दीपावली पूजन 2018

दीपावली पूजन के शुभ मुहूर्त:-

(Dr.R.B.Dhawan, Top best Astrologer in Delhi)

इस वर्ष दीपावली पर्व 7 नवम्बर 2018 के दिन है, इस दिन अमावस्या तिथि दिल्ली की गणना अनुसार लगभग 20:32 तक रहेगी। महालक्ष्मी पूजन किसी स्थिर लग्न में होना उचित है, इस दिन वृषभ और सिंह दो स्थिर लग्न होंगी। वृषभ लग्न सांयकाल 17 बजकर 57 मिनट से रात्रि 19 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। और सिंह लग्न मध्य रात्रि को 00 (24) बजकर 27 मिनट से 02 बजकर 54 मिनट तक रहेगी। इन दोनो महूर्त में स्वाती नक्षत्र 19 बजकर 37 मिनट तक, इसके पश्चात विशाखा नक्षत्र पढेगा। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इन दोनो लग्नों का यह समय दिल्ली प्रदेश के लिये है। शेष भारत अथवा विदेशों में रहने वाले पाठक अपने देश या प्रदेश के लिये उपरोक्त स्थिर लग्नों का समय shukracharya कार्यालय से फोन द्वारा पता कर सकते हैं। इन्हीं दो स्थिर लग्न में से किसी लग्न में जब अनुकूल चौघड़िया भी हो तब महालक्ष्मी पूजन किया जा सकता है।

महालक्ष्मी पूजन के लिए पूजा स्थल एक दिन पहले से सजाना चाहिए पूजन के लिए सामग्री दिपावली से पहले ही एकत्रित कर लें। इसमें यदि माता लक्ष्मी के पसंद को ध्यान में रख कर पूजा की जाए तो शुभत्व की वृद्धि होती है। माता के पसंदीदा रंग लाल, व गुलाबी हैं, इसके बाद फूलों की बात करें, तो कमल और गुलाब माता लक्ष्मी के प्रिय फूल हैं। पूजा में फलों का भी खास महत्व होता है। फलों में उन्हें श्रीफल, सीताफल, बेर, अनार व सिंघाड़े पसंद हैं। आप इनमें से कोई भी फल पूजा के लिए प्रयोग कर सकते हैं। अनाज रखना हो तो चावल रखें, वहीं मिठाई में माता लक्ष्मी की पसंद शुद्ध केसर से बनी मिठाई या हलवा, शीरा और नैवेद्य हैं।

माता के स्थान को सुगंधित करने के लिए केवड़ा, गुलाब और चंदन के इत्र का प्रयोग करें। दीये के लिए आप गाय के घी, मूंगफली या तिल्ली के तेल का इस्तेमाल कर सकते हैं। यह माता लक्ष्मी को शीघ्र प्रसन्न करते हैं। पूजा के लिए महत्वपूर्ण दूसरी वस्तुओं में गन्ना, कमल गट्टा, खड़ी हल्दी, बिल्वपत्र, पंचामृत, गंगाजल, ऊन का आसन, रत्न आभूषण, गाय का गोबर, सिंदूर और भोजपत्र शामिल हैं।

चौकी सजाना :-

1. लक्ष्मी-गणेश की चांदी या फिर मिट्टी से बनी छोटी प्रतिमा, 2. चांदी पर उत्कीर्ण महालक्ष्मी यंत्र (पहले से प्राणप्रतिष्ठित)। 3. मिट्टी के बने हुए 21, 31 या 51 छोटे और 3 बड़े दीपक। 4. एक तांबे का कलश जिस पर नारियल रखेंगे, व आचमनी। 5. चांदी और तांबे के सिक्के, बहीखाता, कलम और दवात। 6. नकदी, थालियां, जल पात्र, चावल, फूल, सुपारी, रोली, कलावा, पानी वाला नारियल, लाल वस्त्र,।

1. ग्यारह दीपक, 2. खील, बताशे, मिठाई, वस्त्र, आभूषण, चन्दन का लेप, सिन्दूर, कुंकुम, सुपारी, पान, 3. फूल, दुर्वा, चावल, लौंग, इलायची, केसर-कपूर, हल्दी-चूने का लेप, सुगंधित पदार्थ, धूप, अगरबत्ती, एक दीपक।

सबसे पहले एक लकड़ी की चौकी पर लक्ष्मी व गणेश की मूर्तियां इस प्रकार रखें, कि उनका मुख पूर्व या पश्चिम की ओर रहे। लक्ष्मीजी, गणेशजी की दाहिनी ओर रहें। पूजा करने वाले मूर्तियों के सामने की तरफ बैठें। कलश को लक्ष्मीजी के पास चावलों पर रखें। नारियल को लाल वस्त्र में इस प्रकार लपेटें कि नारियल का अग्रभाग दिखाई देता रहे, व इसे कलश पर रखें। यह कलश वरुण का प्रतीक है। दो बड़े दीपक रखें, एक में घी भरें व दूसरे में तेल। एक दीपक चौकी के दाईं ओर रखें, व दूसरा मूर्तियों के चरणों में। इसके अलावा एक बड़ा दीपक गणेशजी के पास रखें।

मूर्तियों वाली चौकी के सामने छोटी चौकी रखकर उस पर लाल वस्त्र बिछाएं। कलश की ओर एक मुट्ठी चावल से लाल वस्त्र पर नवग्रह की प्रतीक नौ ढेरियां बनाएं। गणेशजी की ओर चावल की सोलह ढेरियां बनाएं। ये सोलह मातृका की प्रतीक हैं। नवग्रह व षोडश मातृका के बीच स्वस्तिक का चिह्न बनाएं।
इसके बीच में सुपारी रखें, व चारों कोनों पर चावल की ढेरी। सबसे ऊपर बीचों बीच ॐ लिखें। छोटी चौकी के सामने तीन थाली व जल भरकर कलश रखें। थालियों की निम्नानुसार व्यवस्था करें- 1. ग्यारह दीपक, 2. खील, बताशे, मिठाई, वस्त्र, आभूषण, चन्दन का लेप, सिन्दूर, कुंकुम, सुपारी, पान, 3. फूल, दुर्वा, चावल, लौंग, इलायची, केसर-कपूर, हल्दी-चूने का लेप, सुगंधित पदार्थ, धूप, अगरबत्ती, एक दीपक।

इन थालियों के सामने पूजा करने वाला बैठे। आपके परिवार के सदस्य आपकी बाईं ओर बैठें। कोई आगंतुक हो तो वह आपके या आपके परिवार के सदस्यों के पीछे बैठे। हर वर्ष दीपावली पूजन में नया सिक्का लें, और पुराने सिक्को के साथ इकट्ठा रख कर दीपावली पर पूजन करें, और पूजन के बाद सभी सिक्को को तिजोरी में रख दें।

पूजा की संक्षिप्त विधि स्वयं पूजा करने के लिए :- हाथ में पूजा के जलपात्र से थोड़ा सा जल ले लें, और अब उसे मूर्तियों के ऊपर छिड़कें। साथ में नीचे दिया गया पवित्रीकरण मंत्र पढ़ें। इस मंत्र और पानी को छिड़ककर आप अपने आपको पूजा की सामग्री को और अपने आसन को भी पवित्र कर लें।

शरीर एवं पूजा सामग्री पवित्रीकरण मन्त्र :-

ॐ पवित्रः अपवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपिवा।
यः स्मरेत्‌ पुण्डरीकाक्षं स वाह्यभ्यन्तर शुचिः॥

पृथ्वी पवित्रीकरण विनियोग:-

पृथ्वी देवता मंत्रस्य मेरुपृष्ठः ग षिः सुतलं छन्दः
कूर्मोदेवता आसने विनियोगः॥

अब पृथ्वी पर जिस जगह आपने आसन बिछाया है, उस जगह को पवित्र कर लें, और मां पृथ्वी को प्रणाम करके मंत्र बोलें-
पृथ्वी पवित्रीकरण मन्त्र :-

ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता। त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्‌॥ पृथिव्यै नमः आधारशक्तये नमः।

अब आचमन करें :-

पुष्प, चम्मच या अंजुलि से एक बूंद पानी अपने मुंह में छोड़िए और बोलिए-

ॐ केशवाय नमः।

और फिर एक बूंद पानी अपने मुंह में छोड़िए और बोलिए-

ॐ नारायणाय नमः।

फिर एक तीसरी बूंद पानी की मुंह में छोड़िए और बोलिए-

ॐ वासुदेवाय नमः।

इसके बाद संभव हो तो किसी किसी ब्राह्मण द्वारा विधि विधान से पूजन करवाना अति लाभदायक रहेगा। ऐसा संभव ना हो तो सर्वप्रथम दीप प्रज्वलन कर गणेश जी का ध्यान कर अक्षत पुष्प अर्पित करने के पश्चात दीपक का गंधाक्षत से तिलक कर निम्न मंत्र से पुष्प अर्पण करें।

शुभम करोति कल्याणम, अरोग्यम धन संपदा, शत्रु-बुद्धि विनाशायः, दीपःज्योति नमोस्तुते !

पूजन हेतु संकल्प :-

इसके बाद बारी आती है संकल्प की। जिसके लिए पुष्प, फल, सुपारी, पान, चांदी का सिक्का, नारियल (पानी वाला), मिठाई, मेवा, आदि सभी सामग्री थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लेकर संकल्प मंत्र बोलें-

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु:, ऊं तत्सदद्य श्री पुराणपुरुषोत्तमस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय पराद्र्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे सप्तमे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे जम्बुद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गत ब्रह्मवर्तैकदेशे पुण्य (अपने नगर/गांव का नाम लें) क्षेत्रे बौद्धावतारे वीर विक्रमादित्यनृपते : 2070, तमेऽब्दे शोभन नाम संवत्सरे दक्षिणायने/उत्तरायणे हेमंत ऋतो महामंगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमे कार्तिक मासे कृष्ण पक्षे अमावस तिथौ (जो वार हो) रवि वासरे स्वाति नक्षत्रे आयुष्मान योग चतुष्पाद करणादिसत्सुशुभे योग (गोत्र का नाम लें) गोत्रोत्पन्नोऽहं अमुकनामा (अपना नाम लें) सकलपापक्षयपूर्वकं सर्वारिष्ट शांतिनिमित्तं सर्वमंगलकामनया– श्रुतिस्मृत्यो- क्तफलप्राप्तर्थं— निमित्त महागणपति नवग्रहप्रणव सहितं कुलदेवतानां पूजनसहितं स्थिर लक्ष्मी महालक्ष्मी देवी पूजन निमित्तं एतत्सर्वं शुभ-पूजोपचारविधि सम्पादयिष्ये।

गणेश पूजन :-

किसी भी पूजन की शुरुआत में सर्वप्रथम श्री गणेश को पूजा जाता है। इसलिए सबसे पहले श्री गणेश जी की पूजा करें। इसके लिए हाथ में पुष्प लेकर गणेश जी का ध्यान करें। मंत्र पढ़े –

गजाननम्भूतगणादिसेवितं कपित्थ जम्बू फलचारुभक्षणम्। उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्।

गणपति आवाहन:- ॐ गं गणपतये इहागच्छ इह तिष्ठ।। इतना कहने के बाद पात्र में अक्षत छोड़ दे।

इसके पश्चात गणेश जी को पंचामृत से स्नान करवाये पंचामृत स्नान के बाद शुद्ध जल से स्नान कराए अर्घा में जल लेकर बोलें- एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम् ऊं गं गणपतये नम:।

रक्त चंदन लगाएं:- इदम रक्त चंदनम् लेपनम् ऊं गं गणपतये नम:। इसी प्रकार श्रीखंड चंदन बोलकर श्रीखंड चंदन लगाएं। इसके पश्चात सिन्दूर चढ़ाएं :- इदं सिन्दूराभरणं लेपनम् ॐ गं गणपतये नम:। दूर्वा और विल्बपत्र भी गणेश जी को अर्पित करें। उन्हें वस्त्र पहनाएं और कहें – इदं रक्त वस्त्रं ऊं गं गणपतये समर्पयामि।

पूजन के बाद श्री गणेश को प्रसाद अर्पित करें और बोले – इदं नानाविधि नैवेद्यानि ऊं गं गणपतये समर्पयामि:। मिष्ठान अर्पित करने के लिए मंत्र:- इदं शर्करा घृत युक्त नैवेद्यं ॐ गं गणपतये समर्पयामि:। प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन करायें। इदं आचमनयं ऊं गं गणपतये नम:। इसके बाद पान सुपारी चढ़ायें: इदं ताम्बूल पुगीफल समायुक्तं ऊं गं गणपतये समर्पयामि:। अब एक फूल लेकर गणपति पर चढ़ाएं और बोलें: एष: पुष्पान्जलि ऊं गं गणपतये नम:।
इसी प्रकार अन्य देवताओं का भी पूजन करें बस जिस देवता की पूजा करनी हो गणेश जी के स्थान पर उस देवता का नाम लें।

