दीपावली तंत्र-मंत्र विशेषांक

संपादक :- Dr. R.B.Dhawan

(Top Astrologer in Delhi, best Astrologer in Delhi)

“आप का भविष्य” मासिक ज्योतिषीय ई-पत्रिका अक्तूबर 2017 अंक :- “दीपावली तंत्र-मंत्र विशेषांक” Deepawali tantra mantra viseshank जिसमें आप पाएंगे दीपावली पर सिद्ध किए जाने वाले आर्थिक समृद्धि तथा जीवनोपयोगी अनेक सरल प्रयोग।
इस अंक की विशेष बात यह है कि, ज्योतिष विज्ञान व तंत्र विज्ञान में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह कहना ठीक होगा कि, वे पूरा वर्ष दीपावली पर प्रकाशित होने वाले इस अंक की बेसब्री से प्रतीक्षा करते हैं। इस अक्तूबर आप ई-पत्रिका “आप का भविष्य” Diawali tantra mantra की Subscription ले ही लीजिए, बेशक आप अक्तूबर 2017 अंक से सितम्बर 2018 अंक तक की Subscription ले सकते हैं। Deepawali Tantra Mantra viseshank अक्तूबर अंक केवल तंत्र मंत्र विशेषांक ही नहीं अपितु आप के लिये बहुत उपयोगी भी है। इस अंक में गुरूजी ने आप के लिये अनेक सरल प्रयोग एवं उपाय प्रकाशित किए हैं, जिनमें से एक प्रयोग (सरल उपाय) आपने सिद्ध कर लिया तो आप इस विद्या की प्रशंसा करते नहीं थकेंगे।
तंत्र-मंत्र से संबंधित अनेक कार्य एेसे होते हैं, जो पर्वकाल में ही सिद्ध हो सकते हैं, कुछ समस्याएं होती ही एेसी हैं, जिनकी चर्चा किसी से भी नहीं कर सकते। परंतु उनका जल्दी ही समाधान न किया जाए तो वे और भी जटिल होती चली जाती हैं। आज का युग तड़क-भड़क और दिखावे का युग बनकर रह गया है, इसके प्रभाव वश अनेक युवक किसी सुन्दर युवती को देखकर मचलने लगते हैं, आजकल के हालात को देखकर तो लगता है, कुछ युवतियों का लक्ष्य दूसरी महिला मित्र के पति पर डोरे डालने का ही हो गया है। इस समस्या से पीड़ित अनेक महिलाएं तो किसी को बताना भी ठीक नहीं समझती, और यह ठीक भी है, बताकर भला अपने पति की इज्जत क्यों खराब की जाये?
इसी प्रकार कुछ ईष्यालु लोग व्यापार करने वाले अपने दूसरे प्रतिद्वंद्वी पर कोई एेसा तंत्र कर देते हैं, जिसके प्रभाव से प्रतिद्वंद्वी का व्यापार ठप हो जाता है, नौकरी करने वालों को भी कभी-कभी एेसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
गुरूजी का कहना है, एेसी समस्याओं का समाधान आप स्वयं कर सकते हैं। अक्तूबर 2017 “आप का भविष्य” diwali Tantra Mantra अंक इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए प्रकाशित किया गया है।

आज ही Aap Ka Bhavishya app डाउनलोड कीजिए और केवल 180/- में एक वर्ष (12 अंक) के लिये Subscription लीजिए।

https://play.google.com/store/apps/details?id=com.pdt.akb

_____________________________________________

मेरे और लेख देखें :- Aapkabhavishya.in, astroguruji.in, gurujiketotke.com,vaidhraj.com,shukracharya.com, rbdhawan@wordpress.com

Advertisements

दीपावली मुहूर्त 2018

Dr.R.B.Dhawan

(Top Astrologer in Delhi, best Astrologer in Delhi,experience Astrologer in Delhi)

