पूर्णिमा और अमावस्या

हिन्दू संस्कृति में क्यों महत्वपूर्ण हैं,पूर्णिमा और अमावस्या ? :-

Dr.R.B.Dhawan

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पूर्णिमा :- पूर्णिमा का महत्व जहां हिन्दू और सनातन संस्कृति में पर्व के रूप में विशेष है, वहीं आधुनिक विचारधारा सांस्कृतिक विचारधारा से बिल्कुल अलग है। भारतीय सनातन या वैदिक गणना के अनुसार हर माह की पूर्णिमा का कोई न कोई धार्मिक महत्व है, वर्ष की सभी 12 पूर्णिमा के नाम और अपने अपने प्रभाव हैं :- 1. चैत्र की पूर्णिमा के दिन हनुमान जयंती मनाई जाती है। 2. वैशाख की पूर्णिमा के दिन बुद्ध जयंती मनाई जाती है। 3. ज्येष्ठ की पूर्णिमा के दिन वट-सावित्री मनाया जाता है। 4. आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरू-पूर्णिमा कहते हैं, इस दिन गुरु पूजा का विधान है। इसी दिन कबीर जयंती भी मनाई जाती है। 5. श्रावण की पूर्णिमा के दिन रक्षाबन्धन का पर्व मनाया जाता है। 6. भाद्रपद की पूर्णिमा के दिन उमा माहेश्वर व्रत मनाया जाता है। 7. अश्विन की पूर्णिमा के दिन शरद पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। 8. कार्तिक की पूर्णिमा के दिन पुष्कर मेला और गुरुनानक जयंती पर्व मनाए जाते हैं। 9. मार्गशीर्ष की पूर्णिमा के दिन श्री दत्तात्रेय जयंती मनाई जाती है। 10. पौष की पूर्णिमा के दिन शाकंभरी जयंती मनाई जाती है, जैन धर्म के मानने वाले पुष्यभिषेक यात्रा प्रारंभ करते हैं। बनारस में दशाश्वमेध तथा प्रयाग में त्रिवेणी संगम पर स्नान का बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। 11. माघ की पूर्णिमा के दिन संत रविदास जयंती, श्री ललित और श्री भैरव जयंती मनाई जाती है, माघी पूर्णिमा के दिन संगम पर माघ-मेले में जाने और स्नान करने का विशेष महत्व है। 12. फाल्गुन की पूर्णिमा के दिन होली का पर्व मनाया जाता है।

खगोल वैज्ञानिकों के अनुसार इस दिन चन्द्रमा का प्रभाव काफी तीव्र होता है, इस कारण शरीर के अंदर न्यूरॉन सेल्स क्रियाशील हो जाते हैं, और ऐसी स्थिति में मनुष्य ज्यादा उत्तेजित या या भावुक रहता है। एक बार नहीं, प्रत्येक पूर्णिमा को ऐसा होता रहता है, तो व्यक्ति का भाग्य भी उस क्रिया से प्रभावित होता है। अक्सर देखा जाता है कि पूर्णिमा की रात कुछ लोगों का मन बेचैन रहता है, और नींद कम आती है। संवेदनशील दिमाग वाले लोगों के मन में आत्महत्या करने के विचार बनने लगते हैं। चांद का धरती के जल से सम्बंध है, जब जब पूर्णिमा आती है, समुद्र में ज्वार-भाटा उत्पन्न होता है, क्योंकि चंद्रमा समुद्र के जल को ऊपर की ओर उठाता है। मानव के शरीर में भी लगभग 66% जल रहता है।

पूर्णिमा के दिन इस जल की गति और गुण बदल जाते हैं। जिन्हें मंदाग्नि रोग होता है, या जिनके पेट में चय-उपचय की क्रिया शिथिल होती है, तब अक्सर सुनने में आता है कि, ऐसे व्यक्ति भोजन करने के बाद नशा जैसा महसूस करते हैं, और नशे में न्यूरॉन सेल्स शिथिल हो जाते हैं, जिससे दिमाग का नियंत्रण शरीर पर कमजोर हो जाता है, और भावनाओं पर केंद्रित हो जाता है। ऐसे व्यक्तियों पर चन्द्रमा का प्रभाव कुछ इस प्रकार होता है कि उनका मन गलत दिशा लेने लगता है। इस कारण हर माह पूर्णिमा व्रत रखने की सलाह दी जाती है। व्रत के साथ साथ इस दिन तामसिक वस्तुओं का सेवन भी नहीं करना चाहिए। मदिरा इत्यादि से दूर रहना चाहिए। क्योंकि इस दिन तामसिक भोजन करने से मनुष्य के शरीर पर ही नहीं अपितु मन और फिर कर्म व कर्मफल भी प्रभावित होते हैं। चौदस, पूर्णिमा और प्रतिपदा यह 3 दिन पवित्रता बने रहने में ही भलाई है।