कलश पूजन:- इसके लिए लोटे या घड़े पर मोली बांधकर कलश के ऊपर आम के पत्ते रखें। कलश के अंदर सुपारी, दूर्वा, अक्षत व् मुद्रा रखें। कलश के गले में मोली लपेटे। नारियल पर वस्त्र लपेट कर कलश पर रखें। अब हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर वरुण देव का कलश में आह्वान करें।

ओ३म् त्तत्वायामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो हविभि:। अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुशंस मान आयु: प्रमोषी:। (अस्मिन कलशे वरुणं सांगं सपरिवारं सायुध सशक्तिकमावाहयामि, ओ३म्भूर्भुव: स्व:भो वरुण इहागच्छ इहतिष्ठ। स्थापयामि पूजयामि॥)

इसके बाद इस प्रकार श्री गणेश जी की पूजन की है उसी प्रकार वरुण देव की भी पूजा करें। इसके बाद इंद्र और फिर कुबेर जी की पूजा करें। एवं वस्त्र सुगंध अर्पण कर भोग लगाये इसके बाद इसी प्रकार क्रम से कलश का पूजन कर लक्ष्मी पूजन आरम्भ करें।

लक्ष्मी पूजन:-

सर्वप्रथम निम्न मंत्र कहते हुए माँ लक्ष्मी का ध्यान करें। ॐ या सा पद्मासनस्था, विपुल-कटि-तटी, पद्म-दलायताक्षी। गम्भीरावर्त-नाभिः, स्तन-भर-नमिता, शुभ्र-वस्त्रोत्तरीया।। लक्ष्मी दिव्यैर्गजेन्द्रैः। मणि-गज-खचितैः, स्नापिता हेम-कुम्भैः।नित्यं सा पद्म-हस्ता, मम वसतु गृहे, सर्व-मांगल्य-युक्ता।।

अब माँ लक्ष्मी की प्रतिष्ठा करें, हाथ में अक्षत लेकर मंत्र कहें – “ॐ भूर्भुवः स्वः महालक्ष्मी, इहागच्छ इह तिष्ठ, एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम्।”

प्रतिष्ठा के बाद स्नान कराएं और मंत्र बोलें – ॐ मन्दाकिन्या समानीतैः, हेमाम्भोरुह-वासितैः स्नानं कुरुष्व देवेशि, सलिलं च सुगन्धिभिः।। ॐ लक्ष्म्यै नमः।। इदं रक्त चंदनम् लेपनम् से रक्त चंदन लगाएं। इदं सिन्दूराभरणं से सिन्दूर लगाएं। ‘ॐ मन्दार-पारिजाताद्यैः, अनेकैः कुसुमैः शुभैः। पूजयामि शिवे, भक्तया, कमलायै नमो नमः।। ॐ लक्ष्म्यै नमः, पुष्पाणि समर्पयामि।’

इस मंत्र से पुष्प चढ़ाएं फिर माला पहनाएं। अब लक्ष्मी देवी को इदं रक्त वस्त्र समर्पयामि कहकर लाल वस्त्र पहनाएं। इसके बाद मा लक्ष्मी के क्रम से अंगों की पूजा करें। माता लक्ष्मी की अंग पूजा बाएं हाथ में अक्षत लेकर दाएं हाथ से थोड़े थोड़े छोड़ते जाए और मंत्र कहें :–

ॐ चपलायै नम: पादौ पूजयामि ॐ चंचलायै नम: जानूं पूजयामि, ॐ कमलायै नम: कटि पूजयामि, ॐ कात्यायिन्यै नम: नाभि पूजयामि, ॐ जगन्मातरे नम: जठरं पूजयामि, ॐ विश्ववल्लभायै नम: वक्षस्थल पूजयामि, ॐ कमलवासिन्यै नम: भुजौ पूजयामि, ॐ कमल पत्राक्ष्य नम: नेत्रत्रयं पूजयामि, ॐ श्रियै नम: शिरं: पूजयामि।

अष्टसिद्धि पूजा :-

अंग पूजन की ही तरह हाथ में अक्षत लेकर मंतोच्चारण करते रहे। मंत्र इस प्रकर है – ॐ अणिम्ने नम:, ॐ महिम्ने नम:, ॐ गरिम्णे नम:, ॐ लघिम्ने नम:, ॐ प्राप्त्यै नम: ॐ प्राकाम्यै नम:, ॐ ईशितायै नम: ॐ वशितायै नम:।

अष्टलक्ष्मी अंग पूजन :-

अंग पूजन एवं अष्टसिद्धि पूजा की ही तरह हाथ में अक्षत लेकर मंत्रोच्चारण करें। ॐ आद्ये लक्ष्म्यै नम:, ॐ विद्यालक्ष्म्यै नम:, ॐ सौभाग्य लक्ष्म्यै नम:, ॐ अमृत लक्ष्म्यै नम:, ॐ लक्ष्म्यै नम:, ॐ सत्य लक्ष्म्यै नम:, ॐ भोगलक्ष्म्यै नम:, ॐ योग लक्ष्म्यै नम:।

नैवैद्य अर्पण :-

पूजन के बाद देवी को “इदं नानाविधि नैवेद्यानि ॐ महालक्ष्मियै समर्पयामि” मंत्र से नैवैद्य अर्पित करें। मिष्टान अर्पित करने के लिए मंत्र: “इदं शर्करा घृत समायुक्तं नैवेद्यं ॐ महालक्ष्मियै समर्पयामि” बालें। प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन करायें। इदं आचमनयं ऊं महालक्ष्मियै नम:। इसके बाद पान सुपारी चढ़ायें: इदं ताम्बूल पुगीफल समायुक्तं ॐ महालक्ष्मियै समर्पयामि। अब एक फूल लेकर लक्ष्मी देवी पर चढ़ाएं और बोलें: एष: पुष्पान्जलि ऊं महालक्ष्मियै नम:।
माँ को यथा सामर्थ वस्त्र, आभूषण, नैवेद्य अर्पण कर दक्षिणा चढ़ाए दूध, दही, शहद, देसी घी और गंगाजल मिलकर चरणामृत बनाये और गणेश लक्ष्मी जी के सामने रख दे। इसके बाद 5 तरह के फल, मिठाई खील-पताशे, चीनी के खिलोने लक्ष्मी माता और गणेश जी को चढ़ाये और प्राथना करे की वो हमेशा हमारे घरो में विराजमान रहे। इनके बाद एक थाली में विषम संख्या में दीपक 11, 21 अथवा यथा सामर्थ दीप रख कर इनको भी कुंकुम अक्षत से पूजन करे इसके बाद माता लक्ष्मी को श्री सूक्त अथवा ललिता सहस्त्रनाम का पाठ सुनाये पाठ के बाद माँ से क्षमा याचना कर माँ लक्ष्मी जी की आरती कर बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लेने के बाद थाली के दीपो को घर में सब जगह रखे। लक्ष्मी-गणेश जी का पूजन करने के बाद, सभी को जो पूजा में शामिल हो, उन्हें खील, पताशे, चावल दें। सब फिर मिल कर प्राथना करे की माँ लक्ष्मी हमने भोले भाव से आपका पूजन किया है ! उसे स्वीकार करें और गणेशा, माँ सरस्वती और सभी देवताओं सहित हमारे घरों में निवास करें, प्रार्थना करने के बाद जो सामान अपने हाथ में लिया था वो मिटटी के लक्ष्मी गणेश, हटड़ी और जो लक्ष्मी गणेश जी की फोटो लगायी थी उस पर चढ़ा दे।

लक्ष्मी पूजन के बाद आप अपनी तिजोरी की पूजा भी करें :- रोली को देसी घी में घोल कर स्वस्तिक बनाये और धुप दीप दिखा करें, मिठाई का भोग लगाए।

लक्ष्मी माता और सभी भगवानों को आपने अपने घर में आमंत्रित किया है, अगर हो सके तो पूजन के बाद शुद्ध बिना लहसुन-प्याज़ का भोजन बना कर गणेश-लक्ष्मी जी सहित सबको भोग लगाए। दीपावली पूजन के बाद आप मंदिर, गुरद्वारे और चौराहे में भी दीपक और मोमबतियां जलाएं।

रात को सोने से पहले पूजा स्थल पर मिटटी का चार मुहं वाला दिया सरसों के तेल से भर कर जगा दें, और उसमे इतना तेल हो की वो सुबह तक जग सके।

माँ लक्ष्मी जी की आरती :-

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता तुम को निस दिन सेवत, मैयाजी को निस दिन सेवत, हर विष्णु विधाता …..

ॐ जय लक्ष्मी माता …
उमा रमा ब्रह्माणी, तुम ही जग माता ओ मैया तुम ही जग माता, सूर्य चन्द्र माँ ध्यावत, नारद ऋषि गाता…

ॐ जय लक्ष्मी माता ..
दुर्गा रूप निरन्जनि, सुख सम्पति दाता ओ मैया सुख सम्पति दाता …. जो कोई तुम को ध्यावत, ऋद्धि सिद्धि धन पाता।

ॐ जय लक्ष्मी माता ..
तुम पाताल निवासिनि, तुम ही शुभ दाता ओ मैया तुम ही शुभ दाता …. कर्म प्रभाव प्रकाशिनि, भव निधि की दाता …

ॐ जय लक्ष्मी माता ..
जिस घर तुम रहती तहँ सब सद्गुण आता ओ मैया सब सद्गुण आता … सब संभव हो जाता, मन नहीं घबराता…

ॐ जय लक्ष्मी माता …
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता ओ मैया वस्त्र न कोई पाता … ख़ान पान का वैभव, सब तुम से आता..

ॐ जय लक्ष्मी माता ..
शुभ गुण मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि जाता.. ओ मैया क्षीरोदधि जाता … रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता..

ॐ जय लक्ष्मी माता ..
महा लक्ष्मीजी की आरती, जो कोई जन गाता ओ मैया जो कोई जन गाता … उर आनंद समाता, पाप उतर जाता

ॐ जय लक्ष्मी माता ..।।

7 नवम्बर 2018 के चौघड़िया मुहूर्त-

दिन की चौघड़िया:-
लाभ 06:42 से 08:02
अमृत 08:02 से 09:22
काल 09:22 से 10:42
शुभ 10:42 से 12:02
रोग। 12:02 से 13:21
उद्वेग 13:21 से 14:40
चर 14:40 से 16:00
लाभ 16:00 से 17:20

रात्रि की चौघड़िया:-
उद्वेग 17:10 से 19:00
शुभ 19:00 से 20:41
अमृत 20:41 से 22:22
चर 22:22 से 24:02
रोग 24:02 से 25:42
काल 25:42 से 27:22
लाभ 27:22 से 29:02
उद्वेग 29:02 से 30:42

1. चर, लाभ, अमृत और शुभ की चौघड़िया पूजन के समय होनी चाहिये। इस प्रकार शुद्ध ज्योतिषीय गणनाओं तथा विशेष दृष्टिकोंण से यह स्पष्ट होता है, कि साधना व पूजन के लिये 7 नवम्बर 2018 की रात्रि 19:00 से 19:52 वृषभ लग्न के साथ साथ शुभ का चौघडिया भी अत्यन्त विशेष फलदायक तथा सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त हैं। अतः सभी गृहस्थ तथा साधक-साधिकाओं से मेरा यही आग्रह है की वे इस वर्ष इसी मुहूर्त में दीपावली पूजन अथवा तंत्र-मंत्र सम्बंधी साधनायें सम्पन्न करें।

शुभ स्थिर लग्न :-

महालक्ष्मी पूजन किसी स्थिर लग्न में होना उचित है, इस दिन वृषभ और सिंह दो स्थिर लग्न होंगी। वृषभ लग्न सांयकाल 19 बजकर 00 मिनट से रात्रि 19 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। और सिंह लग्न मध्य रात्रि को 00 (24) बजकर 27 मिनट से 02 बजकर 54 मिनट तक रहेगी।

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अधिक जानकारी के लिए अथवा ज्योतिषीय परामर्श के लिए :- गुरू जी के कार्यालय में सम्पर्क करें :- 011-22455184, 09810143516

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गुरू की महिमा

जब महादेवजी ने बताई पार्वतीजी को गुरु की महिमा :-

(गुरू पूर्णिमा 27/07/2018 पर विशेष) :-

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गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वर:।

गुरु: साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नम:।।

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।

तत्पदं दर्शितं येनं तस्मै श्रीगुरवे नम:।।

एक बार पार्वतीजी ने महादेवजी से गुरु की महिमा बताने के लिए कहा। तब महादेवजी ने कहा :-

गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु, गुरु ही शिव और गुरु ही परमब्रह्म है; ऐसे गुरुदेव को नमस्कार है। अखण्ड मण्डलरूप इस चराचर जगत में व्याप्त परमात्मा के चरणकमलों का दर्शन जो कराते हैं; ऐसे गुरुदेव को नमस्कार है।