कार्तिक मास kartik की अमावस्या amavasya की रात्रि प्रदोषकाल, स्थिर लग्न में अथवा महानिशीथ काल, mahanishith kaal स्थिर लग्न में अनुकूल चौघडिया के समय गणेश सहित देवी महालक्ष्मी-महाकाली-महासरस्वती की पूजा-आराधना diwali Pooja करने से यह देवीयां भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करती हैं।

इस वर्ष दीपावली depawli pooja (Laxmi Pooja) का पर्व 19 अक्तूबर 2017 बृहस्पतिवार के दिन होगा। दिल्ली की समय गणना अनुसार इस दिन अमावस्या रात्रि 24:44 तक रहेगी, चित्रा नक्षत्र 07:28 से आरंभ होगा, वृष (स्थिर लग्न) 19:11 से 21:06 तक रहेगी। निशीथ काल nishith kaal 20:20 से 22:54 तक, प्रदोष काल pradosh kaal 17:46 से 20:20 तक रहेगा। दीपावली की शाम प्रदोष काल में स्नान के उपरांत वस्त्राभूषण धारण करके धर्मस्थल पर श्रद्धापूर्वक दीपदान करके शुभ मुहूर्त अनुकूल चौघडिया में अपने निवास स्थान पर श्री गणेश सहित देवी महालक्ष्मी महाकाली महासरस्वती और कुबेर की पूजा diwali pooja करनी चाहिए।

महालक्ष्मी mahalxmi Pooja पूजन विशेष मुहूर्त : (1). सायं 19 : 11 से 20 : 20 तक। (2). रात्रि 20 : 20 से 20 : 59 तक। यह दोनों मुहूर्त वृष लग्न के हैं।

विशेष Diwali muhurt 2017, मध्य रात्रि महानिशीथ काल सिंह लग्न : 25 : 39 से 25 : 48 तक है।

हर पर्व का महत्व व मुहूर्त तथा अनेक ज्योतिषीय लेख पड़ने के लिए आप हमारी एप डाउनलोड करें, इसका वार्षिक (12 अंक के लिए) subscription केवल 180/- है। “आप का भविष्य” मासिक ज्योतिषीय ई-पत्रिका का लिंक दिया गया है, जिस से आप Aap ka Bhavishya एप डाउनलोड कर सकते हैं।

https://play.google.com/store/apps/details?id=com.pdt.akb

_____________________________________________

मेरे और लेख देखें :- Aapkabhavishya.in, astroguruji.in, gurujiketotke.com,vaidhraj.com,shukracharya.com, rbdhawan@wordpress.com

शत्रु नाशक मंत्र

(श्री दुर्गा सप्तशति बीजमंत्रात्मक साधना)

Dr.R.B.Dhawan

Dr.R.B.Dhawan, (Top Astrologer in Delhi, best Astrologer in Delhi, best Astrologer in delhi)

इस मंत्र की साधना से शत्रु की शत्रुता नष्ट हो जाती है। (शत्रु नहीं)

ॐ श्री गणेशाय नमः [११ बार]
ॐ ह्रों जुं सः सिद्ध गुरूवे नमः [११ बार]
ॐ दुर्गे दुर्गे रक्ष्णी ठः ठः स्वाहः [१३ बार]

[सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम..]

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।।
नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दीनि। नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दीनि।।

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भसुरघातिनि। जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे।।

ऐंकारी सृष्टीरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका। क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोस्तुते।।

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी। विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि।।

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी। क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुंभ कुरू।।

हुं हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी। भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रै भवान्यै ते नमो नमः।।

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं। धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा।।

पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा। सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे।।

ॐ नमश्चण्डिका:। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
प्रथमचरित्र…

ॐ अस्य श्री प्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा रूषिः महाकाली देवता गायत्री छन्दः नन्दा शक्तिः रक्तदन्तिका बीजम् अग्निस्तत्त्वम् रूग्वेद स्वरूपम् श्रीमहाकाली प्रीत्यर्थे प्रथमचरित्र जपे विनियोगः।

