नीलम Neelam धारण

नीलम कब धारण करें-

Dr.R.B.Dhawan, top, best astrologer

नीलम रत्न शनि ग्रह का रत्न है, यह रत्न नवरत्नों में से एक और मूल्यवान तथा अति प्रभावशाली रत्न है, शनि ग्रह का प्रतिनिधि यह रत्न चमत्कारी और तुरंत अपना प्रभाव प्रकट करने वाला, किस्मत पलटने की ताकत रखने वाला माना गया है।
इस रत्न के विषय में लोक मान्यता यह है कि, यह रत्न विरले ही किसी जातक को अनुकूल बैठता है। जिस किसी को अनुकूल बैठता है, उसकी किस्मत ही पलट देता है। यह रत्न रंक से राजा भी बना देता है, और अनूकूल नहीं बैठने पर राजा से रंक भी बना देता है।
मैने अनेक ऐसे जातकों को नीलम धारण करने की सलाह दी है, जिनकी जन्म कुंडली में शनि ग्रह योगकारक है, अथवा योगकारक होकर शुभ ग्रहों के साथ युति बना रहा है, या फिर योगकारक होकर शुभ स्थान में स्थित है।

वस्तुत: मैंने नीलम धारण करवाने के बाद उन जातकों के जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन देखा है। उनमें से कुछ तो आर्थिक संकट के चलते न केवल अपना व्यापार ही बंद कर चुके थे, बल्कि भयंकर कर्ज से दबे हुये भी थे, और कुछ का व्यापार बंद होने के कागार पर था। कुछ लोग ऐसे भी थे जो नौकरी-पेशा थे, और अपने अधिकारियों से तंग आकर नौकरी छोड चुके थे, उनके सामने भी भयंकर आर्थिक संकट मंडरा रहा था। ऐसी स्थिति में कुंडली का पूर्ण विश्लेषण करने की आवश्यकता होती है, मैंने अपने 32 वर्ष के अनुभव से और ज्योतिष के मूल सिद्धांतों को कुंडलियों पर लागू करने के बाद ही कहा कि, जातक की कुंडली में शनि ग्रह विशेष स्थिति में स्थित है। इस लिये नीलम धारण करने से न केवल समस्या का समाधान होगा अपितु अत्यंत आर्थिक सहायता भी प्राप्त होगी।
नीलम धारण करने के मामले में पहले किसी दीर्घ-अनुभवी विद्वान ज्योतिषाचार्य से सलाह अवश्य लेनी चाहिये। क्योकि कभी-कभी शनि ग्रह का चमत्कारी रत्न ‘‘नीलम’’ शनिग्रह जैसे क्रूर स्वाभाव को भी धारक पर प्रकट कर देता है, इसी लिये विशेष परिस्थितीयों में ही तथा शनि ग्रह की अनुकूलता प्राप्त करने के लिये ‘‘नीलम रत्न’’ धारण करने की सलाह अवश्य दी जाती है।

कब धारण करें नीलम :-
नीलम के विषय में मेरा अपना पिछले 32 वर्ष का अनुभव रहा है कि, नीलम रत्न केवल वृष एवं तुला लग्न वालों को ही धारण करना चाहिये, वह भी कुंडली का पूर्ण विश्लेषण के उपरांत क्योकि तुला लग्न के लिये शनि चतुर्थेश-पंचमेश होता है, और वृष लग्न के लिये शनि नवम और दशम स्थान का स्वामी होकर योगकारक ग्रह कहलता है। परंतु वृष-तुला लग्न में जब शनि की स्थिति कुंडली के किसी केन्द्र या त्रिकोण स्थान में हो। जैसे-

1. वृष लग्न की कुंडली में नवमेश-दशमेश शनि की स्थिति यदि नवम स्थान में हो, तो (शनि इस लग्न में केन्द्र-त्रिकोण नवम-दशम दोनो स्थान) का स्वामी होगा, और नवम स्थान में स्वगृही (अपनी मकर राशि) में योगकारक स्थित में होने के कारण अत्यंत शुभ फल प्रकट करेगा। परंतु इस शुभ योग के लिये शर्त यह है कि इस स्थान में शनि के साथ कोई पाप स्थान का स्वामी ग्रह स्थित नहीं होना चाहिये, अथवा कुंडली के इस स्थान में शनि वक्री नहीं होना चाहिये। यदि शनि नवम में वक्री या किसी पाप स्थान के स्वामी के साथ स्थित होगा, तब शनि रत्न नीलम का अशुभ फल होगा अथवा नीलम धारण के शुभ प्रभाव में कमी हो जायेगी। वृष लग्न की कुंडली में नवम भाव स्थित शनि के शुभ प्रभाव में कमी तब भी होती है, जब शनि ग्रह अपनी इस राशि में वाल्यावस्था, कुमारावस्था, वृद्धावस्था अथवा मृतावस्था में हो। वृष लग्न और नवम भाव में पाप युक्त या वक्री स्थिति में शनि नहीं है, तब भी अवस्था देखना आवश्यक है।

शनि की अवस्था (शनि की स्थिति वृष या तुला लग्न तथा कुम्भ राशि में) –

बाल्यावस्था- में शनि (24 से 30 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 25 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
कुमारावस्था- में शनि (18 से 24 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 50 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
युवावस्था- में शनि (12 से 18 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 100 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
वृद्धावस्था- में शनि (06 से 12 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 50 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
मृतावस्था- में शनि (00 से 06 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 25 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।

