साढ़ेसाती,Sadesati

शनि की साढ़ेसाती और साढ़ेसाती का प्रभाव :-

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant), top best astrologer in delhi

नीलाम्बरः शूलाधरः किरीटी गघ्रस्थित स्त्रासकरो धनुष्ठाम्।
चतुर्भुजः सूर्यसुतः प्रशान्तः सदाऽतु महां वरदोऽल्पगामी।।

शरीर पर नीले वस्त्राभूषण धारण करने वाले, सिर पर मुकुट को, हाथों में धनुष और शूल को धारण करने वाले, गीध पर विराजमान, प्राणियों को भय देने वाले, मंदगति से चलने वाले और चार भुजाओं से युक्त सूर्य के पुत्र शनिदेव हमारे प्रति शांत और शुभ वर देने वाले हों।

शनि ग्रह का परिचय-
भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया ने शनिदेव को जन्म दिया। शनिदेव का स्तवन काश्यपेयं महद्रद्युतिम कहकर किया जाता है। क्योंकि शनि को महर्षि कश्यप की वंश परम्पराओं में माना गया है। एक मत के अनुसार महर्षि कश्यप के अभिभावकत्व में संपन्न काश्यपेय यज्ञ का संबंध शनि की उत्पत्ति से है। भारतीय ज्योतिष के सात ग्रहों में शनिग्रह सबसे दूरस्थ है। यह सूर्य की एक परिक्रमा 29.5 वर्षों में पूरी करता है, तथा एक राशि में लगभग 2.5 वर्ष तक रहता है। शनि के दस चन्द्रमा हैं। शनि अस्त होने के 38 दिन बाद उदय होता है। तत्पश्चात 135 दिनों तक सामान्य गति से उसके बाद 105 दिनों तक वक्री गति से संचरणशील रहता है। वक्र गति से परिक्रमा करते हुए पश्चिम से अस्त होता है।

ज्योतिर्विदों एवं खगोलविदों ने शनि ग्रह को नीलनिलय का सुन्दरतम ग्रह स्वीकार किया है। विषय यहां साढ़ेसाती से सम्बध है, अतः शनि की साढ़ेसाती sadesati का मुख्यतः कारण उसके वलय हैं। शनिग्रह एक नीली गेंद की भांति प्रतीत होते हैं, ये तीन पीले वलयों के बीच स्थित हैं। यही वलय साढ़ेसाती का कारण है। क्योंकि शनिदेव जिस राशि पर भ्रमण करते हैं एक वलय उस राशि से आगे वाली राशि पर प्रभाव डालता है, तथा पीछे वाला वलय पीछे वाली राशि पर प्रभाव डालता है। मध्य राशि में शनिदेव स्वयं स्थित होते हैं। अतः गोचर में शनिदेव जिस राशि पर भ्रमण करते हैं, उसके आगे-पीछे की राशियों को प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए वर्तमान में शनि धनु राशि में स्थित हैं, अतः धनु राशि वाले जातकों के लिए तो शनि की साढ़ेसाती चल ही रही है। वृश्चिक राशि वालों के लिए उतरती साढ़ेसाती तथा मकर राशि वालों के लिए चढ़ती हुई साढ़ेसाती लगी हुई है। चूंकि शनि ग्रह एक राशि में 2.5 वर्ष रहते हैं, तथा उसके वलय आगे पीछे रहते हैं अतः गोचर कालीन शनि से एक राशि 2.5×3=7.5 वर्ष तक प्रभावित होती है, इसे ही शनि की साढ़ेसाती कहते हैं।

जब एक जातक के जन्मकालीन चन्द्रमा से शनि 12वें हो तब साढ़ेसाती का प्रारंभ होता है। जन्मकालीन चन्द्रमा पर शनि का गोचर योग कहलाता है, तथा अन्यकालीन चन्द्रमा से द्वितीयस्थ शनि पाद कहलाता है। जिन जातकों की जन्मपत्रिका नहीं है। उनको साढ़ेसाती के प्रभाव उनकी मानसिक स्थिति से अनुमान द्वारा जाना जा जाता है।