(१) श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं प्रीं ह्रां ह्रीं सौं प्रें म्रें ल्ह्रीं म्लीं स्त्रीं क्रां स्ल्हीं क्रीं चां भें क्रीं वैं ह्रौं युं जुं हं शं रौं यं विं वैं चें ह्रीं क्रं सं कं श्रीं त्रों स्त्रां ज्यैं रौं द्रां द्रों ह्रां द्रूं शां म्रीं श्रौं जूं ल्ह्रूं श्रूं प्रीं रं वं व्रीं ब्लूं स्त्रौं ब्लां लूं सां रौं हसौं क्रूं शौं श्रौं वं त्रूं क्रौं क्लूं क्लीं श्रीं व्लूं ठां ठ्रीं स्त्रां स्लूं क्रैं च्रां फ्रां जीं लूं स्लूं नों स्त्रीं प्रूं स्त्रूं ज्रां वौं ओं श्रौं रीं रूं क्लीं दुं ह्रीं गूं लां ह्रां गं ऐं श्रौं जूं डें श्रौं छ्रां क्लीं

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
मध्यमचरित्र..

ॐ अस्य श्री मध्यमचरित्रस्य विष्णुर्रूषिः महालक्ष्मीर्देवता उष्णिक छन्दः शाकम्भरी शक्तिः दुर्गा बीजम् वायुस्तत्त्वम् यजुर्वेदः स्वरूपम् श्रीमहालक्ष्मी प्रीत्यर्थे मध्यमचरित्र जपे विनियोगः।

(२) श्रौं श्रीं ह्सूं हौं ह्रीं अं क्लीं चां मुं डां यैं विं च्चें ईं सौं व्रां त्रौं लूं वं ह्रां क्रीं सौं यं ऐं मूं सः हं सं सों शं हं ह्रौं म्लीं यूं त्रूं स्त्रीं आं प्रें शं ह्रां स्मूं ऊं गूं व्र्यूं ह्रूं भैं ह्रां क्रूं मूं ल्ह्रीं श्रां द्रूं द्व्रूं ह्सौं क्रां स्हौं म्लूं श्रीं गैं क्रूं त्रीं क्ष्फीं क्सीं फ्रों ह्रीं शां क्ष्म्रीं रों डुं

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(३) श्रौं क्लीं सां त्रों प्रूं ग्लौं क्रौं व्रीं स्लीं ह्रीं हौं श्रां ग्रीं क्रूं क्रीं यां द्लूं द्रूं क्षं ह्रीं क्रौं क्ष्म्ल्रीं वां श्रूं ग्लूं ल्रीं प्रें हूं ह्रौं दें नूं आं फ्रां प्रीं दं फ्रीं ह्रीं गूं श्रौं सां श्रीं जुं हं सं

।ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(४) श्रौं सौं दीं प्रें यां रूं भं सूं श्रां औं लूं डूं जूं धूं त्रें ल्हीं श्रीं ईं ह्रां ल्ह्रूं क्लूं क्रां लूं फ्रें क्रीं म्लूं घ्रें श्रौं ह्रौं व्रीं ह्रीं त्रौं हलौं गीं यूं ल्हीं ल्हूं श्रौं ओं अं म्हौं प्री

।ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
उत्तमचरित्र..

ॐ अस्य श्री उत्तरचरित्रस्य रुद्र रूषिः महासरस्वती देवता अनुष्टुप् छन्दः भीमा शक्तिः भ्रामरी बीजम सूर्यस्तत्त्वम सामवेदः स्वरूपम श्री महासरस्वती प्रीत्यर्थे उत्तरचरित्र जपे विनियोगः।