ध्यानमूलं गुरोर्मूर्ति: पूजामूलं गुरो: पदम्। मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरो: कृपा।।

अर्थात्– गुरुमूर्ति का ध्यान ही सब ध्यानों का मूल है, गुरु के चरणकमल की पूजा ही सब पूजाओं का मूल है, गुरुवाक्य ही सब मन्त्रों का मूल है, और गुरु की कृपा ही मुक्ति प्राप्त करने का प्रधान साधन है। गुरु शब्द का अभिप्राय जो अज्ञान के अंधकार से बंद मनुष्य के नेत्रों को ज्ञानरूपी सलाई से खोल देता है, वह गुरु है। जो शिष्य के कानों में ज्ञानरूपी अमृत का सिंचन करता है, वह गुरु है। जो शिष्य को धर्म, नीति आदि का ज्ञान कराए, वह गुरु है। जो शिष्य को वेद आदि शास्त्रों के रहस्य को समझाए, वह गुरु है।

गुरुपूजा का अर्थ :-
गुरुपूजा का अर्थ किसी व्यक्ति का पूजन या आदर नहीं है वरन् उस गुरु की देह में स्थित ज्ञान का आदर है, ब्रह्मज्ञान का पूजन है।

गुरुपूर्णिमा मनाने का कारण :-
वैसे तो गुरू सदा पूजनीय हैं, परंतु आषाढ़ पूर्णिमा के दिन सभी अपने-अपने गुरु की पूजा विशेष रूप से करते हैं। यह सद्गुरु के पूजन का पर्व है, इसलिए इसे गुरुपूर्णिमा कहते हैं। जिन ऋषियों-गुरुओं ने इस संसार को इतना ज्ञान दिया, उनके प्रति कृतज्ञता दिखाने का, ऋषिऋण चुकाने का और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का पर्व है गुरुपूर्णिमा। यह श्रद्धा और समर्पण का पर्व है। गुरुपूर्णिमा का पर्व पूरे वर्षभर की पूर्णिमा मनाने के पुण्य का फल तो देता ही है, साथ ही मनुष्य में कृतज्ञता का सद्गुण भी भरता है। गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय।।
माता-पिता जन्म देने के कारण पूजनीय हैं, किन्तु गुरु धर्म और अधर्म का ज्ञान कराने से अधिक पूजनीय हैं। इष्टदेव के रुष्ट हो जाने पर तो गुरु बचाने वाले हैं,‌ परन्तु गुरु के अप्रसन्न होने पर कोई भी बचाने वाला नहीं हैं। गुरुदेव की सेवा-पूजा से जीवन जीने की कला के साथ परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग भी दिखाई पड़ जाता है। कवच अभेद विप्र गुरु पूजा। एहि सम विजय उपाय न दूजा।।

अर्थात् :- वेदज्ञ ब्राह्मण ही गुरु है, उन गुरुदेव की सेवा करके, उनके आशीर्वाद के अभेद्य कवच से सुरक्षित हुए बिना संसार रूपी युद्ध में विजय प्राप्त करना मुश्किल है।

गुरुपूर्णिमा को व्यासपूजा क्यों कहते हैं? :-
आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को भगवान वेदव्यास का अवतरण पृथ्वी पर हुआ था इसलिए यह व्यासपूजा या व्यासपूर्णिमा कहलाती है। व्यासजी ऋषि वशिष्ठ के पौत्र व पराशर ऋषि के पुत्र हैं। व्यासदेवजी गुरुओं के भी गुरु माने जाते हैं। वेदव्यासजी ज्ञान, भक्ति, विद्वत्ता और अथाह कवित्व शक्ति से सम्पन्न थे। इनसे बड़ा कवि मिलना मुश्किल है। उन्होंने ब्रह्मसूत्र बनाया, संसार में वेदों का विस्तार करके ज्ञान, उपासना और कर्म की त्रिवेणी बहा दी, इसलिए उनका नाम ‘वेदव्यास’ पड़ा। पांचवा वेद ‘महाभारत’ और श्रीमद्भागवतपुराण की रचना व्यासजी ने की। अठारह पुराणों की रचना करके छोटी-छोटी कहानियों द्वारा वेदों को समझाने की चेष्टा की। संसार में जितने भी धर्मग्रन्थ हैं, चाहे वे किसी भी धर्म या पन्थ के हों, उनमें अगर कोई कल्याणकारी बात लिखी है तो वह भगवान वेदव्यास के शास्त्रों से ली गयी है। इसलिए कहा जाता है–‘व्यासोच्छिष्टं जगत्सर्वम्’ अर्थात् जगत में सब कुछ व्यासजी का ही उच्छिष्ट है।
विलक्षण गुरु समर्थ रामदास के अदम्य साहसी शिष्य छत्रपति शिवाजी छत्रपति शिवाजी महाराज समर्थ गुरु रामदास स्वामी के शिष्य थे। एक बार सभी शिष्यों के मन में यह बात आयी कि शिवाजी के राजा होने से समर्थ गुरु उन्हें ज्यादा प्यार करते हैं। स्वामी रामदास शिष्यों का भ्रम दूर करने के लिए सबको लेकर जंगल में गए और एक गुफा में जाकर पेटदर्द का बहाना बनाकर लेट गए। शिवाजी ने जब पीड़ा से विकल गुरुदेव को देखा तो पूछा– ‘महाराज! इसकी क्या दवा है?’
गुरु समर्थ ने कहा – शिवा! रोग असाध्य है। परन्तु एक दवा काम कर सकती है, पर जाने दो।
शिवा ने कहा ‘गुरुदेव दवा बताएं, मैं आपको स्वस्थ किए बिना चैन से नहीं रह सकता।’
गुरुदेव ने कहा इसकी दवा है– सिंहनी का दूध और वह भी ताजा निकला हुआ; परन्तु यह मिलना असंभव सा है।
शिवा ने पास में पड़ा गुरुजी का तुंबा उठाया और गुरुदेव को प्रणाम कर सिंहनी की खोज में चल दिए। कुछ दूर जाने पर उन्हें एक सिंहनी अपने दो शावकों (बच्चों) के साथ दिखायी पड़ी। अपने बच्चों के पास अनजान मनुष्य को देखकर वह शिवा पर टूट पड़ी और उनका गला पकड़ लिया। शूरवीर शिवा ने हाथ जोड़कर सिंहनी से विनती की– ‘गुरुदेव की दवा के लिए तुम्हारा दूध चाहिए’ उसे निकाल लेने दो। गुरुदेव को दूध दे आऊँ, फिर तुम मुझे खा लेना।’ ऐसा कहकर उन्होंने ममता भरे हाथों से सिंहनी की पीठ सहलाई। मूक प्राणी भी ममता की भाषा समझते हैं। सिंहनी ने शिवा का गला छोड़ा और बिल्ली की तरह शिवा को चाटने लगी। मौका देखकर शिवा ने उसका दूध निचोड़कर तुंबा में भर लिया और सिंहनी पर हाथ फेरते हुए गुरुजी के पास चल दिए।
उधर गुरुजी सभी शिष्यों को आश्चर्य दिखाने के लिए शिवा का पीछा कर रहे थे। शिवा जब सिंहनी का दूध लेकर लौट रहे थे तो रास्ते में गुरुजी को शिष्यों के साथ देखकर शिवा ने पूछा– ‘गुरुजी, पेटदर्द कैसा है?’
गुरु समर्थ ने शिवा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा– ‘आखिर तुम सिंहनी का दूध ले आए। तुम्हारे जैसे शिष्य के होते गुरु की पीड़ा कैसे रह सकती है?’
भारतीय परम्परा में गुरुसेवा से ही भक्ति की सिद्धि हो जाती है। गुरु की सेवा तथा प्रणाम करने से देवताओं की कृपा भी मिलने लगती है।
‘गुरु को राखौ शीश पर सब विधि करै सहाय।’
कलिकाल में सद्गुरु न मिलने पर भगवान शिव ही सभी के गुरु हैं क्योंकि ‘गुरु’ शब्द से जगद्गुरु परमात्मा ईश्वर का ही बोध होता है; इसलिए कहा भी गया है :-

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूर मर्दनम्। देवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।।

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नारायण नागबली

नारायण नागबली (संतान बाधा निवारण हेतु पितृ दोष का प्रभावशाली उपाय):-

Dr.R.B.Dhawan astrological consultant, top Best Astrologer in Delhi,

नारायण नागबली छविनारायण नागबलि ये दोनो अनुष्ठान पद्धतियां संतान सुख की अपूर्ण इच्छा, कामना पूर्ति के उद्देश से किय जाते हैं, इसीलिए ये दोनो अनुष्ठान काम्य प्रयोग कहलाते हैं। वस्तुत: नारायणबलि और नागबलि ये अलग-अलग पूजा अनुष्ठान हैं। नारायण बलि का उद्देश मुखत: पितृदोष निवारण करना है। और नागबलि का उद्देश सर्प शाप, नाग हत्या का दोष निवारण करना है। इन में से केवल एक नारायण बलि या नागबलि अकेले नहीं कर सकते, इस लिए ये दोनो अनुष्ठान एक साथ ही करने पड़ते हैं।

पितृदोष निवारण के लिए ही नारायण नागबलि अनुष्ठान करने के लिये शास्त्रों मे निर्देशित किया गया है । प्राय: यह अनुष्ठान जातक के पूर्वजन्म के दुर्भाग्य संबधी दोषों से मुक्ति दिलाने के लिए किये जाते हैं। ये अनुष्ठान किस प्रकार व कौन इन्हें कर सकता है? इसकी पूर्ण जानकारी होना आवश्यक है। ये अनुष्ठान जिन जातकों के माता पिता जिवित हैं, वे भी विधिवत सम्पन्न कर सकते हैं, यज्ञोपवीत धारण करने के बाद कुंवारा ब्राह्मण यह अनुष्ठान सम्पन्न करा सकता है। संतान प्राप्ति एवं वंशवृद्धि के लिए ये अनुष्ठान सपत्नीक करने चाहीयें। यदि पत्नी जीवित न हो तो कुल के उद्धार के लिए पत्नी के बिना भी ये कर्म किये जा सकते हैं। यदि पत्नी गर्भवती हो तो गर्भ धारण से पाचवें महीने तक यह अनुष्ठान किया जा सकता है। घर में कोई भी मांगलिक कार्य हो तो ये अनुष्ठान एक साल तक नही किये जाते हैं। माता या पिता की मृत्यु् होने पर भी एक साल तक ये अनुष्ठान करने निषिद्ध माने गये हैं।

दोनों प्रकार यह अनुष्ठान एक साथ और निम्नलिखित इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए किये जाते हैं :-

1. काला जादू के प्रभाव से मुक्ति पाने के लिए।
2. संतान प्राप्ति के लिए।
3. भूत प्रेत से छुटकारा पाने के लिए।
4. घर के किसी व्यक्ति की दुर्घटना के कारण मृत्यु होती है (अपघात, आत्महत्या, पानी में डूबना) इस की वजह से अगर घर में कोई समस्याए आती है तो, उन समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए यह अनुष्ठान किया जाता है।

संतान प्राप्ति के लिए :-
सनातन मान्यता के अनुसार प्रत्येक दम्पत्ती की कम से कम एक पुत्र संतान प्राप्ति की प्रबल इच्छा होती है, और इस इच्छा की पूर्ति न होना दम्पत्ती के लिए बहुत दुःखदाई होता है, हालांकि इस आधुनिक युग में टेस्ट ट्यूब बेबी जैसी उपचार पद्धतियां उपलब्ध हैं, लेकिन कुछ जोड़ों की कमाई के हिसाब से यह बहुत खर्चीली होती हैं। इस लिये बहुत से लोग इन महेंगे उपचारों के कारण खर्च करने में समर्थ नहीं होते, और कुछ इस के लिए कर्जा लेते हैं, लेकिन जब कभी इस महेंगे उपचारों का भी कोई लाभ नहीं होता, तब यह जोड़े ज्योतिषीयों के पास जाते हैं, और एक अच्छा अनुभवी ज्योतिषी ही इस समस्या का समाधान और उपचारों की विफलता का कारण बता सकता है।

शास्त्र कहते हैं :- जहां रोग है, वहां उपचार भी है। इसी नियम को ध्यान में रखते हुऐ हमारे पूर्वज ऋषियों ने इन समस्याओं के समाधान हेतु ज्योतिष शास्त्र में कुछ विशेष उपाय सुझाए हुए है, सब से पहेले ज्योतिषी यह देखते हैं की इस की पीड़ित दंपति की जन्म कुंडली में संतान प्राप्ति का योग है या नहीं? अगर है, तो गर्भधारण करने में समस्या का कारण क्या है? जैसे की पूर्व जन्म के पाप, पितरों का श्राप, कुलविनाश का योग, इनमें से कोई विशेष कारण पता चलने के बाद वह उस समस्या का निराकरण सुझाते खोजते हैं। इन उपायों में से नारायण नागबली सर्वश्रेष्ठ उपाय माना जाता है। यदि यह अनुष्ठान उचित प्रकार से और मनोभाव से किया जाए, तो संतानोत्पत्ति की काफी संभावनाए हो जाती हैं।