अमावस्या :- चन्द्रमा की सोलह कला हैं, इनमें सोलहवीं कला का नाम “अमा” है, स्कन्द-पुराण में एक श्लोक है :-
अमावस्या षोडशभागेन देवी प्रोक्ता महाकला।

संस्थिता परमा माया देबिना देहधारिणी।।

चन्द्रमण्डल की सोलह कलाओं में ‘अमा’ नाम की भी एक महाकला है, जिसमे चन्द्रमा की सोलह कलाएं समाहित हैं, जिसका कभी क्षय या उदय नहीं होता, आसान शब्दों में कहा जाये तो, सूर्य और चंद्रमा के मिलन काल को अमावस्या कहते हैं, ज्योतिष में चन्द्रमा को मन का देवता माना गया है। अमावस्या के दिन चन्द्रमा दिखाई नहीं देता। ऐसे में जो लोग अति भावुक होते हैं, जैसे लड़कियां और महिलाएं, इन पर इस खगोलीय घटना का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है, क्यों की ये मन से बहुत ही भावुक होती हैं, इस दिन संवेदनशील लोगों विशेषकर लड़कियों और महिलाओं के मन में हलचल अधिक बढ़ जाती है। इस के अतिरिक्त जो व्यक्ति नकारात्मक सोच वाला होता है, उसे नकारात्मक शक्ति अपने प्रभाव में ले लेती है। अमावस्या माह में एक दिन आती है। शास्त्रों में अमावस्या तिथि का स्वामी पितृदेव को माना जाता है। अमावस्या सूर्य और चन्द्र के मिलन का काल है, इस दिन दोनों एक ही राशि में रहते हैं। क्योंकि अमावस्या तिथि का स्वामी पितृदेव है, इसी लिए यह धारणा प्रचलित हुई की इस दिन भूत-प्रेत पितृ, पिशाच, निशाचर जीव-जंतु और दैत्य अधिक सक्रिय और उन्मुक्त रहते हैं। अतः इस दिन कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। इस दिन तामसिक भोजन और मादक वस्तुओ का सेवन करने से बचना चाहिए। मांसाहार का सेवन नहीं करना चाहिए। शराब आदि नशे से भी दूर रहना चाहिए इन वस्तुओं का शरीर पर ही नहीं, मन पर भी दुष्प्रभाव होता है। अच्छी बात तो यह होगी कि चौदस, अमावस्या और प्रतिपदा इन तीनों दिन पवित्र रहकर सात्विक आहार और ब्रह्मचर्य का पालन करने में ही भलाई है ।कुछ मुख्य अमावस्या : भौमवती अमावस्या, मौनी अमावस्या, शनि अमावस्या, हरियाली अमावस्या, दिवाली अमावस्या, सोमवती अमावस्या, सर्वपितृ अमावस्या।

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सोमवती अमावस्या

Dr.R.B.Dhawan

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सोमवती अमावस्या अर्थात्- सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या को ही सोमवती अमावस्या कहते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार सोमवती अमावस्या बड़े भाग्य से पड़ती है। पांडव सोमवती अमावस्या के लिए तरसते रहे, लेकिन उनके जीवन में कभी सोमवती अमावस्या पड़ी ही नहीं। सोमवार का दिन भगवान चन्द्रमा को समर्पित दिन है। भगवान चन्द्रमा को ज्योतिष शास्त्र में मन का कारक माना गया है। अत: इस दिन अमावस्या पड़ने का अर्थ है कि यह दिन मन सम्बन्धी दोषों के समाधान के लिये अति उत्तम है। चूंकि हमारे शास्त्रों में चन्द्रमा को ही समस्त दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों का कारक माना जाता है, अत: पूरे वर्ष में एक या दो बार पड़ने वाले इस दिन का बहुत महत्व है। विवाहित स्त्रियों द्वारा इस दिन अपने पतियों के दीर्घायु की कामना के लिए व्रत का विधान है।

सोमवती अमावस्या एक पर्व के रूप में जाना और माना जाता है, यह कल्याणकारी पर्वो में से एक है, लेकिन सोमवती अमावस्या को अन्य अमावस्याओं से अधिक पुण्य कारक मानने के पीछे भी शास्त्रीय और पौराणिक कारण हैं। सोमवार को भगवान शिव और चंद्रमा का दिन कहा गया है। सोम यानि चंद्रमा! अमावस्या और पूर्णिमा के दिन चंद्रमा का सोमांश यानि अमृतांश सीधे पृथ्वी पर पड़ता है। शास्त्रों के अनुसार सोमवती अमावस्या पर चंद्रमा का अमृतांश पृथ्वी पर सबसे अधिक मात्रा में पड़ता है।