शनि की अवस्था- (शनि की स्थिति वृष या तुला लग्न तथा मकर राशि में) –

मृतावस्था- में शनि (00 से 06 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 25 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
वृद्धावस्था- में शनि (06 से 12 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 50 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
युवावस्था- में शनि (12 से 18 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 100 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
कुमारावस्था- में शनि (18 से 24 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 50 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
बाल्यावस्था- में शनि (24 से 30 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 25 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।

2. वृष लग्न की कुंडली में दशम स्थान कुम्भ राशि (मूल त्रिकोण राशि) का शनि न केवल योगकारक होता है, मकर से अधिक शुभ फल प्रदान करता है। इस कुम्भ राशि में दशम (केन्द्र) में स्थित शनि भी यदि किसी पाप स्थान के स्वामी के साथ स्थित नहीं, वक्री नहीं है, और युवावस्था में भी है, शनि ग्रह शुभ व बलवान माना जाता है, और नीलम धारण करने वाले धारक को अत्यंत शुभफल की प्राप्ति होती है। परंतु यदि अवस्था में भी कमजोर हो, तो तब यह शनि का रत्न नीलम पूर्ण शुभ फल नहीं देता, अपितु नीलम धारण करने वाले को न्यून शुभफल ही प्राप्त होता है।

3. तुला लग्न की कुंडली में शनि चतुर्थ व पंचम स्थान का स्वामी होकर योगकारक होता है, इस लिये तुला लग्न वाले जातक की कुंडली में शनि की स्थिति यदि चतुर्थ या पंचम में हो, और शनि ग्रह के मार्गी तथा युवावस्था में होने पर जातक नीलम धारण करके 100 प्रतीशत शुभ फल प्राप्त करते हैं। तथा बाल्य, कुमार, वृद्ध और मृत अवस्था में अथवा शनि ग्रह का पाप स्थान के स्वामी से सम्बंध अथवा शनि के वक्री होने पर शुभ फल में कमी हो जाती है।
विशेष– वृष तथा तुला लग्न वाले जातक के लिये शनि की स्थिति इन दो स्थानों (नवम-दशम अथवा चतुर्थ-पंचम स्थान) के अतिरिक्त भी (कुंडली के अन्य भावों में) शुभ हो सकती है, परंतु वह स्थिति कितनी शुभ या अशुभ होगी, कुंडली के अन्य ग्रहों की स्थिति के अनुसार ही निर्णय किया जा सकता है। अतः नीलम धारण से शुभाशुभ फल प्राप्त हो सकता है, अथवा नहीं? यदि शुभफल प्राप्त हो सकता है, तो कितने प्रतीशत? इस शुभाशुभ का निर्णय कुंडली का पूर्ण विश्लेषण करने के पश्चात ही हो सकता है।

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Sukh-Samriddhi

पौराणिक काल से ही भारतवर्ष में महालक्ष्मी साधना एवं पूजा की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित रही हैं, और हमारे ऋषियों ने भी अनेक गोपनीय अति-गोपनीय साधना पद्धतियाँ मानव जाति को दी हैं, परन्तु लगभग सभी ग्रन्थों में इस बात को स्वीकार किया है, कि शुक्राचार्य प्रणीत तांत्रोक्त महालक्ष्मी साधना पद्धति अपने आप में अद्वितीय, गोपनीय एवं दुर्लभ पद्धति रही है। यह एक ऐसी साधना पद्धति है, जिसकी खोज में अनेक तंत्रशास्त्रीयों का जीवन ही व्यतीत हो गया परंतु उन्हें इस पद्धति से महालक्ष्मी साधना का पूर्ण रहस्य कही नहीं मिला।
यूं तो महालक्ष्मी की यह साधना सम्पन्न करने के लिए उच्चकोटि के साधक हमेशा लालायित रहे हैं, सन्यासियों ने भी यह स्वीकार किया है कि विभिन्न साधना पद्धतियों में यह पद्धति उज्जवल रत्न की तरह है। अनेक समृद्ध मठों के योगियों (जिनके मठों में अतुलित सम्पत्ति विद्यमान है) ने भी एक स्वर से यह स्वीकार किया है कि महर्षि शुक्राचार्य ने ऐश्वर्य प्रदायिनी महालक्ष्मी की इस साधना पद्धति को स्पष्ट कर पूरे विश्व पर महान उपकार किया है।