ज्योतिष तत्व प्रकाश के अनुसार-
द्वादशे जन्मगे राशौ द्वितीये च शनैश्चरः।
सार्धानि सप्तवर्षाणि तदा दुःखेर्युतो भवेत्।। रिष्फ रूप धनमेषु भास्करिः संस्थितो भवति यस्य जन्मजात्।
लोचनोदरपदेषु संस्थितिः कथ्यते रविजलोकजैर्जनं।। (ज्योतिष तत्व प्रकाश)

शनि जन्म राशि से द्वादश भाव (12), जन्म राशि (1), एवं जन्मराशि से द्वितीयस्थ (2) हो तो, शनि की साढ़ेसाती आरोपित होती है। शनि के आगे वाले वलय को नेत्रों की संज्ञा दी गई है, स्वयं शनि देव जिस राशि में रहते हैं, उसे उदर की संज्ञा दी गई है, तथा शनिदेव के पीछे वाले वलय को पाद (पावो) की संज्ञा दी गई है। अर्थात लगती हुई साढ़ेसाती sadesati को नेत्रों पर, बीच वाली (मध्य) साढ़ेसाती को भोग तथा उतरती हुई साढ़ेसाती को पाद काल कहा जाता है। शनि की साढ़ेसाती स्वयं में भीषण भय तथा सघन संत्रास उत्पन्न करने वाले शब्द हैं। साढ़ेसाती के विषय में अनेकानेक भ्रांतियाँ भी प्रचलित हैं। लौकिक कथाओं में साढ़ेसाती विनाशक काल प्रहार के रूप में प्रस्तुत होती है। शनि की विकरालता में साढ़ेसाती की क्रूरता संयुक्त होकर प्रकम्पन उत्पन्न कर देती है। परंतु प्रत्येक जातक के लिए शनि की साढ़ेसाती विकरालता या क्रूरता लिये नहीं आती, अतः शनि की साढ़ेसाती के प्रभावों को समझने के लिए शनिदेव की प्रकृति को समझना आवश्यक है।

शनि देव की प्रकृतिः-
शनि के पर्याय नाम- शनि, मन्द, छायायुक्त-पंगु, पंगुकाय, कोण, तरणि, तनय, घुमणिसुत, पातंगी, मृदु, नील, कपिलाक्ष, कृशांग, दीर्घ, छायातज, यम, अर्कपुत्र, सौरि, क्रोड, क्रूरलोचन, दुःख।

शनि का सामान्य/विशेष स्वरूपः-
मन्दोऽलसः कपलिदृक कृश दीर्घगात्रः।
स्थूलद्विजः परुष रोम कचोऽनिलात्मा।।

शनि प्रधान पुरुष आलसी, पिंगलवर्ण, दृष्टियुक्त, दुबला तथा लम्बी देहवाला, मोटे दांतों वाला होता है। इसके रोम और केश रूखे होते हैं। यह वात प्रकृति प्रधान होता है। सूर्यपुत्र शनि दुःखदायक काले वर्ण का होता है। स्नायुतंत्र, कूड़ा करकट फेंकने की जगह, फटे पुराने कपड़े, लोहा, कबाड़, शिशिर तथा नमकीन रूचि पर शनि का अधिकार है।

कान्नियरोमावयवः कृशात्मा दुर्वासिताङ्ग कफ मारू मात्मा।
पीनद्विजश्चारूपिशङ्ग दृष्टिः सौरिस्तमो बुद्धि रतोऽलसः स्यात।। (वेधनाथ)