(५) श्रौं प्रीं ओं ह्रीं ल्रीं त्रों क्रीं ह्लौं ह्रीं श्रीं हूं क्लीं रौं स्त्रीं म्लीं प्लूं ह्सौं स्त्रीं ग्लूं व्रीं सौः लूं ल्लूं द्रां क्सां क्ष्म्रीं ग्लौं स्कं त्रूं स्क्लूं क्रौं च्छ्रीं म्लूं क्लूं शां ल्हीं स्त्रूं ल्लीं लीं सं लूं हस्त्रूं श्रूं जूं हस्ल्रीं स्कीं क्लां श्रूं हं ह्लीं क्स्त्रूं द्रौं क्लूं गां सं ल्स्त्रां फ्रीं स्लां ल्लूं फ्रें ओं स्म्लीं ह्रां ऊं ल्हूं हूं नं स्त्रां वं मं म्क्लीं शां लं भैं ल्लूं हौं ईं चें क्ल्रीं ल्ह्रीं क्ष्म्ल्रीं पूं श्रौं ह्रौं भ्रूं क्स्त्रीं आं क्रूं त्रूं डूं जां ल्ह्रूं फ्रौं क्रौं किं ग्लूं छ्रंक्लीं रं क्सैं स्हुं श्रौं श्रीं ओं लूं ल्हूं ल्लूं स्क्रीं स्स्त्रौं स्भ्रूं क्ष्मक्लीं व्रीं सीं भूं लां श्रौं स्हैं ह्रीं श्रीं फ्रें रूं च्छ्रूं ल्हूं कं द्रें श्रीं सां ह्रौं ऐं स्कीं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(६) श्रौं ओं त्रूं ह्रौं क्रौं श्रौं त्रीं क्लीं प्रीं ह्रीं ह्रौं श्रौं अरैं अरौं श्रीं क्रां हूं छ्रां क्ष्मक्ल्रीं ल्लुं सौः ह्लौं क्रूं सौं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(७) श्रौं कुं ल्हीं ह्रं मूं त्रौं ह्रौं ओं ह्सूं क्लूं क्रें नें लूं ह्स्लीं प्लूं शां स्लूं प्लीं प्रें अं औं म्ल्रीं श्रां सौं श्रौं प्रीं हस्व्रीं।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(८) श्रौं म्हल्रीं प्रूं एं क्रों ईं एं ल्रीं फ्रौं म्लूं नों हूं फ्रौं ग्लौं स्मौं सौं स्हों श्रीं ख्सें क्ष्म्लीं ल्सीं ह्रौं वीं लूं व्लीं त्स्त्रों ब्रूं श्क्लीं श्रूं ह्रीं शीं क्लीं फ्रूं क्लौं ह्रूं क्लूं तीं म्लूं हं स्लूं औं ल्हौं श्ल्रीं यां थ्लीं ल्हीं ग्लौं ह्रौं प्रां क्रीं क्लीं न्स्लुं हीं ह्लौं ह्रैं भ्रं सौं श्रीं प्सूं द्रौं स्स्त्रां ह्स्लीं स्ल्ल्रीं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।

(९) रौं क्लीं म्लौं श्रौं ग्लीं ह्रौं ह्सौं ईं ब्रूं श्रां लूं आं श्रीं क्रौं प्रूं क्लीं भ्रूं ह्रौं क्रीं म्लीं ग्लौं ह्सूं प्लीं ह्रौं ह्स्त्रां स्हौं ल्लूं क्स्लीं श्रीं स्तूं च्रें वीं क्ष्लूं श्लूं क्रूं क्रां स्क्ष्लीं भ्रूं ह्रौं क्रां फ्रूं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।