Sukh samriddhi sadhna for diwali

Sukh Samriddhi sadhna of Lakshmi for diwali

महर्षि शुक्राचार्य की महालक्ष्मी सिद्धि-
शुक्राचार्य न केवल क्रांतिकारी और अद्वितीय महर्षि थे, अपितु आर्थिक दृष्टि से भी अत्यन्त ही सम्पन्न और समृद्ध एकमात्र संजीवनी विद्या से विभूषित ऋषि थे, इनका आश्रम हर प्रकार की सुख- सुविधाओं से सम्पन्न था, एक समय शुक्राचार्य के पास भी अनेक निर्धन ऋषियों की तरह धन और अन्न का अभाव था। और यह स्थिति उनके हृदय को बेध गई, उन्होंने मुट्ठी तान कर ऐलान किया कि मैं महालक्ष्मी की ऐसी साधना पद्धति को ढ़ूंढ़ निकालूंगा जिसके द्वारा लक्ष्मी को बरबस मजबूर हो कर मेरे आश्रम तथा मेरे शिष्यों के घर पर स्थायी रूप से निवास करना ही पड़ेगा; और जन्म-जन्म के लिये महालक्ष्मी को मुझे सम्पन्नता सौभाग्य और द्रव्य प्रदान करते ही रहना पड़ेगा। इस प्रकार शुक्राचार्य ने तांत्रोक्त महालक्ष्मी साधना पद्धति ढ़ूंढ़ निकाली जो कि अपने आप में अद्वितीय है, चाहे भाग्य में दरिद्रता लिखी हो, चाहे कितना ही दुर्भाग्य हो, चाहे घर में सात पीढ़ियों से दरिद्रता ने निवास कर रखा हो, परन्तु इस साधना के सम्पन्न करने पर गुरूमुख साधक आश्चर्यजनक रूप से सफलता और सम्पन्नता प्राप्त करता है; उसे यह विश्वास हो जाता है कि आज के युग में ऐसी गोपनीय तथा अचूक साधना पद्धतियाँ उपलब्ध हैं, शुक्राचार्य ने कहा था कि- चाहे इन्द्र का वज्र निष्फल हो जाये, चाहे रूद्र का त्रिशूल कुंठित हो जाये, और चाहे विष्णु का सुदर्शन चक्र कमजोर पड़ जाये, परन्तु इस साधना पद्धति का प्रभाव निष्फल नहीं हो सकता; जो साधक इस साधना पद्धति को पूर्णता के साथ सम्पन्न करता है, उसके जीवन में धन, यश, मान, पद, प्रतिष्ठा, और एैश्वर्य की अभिवृद्धि होती ही रहती है; वह चाहे कमजोर हो, अशक्त हो, और निर्धन हो, दरिद्र और अशिक्षित हो, परन्तु यदि दृढ़ता पूर्वक इस महालक्ष्मी साधना को सम्पन्न कर लेता है, तो वह निश्चय ही अतुलनीय धन और एैश्वर्य का स्वामी बन सकता है।

साधना का समय-
यह साधना दीपावली के अवसर पर ही सम्पन्न की जाती है, और केवल एक दिन की साधना है; इस वर्ष दीपावली 13 नवम्बर 2012 को है, मंगलवार को दीपावली पर्व होने की वजह से अपने आप में अद्भुत् योग बन गया है, इसलिये इस साधना-पूजा को 13-11-2012 को रात्रि में ही सम्पन्न करना चाहिए।

सधारण साधना सामग्री-
सामान्यतः पूजन में जिस पूजा सामग्री का प्रयोग होता है, वह सामग्री तो पहले से ही तैयार रखनी चाहिये जिसमें-
1. जलपात्र 2. गंगाजल, 3. दूध, 4. दही, 5. घी, 6. शहद, 7. शक्कर, 8. पंचामृत, 9. चन्दन, 10. केसर, 11 चावल, 12. पुष्प एवं पुष्प मालाएं, 13. घ में बना हुआ मिष्ठान्न द्रव्य, 14. धूप, 15. दीप, 16. मौली, 17. नारियल, 18. सुपारी, 19. फल और  20. दक्षिणा।
इसकी तैयारी पहले से ही कर लेनी चाहिए, इसके साथ ही साथ महर्षि शुक्राचार्य के बताये अनुसार साधना सामग्री को भी पहले से ही तैयार करके रख देनी चाहिए।

विषेश साधना सामग्री-
शुक्राचार्य प्रणीत महालक्ष्मी का चित्र जो महालक्ष्मी पद्धति से मंत्र सिद्ध हो, 2. शुद्ध चाँदी पर अंकित सिद्ध श्री महालक्ष्मी सूर्य यंत्र, 3. गोमती चक्र 12 दाने, 4. बारह लघु मोती-शंख, 5. बारह लाल हकीक तथा 6. दुर्लभ शुक्राचार्य चैतन्य माला।
महर्षि शुक्राचार्य ने कहा है, कि तांत्रोक्त रूप से महालक्ष्मी को आबद्ध करने के लिये और अपने घर में स्थायित्व देने के लिए साधक को इस प्रकार की सामग्री एकत्र कर लेनी चाहिये। (यह सिद्ध सामग्री पत्रिका कार्यालय से प्राप्त की जा सकती है। सिद्ध सामग्री दीपावली से 20-25 दिन पूर्व ही मंगवा लें। इस वर्ष कार्याल्य में गुरूजी ने इस विशेष साधना सामग्री के कुछ पैकिट सिद्ध किये हैं। इसमें कई वस्तुयें तो अत्यन्त दुर्लभ और अप्राप्य हैं, परन्तु फिर भी 4-5 पैकेट तैयार किये गये हैं, जिससे कि साधकों को एक साथ प्रमाणिक सामग्री प्राप्त हो सके। सारा अतिरिक्त खर्च पत्रिका कार्यालय ने उठाकर यह पैकिट मात्र 3100/- रू. में भेजने की व्यवस्था की है।
आप यह न सोचें कि अभी समय पड़ा है, और विलम्ब होने पर भी यह साधना सामग्री मिल ही जायेगी। क्योंकि सिद्धियाँ एवं दुर्लभ वस्तुयें बहुत कठिनाई से ही प्राप्त हो पाती हैं; इसीलिये आप तुरंत ही सामग्री के लिये आर्डर कर दीजिये। और निश्चिन्त हो जाईये। अतः तुरंत ही न्यौक्षावर राशि जमा करवायें।)