शनि प्रधान व्यक्ति के केश और अव्यव कठिन (मोटे) होते हैं। इसका शरीर दुर्बल होता है। शरीर का रंग दूर्वा जैसा (श्याम) होता है। इसकी प्रकृति कफ-वात होती है। इसके मोटे दांत होते है। दृष्टि पिंगलवर्ण की, यह तामसी बुद्धि वाला तथा आलसी होता है। शनि का उदय पृष्ठ भाग से होता है। यह चैपाया है पर्वत वनों में घूमने वाला, सौ वर्ष की आयु का मूल प्रधान होता है। इसके देवता ब्रह्मा है, इसका रत्न नीलम है। इसका प्रदेश गंगा से हिमालय तक है। यह वायु तत्व प्रधान कसैली रूचिवाला, निम्न दृष्टि वाला और तीक्ष्ण स्वभाव वाला होता है, तुला, मकर, कुम्भ राशि में, जाया स्थान (स्त्री स्थान) में, विषुव के दक्षिणायान में स्वग्रह (मकर कुम्भ) में, शनिवार में, अपनी दशा में, राशि के अन्त भाग में, युद्ध के समय में, कृष्ण पक्ष, वक्री होने पर किसी भी स्थान में शनि बलवान होता है।

श्यामलोऽति मालिनश्च शिरालः सालसश्च जटिलः कृश दीर्घ।
स्थूल नख पिगंल नेत्रोयुक् शनिश्च खलता निलकोपः। (टुण्डीराज)

शनि श्याम वर्ण, हृदय से अर्थात् अन्तरात्मा से मलिन, नसों से व्याप्त देह वाला, स्वभाव से आलसी, जटायुक्त, दुर्बल तथा लम्बा शरीर दांत और नाखून मोटे, पीतवर्ण की आंखों वाला, दुष्ट स्वभाव, क्रोधी तथा वायु प्रधान प्रकृति का होता है।
विद्वानों का मत है कि दशम तथा एकादश राशियों पर शनि का अधिकार है, अर्थात् मकर और कुम्भ राशियों का स्वामी शनि है। इसका उच्च स्थान सप्तम राशि तुला है। नीच राशि मेष है। यह सीमांतक ग्रह कहलाता है, क्योंकि यहां पर सूर्य का प्रभाव समाप्त हो जाता है, वहां पर शनि के प्रभाव का प्रारंभ होता है। शनि सूर्य से पराजित होता है, और मंगल को परास्त कर देता है। पाश्चात्य ज्योतिर्विद विलियम लिलि के अनुसार, शनि प्रधान व्यक्ति का शरीर साधारणतः शीतल और रूक्ष होता है, मझंला कद, फीका काला रंग, आंखें बारीक और काली, दृष्टि नीचे की ओर, भाल भव्य, केश काले और लहरीले तथा रूक्ष, कान बड़े लटकते जैसे, भौंहे झुकी हुई, होंठ और नाक मोटा, दाढ़ी पतली, इस प्रकार का स्वरूप बतलाया जा सकता है। इसका चेहरा देखने से प्रसन्नता नहीं होती। सिर झुका हुआ और चेहरा अटपटा सा लगता है। कंधे चौड़े, फैले, टेढ़े होते हैं। पेट पतला, जघाएं पतली तथा घुटने और पैर टेढे-मेढ़े होते हैं। चाल शराबी जैसी लड़खड़ाती प्रतीत होती है। घुटने एक-दूसरे से सटे रखकर चलते हैं। शनि पूर्व की ओर हो तो प्रमाण बद्धता और मृदुता कुछ हद तक होती है। कद मोटा होता है। पश्चिम की ओर हो तो कृश और अधिक काले रंग का होता है। शरीर पर केश बहुत कम होते हैं। शनि के शर कम हों तो कृशता ज्यादा होती है। शर अधिक हों तो मांसल शरीर होता है।

शनि का कारकत्वः-
प्रत्येक ग्रह किन-किन का कारक होता है। इसके संबंध में उतर कालामृत ज्योतिष ग्रंथ के रचयिता कालिदास ने सभी प्राचीन ग्रंथों से अधिक ग्रहों के कारकत्व का वर्णन किया है। अतः सर्वप्रथम शनि का कारकत्व उत्तर कालामृत से उद्धृत किया जा रहा है-