भूत-प्रेत बाधा के कारण संतानोत्पत्ति में रूकावटें :-
कोई स्थाई अस्थाई संपत्ति जैसे के, घर जमीन या पैसा किसी से जबरन या ठग कर हासिल की जाती है तो, मृत्यु पश्चात् उस व्यक्ति की आत्मा उसी संपत्ति के मोह रहती है, उस व्यक्ति को मृत्यु पश्चात् जलाया या दफनाया भी जाए तो भी उस की इच्छाओं की आपूर्ति न होने के कारण उस की आत्मा को माया से मुक्ति नहीं मिल पाती, और वह आत्मा प्रेत योनी में भटकती है, और उस के पतन के कारण व्यक्ति को वह पीड़ा देने लगती है, यदि किसी शापित व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात् उसकी अंतेष्ठि विधि शास्त्रों अनुसार संपन्न न हो, या श्राद्ध न किया गया हो, तब उस वजह से उस से सम्बंधित व्यक्तिओं को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है, जैसे कि– संतति का आभाव, यदि संतान होती भी है, तो उस का अल्प जीवी होना
संतति का ना होना ही है।

1. काफी कष्टों के बावजूद आर्थिक अड़चनों का सामना करना
खेती में नुकसान।
2. व्यवसाय में हानि, नौकरी छूट जाना, कर्जे में डूब जाना,
परिवार में बिमारीयाँ।
3. मानसिक या शारीरिक परेशानी, विकलांग संतति का जन्म होना, या अज्ञात कारणों से पशुधन का विनाश।
4. परिवार के किसी सदस्यों को भूत बाधा होना।
5. परिवार के सदस्यों में झगड़े या तनाव होना।
6. महिलाओं में मासिक धर्म का अनियमित होना, या गर्भपात होना।
ऊपर लिखे हुये सभी या किसी भी परेशानी से व्यक्ति झूंज रहा हो तोतो, उसे नारायण-नागबली करने की सलाह दी जाती है।

श्राप सूचक स्वप्न :-
कोई व्यक्ति यदि निम्नलिखित स्वप्न देखता है, तो वह पिछले या इसी जन्म में श्रापित होता है :-
1. स्वप्न में नाग दिखना, या नाग को मारते हुवे दिखना, या टुकड़ो में कटा हुवा नाग दिखना।
2. किसी ऐसी स्त्री को देखना, जिसके बच्चे की मृत्यु हो गई है, वह उस बच्चे के प्रेत के पास बैठ कर अपने बच्चे को उठने को कह रही है, और लोग उसे उस प्रेत से दूर कर रहे है।
3. विधवा या किसी रोगी सम्बन्धी को देखना।
4. किसी ईमारत को गिरते हुए देखना।
5. स्वप्न में झगड़े देखना।
6. खुद को पानी में डूबते हुये देखना।
इस प्रकार के स्वप्नों से मुक्ति पाने के लिए नारायण-नागबली अनुष्ठान किया जाता है। धर्मसिंधु और धर्मनिर्णय इन प्राचीन ग्रंथो में इस अनुष्ठान के विषय में लिखा हुआ है।

दुर्मरण :-
किसी भी प्रकार से दुर्घटना यदि मृत्यु का कारण हो, और अल्पायु में मृत्यु होना दुर्मरण कहा जाता है। किसी मनुष्य की इस प्रकार से मृत्यु उस मनुष्य के परिवार के लिए अनेक परेशानियों का कारण बनती है। निम्नलिखित कारण से आने वाली मृत्यु दुर्मरण कहलाती है :-

1. विवाह से पहले मृत्यु होना।
2. परदेस में मृत्यु होना।
3. गले में अन्न अटक कर श्वास रुकने से मृत्यु होना।
4. पंचक, त्रिपाद या दक्षिणायन काल में मृत्यु होना।
5. आग में जल कर मृत्यु होना।
6. किसी खतरनाक जानवर के हमले से मृत्यु होना।
7. छोटे बच्चे का किसी के हाथों मारा जाना।
8. पानी में डूब जाने से मृत्यु होना।
9. आत्महत्या करना।
10. आकाशीय बिजली गिरने या बिजली के झटके से मृत्यु।
यह सब कारण हैं, जिसके कारण किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो, परिवार में आर्थिक, मानसिक वा शारीरिक परेशानियां हो सकती हैं, इं परेशानियों को दूर करने के लिए परिजनों को नारायण-नागबली करवाने की सलाह दी जाती ।

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धूम उपग्रह

वृहत्पराशर होरा शास्त्र, आलेख- 1

धूम उपग्रह (भावस्थिति अनुसार फलादेश)

1. कुंडली में धूम यदि – प्रथम स्थान में हो तो, वह जातक निर्मल (सुंदर) नेत्र वाला, शूरवीर, हठी परंतु घृणा रहित, दुष्ट बुद्धि वाला और महाक्रोधी होता है।

2. कुंडली में धूम यदि – द्वितीय स्थान में हो तो, वह जातक धनवान परंतु रोगी, किसी अंग से हीन, राजपक्ष से चिंतित, मूर्खतापूर्ण व्यवहार वाला और कुछ मात्रा में नपुंसक होता है।

3. कुंडली में धूम यदि – तृतीय स्थान में हो तो, वह जातक बुद्धिमान, युद्ध की स्थिति में विचारपूर्ण नीति तय करने वाला, मिष्ठभाषी, शांतचित्त वाला और धनवान होता है।

4. कुंडली में धूम यदि – चतुर्थ स्थान में हो तो, वह जातक स्त्री से रति के समय निढाल या रतिरहित, चिंतनशील, शास्त्र अध्ययन में रूचि रखने वाला होता है।

5. कुंडली में धूम यदि – पंचम स्थान में हो तो, वह जातक कम संतान वाला, अल्पधनी, भारी शरीर वाला, शाकाहारी और मांसाहारी भी होता है, इसे मित्रता में अधिक रूचि नहीं होती।

6. कुंडली में धूम यदि – षष्ठ स्थान में हो तो, वह जातक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाला, तेजस्वी, निरोगी और विख्यात् होता है।

7. कुंडली में धूम यदि – सप्तम स्थान में हो तो, वह जातक अल्प धनी, धोखाधड़ी में विश्वास रखने वाला और रूखे चेहरे वाला होता है।

8. कुंडली में धूम यदि – अष्टम स्थान में हो तो, वह जातक कठिनाई के समय हिम्मत हीन, दूसरे समय उत्साहित, सत्य में विश्वास रखने वाला तथा निष्ठुर या कठोर होता है।

9. कुंडली में धूम यदि – नवम स्थान में हो तो, वह जातक धनवान, मान-सम्मान वाला, प्रसिद्ध व्यक्तित्व, अपनों से स्नेह रखने वाला और एेशवर्यशाली होता है।

10. कुंडली में धूम यदि – दशम स्थान में हो तो, वह जातक संतान सुख तथा ऐश्वर्य से सम्पन्न, बुद्धिमान, सुखी और सत्य में विश्वास रखने वाला होता है।

11. कुंडली में धूम यदि – एकादश स्थान में हो तो, वह जातक धन और प्रचूर सम्पत्ति युक्त, कलाप्रेमी और गायन विद्या या वाद्य में निपुण होता है।

12. कुंडली में धूम यदि – द्वादश स्थान में हो तो, वह जातक दोषी, अपराध करने वाला, धोखाधड़ी वाला, दूसरी स्त्रीयों में रूचि वाला, नशे के वशीभूत और दुष्टप्रवृती वाला होता है।

(आलेख- 19-07-2018)

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Astrology Course in Distance

SHUKRACHARYA

(Professional Astrological Course)

ज्योतिष/ज्योतिषीय पाठ्यक्रम पत्राचार से उपलब्ध –

परिचय- Shukracharya Astrological Research Centre, शुक्राचार्य (एस्ट्रोलाॅजिकल रिसर्च सेंटर) की स्थापना ज्योतिष जैसी वैदिक विद्याओं तथा अन्य भारतीय गूढ़ विद्याओं का विश्व स्तर पर प्रसार-प्रचार करने के उद्देश्य से Dr.R.B.Dhawan धवन द्वारा 1995 में की गई थीं, जिससे कि इस वैदिक विज्ञान वाले विषय की उपयोगिता का विश्वस्तर पर प्रकाश हो, और इसके उपयोग से मानवता की सेवा की जा सके।

संस्थान के मुख्य कार्यक्रम एवं उद्देशय:-
यह संस्थान प्राचीन वैदिक ज्योतिष vaidic astrology के आधार पर ज्योतिष विज्ञान में रूची रखने वाले जिज्ञासुओं को ज्योतिष विषय के पाठ्यक्रमों की सुविधा प्रदान करता है।

संस्थान के संस्थापक एवं मुख्य संचालक Dr.R.B.Dhawan जी हैं। ये अपनी टीम के साथ निरंतर अनुसंधान एवं शिक्षण कार्य में समर्पित भाव से कार्यरत हैं।

ज्योतिर्विद्या, हस्तरेखा-शास्त्र, अंक-शास्त्र, वास्तु शास्त्र, लाल किताब एवं ज्योतिषीय उपाय आदि विषयों की शिक्षा पत्राचार पाठ्यक्रम के माध्यम से उपलब्ध करवाई जा रही है।

पारम्परिक ज्योतिष एवं इससे जुड़ी अन्य सभी विद्याओं के ज्ञान को सुरक्षित रखने की दृष्टि से इन सभी अति विशिष्ट विद्याओं के अध्ययन अध्यापन की व्यवस्था करना संस्थान का मुख्य उद्देश्य है।

सम्पूर्ण भारतवर्ष में ज्योतिष विज्ञान के अध्यन अध्यापन हेतु क्षेत्रिय प्रशिक्षण केन्द्र खोलने का संकल्प। और उनके संचालन व देख-रेख हेतु क्षेत्रीय फ्रेन्चाईजी (सेंटर) आरम्भ करने का संकल्प है।

मुख्य केन्द्र (दिल्ली) तथा देश के सभी स्थानीय केन्द्रों में ज्योतिष तथा इस से सम्बंधित अन्य वैदिक विद्याओं की निरंतर कक्षाओं एवं शिक्षा (अध्यन अध्यापन) की व्यवस्था करवाना एक लक्ष्य है।

मुख्य केन्द्र (दिल्ली) तथा देश के सभी स्थानीय केन्द्रों में ज्योतिष तथा इस से सम्बंधित अन्य वैदिक विद्याओं vaidic astrology की पत्राचार पाठ्यक्रम द्वारा शिक्षा (अध्यन अध्यापन) के लिये व्यवस्था करना उद्देश्य है।

निरंतर तथा पत्राचार द्वारा देश के अधिकांश शहरों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में ज्योतिष पठ्यक्रम उपलब्ध करवाने का लक्ष्य है।

मासिक ज्योतिषीय पत्रिका (वर्तमान में AAP ka Bhavishya) तथा अन्य उपयोगी पुस्तकें एवं सम्बंधित विषयों के मौलिक ग्रंथ, भाष्य और अनुवाद आदि प्रकाशित करना निरंतर जारी है।

ज्योतिष विज्ञान की पाठ्य पुस्तकों तथा अन्य आधुनिक माध्यमों जैसे-इलैक्ट्रानिक मीडिया, साॅफ्टवेयर, मोबाईल एप, कैसेट या सी. डी. इत्यादि के माध्यम से शोध-निष्कर्षों और भारतीय विद्याओं की उपयोगी अनुसंधानात्मक सामग्री को प्रकाशित करना निरंतर जारी है।

उपरोक्त विषय के विद्वानों को प्रोत्साहित कर उनके विचार प्रकाशित करना। संगोष्टियों तथा सभाओं का आयोजन कर विद्वानों को समय-समय पर सम्मानित करना तथा भारतीय वैदिक विद्याओं vaidic astrology के उत्थान में समर्पित अन्य संस्थाओं को सहयोग देना निरंतर जारी है।

उपरोक्त विद्याओं के विकास के लिये उपयोगी सामग्री जैसे- धर्म-ग्रंथ, सभी प्रकार की पूजा एवं साधना सामग्री, Jyotish software साफ्टवेयर एवं उपयोगी टी. वी. कार्यक्रमों की सी. डी. इत्यादि उचित मूल्य पर विद्वानों को उपलब्ध करवाना निरंतर जारी है।

शुक्राचार्य द्वारा उपलब्ध पाठ्यक्रम:-

वह विद्यार्थी जिन्हें ज्योतिष फलादेश या ज्योतिषीय गणना, अंकशास्त्र, वास्तुशास्त्र अथवा हस्तरेखा शास्त्र जैसे वैदिक विषयों की शिक्षा प्राप्त करने में रुचि है, वे शुक्राचार्य संस्थान द्वारा संचालित सर्टिफिकेट कोर्स Certificate Cource में प्रवेश ले सकते हैं। इन पाठ्यक्रमों को इस प्रकार बनाया गया है कि वह प्रत्येक विद्यार्थी के लिए व्यवसायिक उपयोग के लिये उपयोगी हों।