अमावस्या अमा+वस्या दो शब्दों से मिलकर बना है। शिव महापुराण में इस संधि विच्छेद को भगवान शिव ने माता पार्वती को समझाया था। क्योंकि सोम को अमृत भी कहा जाता है, अमा का अर्थ है एकत्र करना और वस्या वास को कहा गया है। यानि जिसमें सब एक साथ वास करते हों वह अमावस्या अति पवित्र सोमवती अमावस्या कहलाती है। यह भी माना जाता है की सोमवती अमावस्या में भक्तों को अमृत की प्राप्ति होती है।

निर्णय सिंधु व्यास के वचनानुसार इस दिन मौन रहकर स्नान-ध्यान करने से सहस्र गोदान का पुण्य फल प्राप्त होता है। हिन्दु धर्म शास्त्रों में इसे अश्वत्थ प्रदक्षिणा व्रत की भी संज्ञा दी गयी है। अश्वत्थ यानि पीपल वृक्ष। इस दिन पीपल कि सेवा-पूजा, परिक्रमा का अति विशेष महत्व है।

शास्त्रों के अनुसार में पीपल की छाया से, स्पर्श करने से और प्रदक्षिणा करने से समस्त पापों का नाश, अक्षय लक्ष्मी की प्राप्ति और आयु में वृद्धि होती है।

पीपल के पूजन में दूध, दही, मीठा,फल,फूल, जल,जनेऊ जोड़ा चढ़ाने और दीप दिखाने से भक्तों कि सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। कहते हैं कि पीपल के मूल में भगवान विष्णु, तने में भगवान शिव जी तथा अग्रभाग में भगवान ब्रह्मा जी का निवास है। इसलिए सोमवार को यदि अमावस्या हो तो, पीपल के पूजन से अक्षय पुण्य, लाभ तथा सौभाग्य की वृद्धि होती है।

इस दिन विवाहित स्त्रियों द्वारा पीपल के वृक्ष की दूध, जल, पुष्प, अक्षत, चन्दन इत्यादि से पूजा और वृक्ष के चारों ओर 108 बार धागा लपेट कर परिक्रमा करने का विधान होता है, और प्रत्येक परिक्रमा में कोई भी एक मिठाई, फल या मेवा चढ़ाने से विशेष लाभ होता है । प्रदक्षिणा के समय 108 फल अलग रखकर समापन के समय वे सभी वस्तुएं ब्राह्मणों और निर्धनों को दान करें। इस प्रक्रिया को कम से कम तीन सोमवती अमावस्या तक करने से सभी कामनाओं की पूर्ति होती है और समस्याओं से मुक्ति मिलती है। इस प्रक्रिया से पितृदोष का भी समाधान होता है।

इस दिन जो स्त्री तुलसी व माता पार्वती पर सिन्दूर चढ़ाकर अपनी माँग में लगाती है, वह अखण्ड सौभाग्यवती बनी रहती है। आज के दिन महिलाएँ कपड़ा, गहना, बरतन, अनाज अथवा कोई भी खाने की वस्तु वस्तुयें दान कर सकती हैं, जिससे उनके जीवन में शुभता आती है, समाज में उनके परिवार का नाम होता है, यश मिलता है ।

जिन जातकों की जन्मपत्रिका में घातक कालसर्प दोष है, वे लोग यदि सोमवती अमवस्या पर चांदी के बने नाग-नागिन की विधिवत पूजा करके उन्हे नदीं में प्रवाहित कर दें, भगवान भोले भण्डारी पर कच्चा दूध चढ़ायें, पीपल पर मीठा जल चढ़ाकर उसकी परिक्रमा करें, धूप दीप जलाएं, ब्राह्मणों को यथाशक्ति दान दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद ग्रहण करें तो, उन्हें निश्चित ही कालसर्प दोष से छुटकारा मिलता है।

सोमवती अमावस्या को अत्यंत पुण्य तिथि माना जाता है। मान्यता है कि सोमवती अमावस्या के दिन किये गए किसी भी प्रकार के उपाय शीघ्र ही फलीभूत होते हैं। सोमवती अमावस्या के दिन उपाय करने से मनुष्यों को सभी तरह के शुभ फल प्राप्त होते हैं, अगर उनको कोई कष्ट है तो, उसका शीघ्र ही निराकरण होता है, और उस व्यक्ति तथा उसके परिवार पर आने वाले सभी तरह के संकट टल जाते हैं।