शनि से इन विषयों का विचार करना चाहिए-
जड़ता अथवा आलस्य, रूकावट, घोड़ा, हाथी, चमड़ा, आय, बहुत कष्ट, रोग, विरोध, दुःख, मरण, स्त्री से सुख, दासी, गधा अथवा खच्चर, चाण्डाल, विकृत अंगों वाले, वनों में भ्रमण करने वाले डरावनी सूरत, दान, स्वामी, आयु, नपुंसक, अन्त्यज, खग, तीन अग्नियां, दासता का कर्म करने वाले, अधार्मिक कृत्य, पौरुषहीन, मिथ्या भाषण, चिरस्थायी, वायु, वृद्धावस्था, नसें, दिन के अंतिम भाग में बलवान, शिशिर ऋतु, क्रोध, परिश्रम, नीच जन्मा, हरामी, गौलिक, गन्दा कपड़ा, घर, बुरे विचार, दुष्ट से मित्रता, काला, पाप कर्म, क्रूर कर्म, राख, काले धान्य, मणि, लोहा, उदारता, वर्ष, शूद्र, वैश्य, पिता का प्रतिनिधि, दूसरे के कुल की विद्या सीखने वाला, लंगड़ापन, उग्रता, कम्बल, पश्चिमाभिमुख, जिलाने के उपाय, नीचे देखना, कृषि द्वारा जीवन निर्वाह, शस्त्रागार, जाति से बाहर वाले स्थान, ईशान दिशा का प्रिय, नागलोक, पतन, युद्ध, भ्रमण, शल्यविद्या, सीसा धातु, शक्ति का दुरूपयोग, शुष्क, पुराना तेल, लकड़ी, ब्राह्मण, तामस गुण, विष, भूमि पर भ्रमण, कठोरता, इच्छुक, वस्त्रों से सजाना, यमराज का पुजारी, कुत्ता, चित्त, की कठोरता आदि शनि के कारकत्व है।

जैसे सौर मण्डल में शनि का स्थान सबसे अंत में है ऐसे ही गुणों आदि में भी शनि का स्थान अंत में अर्थात घटिया, निकृष्ट अधम है। यही कारण है कि शनि निम्न वर्ग का (मजदूरों का, सफाई कर्मचारियों का ग्रह) माना गया है। वर्णों में इसीलिए शूद्र की पदवी प्राप्त है। घर में नौकर, भ्रत्य की सी निम्न स्थिति है, सूर्य से दूर रहने के कारण इसमें प्रकाश कम है। यही कारण है कि शनि को विद्याहीन, प्रकाशहीन, काला, विद्याहीन माना गया है। प्रकाश की रश्मियों से जो पदार्थ वंचित हैं उनकी पूरी उन्नति नहीं हो पाती। अतः शनि अपूर्णता, हीनता, अभाव आदि का द्योतक है। इसी प्रकाश आदि के अभाव से कई रोगों की उत्पत्ति होती है। इसीलिए शनि को रोग का कारण माना गया है। नवग्रह परिवार में मंद गति से भ्रमण करने (शनैः शनैःश्चर) धीरे-धीरे चलाने वाला शनैश्चर कहा गया है। मन्द गति होने के कारण शनि को लंगड़े की उपाधि भी दी गई है। शनि की कुण्डली में स्थिति मनुष्य की टांगों की स्थिति को बतला देती है। प्रकाशहीन वनस्पति तथा अन्य जीवन, मृत पदार्थों, जैसे चमड़ा और पत्थर इनसे भी शनि का घनिष्ठ संबंध है। मन्दगति होने के कारण कार्यों का विलम्ब से सम्पादन होना स्वाभाविक ही है। अतः विलम्ब से, बहुत काल से, आयु से, दीर्घ रोग से, दीर्घ आकार से शनि का संबंध है और इन वस्तुओं का शनि इसलिए कारक भी है।