1. ज्योतिष दैवज्ञ (Jyotish Daivagya) :- यह पाठ्यक्रम नवीन विद्यार्थियों के लिए है, जो ज्योतिष जगत में पहला कदम रख रहे हैं, जो ज्योतिष शास्त्र horoscope के मूल अवयवों का ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं। मूल रूप से यह एक स्वाध्याय उपकरण Astrological Hobby Course है। यह उन नये विद्यार्थीयों के लिये उपयोगी है, जो ज्योतिष जगत को समझकर ज्योतिष के पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेना चाहते हैं। इस पाठ्यक्रम में ज्योतिष की उत्पत्ति ज्योतिष शास्त्र की विशेषताएं, नक्षत्र व 9 ग्रहों का परिचय और स्वभाव, 12 राशियां और उनका स्वभाव तथा कुण्डली के 12 भावों का परिचय और उन भावों का फलादेश में प्रयोग, ग्रहों की दृष्टियां, ग्रहों की मैत्री-शत्रुता, ग्रहों की अवस्था इत्यादि समझाते हुये पंचांग देखना भी सिखाया जाता है। यह Certificate Cource है। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

2. ज्योतिष दैवज्ञाचार्य (Jyotish Daivagyacharya) :– यह पाठ्यक्रम ज्योतिष शास्त्र की गहराइयों को समझने के लिये Professional Course है, इस पाठ्यक्रम में ज्योतिषीय फलादेश तथा ज्योतिषीय गणना के अतिरिक्त ग्रहों की युतियों, दृष्टियों को समझाते हुये फलादेश करने के गोपनीय सूत्र Secret Astrological formulas तथा जीवन के प्रमुख अंगों, अवसरों, सम्बंधियों, आर्थिक तथा व्यक्तिगत आवश्यकताओं, शारीरिक अंगों का फलादेश करना तथा जीवन की लगभग सभी आवश्यकताओं के लिये फलादेश करना समझाया जाता है। यह ज्योतिष पाठ्यक्रम ज्योतिष शास्त्र horoscope की गहराइयों को समझने की मुख्य सीढ़ी है। (एक प्रकार से जन्मपत्रिका का पूर्ण विवेचन करना सिखाया जाता है।) इस के द्वितीय भाग में खगोलीय परिचय, लग्न की गणना, ग्रहों की गणना, नक्षत्र nakshatra गणना वर्ग कुण्डलियों की रचना तथा प्रमुख खगोलीय (ज्योतिषीय) गणनायें, आधुनिक विधि से जन्मकुण्डली का निर्माण एवं ग्रहों की महादशा vimshotari mahadasha व अंतरदशाओं की गणना, अष्टकवर्ग Astakvarga गणना व अष्टकवर्ग निमार्ण की शिक्षा दी जाती है। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।) Professional Astrological Course

3. ज्योतिष शिरोमणी (Jyotish Shiromani) :- यह पाठ्यक्रम ज्योतिष शास्त्र की गहराइयों को समझने के लिये Expert Astrology Cource है। इस पाठ्यक्रम के प्रथम भाग में अष्टकवर्ग की अतिरिक्त गणना, आयु की गणना तथा आयुविचार में जातक की आयु की गणना करना सिखाया जाता है।, कुंडली Kundli Milan मिलान एवं मुहूर्त की गणना, तथा वर्षफल गणना की पूर्ण जानकारी दी जाती है। द्वितीय भाग में कुण्डली मिलान एवं मुहूर्त आदि देखना। Astakvarga अष्टकवर्ग के अतिरिक्त फलादेश, कुंडली मिलान एवं फलादेश, मुहूर्त का फलादेश, तथा वर्षफल के फलादेश की पूर्ण रूप से जानकारी तथा प्रश्न कुण्डली prashna kundli के सिद्धांत एवं प्रश्न कर्ता के प्रश्न पूछने के समय की कुण्डली बनाकर उत्तर देना सिखाया जाता है। यह प्रश्न कुण्डली सिद्धांत इस पाठ्यक्रम में सिखाया जाता है। इस पाठ्यक्रम में विद्यार्थी प्रतिदिन काम आने वाली भविष्यवाणी vimshotari mahadasha फलादेश या मिलान एवं मुहूर्त आदि देख सकता है। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 1वर्ष है।) Professional Astrological Course

4. ज्योतिष तत्ववेत्ता (Jyotish Tatvaveta) :- यह पाठ्यक्रम केवल शोध एवं अनुसंधान Astrological Research पर आधारित है। इस पाठ्यक्रम में शोध के लिए डाटा इकट्ठा कर अनुसंधान करवाया जाता है। ग्रंथों में दिए गए नियम कितने सही हैं? यह प्रमाणित करना एवं नए नियम प्रस्तावित करना इसका मुख्य उद्देश्य है। इसमें छात्रों को शोध पत्र Astrology Theses लिखना होगा, एवं पत्र पत्रिकाओं में छपवाना आवश्यक होगा। इसमें ग्रह-नक्षत्रों nakshatra के आधार पर कुण्डली के किसी एक भाव पर भी शोध कर सकते हैं, अथवा अपनी रूची तथा अर्जित ज्ञान के अनुसार- गोचर विचार, मांगलिक विचार, कुण्डली मिलान, प्रश्न-कुण्डली, अष्टकवर्ग फलादेश या पंचांग एवं मुहूर्त में से किसी भी एक विषय पर अनुसंधान कर सकते हैं। यह पाठ्यक्रम केवल शोध एवं अनुसंधान कार्य के लिए Dr.R.B.Dhawan द्वारा प्रस्तुत किया गया है। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 1वर्ष है।)

5. अंक शास्त्राचार्य (Numerology) :- यह पाठ्यक्रम नवीन विद्यार्थियों के लिए है, जो अंक शास्त्र सीखना चाहते हैं, इस के द्वारा आप शुभ अंक एवं नामांक आदि के बारे में जान सकते हैं। नाम को भाग्यशाली व अनुकूल बनाना इसका मुख्य विषय है। इसमें अंकशास्त्र के मूल अवयवों का ज्ञान प्राप्त करना तथा अंकशास्त्र के सामान्य सिद्धांतों के अनुसार अंकों का प्रयोग कर भविष्यफल ज्ञात करना सम्मीलित है। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

6. अंक शिरोमणी (Adwance Numerology) :- इस पाठ्यक्रम में अंकशास्त्र के नियमों के अनुसार अंकों का हमारे जीवन में क्या महत्व है, तथा अंकशास्त्र से अपने नाम, कम्पनी के नाम, अपने एकाऊँट नम्बर या वाहन नम्बर को कैसे भाग्यशाली बना सकते हैं? विस्तार पूर्वक समझाया गया है यह पाठ्यक्रम अंकशास्त्र की द्वितीय सीढ़ी है, इसमें अंकों के अनुसार प्रश्न फल का विचार तथा पद्धति का फार्मूला भी दिया गया है। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

7. वास्तु आचार्य (Vastushastra) :- यह पाठ्यक्रम नवीन विद्यार्थियों के लिए है, जो वास्तुशास्त्र के मूल अवयवों का ज्ञान प्राप्त कर वास्तु विशेषज्ञ बनना चाहते हैं। इस में वास्तु के मूल ग्रन्थों का स्वाध्याय करना होता है। आर्किटेक्ट, बिल्डर एवं उन सब के लिए जो कोई भवन, कार्यालय आदि निर्माण करने का विचार कर रहे हैं, उनके लिए यह पाठ्यक्रम अत्युत्तम है। गृहिणीयों के लिये भी उपयोगी है, जो अपने घर या कार्यालय को वास्तु सम्मत सजाना चाहती हैं। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

8. वास्तु शिरोमणी (Adwance Vastushastra) :- पाठ्यक्रम के इस भाग में जो विद्यार्थी वास्तु नियम जानते हैं, लेकिन उनका उपयोग करने में सक्षम नहीं हैं, इसमें प्रवेश ले सकते हैं। इसमें वास्तु दोष एवं निवारण पर विशेष बल दिया जाता है। वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुसार अनेक प्रकार के उदाहरणों के द्वारा भवन, मंदिर, कार्यालय, फैक्ट्री इत्यादि में वास्तुदोष की बारीकियों को समझाते हुये उन दोषों का वास्तु अनुरूप निवारण दिया गया है। इस में वास्तु संबंधित उच्च स्तरीय उपायों का भी अध्ययन होता है। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

9. हस्तरेखा आचार्य (palmistry) :- यह पाठ्यक्रम उन सभी नवीन विद्यार्थियों के लिए है जो हस्तरेखा विज्ञान सीखना चाहते हैं। जो हस्तरेखा शास्त्र के मूल अवयवों का ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं। यह नये विद्यार्थीयों के लिये भी उपयोगी है, इस पाठ्यक्रम में हस्तरेखा परीक्षण के सामान्य सिद्धांतों के अतिरिक्त, हस्त की प्रमुख रेखाओं, चिन्हों, पर्वों व पवर्तों के अतिरिक्त शरीर लक्षणों Body Language को समझकर हस्त परीक्षण, अंगुष्ठ विचार, पर्व एवं चिह्न विचार एवं अनेक प्रकार की छोटी-बड़ी रेखाओं के बारे में बताया जाता है, जिससे कि हाथ देखकर भविष्यवाणी की जा सके। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

10. हस्तरेखा शिरोमणी (Adwance Palmistry) :- यह पाठ्यक्रम हस्तरेखा शास्त्र की गहराईयों को समझने की दूसरी सीढ़ी है, इस पाठ्यक्रम में हाथ की बनानट और भेद, ग्रह रेखाओं के अनुसार मानव स्वाभाव, हस्तरेखाओं के सभी 16 भेद, शुभ-अशुभ चिन्ह, अनेक महत्वपूर्ण हस्तरेखाओं और लक्षणों का तुलनात्मक विचार किया गया है। हस्तरेखा ज्ञान में पूर्णता हेतु यह पाठ्यक्रम आवश्यक है। इस पाठ्यक्रम में अनेक प्रकार के प्रश्न जैसे स्वास्थ्य, धन, व्यवसाय, शिक्षा, आयु आदि का विचार किया जाता है। अनेक प्रकार के उपायों के बारे में विस्तृत जानकारी दी जाती है। मुखाकृति विज्ञान Face Reading की पूर्ण जानकारी भी इसमें दी जाती है। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

11. लाल किताब आचार्य (Lal Kitab Acharya) :- पाठ्यक्रम के प्रथम भाग में लाल-किताब के नियमों के अनुसार ग्रहों का लाल किताब में प्रकार जैसे- अंधे ग्रह, रतांध ग्रह, धर्मी ग्रह, मुकाबले के ग्रह, टकराव के ग्रह इत्यादि के रहस्य विस्तार पूर्वक समझाये गये हैं। इस पाठ्यक्रम में लाल किताब के अनुसार वर्षफल बनाने तथा फलादेश का फार्मूला भी दिया गया है। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

12. लाल किताब शिरोमणी (Adwance Lal Kitab Acharya) :- पाठ्यक्रम के इस भाग में लाल किताब के अनुसार प्रथम से लेकर द्वादश भाव तक का लाल किताब के अनुसार फलादेश, सूर्य से लेकर केतु तक सभी 9 ग्रहों का लाल किताब के अनुसार फलादेश, अनेक प्रकार की ग्रहस्थितियों एवं योगों का फलादेश तथा प्रत्येक ग्रह, भाव या योग के विपरीत प्रभाव को दूर करने के लाल किताब अनुसार उपाय दिये गये हैं। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

13. उपाय आचार्य (Remedial Astrology) :- यह पाठ्यक्रम ज्योतिषीय उपायों में रूचि रखने वाले उन जिज्ञासुओं व विद्यार्थियों के लिये स्वाध्याय उपकरण व प्रथम सीढ़ी है, जो उपाय-शास्त्र के मूल अवयवों का ज्ञान प्राप्त करना तथा सामान्य सिद्धांतों के अनुसार उपायों का प्रयोग कर सकारात्मक परिणाम चाहते हैं। उपाय शास्त्र के सिद्धांतों को समझकर आगे के पाठ्यक्रम में प्रवेश ले सकते हैं। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

14. उपाय शिरोमणी (Adwance Remedial Astrology) :- इस पाठ्यक्रम में उपाय-शास्त्र के नियमों के अनुसार मंत्र-तंत्र का हमारे जीवन में क्या महत्व है, तथा शास्त्रीय प्रयोगों के द्वारा मारण-मोहन आदि भयंकर अभिचारों से रक्षा करने वाले, व्याधिनाश तथा कष्टकारी ग्रहों से रक्षा करने वाले, अकालमृत्यु शमन प्रयोग, ऐश्वर्य एवं आरोग्य प्रदायक प्रयोग, तथा नजरदोष की पहचान व उपाय सम्मीलित हैं। (इस पाठ्यक्रम की अवधि 6 माह है।)