पूजा व्यवस्था-
दीपावली के दिन पूजा गृह को स्वच्छ करें, द्वार पर कुंकुम से स्वस्तिक बनावें, और साधना द्वार को पुष्प मालाओं की बन्दनवार से सजायें, उत्तर की ओर मुँह करते हुए सफेद आसन बिछायें और सामने पूजन एवं साधना सामग्री को रख दें। साधक स्वयं या अपनी पत्नी और परिवार के साथ यह पूजा और साधना करें तो ज्यादा उचित होगा।
सबसे पहले भूमि पर स्वास्तिक बना कर उस पर तांबे के कलश को स्थापित करें या पीतल अथवा मिट्टी के कलश को स्थापित कर सकते हैं, स्टील का प्रयोग न करें, फिर एक पूजा की थाली में शुक्राचार्य प्रणीत महालक्ष्मी का चित्र जो महालक्ष्मी पद्धति से मंत्र सिद्ध हो, को एक छोटे पीले रेशमी वस्त्र को तह करके छोटा आसन बना लें जिसे पूजा की थाली में रख कर उस पर स्थापित करें तथा एक स्थायी दीपक प्रज्जवलित करें। सुगधित धूप-अगरबत्ती जलायें, गन्ध अक्षत पुष्प से चित्र और यंत्र की विधिवत् पूजा करें।

ऊँ ऐं हृीं श्रीं अखण्ड मण्डलाकारं विश्व व्याप्यं व्यवस्थितम्। त्र्यैलोक्य मण्डितं येन मण्डलं तत् सदाशिवम्।।

इसके बाद फट् शब्द का उच्चारण करते हुये कलश को धो कर उसे स्वस्तिक पर रखें, और उसमें शुद्ध जल भरें, यदि गंगाजल हो तो थोड़ा सा गंगाजल भी डालें, फिर इसमें समस्त तीर्थो को आवाहान करें-
गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वती।
नर्मदे सिन्धु कावेरी; जले स्मिन् सन्निधि करू।

फिर इस कलश में थोड़े से चावल, सुपारी सवा रूपया या दक्षिणा डालें, और इसमें पुष्प डालकर पांच पीपल के पत्ते बिछा कर उस पर पानी वाला नारियल रखें। नारियल पर पहले से ही लाल वस्त्र बांध दें या मौली लपेट दें, इसके बाद नारियल नीचे रख कर उस का पूजन करें, और कलश का जल छिड़कते हुए उसे पवित्र करें। फिर अपने सामने बारह कुंकुम की बिन्दियाँ एक पंक्ति में लगावें और उन सभी पर 1-1 मुट्ठी चावल की ढ़ेरी बनावें; तथा उन सभी ढ़ेरीयों पर- 1. एक-एक लघु मोती शंख, 2. एक-एक लाल हकीक तथा 3. एक-एक गोमती चक्र स्थापित करें, इस सभी ढ़ेरीयों की पूजा गंध, पुष्प, रोली, कलावा तथा मिष्ठान चढ़ाकर करें पूजा के समय इन मंत्रों का उच्चारण करें-
1. ऊँ ऐं हृीं क्लीं श्रीं अविध्नाय नमः। 2. मं महालक्ष्म्यै नमः 3. सं सरस्वत्यै नमः। 4. गं गणपतये नमः 5. क्षें क्षेत्रपालाय नमः। 6. विं विधात्र्यै नमः। 7. शं शंख-निधये नमः। 8. पं पदन निधये नमः। 9. आं वाहभ्यै नमः। 10. हं माहेश्वर्यै नमः। 11. ऊँ चामुण्डायै नमः। 12. ऊँ विजयायै नमः।

इन बारह ढ़ेरियों की पूजा कर गन्ध, अक्षत, पुष्प चढ़ा कर इनके सामने बारह तेल के दीपक जलायें, प्रत्येक ढ़ेरी के सामने एक दीपक लगावें, इसमें किसी भी प्रकार का खाने वाला तेल प्रयोग किया जा सकता है। इसके बाद भावना करते हुए कि मेरे सभी विध्न-बाधायें दूर हों, हाथ में चावल ले कर अपने और अपने परिवार के ऊपर घुमाते हुये दसों दिशाओं की ओर फेंक दें। चावल फेंकते समय यह मंत्र पाठ करें- अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भूमि-संस्थिता; ये भूता विघ्न-कर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञा। फिर पृथ्वी की प्रार्थना करते हुये उसे गन्ध, पुष्प, अक्षत समर्पित करें और आसन पर केसर की बिन्दी लगावें। पूजा करते समय इस मंत्र का उच्चारण करें-

    ऊँ भूमि त्वया धृता लोका देवि; त्वं विष्णुना धृता। त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरू चासनम्।।
भूमि पूजन के उपरांत अपने सामने अपने गुरूदेव का चित्र रख कर ऊँ गुं गुरूभ्यो नमः मंत्र से गुरू पूजन करें; इस प्रकार गं गणपतये नमः मंत्र से देव पूजा करें, और फिर अपने सामने एक पात्र में आठ बिन्दियाँ कुंकुम की लगावें और उन बिन्दियों पर चावलों की ढ़ेरी बनायें तथा प्रत्येक ढ़ेरी पर निम्न देव शक्तियों की स्थापना करें-

1. वास्तु पुरूषाय नमः। 2. भद्रकाल्यै नमः। 3. भैरवाय नमः। 4. द्वां द्वार देवताभ्यो नमः। 5. रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा। 6. पवित्र बृज भूम्यै हँु फट् स्वाहा। 7. श्रीं हृीं श्रीं हुँ फट् स्वाहा। 8. आं आधार शक्त्यै नमः।

फिर इन सब की यथोचित गन्ध, अक्षत, पुष्प, से पूजा करें; इसके बाद अपनी चोटी को गांठ लगावें और यदि चोटी नहीं हो तो चोटी वाले स्थान पर जल से पांचों अंगुलियों का स्पर्श करें, और फिर तीन बार दाहिने हाथ में जल ले कर आचमन करें, फिर अपने पूरे शरीर पर हाथ फेरते हुये अमृतीकरण न्यास करें-