साढ़ेसाती sadesati स्वयं में भयप्रद शब्द है किन्तु संपूर्ण साढ़ेसाती काल विध्वंसक या खराब नहीं होता, कारण कि सभी राशियों पर शनि की साढेसाती का प्रभाव समान नहीं होता, क्योंकि साढ़ेसाती का संबंध गोचर से है। अतः गोचर में शनि जन्मांग में अपनी स्थिति प्रत्येक राशि में उसके अधिपति के साथ अपने संबंध के अनुसार ही फल प्रदान करेगा। जैसा कि विदित है, शनि मकर एवं कुम्भ राशि का स्वामी, कुम्भ राशि में मूल त्रिकोण, तुला राशि में उच्च के तथा मेष राशि में नीच के होते हैं। बुध एवं शुक्र, राहु ग्रह मित्र हैं। सूर्य चन्द्र मंगल शत्रु हैं, गुरु केतु सम है। अतः शनि जन्मागीय स्थिति के अनुसार फल प्रदान करता है। कुछ ज्योतिषाचार्यों के अनुसार शनि जन्म राशि के अनुसार निम्नानुसार फल प्रदान करता हैं :-

1. मेष राशि- मध्य भाग घातक।
2. वृष राशि- प्रारंभ घातक।
3. मिथुन राशि- अंत भाग घातक।
4. कर्क राशि- मध्य व अंत घातक।
5. सिंह राशि- प्रारंभ व मध्य घातक।
6. कन्या राशि- प्रारंभ घातक।
7. तुला राशि- अंत घातक।
8. वृश्चिक राशि- मध्य व अंत घातक।
9. धनु राशि- प्रारंभ व मध्य घातक।
10. मकर राशि- समस्त समय सम।
11. कुम्भ राशि- समस्त समय शुभ।
12. मीन राशि- अंत घातक।

इसके अतिरिक्त तीनों चरणों का समग्र परिणाम निम्नानुसार रहता है, व्यवहार में ऐसा पाया जाता है।

1. प्रथम चरण- जन्म राशि से 12वें भाव में आते ही शनि साढ़ेसाती का प्रथम चरण प्रारंभ हो जाता है। साढ़ेसाती के प्रथम चरण अर्थात् साढ़ेसाती sadesati के प्रथम ढ़ाई वर्ष में व्यक्ति आर्थिक रूप से अत्यंत पीड़ित होता है। आय की अपेक्षा व्यय की अधिकता होने से पूर्व नियोजित योजनाएं विघटित होती हैं। अप्रत्याशित आर्थिक हानि चकित करती है। शैय्या सुख में कमी आती है। जातक का स्वयं स्वास्थ्य बाधित रहता है। फलस्वरूप शारीरिक सुखों में कमी आती है। व्यक्ति निरूद्देश भटकता रहता है। यात्रा का सुफल प्राप्त नहीं होता। नेत्र व्याधि संभव है। चश्में का प्रयोग जातक के लिए अपेक्षित हो सकता है। जातक के पिता की माता अर्थात दादी को मारक कष्ट होता है। व्यक्ति का स्नायुतंत्र व्याधिग्रस्त रहता है। अभिभावक एवं आत्मीय जन कष्ट का अनुभव करते हैं। कुटुम्ब से वियोग या अलगाव (बंटवारा) होता है। पिता को कष्ट होता है। लाभ एवं आय नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है।

2. द्वितीय चरण- साढे़साती का द्वितीय चरण तब प्रारंभ होता है जब शनि जन्मकालीन चन्द्रमा पर गोचर करता है। इसे उदर या पेट की या द्वितीय चरण साढे़साती sadesati कहते हैं। द्वितीय चरण का प्रभाव जातक को आर्थिक, शारीरिक एवं मानसिक रूप से प्रभावित करता है। आर्थिक चिन्ताएं निरन्तर रहती हैं। शारीरिक सार्मथ्य, प्रभाव व गति आक्रान्त होती है। मानसिक स्तर पर प्रबल उद्वेलन रहता है। व्यर्थ का व्यय व्यथित करता है। कोई कार्य मनोनुकूल नहीं होता। अपूर्ण कार्य दु:खी करते हैं, व्यवधान एवं बाधाएं प्रबल रहती हैं। व्यक्तित्व मन्द होता है। गृहस्थ का पारिवारिक तथा व्यवसायिक जीवन अस्तव्यस्त रहता है। किसी सगे-संबंधी को मारक कष्ट होता है। दीर्घयात्राएं, शरीर से कष्ट, आत्मीयों से पृथक्य द्वारा कष्ट, संपत्ति की हानि, सामाजिक प्रतिष्ठा पर आंच, मित्रों का अभाव एवं कार्य में अवरोध द्वितीय चरण के फल हैं। प्रयास निष्फल होते हैं, अर्थात प्रत्यय फलीभूत नहीं होते।

