण योग्य) है या नहीं।

डाॅक्टर विभिन्न प्रकार कि जाँच करने के बाद भी जो नही बता पाते, वो ज्योतिषी चंद मिनटों मे गणना करके बता सकते हैं। दम्पत्ती के जीवन मे संतान होने या ना होने के विचार के लिये ज्योतिष मे पंचम भाव, पंचमेश, संतान कारक बृहस्पति आदि पर विचार करने के ज्योतिषीय नियम बताये गये हैं, किन्तु महर्षि पाराशर ने संतान के विषय में एक क्रान्तिकारी ज्योतिषीय सूत्र दिया है, सूत्र यह है- पुरूष कि जन्म कुण्डली मे बीज स्फुट कि गणना, तथा स्त्री कि जन्म कुण्डली मे क्षेत्र स्फुट कि गणना करना। डाॅक्टर अनेक प्रकार कि जाँच करने के बाद भी यह ठीक से निर्णय नही कर पाते हैं कि समस्या पुरूष के शुक्राणुओं मे है, या स्त्री के गर्भाशय में। डाॅक्टर अनेक बार शारीरिक तौर पर पति-पत्नी को फिट बताते हैं, लेकिन फिर भी संतान के जन्म में बाधा उत्पन्न हो जाती है। लेकिन बीज स्फुट ओर क्षेत्र स्फुट कि गणना करके नि:संतान दंपत्ति को यह स्पष्ट रूप से बताया जा सकता है कि, रोग किसके शरीर में है।

क्या मेडिकल कि सहायता से संतान का जन्म हो सकेगा? बीज के वृक्ष बनने के लिये उसे उपजाऊ भूमि कि आवश्यकता होती है, अगर भूमि बंजर है तो बीज वृक्ष ना बन सकेगा। स्त्री कि जन्म कुण्डली मे क्षेत्र स्फुट कि गणना गर्भ के ठीक भूमि कि तरह उपजाऊ, बंजर या मध्यम होने का पता लगाने जैसा है। अगर स्त्री कि जन्मकुंडली मे क्षेत्र स्फुट सही आता है ओर पुरूष कि जन्म कुण्डली मे बीज स्फुट मध्यम आता हो या सही नही आता है तो मेडिकल ओर ज्योतिषीय उपाय वहाँ निःसंतान दंपत्ति कि सहायता कर सकते है। लेकिन क्षेत्र स्फुट के खराब होने पर मेडिकल ओर ज्योतिषीय उपाय सहायक नही हो पाते है।

आज के समय मे चिकित्सा विज्ञान के साथ यदि ज्योतिष विज्ञान को जोड़कर कार्य किया जाये तो चिकित्सा विज्ञान ओर अधिक सरल बन सकेगा। कुंडली में संतानोत्पत्ति और संतान सुख के लिए विशेष तौर पर पंचम भाव से देखा जाता है, किंतु कुंडली विश्लेषण करते समय हमें बहुत से तथ्यों पर ध्यान देना बहुत ही आवश्यक है। संतान के सुख-दु:ख का विचार सप्तमेश, नवमेश, पंचमेश तथा गुरु से किया जाता है। नवम स्थान जातक का भाग्य स्थान भी है, और पंचम स्थान से पांचवा स्थान भी होता है, इस कारण भी नवमेश पर दृष्टि रखना बतलाया गया है। बृहस्पति संतान और पुत्र का कारक है, अतएव बृहस्पति पर दृष्टि रखना आवश्यक है।

इसके अलावा एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि पुराने शास्त्रों में एक मंत्र लिखा है, कारकों भावः नाशयः इसका अर्थ यह हुआ कि जिस भाव का जो कारक होता है, वह उस भाव में स्थित हो तो, उस भाव का नाश करता है। इसलिए गुरु यदि पंचम भाव में हो तो बहुत बार देखा गया है कि संतान संबंधी चिंता व कष्ट रहते हैं। लग्न, चंद्रमा और बृहस्पति से पंचम भाव यदि पाप ग्रहों से युत अथवा दृष्ट हो, शुभ ग्रहों से युति या दृष्ट ना हो तो तीनो पंचम भाव पापग्रहों के मध्य पापकर्तरी स्थित हो तथा उनके स्वामी त्रिक 6 8 12 वे भाव में स्थित हो तो, जातक संतानहीन होता है। फलित शास्त्र के सभी ग्रंथो में इसका उल्लेख मिलता है।

अनेक प्राचीन विज्ञजनों ने यह लिखा है कि, यदि पंचम भाव में वृषभ, सिंह, कन्या अथवा वृश्चिक राशि हो तो, अल्प संतति होती है, या दीर्घ अवधि के बाद संतान लाभ मिलता है। ज्योतिष में हर विषय पर बहुत ही विस्तृत और बहुत ही बड़ा साहित्य मिलता है, और अनेक प्रकार के उपाय या विधियां दी हुई हैं, लेकिन मुख्य तौर पर कुछ सूत्र हैं, जिनके आधार पर हम संतान योग को अच्छी तरह से पता लगा सकते हैं, इसमें सबसे बड़ा सूत्र है बीज स्फुट और क्षेत्र स्फुट। बीज स्फुट से तात्पर्य पुरुष की कुंडली के ग्रहो की स्तिथि से है। अगर कोई फसल बोई तो बीज हमको उत्तम चाहिए यदि बीज अच्छा नहीं होगा तो कभी भी फसल अच्छी नहीं होगी। इसी प्रकार क्षेत्र स्फुट मतलब हम खेत से भी समझ सकते हैं,‌ यदि खेत अच्छा नहीं होगा तो कितने भी अच्छे बीज बो देवें उसके अंदर फसल अच्छी नहीं होगी, अतः पुरुष की कुंडली में बीज स्फुट और स्त्री की कुंडली मे क्षेत्र स्फुट की गणना बतलाई गयी है, जिससे भी संतान योग का अंदाज लगाया जा सकता है।

बीज स्फुट की गणना में हम पुरुष की कुंडली में सूर्य गुरु और शुक्र के भोगांश को जोड़कर एक राशि निकालते हैं, यदि वह राशि विषम होगी और नवांश में भी उसकी विषम में स्थिति होगी तो बीज शुभ होगा, और साथ ही यदि एक सम और दूसरा विषम है तो, मध्यम फल होंगे और दोनों सम राशियां होगी तो, अशुभ फल होंगे, और बीज अशुभ होगा।
स्त्री की कुंडली में क्षेत्र स्फुट की गणना में हमें चंद्रमा मंगल और गुरु के भोगांशों को जोड़ना पड़ेगा, और भोगांशो को जोड़ने के बाद जो राशि आएगी वह राशि यदि सम होगी और नवमांश में भी उसकी सम स्थिति होगी तो, क्षेत्र स्फुट अच्छा होगा साथ ही एक सम व दूसरी विषम है तो, मध्यम फल होंगे और दोनों विषम हुई तो अशुभ फल होंगे व स्त्री सन्तान उत्पन्न करने में सक्षम नही होगी।

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