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जब राहु खराब हो

क्या करें, कुंडली में जब राहु खराब हो:-

Dr.R.B.Dhawan

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ज्योतिष के जनक महर्षि पराशर के अनुसार राहु ग्रह को पितामह (दादा), समाज एवं जाती से अलग लोग (विद्रोही भी), सर्प, सामाजिक जहर का फैलाना, क्रानिक बीमारियां, भय, विधवा, दुर्वचन, तीर्थ यात्रायें, निष्ठुर वाणी, विदेश में जीवन, त्वचा पर दाग, सरीसृप, महामारी, किसी महिला से अनैतिक संबन्ध, नानी, व्यर्थ के तर्क, भडकाऊ भाषण, बनावटीपन, दर्द और सूजन, डूबना, अंधेरा, दु:ख पहुंचाने वाले शब्द, निम्न जाति, दुष्ट स्त्री, जुआरी, विधर्मी, चालाकी, संक्रीण सोच, पीठ पीछे बुराई करने वाले, पाखण्डी, बुरी आदतों के आदी, जहाज के साथ जलमग्न होना, डूबना, रोगी स्त्री के साथ आनन्द लेना, अंगच्छेदन होना, डूबना, पथरी, कोढ, बल, व्यय,आत्मसम्मान, शत्रु, मिलावट दुर्घटना, नितम्ब, देश निकाला, विकलांग, खोजकर्ता, शराब, झगडा, गैरकानूनी, तरकीब से सामान देश से अन्दर बाहर ले जाना, जासूसी करना, आत्महत्या, विषैला, विधवा, पहलवान, शिकारी, दासता, शीघ्र उत्तेजित होने इत्यादि का कारक होता है

कौन कौन से दोष आ जाते हैं, राहु खराब होने पर :-

जैसे की कहा जाता है, पीपल की छाया में सोने वाले को किसी भी प्रकार का रोग नहीं होता परंतु यदि बबूल की छाया में सोते रहें तो श्वास रोग या चर्म रोग हो सकता है।

इसी प्रकार ग्रहों की छाया का भी हमारे जीवन पर प्रभाव पढ़ता है। नवग्रहों में राहु ग्रह हमारी बुद्धि भ्रमित करता है, लेकिन जो चतुराई हमारी बुद्धि में पैदा होती है, उसका कारक भी राहु ही है। ज्योतिष शास्त्र में राहु के दोषपूर्ण या खराब होने पर जातक चतुराई से घोटाले तो करता है, परंतु एक दिन अपने ही बुने जाल में बुरी तरह फंस जाता है।

क्यों होता है राहु खराब ? :-

1 :- यदि कोई व्यक्ति अपने गुरु या फिर अपने धर्म का अपमान करता है, तो उस व्यक्ति का राहू ग्रह अवश्य बुरा फल देता है।

2 :- यदि कोई व्यक्ति शराब का सेवन नियमित करता है, या फिर पराई स्त्री के साथ सम्बन्ध बनाने की इच्छा रखता है, तो उसका राहू ग्रह अवश्य बुरा फल देता है।

3 :- यदि कोई व्यक्ति ब्याज वाले पैसों का प्रयोग घर में करता है तो, उस व्यक्ति का राहू ग्रह अवश्य बुरा फल देता है।

4 :- यदि कोई व्यक्ति चतुराई से किसी को धोखा देता है, और झूठ बोलने की आदत को नहीं छोड़ता तो उस व्यक्ति का राहू ग्रह बुरा फल देता है।

5 :- यदि कोई व्यक्ति हमेशा तामसिक भोजन करता है तो, उस व्यक्ति का राहू ग्रह बुरा फल देता है।

6 :- यदि कोई व्यक्ति खाना हमेशा घर से बाहर खाता है, या बाहर का खाना हमेशा खाता है तो, उस व्यक्ति का राहू ग्रह बुरा फल देने लगता है।

खराब राहु को कैसे पहचानेगे ? :-

1 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके ससुर, साले या साली से झगडा बढ़ने लगेगा।

2 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके सोचने की ताकत कम हो जायेगी।

3 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके जीवन में शत्रु बढ़ जायेंगे, और सोचने की क्षमता कम होने लगती है।

4 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके साथ दुर्घटना, पुलिस केस, या पत्नी के साथ लड़ाई झगडे में बढ़ोत्तरी हो जायेगी।

5 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो वो व्यक्ति छोटी छोटी बातों पर गुस्सा होने लगता है, और लोगों के साथ सही तालमेल नहीं बिठा पाता है।

6 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उस व्यक्ति का एक तरह से दिमाग खराब होने लगता है, और उस व्यक्ति के सर में फालतू में छोटी छोटी चोट लगने लगती है या चक्कर आते हैं।

7 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो वह व्यक्ति अधिक मदिरापान या फिर सम्भोग/हस्तमैथुन की तरफ भागने लगता है।

8 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो व्यक्ति नीच हरकते करने लगता है, और निर्दयी हो जाता है।

राहु ग्रह खराब होने से होने वाले रोग :-

1 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो सबसे पहले उसको गैस से सम्बन्धित शिकायत बढ़ने लगती है।

2 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके बाल झड़ने लगते हैं, तथा बवासीर से सम्बन्धित भी समस्या होने लगती है।

3 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो वो जातक पागलों की तरह व्यवहार करेगा और लगातार मानसिक तनाव में रहेगा।

4 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उसके नाखून अपने आप ही टूटने लगते हैं और व्यक्ति के सर में पीड़ा या दर्द बनी रहती है।

5 :- किसी भी व्यक्ति का अगर राहू ग्रह खराब है तो उस व्यक्ति को अचानक पता चलेगा की मुझे कोई बीमारी है और उस पर पैसा भी खूब खर्चा होगा तथा व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है।

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अधिक जानकारी के लिए अथवा ज्योतिषीय परामर्श के लिए :- गुरू जी के कार्यालय में सम्पर्क करें :- 011-22455184, 09810143516

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संतान का योग

Dr.R.B.Dhawan

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“संतान होगी या नही?” इस विषय पर ज्योतिष शास्त्र में महर्षि पराशर ने बहुत स्टीक ग्रह गणना पद्धति प्रस्तुत की है। पुरुष के लिए “बीज स्फुट” और स्त्री के लिए “क्षेत्र स्फुट”। हालांकि इस ग्रह गणना के परिणाम कोई अंतिम और निर्णायक नहीं हो सकते, किन्तु फिर भी, संतानोत्पत्ति के प्रश्न का उत्तर काफी हद तक स्पष्ट हो जाता है। वृहदपराशर होरा शास्त्र में महर्षि पराशर कहते हैं- पुरूष का शुक्राणु (वीर्य) संतानोत्पत्ति के लिए योग्य है, अथवा अयोग्य! और यदि योग्य है, तो उत्तम है, या मध्यम श्रेणी का‌ है! इस प्रश्न का उत्तर बीज स्फुट गणना से देखना चाहिए-।

इसी प्रकार स्त्री के लिए “क्षेत्र स्फुट” ग्रह गणना से अनुमान हो सकता है कि स्त्री का गर्भाशय संतानोत्पत्ति के लिए योग्य है, अथवा उत्तम या मध्यम है, या फिर अयोग्य है। महर्षि ने वृहद पराशर होरा शास्त्र में उल्लेख किया है कि जिस प्रकार उपजाऊ भूमि में उत्तम बीज बोया जाये तो अच्छी फसल होती है, मध्यम भूमि में उत्तम बीज से मध्यम श्रेणी की फसल होती है, और मध्यम भूमि में मध्यम श्रेणी का बीज परिणाम इसी अनुसार होता है। और इसी प्रकार बंजर भूमि में कितना ही उत्तम बीज बोने से परिणाम शून्य ही होता है। और मध्यम बीज से भी परिणाम शून्य होता है, इसी प्रकार स्त्री के गर्भाशय को महर्षि ने क्षेत्र बताते हुए कहा है कि, इस ज्योतिषीय गणना पद्धति से देखना चाहिए कि स्त्री का गर्भाशय स्वस्थ (गर्भ धारण योग्य) है या नहीं।

डाॅक्टर विभिन्न प्रकार कि जाँच करने के बाद भी जो नही बता पाते, वो ज्योतिषी चंद मिनटों मे गणना करके बता सकते हैं। दम्पत्ती के जीवन मे संतान होने या ना होने के विचार के लिये ज्योतिष मे पंचम भाव, पंचमेश, संतान कारक बृहस्पति आदि पर विचार करने के ज्योतिषीय नियम बताये गये हैं, किन्तु महर्षि पाराशर ने संतान के विषय में एक क्रान्तिकारी ज्योतिषीय सूत्र दिया है, सूत्र यह है- पुरूष कि जन्म कुण्डली मे बीज स्फुट कि गणना, तथा स्त्री कि जन्म कुण्डली मे क्षेत्र स्फुट कि गणना करना। डाॅक्टर अनेक प्रकार कि जाँच करने के बाद भी यह ठीक से निर्णय नही कर पाते हैं कि समस्या पुरूष के शुक्राणुओं मे है, या स्त्री के गर्भाशय में। डाॅक्टर अनेक बार शारीरिक तौर पर पति-पत्नी को फिट बताते हैं, लेकिन फिर भी संतान के जन्म में बाधा उत्पन्न हो जाती है। लेकिन बीज स्फुट ओर क्षेत्र स्फुट कि गणना करके नि:संतान दंपत्ति को यह स्पष्ट रूप से बताया जा सकता है कि, रोग किसके शरीर में है।

क्या मेडिकल कि सहायता से संतान का जन्म हो सकेगा? बीज के वृक्ष बनने के लिये उसे उपजाऊ भूमि कि आवश्यकता होती है, अगर भूमि बंजर है तो बीज वृक्ष ना बन सकेगा। स्त्री कि जन्म कुण्डली मे क्षेत्र स्फुट कि गणना गर्भ के ठीक भूमि कि तरह उपजाऊ, बंजर या मध्यम होने का पता लगाने जैसा है। अगर स्त्री कि जन्मकुंडली मे क्षेत्र स्फुट सही आता है ओर पुरूष कि जन्म कुण्डली मे बीज स्फुट मध्यम आता हो या सही नही आता है तो मेडिकल ओर ज्योतिषीय उपाय वहाँ निःसंतान दंपत्ति कि सहायता कर सकते है। लेकिन क्षेत्र स्फुट के खराब होने पर मेडिकल ओर ज्योतिषीय उपाय सहायक नही हो पाते है।

आज के समय मे चिकित्सा विज्ञान के साथ यदि ज्योतिष विज्ञान को जोड़कर कार्य किया जाये तो चिकित्सा विज्ञान ओर अधिक सरल बन सकेगा। कुंडली में संतानोत्पत्ति और संतान सुख के लिए विशेष तौर पर पंचम भाव से देखा जाता है, किंतु कुंडली विश्लेषण करते समय हमें बहुत से तथ्यों पर ध्यान देना बहुत ही आवश्यक है। संतान के सुख-दु:ख का विचार सप्तमेश, नवमेश, पंचमेश तथा गुरु से किया जाता है। नवम स्थान जातक का भाग्य स्थान भी है, और पंचम स्थान से पांचवा स्थान भी होता है, इस कारण भी नवमेश पर दृष्टि रखना बतलाया गया है। बृहस्पति संतान और पुत्र का कारक है, अतएव बृहस्पति पर दृष्टि रखना आवश्यक है।

इसके अलावा एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि पुराने शास्त्रों में एक मंत्र लिखा है, कारकों भावः नाशयः इसका अर्थ यह हुआ कि जिस भाव का जो कारक होता है, वह उस भाव में स्थित हो तो, उस भाव का नाश करता है। इसलिए गुरु यदि पंचम भाव में हो तो बहुत बार देखा गया है कि संतान संबंधी चिंता व कष्ट रहते हैं। लग्न, चंद्रमा और बृहस्पति से पंचम भाव यदि पाप ग्रहों से युत अथवा दृष्ट हो, शुभ ग्रहों से युति या दृष्ट ना हो तो तीनो पंचम भाव पापग्रहों के मध्य पापकर्तरी स्थित हो तथा उनके स्वामी त्रिक 6 8 12 वे भाव में स्थित हो तो, जातक संतानहीन होता है। फलित शास्त्र के सभी ग्रंथो में इसका उल्लेख मिलता है।