(१०) श्रौं ह्रीं ब्लूं ह्रीं म्लूं ह्रं ह्रीं ग्लीं श्रौं धूं हुं द्रौं श्रीं त्रों व्रूं फ्रें ह्रां जुं सौः स्लौं प्रें हस्वां प्रीं फ्रां क्रीं श्रीं क्रां सः क्लीं व्रें इं ज्स्हल्रीं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(११) श्रौं क्रूं श्रीं ल्लीं प्रें सौः स्हौं श्रूं क्लीं स्क्लीं प्रीं ग्लौं ह्स्ह्रीं स्तौं लीं म्लीं स्तूं ज्स्ह्रीं फ्रूं क्रूं ह्रौं ल्लूं क्ष्म्रीं श्रूं ईं जुं त्रैं द्रूं ह्रौं क्लीं सूं हौं श्व्रं ब्रूं स्फ्रूं ह्रीं लं ह्सौं सें ह्रीं ल्हीं विं प्लीं क्ष्म्क्लीं त्स्त्रां प्रं म्लीं स्त्रूं क्ष्मां स्तूं स्ह्रीं थ्प्रीं क्रौं श्रां म्लीं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(१२) ह्रीं ओं श्रीं ईं क्लीं क्रूं श्रूं प्रां स्क्रूं दिं फ्रें हं सः चें सूं प्रीं ब्लूं आं औं ह्रीं क्रीं द्रां श्रीं स्लीं क्लीं स्लूं ह्रीं व्लीं ओं त्त्रों श्रौं ऐं प्रें द्रूं क्लूं औं सूं चें ह्रूं प्लीं क्षीं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(१३) श्रौं व्रीं ओं औं ह्रां श्रीं श्रां ओं प्लीं सौं ह्रीं क्रीं ल्लूं ह्रीं क्लीं प्लीं श्रीं ल्लीं श्रूं ह्रूं ह्रीं त्रूं ऊं सूं प्रीं श्रीं ह्लौं आं ओं ह्रीं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
दुर्गा दुर्गर्तिशमनी दुर्गापद्विनिवारिणी ।

दुर्गमच्छेदिनी दुर्गसाधिनी दुर्गनाशिनी ।।

दुर्गनिहन्त्री दुर्गमापहा ।

दुर्गमग्यानदा दुर्गदैत्यलोकदवानला ।।

दुर्गमा दुर्गमालोका दुर्गमात्मस्वरूपिणी ।

दुर्गमार्गप्रदा दुर्गमविद्या दुर्गमाश्रिता ।।

दुर्गमग्यानसंस्थाना दुर्गमध्यानभासिनी ।

दुर्गमोहा दुर्गमगा दुर्गमार्थस्वरूपिणी ।।

दुर्गमासुरसंहन्त्री दुर्गमायुधधारिणी ।

दुर्गमाँगी दुर्गमता दुर्गम्या दुर्गमेश्वरी ।।

दुर्गभीमा दुर्गभामा दुर्गभा दुर्गदारिणी ।।

[३ बार]

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ दुर्गार्पणमस्तु।।
नमः शिवाय्
॥ चण्डिकाहृदयस्तोत्रम् ॥
अस्य श्री चण्डिका हृदय स्तोत्र महामन्त्रस्य ।

मार्क्कण्डेय ऋषिः, अनुष्टुप्च्छन्दः, श्री चण्डिका देवता ।

ह्रां बीजं, ह्रीं शक्तिः, ह्रूं कीलकं,

अस्य श्री चण्डिका प्रसाद सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।

ह्रां इत्यादि षडंग न्यासः ।
ध्यानं ।

सर्वमंगळ मांगल्ये शिवे सर्वार्त्थ साधिके ।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते ॥
ब्रह्मोवाच ।