3. तृतीय चरण- साढ़ेसाती का तृतीय चरण तब प्रारंभ होता है जब शनिदेव जन्मकालीन चन्द्रमा से द्वितीयस्थ होते हैं। यह उतरती साढ़ेसाती या पाद (पावों) पर साढ़ेसाती कही जाती है। इसका फल यह होता है कि आत्मीय जनों से निष्प्रयोजन संघर्ष होता है। इन्हें गंभीर व्याधि अथवा किसी को मारक होता है। व्यक्ति का स्वास्थ्य, सन्तति सुख एवं आयुबल प्रभावित होता है। सुखों का नाश होता है। पदाधिकार विलुप्त होता है, किन्तु धनागम होता रहता है। शारीरिक रूप से जड़ता अथवा निर्बलता का अनुभव होता है। आनन्द बाधित होता है। निम्न व्यक्ति से प्रवचना होती है। धन का व्यय एवं अपव्यय होता है।

साढ़ेसाती की आवृत्तियांः-
सामान्यता एक जातक को अपने जीवन काल में तीन बार शनि की साढ़ेसाती झेलनी होती है। चतुर्थ कोई बिरला जातक ही प्राप्त करता है। क्योंकि शनि एक चक्र लगभग 30 वर्ष में पूरा करता है। 30×3=90 वर्ष की आयु तक तीसरी आवृत्ति संभावित होती है। चतुर्थ आवृति दु:साध्य एवं अपवाद स्वरूप ही प्राप्त होती है। प्रत्येक आवृत्ति में शनि की साढ़ेसाती की सार्मथ्य अलग-अलग होती है। जीवन में साढ़ेसाती की प्रथम आवृत्ति अत्यंत प्रबल होती है। प्रभावित व्यक्ति कष्टों अवरोधों क्षतियों से आक्रांत होता है। जातक के जीवन में प्राप्त द्वितीय साढ़ेसाती का प्रभाव मारक न्यूनतम होता है। व्यक्ति थोडी सुविधा का अनुभव करता है। तृतीय आवृत्ति भीषण परिणामों से परिपूर्ण होती है। व्यक्ति अनेक अनापत्तियों से आक्रांत रहता है। शनि अपने क्रूर प्रभाव से जीवन का सर्वनाश करने पर आमादा होता है। आयुबल निर्बल हो तो जातक को जीवन हानि होती है। इस आक्रमण से कोई सौभाग्यशाली जातक ही अपने को सुरक्षित रख पाते हैं।

शनि की साढेसाती एक विश्लेषणः-
परम्परागत रूप से यह माना जाता है कि जन्मकालीन चन्द्रमा से द्वादश भाव में आते ही (शनि के) साढे़साती प्रारंभ हो जाती है। यह स्थूलरूप से सही हो सकती है किन्तु सूक्ष्म रूप से सही नहीं हो सकती। गोचर का शनि जब जन्मकालीन चन्द्रमा के आस-पास रहता है। तब साढ़ेसाती का प्रभाव जातक को प्रभावित करता है। गणितीय दृष्टि से जन्मकालीन चन्द्रमा के राशि अंश कला विकला से 45 अंश पहले तथा 45 अंश बाद तक गोचर के शनि का भ्रमण साढ़ेसाती sadesati कहलायेगी। इसे एक उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है।

उदाहरण के लिए किसी जातक का चन्द्र स्पष्ट 4/10/18 है तो इस जातक के साढ़ेसाती कब प्रारंभ होगी।