यह उपरोक्त शरीर का अमृतीकरण न्यास है, जिससे कि पूरा शरीर अमृतमय हो जाता है, और साधना में पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है। इसके बाद जो महालक्ष्मी साधना के लिये शुद्ध चाँदी पर अंकित सिद्ध श्री महालक्ष्मी सूर्य यंत्र मंगवाया है, इसको लकड़ी का एक पट्टा बिछा कर उस पर पीला वस्त्र बिछा कर कुंकुम से स्वास्तिक बनावें और उन पर चावल की ढ़ेरी बनाकर, फिर उस चावल की ढ़ेरी पर यह यंत्र रख दें। इसके बाद प्राणायाम, करें, और तीन बार गायत्री मंत्र का उच्चारण करें, और हाथ में जल ले कर न्यास विनियोग करें- अस्य श्री मातृका-न्यासस्य ब्रह्मा ऋृषिः। मातृका-सरस्वती देवता। हृीं बीजानि। स्वराः शक्तयः। अर्व्यवर्ते कीलक। श्री महालक्ष्मी-पूजनांगेत्वे न्यासे विनियोगः।

फिर ऋष्यिादि न्यास करते हुये अपने शरीर पर उच्चारण करते हुये दाहिने हाथ से शरीर का स्पर्श करें- ब्रह्मा ऋषिये नमः। शिरसि। गायत्री छन्दसे नमः मुखे। मातृका सरस्वती देवतायै नमः। हृदि। हृीं बीजेभ्यो नमः गुह्ये। स्वर शक्तिभ्यो नमः पादयो। अव्यक्त कीलकाय नमः नाभौ। श्री महालक्ष्मी पूजनांगत्वे न्यासे विनियोगाय नमः सर्वांगे।

इसके बाद गोपनीय कर न्यास अंग न्यास करें- हृीं अंगुष्ठाभ्यां नमः हृदयाय नमः। श्रीं तर्जनीभ्यां नमः शिरसे स्वाहा। क्लीं मध्यमाभ्यां नमः। शिखायै वषट्। हृीं अनामिकाभ्यांम नमः कवचाय हुं। श्रीं कनिष्ठाभ्यां नमः। नेत्र-त्रयाय वौषट्। क्लीं करतल-करपृष्ठाभ्यां नमः। अस्त्राय फट। इसके बाद भगवती महालक्ष्मी का ध्यान करें- कांत्या कांचन सन्निभां हिम गिरि प्रख्यैश्चतुर्भि र्गजेर्हस्तोत्क्षिप्त हिरण्मयामृत घटैरासिच्यमानां श्रियम्। विप्राणां वरमब्ज युग्ममभयं हस्तैः किरिटोज्ज्व लाम्; क्षेमौबद्ध नितम्ब बिम्ब लसितां वन्दे रविन्द स्थित।।

इसके बाद लकड़ी के पट्टे पर जो साधना के लिये बारह ढेरीयाँ तथा आठ ढेरीयाँ रखी हैं, उनमें से प्रत्येक को पुनः नमस्कार करें, और फिर पीले रंग के रेशमी आसन पर बैठकर शांत चित्त से, उत्तर दिशा की ओर मुख करके दुर्लभ शुक्राचार्य चैतन्य माला। से 11 माला मंत्र का जप करें।

    मंत्र- ऊँ हृीं हृीं क्लीं क्लीं श्रीं श्रीं मम् गृह आगच्छ आगच्छ सूर्यरूपी महालक्ष्मी नमः।।

मंत्र जप करने के बाद कपूर से देवी भगवती सूर्यरूपी महालक्ष्मी की आरती करें; और आरती के ऊपर हाथ घुमा कर पूरे शरीर को स्पर्श करें, इसके बाद एक कटोरी में गुड़ और घी मिलाकर देवी को बलि दें, (यह कटोरी पूजा सम्पन्न होने पर घर के बाहर चौराहे पर रख दें) जिससे कि घर की सारी दरिद्रता, दुःख, अभाव और दैन्य समाप्त हो सकें, उन द्वादश गोमती चक्र आदि ढेरीयों के सामने यह उच्छिष्ट बलि पात्र रखते हुये यह उच्चारण करें-