अथातस्सं प्रवक्ष्यामि विस्तरेण यथातथं ।

चण्डिका हृदयं गुह्यं शृणुष्वैकाग्रमानसः । ।

ॐ ऐं ह्रीं क्ळीं, ह्रां, ह्रीं, ह्रूं जय जय चामुण्डे,

चण्डिके, त्रिदश, मणिमकुटकोटीर संघट्टित चरणारविन्दे,

गायत्री, सावित्री, सरस्वति, महाहिकृताभरणे, भैरवरूप

धारिणी, प्रकटित दंष्ट्रोग्रवदने,घोरे, घोराननेज्वल

ज्वलज्ज्वाला सहस्रपरिवृते, महाट्टहास बधरीकृत दिगन्तरे,

सर्वायुध परिपूर्ण्णे, कपालहस्ते, गजाजिनोत्तरीये,

भूतवेताळबृन्दपरिवृते, प्रकन्पित धराधरे,

मधुकैटमहिषासुर, धूम्रलोचन चण्डमुण्डरक्तबीज

शुंभनिशुंभादि दैत्यनिष्कण्ढके, काळरात्रि,

महामाये, शिवे, नित्ये, इन्द्राग्नियमनिरृति वरुणवायु

सोमेशान प्रधान शक्ति भूते, ब्रह्माविष्णु शिवस्तुते,

त्रिभुवनाधाराधारे, वामे, ज्येष्ठे, रौद्र्यंबिके,

ब्राह्मी, माहेश्वरि, कौमारि, वैष्णवी शंखिनी वाराहीन्द्राणी

चामुण्डा शिवदूति महाकाळि महालक्ष्मी, महासरस्वतीतिस्थिते,

नादमध्यस्थिते, महोग्रविषोरगफणामणिघटित

मकुटकटकादिरत्न महाज्वालामय पादबाहुदण्डोत्तमांगे,

महामहिषोपरि गन्धर्व विद्याधराराधिते,

नवरत्ननिधिकोशे तत्त्वस्वरूपे वाक्पाणिपादपायूपस्थात्मिके,

शब्दस्पर्शरूपरसगन्धादि स्वरूपे,

त्वक्चक्षुः श्रोत्रजिह्वाघ्राणमहाबुद्धिस्थिते,

ॐ ऐंकार ह्रीं कार क्ळीं कारहस्ते आं क्रों आग्नेयनयनपात्रे प्रवेशय,

द्रां शोषय शोषय, द्रीं सुकुमारय सुकुमारय,

श्रीं सर्वं प्रवेशय प्रवेशय, त्रैलोक्यवर वर्ण्णिनि

समस्त चित्तं वशीकरु वशीकरु मम शत्रून्,

शीघ्रं मारय मारय, जाग्रत् स्वप्न सुषुप्त्य वस्थासु अस्मान्

राजचोराग्निजल वात विषभूत-शत्रुमृत्यु-ज्वरादि स्फोटकादि

नानारोगेभ्योः नानाभिचारेभ्यो नानापवादेभ्यः परकर्म मन्त्र

तन्त्र यन्त्रौषध शल्यशून्य क्षुद्रेभ्यः सम्यङ्मां

रक्ष रक्ष, ॐ ऐं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रः,

स्फ्रां स्फ्रीं स्फ्रैं स्फ्रौं स्फ्रः – मम सर्व कार्याणि

साधय साधय हुं फट् स्वाहा –

राज द्वारे श्मशाने वा विवादे शत्रु सङ्कटे ।

भूताग्नि चोर मद्ध्यस्थे मयि कार्याणि साधय ॥ स्वाहा ।

चण्डिका हृदयं गुह्यं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः ।

सर्व काम प्रदं पुंसां भुक्ति मुक्तिं प्रियच्चति ।

(देवी के नौ रूपों का एक स्वरूप दक्षिण भारतीय परम्परा में निम्न प्रकार से उपलब्ध होता है) –

प्रथमा वन -दुर्गेति द्वितीया शूलिनी माता।

तृतीया जातवेदा च चतुर्थी शान्तिरिष्यते।।

पंचमी शबरी चैव षष्ठी ज्वालेति गीयते।

सप्तमी लवणा चेति अष्टम्यां आसुरी माता।।

नवमी दीपदुर्गेति नव दुर्गा प्रकीर्तिता।।
महा नवार्ण मंत्र:-

ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं महादुर्गे नवाक्षरी नवदुर्गे नवात्मिके नवचण्डी महामाये महामोहे महायोगनिद्रे जये मधुकैटभ विद्राविणी महिषासुर मर्दिनी धूम्रलोचन संहन्त्रि चण्डमुण्ड विनाशिनी रक्तबीजान्तके निशुम्भध्वंसिनी शुम्भदर्पघ्नि देवि अष्टादश बाहुके कपाल- खट्वांग शूल खड्ग खेटक धारिणी छिन्न मस्तक धारिणी रूधिर मांस भोजिनी समस्त भूत प्रेतादि योग ध्वंसिनी ब्रह्मेन्द्रादि स्तुते देवि मां रक्ष रक्ष मम शत्रून् नाशय नाशय ह्रीं फट् ह्रूं फट् ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।।