अनेक प्राचीन विज्ञजनों ने यह लिखा है कि, यदि पंचम भाव में वृषभ, सिंह, कन्या अथवा वृश्चिक राशि हो तो, अल्प संतति होती है, या दीर्घ अवधि के बाद संतान लाभ मिलता है। ज्योतिष में हर विषय पर बहुत ही विस्तृत और बहुत ही बड़ा साहित्य मिलता है, और अनेक प्रकार के उपाय या विधियां दी हुई हैं, लेकिन मुख्य तौर पर कुछ सूत्र हैं, जिनके आधार पर हम संतान योग को अच्छी तरह से पता लगा सकते हैं, इसमें सबसे बड़ा सूत्र है बीज स्फुट और क्षेत्र स्फुट। बीज स्फुट से तात्पर्य पुरुष की कुंडली के ग्रहो की स्तिथि से है। अगर कोई फसल बोई तो बीज हमको उत्तम चाहिए यदि बीज अच्छा नहीं होगा तो कभी भी फसल अच्छी नहीं होगी। इसी प्रकार क्षेत्र स्फुट मतलब हम खेत से भी समझ सकते हैं,‌ यदि खेत अच्छा नहीं होगा तो कितने भी अच्छे बीज बो देवें उसके अंदर फसल अच्छी नहीं होगी, अतः पुरुष की कुंडली में बीज स्फुट और स्त्री की कुंडली मे क्षेत्र स्फुट की गणना बतलाई गयी है, जिससे भी संतान योग का अंदाज लगाया जा सकता है।

बीज स्फुट की गणना में हम पुरुष की कुंडली में सूर्य गुरु और शुक्र के भोगांश को जोड़कर एक राशि निकालते हैं, यदि वह राशि विषम होगी और नवांश में भी उसकी विषम में स्थिति होगी तो बीज शुभ होगा, और साथ ही यदि एक सम और दूसरा विषम है तो, मध्यम फल होंगे और दोनों सम राशियां होगी तो, अशुभ फल होंगे, और बीज अशुभ होगा।
स्त्री की कुंडली में क्षेत्र स्फुट की गणना में हमें चंद्रमा मंगल और गुरु के भोगांशों को जोड़ना पड़ेगा, और भोगांशो को जोड़ने के बाद जो राशि आएगी वह राशि यदि सम होगी और नवमांश में भी उसकी सम स्थिति होगी तो, क्षेत्र स्फुट अच्छा होगा साथ ही एक सम व दूसरी विषम है तो, मध्यम फल होंगे और दोनों विषम हुई तो अशुभ फल होंगे व स्त्री सन्तान उत्पन्न करने में सक्षम नही होगी।

मेरे और लेख देखें :- aapkabhavishya.in, astroguruji.in, gurujiketotke.com, vaidraj.com, shukracharya.com पर।

अंक ज्योतिष

कीरो गोल्ड सॉफ्टवेयर (हिन्दी और अंग्रेजी दो भाषाओं में) :-

Dr.R.B.Dhawan

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कहा जाता है कि आज तक के मानव इतिहास में सम्पूर्ण विश्व में भविष्य बताने वाली लगभग 160 विद्यायें खोजी गई हैं। इनमें अनेको विद्यायें तो ऐसी हैं, जिनका प्रचार तथा उपयोग केवल उसी देश तक ही सामित होकर रह गया, जिसमें वे खोजी गई हैं। कुछ ऐसी भी हैं जिनका प्रचार और भी सीमित छेत्र लगभग प्रदेश विशेष तक ही सीमित रह गया, और धीरे-धीरे यह विद्यायें अधिक प्रचलन में न आने के कारण लुप्त सी हो गई। ऐसा नहीं है की यह लुप्त हुई विद्याओं की प्रमाणिकता कम थी, बल्कि ऐसा इसलिये हुआ क्यों कि इनको उचित प्रचार ही नहीं मिला या फिर इनमें से कुछ को छिपाकर रखने की प्रवृति कारण बनी थी।

भविष्य का ज्ञान देने वाली जो तीन विद्यायें सम्पूर्ण विश्व में अधिक प्रसिद्ध हुई हैं- 1. हस्तरेखा विज्ञान, जो कि समुद्रिक विज्ञान का एक भाग है। 2. अंक ज्योतिष Numerology तथा 3. जन्मकुण्डली द्वारा भविष्य कथन। देखा जाये तो तीनों ही विद्याओं के जनक भारतीय विद्धान थे। भारत के 18 ऋषियों ने अपने-अपने समय में इन विद्याओं को खोजा तथा प्रस्तुत किया था। इसके अतिरिक्त भारत में भी भविष्य का ज्ञान देने वाली अनेक अन्य विद्यायें उचित प्रचार न पाने तथा छिपाकर रखने की प्रवृति के कारण लुप्त हांकर रह गई या कह सकते हैं, वह स्थान न पा सकी जैसा इन तीन विद्याओं ने प्राप्त किया। भारत में इन में से एक विद्या ‘जन्मकुण्डली द्वारा फलादेश’ पर महर्षि पराशर, का योगदान सर्वाधिक उल्लेखनीय था, इसके उपरांत विक्रमादित्य के शासनकाल में महर्षि वराहमिहिर ने इसमें बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, इस के अतिरिक्त भी बहुत से विद्वानों ने अपना-अपना योगदान समय-समय पर दिया है। वराहमिहिर ने केवल कुण्डली विज्ञान पर ही नहीं अपितु अंक ज्योतिष तथा सामुद्रिक विज्ञान पर भी अनेक ग्रंन्थों की रचना की है। युरोप के विद्वान कीरो, पैथागोरस, स्फेरियल, हिब्रयू ने अंक ज्योतिष तथा सामुद्रिक शास्त्र के एक भाग ‘हस्तरेखा विज्ञान’ पर तो बहुत परिश्रम किया और प्रसिद्धि भी पाई अनेक अंग्रेजी के ग्रन्थ भी लिखे परंतु जन्मकुण्डली विज्ञान के रहस्यों को अधिक नहीं समझ पाये। कहा जाता है पैथागोरस और कीरो भविष्य ज्ञान की विद्याओं की शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से कई वर्ष तक भारत में भारतीय विद्वानों के साथ रहे थे और अनेक विद्यायें यहां से सीखकर गये थे। यह सच है की कीरो ने अंकविद्या ‘अंक ज्योतिष’ पर बहुत सूक्षम अध्ययन किया और इसी लिये अपने क्षेत्र (देश) में बहुत प्रसिद्धि भी पाई थी। यहां तक की इस विद्या के जनक ‘सामुद्र ऋषि’ को बहुत अधिक विद्वान नहीं जानते परंतु कीरो का नाम सभी की जुबान पर रहा है। विद्वान चाहे भारतीय हो या विदेशी सम्मान पाने का अधिकारी तो बराबर है। यहां आपका ध्यान अब Shukracharya संस्थान द्वारा कडे परिश्रम द्वारा बनाया गया Keero Gold की ओर ले जाना चाहता हूं। कीरो गोल्ड एक साॅफ्टवेयर है, जो शुद्ध अंक ज्योतिष पर आधारित है।

कीरो गोल्ड की विशेषतायें-
सर्व प्रथम कीरो-06 नाम से अंक शास्त्र का साॅफ्टवेयर तैयार किया गया था, जो कि वर्तमान कीरो गोल्ड का आधार है। जिसको Keero Gold प्रोफेशनल संस्करण के नाम से जाना जाने लगा। जिसमें व्यक्ति अपनी अंक ज्योतिष से संबंधित अधिकतम आवश्यकताओं को देख व प्रिंट कर सकता है। आप इसके नाम से ही समझ सकते हैं, इस संस्करण का उदेश्य है अंक ज्योतिष द्वारा अंक जन्मपत्री छापकर व विस्तृत फलादेश व गणना देखकर व्यापारिक दृष्टि से प्रयोग करना। किसी भी एडवांस चीज की आवश्यकता तब तक महसूस नहीं होती जब तक कि उसके द्वारा प्राप्त होने वाली सारी सुविधाओं का पता न चले। यह ठीक उसी प्रकार है, जैसे काम तो तब भी चल जाया करता था जब संचार माध्यम सीमित थे, केवल डाक द्वारा पत्र भेजे और पढ़े जाते थे, परंतु आज के आधुनिक समय में ई-मेल, एस. एम. एस. आदि द्वारा संदेश भेजे व प्राप्त किये जाते हैं। आज इन आधुनिक चीजों के बिना जीवन यापन संभव नही लगता है।

कीरो गोल्ड की विशेषतायें :-
यह संस्करण हिन्दी और अंग्रेजी दो भाषाओं में उपलब्ध है। यह संस्करण मुख्यतः पाँच भागों में संगठित है।
1. प्रश्न खण्ड
2. अंक कुण्डली खण्ड
3. मिलापक खण्ड
4. राम शलाका
5. बायोरिद्म

1. प्रश्न खण्ड :-
प्रश्न खण्ड में ‘प्रश्न अंक ज्योतिष’ की पद्धतियों के द्वारा गणना और उसके के फल (उत्तर) उपलब्ध हैं। जैसे कभी-कभी जतक के मन में ऐसे प्रश्न होते हैं, जिनका उत्तर एक शब्द में ही होता है (हाँ, ना, शुभ, सम, अशुभ आदि) इसमें इस प्रकार के प्रश्नों के उत्तर देने वाली विशेषतायें उपलब्ध हैं।

इसमें 7 विभाग हैं-

पहला- नाम सुधारक :-
इस विभाग में आप अपने नाम की त्रुटियां सुधार कर, इसे अपने भाग्यांक के अनुकूल बना सकते हैं, जिससे आपका नाम आपके लिये भाग्य वृद्धि करने वाला हो जायेगा। इनमें से कुछ स्पेलिंग प्रयोग करने योग्य नहीं होते, इस लिये इस के उत्तर में एक से अधिक उत्तर मिलेंगे, यह उत्तर 100 प्रतीशत या 50 प्रतीशत के पैमाने में अनुकूलता के रूप में मिलेंगे।

दूसरा- व्यक्तिगत शुभ घंटे :-
यह होरा शास्त्र पर आधारित गणना आपको किसी भी दिन के शुभ घंटों का ज्ञान देगी, जो की आपके लिये शुभ घंटे होंगे। इन शुभ घंटों में आप अपना कोई भी शुभ कार्य आरम्भ कर सकते है।

तीसरा- ग्राफ :-
इस सुविधा में आप अपने भाग्य स्तर और ऊर्जा स्तर तथा समय (दिन) के बीच बनता हुआ ग्राफ देख सकते हैं, जिससे आपको प्रतिदिन के लिये दिनचर्या बनाने में मदद मिलेगी। भाग्य ग्राफ में आप अपने भाग्य के स्तर का अवलोकन दिन, महीने, वर्ष के रूप में कर सकते हैं। ऊर्जा ग्राफ में आप अपने भाग्य के स्तर का अवलोकन दिन, महीने, वर्ष के रूप में कर सकते हैं। यह सभी गणनायें आपके वर्षांक, मासांक और दैनिकांक पर आधारित होगी।

चौथा- अंक गोचर :-
इस सुविधा में आप अपना वर्तमान, व्यक्तिगत अंक गोचर घडी के आकार में मनचाही गति से देख सकते हैं। साथ में निर्देशरूप में शुभाशुभ समय की जानकारी दी गई है। यह जानकारी आपको अति-उत्तम, उत्तम, मध्यम, कठिन तथा अशुभादि के रूप में मिलेगी। यह गणना व्यक्तिगत वर्षांक, मासांक और दिनांक के पारवहन चक्र पर आधारित है।

पाँचवा- प्रवासी आगमन :-
इस सुविधा में प्रवासी के विषय में जानकारी मिलेगी। जैसे प्रवासी सुरक्षित है या नहीं, किस दिशा में, कम, मध्यम या अधिक दूरी पर है, अथवा वह कितने समय में लौटेगा इत्यादि।

छटा- खोई पाई वस्तु ज्ञान :-
कभी-कभी घर की कोई वस्तु खो जाती है, उस स्थिति में वस्तु की प्राप्ति या ना प्राप्ति की जानकारी मिलती है। यदि मिलेगी तो कैसी अवस्था में, किस ओर मिलेगी।

सातवां- नाम, फोन या वाहन नम्बर जांचना :-
इसमें आपके भाग्यांक के अनुसार आपके लिये आपके फोन, घर, कार्यस्थान या वाहन का नम्बर जांचने की सुविधा शुभ (भाग्यशाली) प्रतीशत में मिलेगी।

2. अंक कुंडली खण्ड :

इस खण्ड में अंक कुंडली के सभी प्रकार का विस्तृत फलादेश रिपोर्ट के रूप में प्रिंटाऊट लेने की सुविधा है। सभी रिपोर्ट के प्रिंटाऊट हिन्दी व अंग्रेजी दोनो भाषाओं में लिये जा सकते हैं।