राशि अंश कला
04 10 18’
01 15 00 (- 45 अंश = 1 राशि 15 अंश)

———————
02 25 18’

अर्थात मिथुन राशि में शनि के 25 अंश 18’ पर आते ही शनि की साढ़ेसाती प्रारंभ होगी। यह शनि की सा़ढ़ेसाती का प्रारंभ होगा। शनि की साढ़ेसाती कब तक रहेगी ? पुनः जन्मकालीन चन्द्रमा में 45 अंश जोड़कर गणना करेंगे :-

राशि अंश कला
04 10 18’
01 15 00 (+ 1 राशि 15 अंश)

————————
05 25 18’

अर्थात शनि जब तक कन्या राशि के 25 अंश 18’ तक गोचर करेंगे, तब तक शनि की साढ़ेसाती रहेगी।

किसी भी कुंडली के लिये शनि की साढे़साती sadesati का फलादेश बहुत कुछ जातक की कुंडली में शनि की स्थिति पर निर्भर करता है। कुंडली में शनि की स्थिति कैसी है, शनि उच्च है, नीच राशि में है, या मित्र, शत्रु, सम स्थिति का प्रभाव गोचर नियमों को प्रभावित करता है, अतः साढ़ेसाती फल कथन के समय अग्रलिखित नियमों को ध्यान में रखते हुए भविष्यवाणी की जाये तो फल कथन में उत्कृष्टता रहती है :-

✓ शनि जन्मांग में उच्चस्थ हो, स्वराशिस्थ हो, मित्र राशिस्थ हो या मूल त्रिकोणस्थ हो तो परिणामों में अपेक्षतया शुभता अधिक रहती है।

✓ जन्मांगीय शनि सबल और गोचरीय शनि दुर्बल हो तो परिणाम मध्यम रहता है।

✓ जन्मांगीय शनि निर्बल (नीचस्थ, शत्रुग्रही) हो और गोचरीय शनि भी दुर्बल हो तो अत्यधिक अप्रिय फल प्राप्त होते हैं।

✓ यदि गोचरीय शनि अवांछित अमंगल परिणाम प्रदान कर रहा हो तो अन्य ग्रहों से प्राप्त होने वाले शुभ फलों में भी न्यूनता होती है।

✓ यदि गोचरीय शनि अप्रिय फलदाता हो, और बृहस्पति सर्वदा शुभ फल प्रदाता हो तो अप्रिय फलों में कमी होती है।

✓ जिस समय गोचरीय शनि शुभ फल प्रदाता हो, और बृहस्पति अप्रिय फल प्रदाता हो तो-उसमें प्रायः अनुकूल परिणाम ही प्राप्त होते हैं।

✓ बृहस्पति एवं राहु के अप्रिय फल सूचित हों, और शनि अनुकूल परिणाम प्रदाता हो तो प्रिय फलों की मात्रा अधिक रहती है।

✓शनि की भीषणता जातकों को स्मरण मात्र से प्रकम्पित कर देती है। महाराजा दशरथ ने शनि की संहारक क्षमता का वर्णन इन शब्दों में किया है-

ब्रह्मा शक्रा हरिश्चैव ऋषयः सप्ततारकाः।
राज्यभ्रष्ट्राः पतन्त्येतो त्वया दृष्टयाऽवलोकिताः।।
देशाश्च नगर ग्राम द्वीपाश्चैव तथा दु्रमाः।
तव्या विलोकिताः सर्वे विनश्यन्ति समूलतः।।
प्रसादं कुरू हे सौरे! वरदो भव भास्करे।।

अर्थात :- ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु और सप्त ऋषि भी तुम्हारे दृष्टि निक्षेप से पदच्यूत हो जाते हैं। देश, नगर, गांव, द्वीप वृक्ष तुम्हारी दृष्टि से समूल विनष्ट हो जाते हैं। अतः हे सूर्यदेव के पुत्र शनिदेव! प्रसन्न होकर हमें मंगलमय वर प्रदान करो।

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