इस दिन जो मनुष्य व्यवसाय में परेशानियां से जूझ रहे हों, वे पीपल वृक्ष के नीचे तिल के तेल का दिया जलाकर और ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम:। मंत्र का जाप करें तो, उनके व्यवसाय में आ रही समस्त रुकावटें दूर हो जायेंगी। सोमवती अमावस्या के पर्व पर अपने पितरों के निमित्त पीपल का वृक्ष लगाने से जातक को सुख-सौभाग्य, संतान, पुत्र, धन की प्राप्ति होती है, और उसके समस्त पारिवारिक क्लेश समाप्त हो जाते हैं।

इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का भी विशेष महत्व समझा जाता है। कहा जाता है कि महाभारत में भीष्म ने युधिष्ठिर को इस दिन का महत्व समझाते हुए कहा था कि, इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने वाला मनुष्य निश्चय ही समृद्ध, स्वस्थ और सभी दुखों से मुक्त होगा, ऐसी मान्यता है कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने से पितरों कि आत्माओं को शांति मिलती है।

इस दिन पवित्र नदियों, तीर्थों में स्नान, ब्राह्मण भोजन, गौदान, अन्नदान, वस्त्र, स्वर्ण आदि दान का विशेष महत्व माना गया है। इस दिन गंगा स्नान का भी विशिष्ट महत्त्व है। इस दिन यदि गंगा जी जाना संभव न हो तो प्रात:काल किसी नदी या सरोवर आदि में स्नान करके भगवान शंकर, पार्वती और तुलसी की भक्तिपूर्वक पूजा करें।

सोमवार भगवान शिव जी का दिन माना जाता है और सोमवती अमावस्या तो पूर्णरूपेण शिव जी को समर्पित होती है। इसलिए इस दिन भगवान शिव कि कृपा पाने के लिए शिव जी का अभिषेक करना चाहिए, या प्रभु भोले भंडारी पर बेलपत्र, कच्चा दूध ,मेवे, फल, मीठा, जनेऊ जोड़ा आदि चढ़ाकर ॐ नम: शिवाय का जाप करने से सभी कष्टों से छुटकारा मिलता है।

मान्यता है कि सोमवती अमावस्या के दिन सुबह-सुबह नित्यकर्मों से निवृत्त होकर किसी भी शिव मंदिर में जाकर सवा किलो साफ चावल अर्पित करते हुए भगवान शिव का पूजन करें। पूजन के पश्चात यह चावल किसी ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद व्यक्ति को दान करें। शास्त्रों के अनुसार सोमवती अमवस्या पर शिवलिंग पर चावल चढ़ाकर उसका दान करने से अक्षय पुण्य मिलता है, माँ लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है।

शास्त्रों में वर्णित है कि सोमवती अमावस्या के दिन उगते हुए भगवान सूर्य नारायण को गायत्री मंत्र उच्चारण करते हुए अर्घ्य देने से गरीबी और दरिद्रता दूर होगी। यह क्रिया आपको अमोघ फल प्रदान करती है ।

सोमवती अमावस्या के दिन 108 बार तुलसी के पौधे की श्री हरि-श्री हरि अथवा ॐ नमो नारायण का जाप करते हुए परिक्रमा करें, इससे जीवन के सभी आर्थिक संकट निश्चय ही समाप्त हो जाते हैं।

जिन लोगों का चंद्रमा कमजोर है, वह यदि गाय को दही और चावल खिलाएं तो उन्हें अवश्य ही मानसिक शांति प्राप्त होगी। इसके अलावा मंत्र जाप, सिद्धि साधना एवं दान कर मौन व्रत को धारण करने से पुण्य प्राप्ति और भगवान का आशीर्वाद मिलता है।

इस दिन स्वास्थ्य, शिक्षा, कानूनी विवाद, आर्थिक परेशानियां और पति-पत्नी सम्बन्धी विवाद के समाधान हेतु किये गये उपाय अवश्य ही सफल होते है ।

इस दिन जो व्यक्ति धोबी, धोबन को भोजन कराता है, सम्मान करता है, दान दक्षिणा देता है, उसके बच्चो को कापी किताबे, फल, मिठाई, खिलौने आदि देता है, उसके सभी मनोरथ अवश्य ही पूर्ण होते हैं।

इस दिन ब्राह्मण, भांजा और ननद को फल, मिठाई या खाने की सामग्री का दान करना बहुत ही उत्तम फल प्रदान करता है।

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