ऊँ ऐं नमः उच्छिष्ट-चाण्डालिनी मातंगि सर्व-जन-वशंकरि स्वाहा।

इसके बाद प्रज्जवलित दीपक से महालक्ष्मी की आरती करें और फिर श्री गणपति तथा देवी सूर्यरूपी महालक्ष्मी को अपने घर में स्थायी निवास करने की प्रार्थना करें और हाथ पैर धो कर सभी परिवार के साथ सुख पूर्वक भोजन करें, और विहार करते हुये वह बलि पदार्थ वाली कटोरी किसी चौराहे पर रख दें। जो स्थायी दीपक जल रहा है उसे सुबह तक जलने दें। सिद्ध श्री महालक्ष्मी सूर्य यंत्र एवं दुर्लभ शुक्राचार्य चैतन्य माला तथा शुक्राचार्य प्रणीत महालक्ष्मी के चित्र को दूसरे दिन प्रातः एक पीले रेशमी वस्त्र में लपेटकर या बांधकर अपने कोष में रख लें। शेष सभी पदार्थ (गोमती चक्र आदि द्वादश ढेरीयों वाले पदार्थ तथा पूजा से बची सामग्री) दूसरे दिन सुबह इकट्ठी करके जल में विसर्जित करें या भूमि में दबा दें। इस प्रकार यह सूर्यरूपी महालक्ष्मी साधना प्रयोग संसार की सर्वश्रेष्ठ साधना एवं पूजा पद्धतियों में एक है, जिसे इस वर्ष प्रत्येक साधक को सम्पन्न करना ही चाहिये।
शिष्य, पाठकों और साधकों के लिये यह सुविधा प्रदान की जाती है, कि वे पत्रिका कार्यालय से विशेष साधना सामग्री पैकिट जिसमें- शुक्राचार्य प्रणीत महालक्ष्मी का चित्र जो महालक्ष्मी पद्धति से मंत्र सिद्ध हो, 2. शुद्ध चाँदी पर अंकित सिद्ध श्री महालक्ष्मी सूर्य यंत्र, 3. गोमती चक्र 12 दाने,  4. बारह लघु मोती-शंख, 5. बारह लाल हकीक  तथा 6. दुर्लभ शुक्राचार्य चैतन्य माला। होंगे। प्राप्त करने के लिये शीघ्र सम्पर्क कर लें, क्योकि यह विशेष साधना सामग्री पैकिट सीमित मात्रा में ही उपलब्ध होंगे। इसके लिये न्यौक्षावर राशि 3100/-रू अग्रिम जमा करनी होगी। कम-से-कम 10-15 दिन पूर्व ही न्यौक्षावर राशि का डी.डी. Shukracharya Astro Pvt. Ltd. के नाम से दिल्ली के लिये बनवाकर पत्रिका कार्यालय के पते पर भेज, अथवा स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के हमारे कम्पनी के खाते-Shukracharya Astro Pvt. Ltd. खाता नः 31810709561 में कैश जमा करवा कर भी मंगवा सकते हैं।

विख्यात् ज्योतिषाचर्य – Dr.R.B.Dhawan
कार्यालय का पता-

Shukracharya Astro Pvt. Ltd.
F- 265, Gali No 22, Laxmi Nagar, Delhi-110092.
Tel. 011-22455184, 9810143516
Web: shukracharya.com

दुर्भाग्य

संसार में जितने भी योगी, सन्यासी, या उच्च कोटि के साधक हुये हैं, उनमें से किसी को पहली बार ही साधना में सफलता मिली हो, यह आवश्यक नहीं। परंतु उनके जीवन का लक्ष्य एक ही था, कि हमें हर हाल में इस क्षेत्र में आगे बढ़ना है, और पूर्णता प्राप्त करनी है, क्योकि यह साधना का मार्ग अपने आप में अलौकिक और दिव्य होता है, इस रास्ते पर चलने वाला व्यक्ति अपने परिवार, समाज, शहर, देश और फिर पूरे विश्व में सम्मानित होता चला जाता है, लोग उसका आदर और सम्मान करते हैं। साधनायें अनेक प्रकार की होती हैं, कुछ साधनायें आध्यात्मिक उन्नति के लिये, कुछ भौतिक या आर्थिक उन्नति के लिये तथा कुछ विश्व-कल्याण के लिये होती हैं। इस साधनाओं के लिये देश-काल- परिस्थिति अनुसार साधना पद्धतियाँ और मुहूर्त भी अलग-अलग होते हैं।

Dipawali sadhna for Lakshmi

Goddess Lakshmi

आर्थिक उन्नति के लिये की जाने वाली साधनाओं में दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने वाली एक साधना का उल्लेख यहाँ इस लेख में किया जा रहा है, जो की सम्पूर्ण पद्धति सहित है- जैसा की सभी जाने हैं, आनेवाले दिनों में दीपावली का पर्व साधनाओं और सिद्धियों के लिये एक अनुपम अवसर है। इस वर्ष दीपावली का यह महापर्व 13 नवम्बर, मंगलवार के दिन है, इस दिन स्वाती नक्षत्र 20 घटि 30 पल तक है। यही वह अवसर है जब दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने वाली साधना सफल हो सकती हैं। वैसे तो इस दिन किसी भी प्रकार की दुर्लभ या अतिदुर्लभ साधना सम्पन्न की जा सकती है, परंतु दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने की साधना करने वाले साधकों के लिये यह एक विशेष अवसर है, पर्वकाल के इस दिन साधना का मनोवांछित फल प्राप्त होता है। इस दिन यह साधना सम्पन्न करने का अर्थ है। साधना में पूर्ण सिद्धि की गारंटी! जो साधक तो हैं परंतु ऐसे अवसर पर पीछे रह जाते हैं, जो ऐसे अवसर का लाभ नहीं उठा पाते; उनके लिये तो यह एक स्वर्णिम अवसर है। और फिर यह साधना तो उन लोगों के लिये गुरूजी ने विशेष रूप से प्रकाशित की है, जिनका पीछा दुर्भाग्य अनेक वर्षों से नही छोड रहा है।
यदि किसी दुर्भाग्य से पीड़ित व्यक्ति को जीवन में ऐसा अवसर प्राप्त हो तो उस व्यक्ति को ऐसे क्षण लपक कर पकड़ लेने चाहियें! उसका उपयोग करना चाहिये, और ऐसे क्षणों में इस प्रकार की साधना संपन्न कर मनोवांछित सिद्धि प्राप्त कर लेनी चाहिये। विशेष साधनायें किसी एक विशेष वर्ग या समुदाय के लिये नहीं होती। साधना का उपयोग तो सम्पूर्ण मानव जाति तथा सम्पूर्ण विश्व के लिये है, कोई भी साधक किसी भी जाति, धर्म या स्थान विशेष से सम्बंध रखता हो वह किसी भी प्रकार की साधना सम्पन्न कर सकता है, मनुष्य यदि प्रयास करे तो वह संपूर्ण विश्व और आगे बढ़कर पूरे ब्रह्माण्ड को अपने द्वारा संचालित कर सकता है। इसलिये जो सही अर्थो में ऊँचाईयों पर पहुँचना चाहते हैं, वे साधना-काल में आने वाली छोटी-मोटी कठिनाईयों अथवा घटनाओं से हताश या निराश नही होते, और फिर यह बाधायें और अड़चने अब और रहने वाली तो हैं नहीं। इस साधना की सिद्धि करने के पश्चात् तो दुर्भाग्य सौभाग्य में अवश्य बदने वाला ही है।