यह एक गोपनीय साधना विधान है, इस से अधिक विवरण प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।

मेरे और लेख देखें :- Aapkabhavishya.in, astroguruji.in,gurujiketotke.com, vaidhraj.com,shukracharya.com, rbdhawan@wordpress.com

मंगल ग्रह

By experience astrologer in Delhi :- मंगल mangal एक अत्यधिक ऊर्जा (अग्नि) प्रधान ग्रह है, मनुष्य शरीर पर जब इसका अधिक प्रभाव होता है, तो यह उसे बलशाली बना देता है। मनुष्य के मस्तिष्क पर जब इसका प्रभाव होता है, तो उसे ये क्रूर वा अत्यंत बलशाली और शीघ्र गति से कार्य करने वाला बना देता है। मनुष्य के रक्त पर जब इसका प्रभाव होता है, तो रक्तचाप अधिक रहता है। अर्थात शरीर के जिस अंग पर अपना प्रभाव डालता है, उसी अंग को असामान्य गति से कार्य करने को विवश कर देता है। इसी लिए अधिक गति के कारण एक्सिडेंट होने के कारण बनते हैं। मानसिक ऊर्जा, शारीरिक ऊर्जा, अग्नि, झगडे़-फसाद, दंगे और उन्माद ये ग्रह जब विपरीत होता है तो, मनुष्य की भावनाओ को भडका देता है जिसके कारण ये सभी होते हैं।

मंगल mangal आजीविका में सेना, पुलिस, बिजली (ऊर्जा), अग्नि, आर्म्स, रेस्टोरंट, फर्निश इत्यादि से देता भी है।

इस ग्रह को जब शुक्र का साथ मिल जाए तो मनुष्य को अत्यंत भोगी अनेक स्त्रीयो का भोगी बना देता है। वह व्यक्ति अत्यंत प्रभावशाली हो जाता है।

Dr.R.B.Dhawan (Top Astrologer in Delhi)

Best Astrologer in India, Best Astrologer in Delhi

Jupiter

संतानसौख्यं वचने पटुत्वं शरीर पुष्टि द्रविणं तनूजा।
ज्ञानं मतिस्तंत्र विचार भूप विनोदवेदार्थ विदोड्.गवीर्य।।
तुरंगसौख्यं स्वगुरूः स्वकर्म सिहासनं गोरथवृद्धप्रयः
चीकराभूषणसत्वमेदो मीमांसतीर्थानि यशः सुरेज्यात्।।

संतान सुख, व्याख्या की कुशलता, शरीर की पुष्टि, धन, ज्ञान, बुद्धि, सिद्धांत शास्त्रों का ज्ञान, वेदार्थ, अपना कर्म-सुख, वृद्ध ब्राह्मण, स्वर्ण-सम्पन्नता, सतोगुण, शरीर की चर्बी, शास्त्रों की मिमांसा, तीर्थ, यश, भाग्य और सम्मान तथा राजकृपा।
यह सभी बृहस्पति ग्रह की कृपा से प्राप्त होते हैं। बृहस्पति राजकृपा कारक ग्रह है, जिस पर बृहस्पति की कृपा दृष्टि होती है, उसकी कुण्डली में हँस योग (राजयोग) होता है।
एेसे खुशनसीब व्यक्ति के लिये अपने हाथ से राज सम्मान को लौटाना बृहस्पति को रूष्ट करना है। बृहस्पति देव जब रूष्ट होते हैं, धीरे-धीरे यह सभी उपलब्धियाँ (राजकृपा) भी लुप्त होती चली जाती हैं। अतः कभी भी राज-सम्मान न लौटायें, यह नसीब वालों को मिलता है।

Experience astrologer in Delhi:-  Dr.R.B.Dhawan,

Beat Astrologer in India, Top Astrologer in Delhi