कैसे सम्पन्न करें दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने वाली यह साधना?-
कार्तिक कृष्ण अमावस्या के दिन को ही समृद्धि का पर्व दीपावली कहा जाता है। परंतु दीपावली के दिन यदि स्वाती नक्षत्र का योग हो तो कुछ विशेष साधनाओं में सिद्धि अवश्य मिलती है। शास्त्रों में कहा गया है कि जिस दिन सूर्य अपनी नीच राशि तुला में विचरण करता हो तथा इसी दिन इस सूर्य को चन्द्रमा का साथ मिले अर्थात् यह दोनो (ग्रहों का राजा सूर्य तथा ग्रहों में रानी चन्दमा) शुक्र की राशि तुला में एक ही अंश में हों ऐसे ब्रह्माण्ड में धरती पर एक ऐसा अद्भुत, अलौकिक वातावरण बनता है, जो कि समृद्धि प्रदायक साधनाओं के लिये अनुकूल मुहूर्त होता है। ऐसा समय साधक के लिये सौभाग्य प्रदायक समय होता है। इस मुहूर्त में कोई भी साधना सम्पन्न करने पर हजार गुना फल प्राप्त होता है। और फिर यदि इस समय स्वाती नक्षत्र का योग हो तो यह हजार गुना फल भी लाख गुना हो जाता है। अर्थात् यदि ऐसे मुहूर्त में किसी विशेष मंत्र का जप किया जाता है तब उस मंत्र का फल भी लाख गुना प्राप्त होगा। यही कारण है कि किसी विशेष प्रयोजन के लिये यदि साधना करनी हो तो साधक वर्ग ऐसे ही विशेष मुहूर्त की प्रतीक्षा वर्षों तक भी करते हैं। क्योकि इस मुहूर्त में योग्य गुरू के निर्देशानुसार यदि सौभाग्य प्रदायक कोई भी साधना सम्पन्न की जाती है तब सफलता अवश्य प्राप्त होती है। शर्त यही है कि साधना के विधि-विधान का पूरा ध्यान रखा जाये।
इस वर्ष 2012 में यह अवसर नवम्बर माह में 13 नवम्बर को प्राप्त हो रहा है। इस दिन मंगलवार है, स्वाती नक्षत्र 20 घटि 30 पल ( सूर्योदय से 8 घंटे 12 मिनट) तक है। दिल्ली व एन. सी. आर. में सूर्योदय- 06:55 पर होगा, इस लिये यहाँ के लिये स्वाती नक्षत्र प्रातः 6:55 से मध्याहन 03:07 स्टै. टा. 15:07 तक रहेगा। (अन्य शहरों के निवासी कार्यालय से सूर्योदय के समय की जानकरी प्राप्त कर सकते हैं।) गुरूजी की राय में इसी समय यह विशेष मुहूर्तराज है, अतः साधक वर्ग को यह सलाह दी जाती है कि- इस समय का भरपूर लाभ सौभाग्यशाली साधक उवश्य उठायें।

कैसे साधना संपन्न करें-
आप इस अवसर पर यह स्वर्ण के समान सौभाग्य प्रदायिनी साधना का प्रयोग आरम्भ करने के लिये इस दिन प्रातः सूर्योदय से 1-2 घंटे पूर्व ही बिस्तर से उठ जायें, प्रातः उठते ही सर्वप्रथम घरती माता को प्रणाम करें, तत्पश्चात् नित्कर्म से निवृत होकर स्नानादि करें और सामान्य पूजा सामग्री तथा साधना की विशेष सामग्री जो इस प्रयोग के लिये पहले से ही तैयार रहनी चाहिये को लाकर साधना कक्ष या साधना स्थान में एक शुद्ध थाली में रखें।
साधना व पूजा सामग्री के साथ एक लोटा (तांबे का) शुद्ध जल भरकर रखें, तथा एक हाथ लम्बा एक हाथ चौड़ा पीले रंग का रेशमी वस्त्र जिसे चार तह लगाकर सामने एक लकड़ी की चौकी पर बिछा देना है। अब लोटे से थोड़ा जल आस-पास छिड़क लें। उसके बाद शुभ मुहूर्त- जो कि सूर्योदय से ही आरम्भ हो जायेगा और सूर्योदय से लेकर 8 घंटे 12 मिनट तक रहेगा। (इसी मुहूर्त का प्रयोग करें) इस मुहूर्त में पूजा स्थान में बैठ जायें, एक थाली में कुंकुम से स्वास्तिक बनायें तथा लक्ष्मी जी का बीज मंत्र श्रीं लिखें। पूजा की थाली में पूजा सामग्री तथा श्री गणेश लक्ष्मी का रंगीन चित्र स्थापित करें, पीले गैंदे के फूल, थोड़े अक्षत् (साबुत चावल) 5 प्रकार के ताजे फल, रोली, कलावा, गुढ, बताशा खील तथा 5 साबुत सुपारी रखें।

विख्यात् ज्योतिषाचर्य – Dr.R.B.Dhawan
विशेष साधना सामग्री में-
गुरूजी द्वारा सिद्ध स्वर्णरेखा यंत्र कवच जो कि पहले से ही गुरूजी के कार्यालय से प्राप्त कर लिया जाये, और इसके साथ 8 सिद्ध हकीक रत्न भी रख दें, जो कि अष्ठलक्ष्मी के प्रतीक रूप हैं। और फिर वहीं उत्तर दिशा की ओर मुख करके रेशमी लाल आसन पर स्वयं तथा यदि शादि-शुदा हैं तो गृहलक्ष्मी (पत्नी) के साथ बैठें। शुद्ध तेल (तिल का तेल) का दीपक लगा लें, सामने रखें ताम्र पात्र (लोटे) से हाथ में थोड़ा जल लेकर अपने तथा पत्नी के शरीर पर छिडकें, कमर सीधी रखें, शांत मन से गणपति का ध्यान कर माँ लक्ष्मी के दरबार में माँ के समक्ष स्वयं को महसूस करते हुये मन-ही-मन दुर्भाग्य तथा धनाभाव को दूर करने की प्रार्थना करें। श्री गणेश लक्ष्मी के चित्र अथवा प्रतिमा पर जल का छींटा देकर रोली से तिलक करें और पुष्प, अक्षत्, गुढ़ बताशा तथा सुपारी चढ़ावें। गणेश-लक्ष्मी की पूजा के समय इस मंत्र का उच्चारण करते रहें-

या देवी सर्वभूतेशु समृद्धि रूपेण संस्थिताः।
नमस्तस्य नमस्तस्य नमस्तस्य नमोनमः।।

पूजा के उपरांत लाल रंग के आसन पर बैठे-बैठे सिद्ध हकीक माला से स्वर्ण रेखा अष्टलक्ष्मी मंत्र की इक्यावन माला जप करें। याद रहे जप करते समय सामने सिद्ध स्वर्णरेखा यंत्र कवच अवश्य स्थापित होना चाहिये, और शुद्ध तेल (तिल का तेल) का दीपक लगा रहना चाहिए।

स्वर्ण रेखा अष्ठलक्ष्मी मंत्र- ऊँ ऐं ऐं श्रीं श्रीं श्रीं हृीं हृीं फट्।
मंत्र जप समाप्ति के बाद वह सिद्ध स्वर्णरेखा यंत्र कवच पीले धागे में पिरोकर गले में धारण कर लें और अष्ठलक्ष्मी प्रतीक 8 हकीक रत्न को पीले रेशमी वस्त्र में बांधकर घर में उत्तर दिशा की किसी संदूक सा तिजोरी अथवा अलमारी में रख दें। जिस हकीक माला से मंत्र जप किया था, वह माला और अन्य पूजा सामग्री तीसरे दिन अर्थात् बृहस्पति वार की शाम को जल में विसर्जित कर दें अथवा भूमि में दबा दें। इस प्रकार यह  दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने वाली साधना पूर्ण होती है और उसी दिन से साधक तथा उसके परिवार का दुर्भाग्य सौभाग्य में बदलने लगेगा।
गत वर्ष गुरूजी ने यह प्रयोग अपने विशेष शिष्यों को अपने स्थान पर सम्पन्न करवाया था। उन सभी साधकों में से 85 प्रतीशत को चमत्कारी लाभ प्राप्त हुआ है। शेष 15 प्रतीशत साधकों को साधारण लाभ हुआ है। इस साधना को सम्पन्न करने के पश्चात् गुरूजी के शिष्य या साधक एक महीने के भीतर जो कुछ भी परिवर्तन महसूस करेंगे, वह आश्चर्य जनक और अद्भुत होगा, उनके जीवन में दुःख दरिद्रता और भय की समाप्ति तो होगी ही जीवन में निरन्तर हर दृष्टि से उन्नति आरम्भ हो जायेगी।
शिष्य, पाठकों और साधकों के लिए यह सुविधा प्रदान की जाती है, कि वे पत्रिका कार्यालय से विशेष साधना सामग्री पैकिट जिसमें- एक सिद्ध स्वर्णरेखा यंत्र कवच एक सिद्ध हकीक माला तथा 8 अष्ठलक्ष्मी प्रतीक हकीक रत्न होंगे। प्राप्त करने के लिये शीघ्र सम्पर्क कर लें, क्योकि यह विशेष साधना सामग्री पैकिट सीमित मात्रा में ही उपलब्ध होंगे। इसके लिये न्यौक्षावर राशि 3100/-रू अग्रिम जमा करनी होगी।
कम-से-कम 15-20 दिन पूर्व ही न्यौक्षावर राशि का डी.डी. Shukracharya Astro Pvt. Ltd. के नाम से दिल्ली के लिये बनवाकर पत्रिका कार्यालय के पते पर भेजें, अथवा स्टेट बैंक आफ इंडिया के हमारे कम्पनी के खाते- Shukracharya Astro Pvt. Ltd. खाता नः 31810709561 में कैश जमा करवा कर भी मंगवा सकते हैं।

लेखक विख्यात ज्योतिषाचार्य— Dr.R.B.Dhawan

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Dr.R.B.Dhawan (Guruji)

मैं, डा.आर.बी.धवन, समाज के कल्याण और आप सभी को उत्तम विद्याओं, वेदों, पुराणों व अन्य टोटके/जानकारियाँ आदि बताने के लिए ब्लॉग शुरू कर रहा हूँ |
[नोट: किसी की कुंडली देख पाना और उनका उत्तर दे पाना यहाँ संभव नहीं होगा, उसके लिए कार्यालय मे संपर्क कर व्यक्तिगत रूप से मिलें|

विख्यात् ज्योतिषाचर्य – Dr.R.B.Dhawan