इसमें 9 विभाग हैं-
पहला- विभाग मूलांक विचार :-
इस अंक पत्रिका में जातक के मूलांक पर आधारित वितृत फलादेश किया गया है। इस के साथ-साथ जातक के भयांक, नामांक, शुभांक, शुभ दिन, शुभ तारीख, शुभ वार, शुभ माह, शुभ वर्ष, अंकों द्वारा स्वास्थ्य, अंकों द्वारा आजीविका के साधन, मित्रांक, शत्रु अंक, महत्वपूर्ण वर्ष, शुभ रंग, शुभ यंत्र, शुभ व्रत आदि का विस्तृत विवरण फलादेश सहित उपलब्ध है। सामान्यतः 8 से 10 पृष्ठ का प्रिंटाऊट इसमें मिलता है।

दूसरा- विभाग अंक कुण्डली :-
इस कुण्डली में जातक की अंक कुण्डली पर आधारित फलित कथन किया गया है। इसके साथ जातक की अंक दशाओं का भी विवरण आरम्भ और समाप्तिकाल सहित हैै। इस कुंडली में जातक की अंक कुंडली में बनने वाले विभिन्न अंक योगों का भी विस्तृत फलादेश है।

तीसरा- विभाग नाम कुण्डली :-
इस कुंडली में जातक के अंग्रेजी नामाक्षरों की विस्तृत फलकथन की सुविधा उपलब्ध है।

चौथा- विभाग वार्षिक फलादेश :-
इस कुण्डली में जातक के 9-10 वर्षो का सामान्य फलादेश किया गया है। यह कुंडली जातक के वर्षांक पर आधारित बनाई जाती है।

पाँचवा- विभाग मासिक फलादेश :-
इस कुण्डली में जातक के 12 महीने का सामान्य फलादेश किया गया है। यह कुण्डली जातक के व्यक्तिगत मासांक पर आधारित बनाई जाती है।

छटा- विभाग दैनिक फलादेश :-
इस कुण्डली में जातक का दैनिक सामान्य फलादेश किया गया है। यह कुण्डली जातक के व्यक्तिगत दैनिक फल पर आधारित बनाई जाती है।

सातवां- विभाग वार्षिक व मासिक फलादेश :-
इस कुण्डली में जातक के वर्ष तथा मास का संयुक्त सामान्य फलादेश किया गया है। यह कुण्डली जातक के वर्षांक व मासंक पर आधारित है।

आठवां- विभाग मासिक फलादेश व दैनिक फलादेश :-
इस कुण्डली में जातक के मासिक तथा दैनिक संयुक्त सामान्य फलादेश किया गया है। यह कुण्डली जातक के मासांक व दैनिक अंक पर आधारित है।

नौवां- विभाग लोशु चक्र (चायनीज अंक शास्त्र) फलादेश :-
इस रिपोर्ट में जातक के लिये लोशु चक्र द्वारा फल कथन किया गया है। डेस्टिनेशन नम्बर का भी विस्तृत फलादेश है। इस के साथ दिनांक का फल सशक्त प्लेन और बनने वाले ऐरो का विस्तृत फलादेश है। व्यक्तिगत लोशु वर्षांक, एवं व्यक्तिगल लोशु मासांक का भी फलादेश है।

3. मेलापक खण्ड :-
इस खण्ड में अंक शास्त्र के आधार पर किन्ही दो व्यक्तियों का मेलापक फल दिया गया है। यह फलादेश प्रतिशत में दिया गया है। इसकी गणना का आधार मूलांक, भाग्यांक और नामांक है, यह इनकी परस्पर अनुकूलता पर आधारित है।

4. राम शलाका :
जीवन में अनेक अवसर ऐसे आते हैं, जब किसी प्रश्न के उत्तर को लेकर दुविधा की स्थिति हो, और आप प्रभु श्रीराम के संकेतात्मक उत्तर चाहते हों, या आप कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेने जा रहे हैं, तथा यह तय नहीं कर पा रहे कि क्या किया जाये, क्या नहीं किया जाये? ऐसी स्थिति में अपनी दुविधा भगवान राम को सौंप दीजिये। समझ लीजिये आपका यह उत्तर तो भगवान के द्वार से आ गया। क्या करें और क्या नहीं करें? ऐसी भटकाव वाली स्थिति से उबरने के लिये ही तुलसीदास जी ने इस शलाका की रचना की है। आप मान सकते हैं कि श्री राम शलाका प्रश्नावली के रूप में एक मूल्यवान चाबी हमें हमारी ऋषि परम्परा से प्राप्त हुई है, इसकी उपयोग विधि बिलकुल सरल है-

श्री राम शलाका एक ऐसी प्रश्नावली है, जो गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित ‘श्री राम चरित मानस’ पर आधारित है। इस प्रश्नावली का प्रयोग कर आप जीवन के कई उपयोगी तथा महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रश्नावली का प्रयोग करना बेहद सरल है। सबसे पहले अपने नेत्र बंद करके भगवान श्री राम का स्मरण करते हुये अपने प्रश्न को अपने मन में अच्छी तरह विचार लें। इसके बाद इस में दिये गये किसी भी एक अक्षर पर अपने नेत्र बंद किये हुये ही क्लिक करें। आपके द्वारा क्लिक किये हुये अक्षर से प्रत्येक 9वें नम्बर के अक्षर को जोड़कर एक चैपाई बनेगी, जो की आपके प्रश्न का उत्तर होगी।

5. बायोरिद्म ग्राफ :-
बायोरिद्म ग्राफ बायोरिद्म सिद्धांत पर आधारित है, इस में जिस समय गणना की जा रही है, उस दिन से 30 दिन पूर्व तथा 30 दिन आगे तक का यह ग्राफ अंकित हो जाता है। इस के अलावा आप इस ग्राफ को कम्प्यूटर स्क्रीन पर भी देख सकते हैं। इमेज के रूप में सहेज सकते हैं, प्रिटर से प्रिट कर सकते हैं। इस में तीत रेखायें दिखई गई हैं, प्रथम रेखा जातक की शारीरिक स्थिति को ग्राफ के रूप में दर्शाती है, इसी प्रकार दूसरी रेखा मन की स्थिति को ग्राफ के रूप में दिखाती है, तथा तीसरी रेखा बौद्धिक स्तर को ग्राफ के रूप में दर्शाने वाली रेखा है।

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शनिदेव

शनि ग्रह हमेशा कष्टकारी या पीड़ादायक नहीं :-

Dr.R.B.Dhawan

(Top best astrologer in Delhi)

शनि ग्रह हमेशा कष्टकारी या पीड़ादायक नहीं होता। वह बुरे फलों के साथ-साथ अच्छा फल भी देता है। वास्तव में शनि के बारे में जितना भय और जितनी गलतफहमियां हैं उतना खराब वह है नहीं। काल पुरुष की जन्म कुण्डली में शनि कर्मेश दशम भाव का स्वामी एवं लाभेश एकादश भाव का स्वामी होकर स्थित है। कर्मेश होने के साथ-साथ लाभेश भी होने के कारण कर्म का फल है। नवम भाव भाग्य है। कर्म के फल को भाग्य भी कहते हैं। कर्म के व्यय होने पर भाग्य बनता है। कर्म का अगला भाव लाभ तथा कर्म का व्यय भाव भाग्य बनाता है। यदि कर्म अच्छा है तो भाग्य भी अच्छा होगा। यदि कर्म ही नहीं तो लाभ तथा भाग्य कहां से आएंगे। भाग्य भाव धर्म का भी है। अर्थात् कर्म को धर्म पर भी व्यय करें तो भाग्य जागृत होगा। शनि कर्मेश होने के कारण भाग्य विधाता भी है। वही एकादश भाव का स्वामी होकर कर्म फलों का लेखा-जोखा या वेलेन्स शीट के अनुसार न्याय करता है।

कुछ लोग शनि ग्रह को खोटा, बुरा, पापी ग्रह मानते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि भले को छोड़िए, खोटे ग्रह जप व दान। अर्थात पापी ग्रहों को ज्यादातर लोग पूजा, अर्चना, जप, तप से शांत करते हैं। उससे भयभीत व त्रस्त रहते हैं। जरा सा किसी को शनि के दुष्प्रभाव का ज्ञान होते ही वह शनि के दुष्प्रभाव के उपचार हेतु पूजा, अर्चना, जप, तप में लग जाता है। मेरे अनुभव के अनुसार शनि जब साढ़े साती से किसी को प्रभावित करता है तो उस को नया परिष्कृत रूप अपनी साढे़साती के बाद देता है। जितना उसको दंडित करता है। उससे ज्यादा देकर जाता है। अधिकतर शनि की साढ़े साती बरबाद हुए लोगों को जाते-जाते फिर से उन्हें धो-पोछकर चमकाकर जाती है। उनमें लगी जंग को छुड़ा जाती है। भले बुरे के भेद से शनि कोमल व कठोर भी है। शनि दोनों तरह के फल देता है। शनि ही इस भू मंडल का न्यायधीश है। शनि ग्रह को काल भैरव अर्थात् न्याय का स्वामी माना गया है। वह अपने दो सहयोगी ग्रहों राहु एवं केतु की सहायता से न्याय करता है। लेकिन जब जरूरत होती है तो सेनापति मंगल की भी सहायता लेता है। तब रक्तप्रद दंड का निधान करता है। तो सेनापति मंगल की सहायता से दंडित कर अंग-भंग करने का आदेश देता है

वैद्यनाथ के अनुसार- लग्नस्थ शनि का जातक कई व्याधियों से ग्रस्त होता है। उसका कोई ना कोई अंग अवश्य दोष युक्त होता है। जबकि स्वगृही या उच्च का शनि जातक को यश वैभव से संपन्न करता है। शनि शुभ संयोग युक्त हो तो जातक संकल्पवान स्वयं परिश्रमी, शनैः शनैः उन्नतिशील, पराक्रमी, विजयी तथा दृढ़ निश्चयी होता है। तथा अथक प्रयास से उच्च पद, सफलता अर्जित करता है। अशुभ संयोग से शनि नीच कर्मरत, वह स्वयं कार्य बिगाड़ता है। अविश्वासी, भयभीत, इर्शालु, अविवेकी, अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने वाला बना देता है। दूरस्थ ग्रह शनि के प्रभाव से एकांत आलसी तथा उदासीन का स्वाभाविक लक्षण होता है।

अरूण सहिंता के अनुसार- सूर्य को विष्णु, चन्द्रमा को शिव, मंगल को हनुमान, स्वामी कार्तिकेय षडानन, बुध को दुर्गा, गुरु को ब्रह्मा, शुक्र को लक्ष्मी जी, शनि को भैरव या काल भैरव राहु को सरस्वती, गायत्री तथा केतु को गणेश माना गया है। ये देवता तथा देवियां ही जातक की कुण्डली में कर्माें के अनुसार राशियों और भावों में आकर शुभ व अशुभ फल प्रदान करते हैं। इसी प्रकार 28 नक्षत्र होते हैं।

नक्षत्रों के नाम :- 1. अश्विनी, 2. भरणी, 3. कृत्तिका, 4. मृगशिरा, 6. आद्र्रा, 7. पुनर्वसु, 8. पुष्य, 9. आश्लेषा, 10. मघा, 11. पूर्वफाल्गुनी, 12. उत्तरफाल्गुनी, 13. हस्त, 14. चित्रा, 15. स्वाति, 16. विशाखा, 17. अनुराधा, 18. ज्येष्ठा, 19. मूल, 20. पूर्वाषाढ़ा, 21. उत्तराषाढ़ा, 22. श्रवण, 23. धनिष्ठा, 24. शतभिषा, 25. पूर्वाभाद्रपद, 26. उत्तराभाद्रपद, 27. रेवती। 28. अभिजित। इन नक्षत्रों के देवता नक्षत्रों तथा ग्रह क्र. नक्षत्र न. स्वामी क्र. नक्षत्र न. स्वामी देवता :-

1. अश्विनी अ. कुमार केतु, 2. भरणी काल शुक्र, 3. कृतिका अग्नि सूर्य, 4. रोहिणी ब्रह्मा चन्द्रमा, 5. मृगशिरा चन्द्रमा मंगल, 6. आद्र्रा रूद्र राहु, 7. पुनर्वसु अदिति बृहस्पति, 8. पुष्य बृहस्पति शनि, 9. आश्लेषा सर्प बुध, 10. मघा पितर केतु, 11. पू.फा भग शुक्र, 12. उ.फा. अर्यमा सूर्य, 13. हस्त सूर्य चन्द्रमा, 14. चित्रा विश्वकर्मा मंगल, 15. स्वाती पवन राहु, 16. विशाखा शुक्राग्नि बृहस्पति, 17. अनुराधा मित्र शनि, 18. ज्येष्ठा इन्द्र बुध, 19. मूल निर्ऋति केतु, 20. पू.आ जल शुक्र, 21. उ.आ. विश्वेदेव सूर्य, 22. श्रवण विष्णु चन्द्रमा, 23. धनिष्ठा वसु मंगल, 24. शतभिषा वरूण राहु, 25. पू.भा. अजैकपाद बृहस्पति, 26. उ.भा. अहिर्बुध्न्य शनि, 27. रेवती पू.षा. बुध, 28. अभिजित ब्रह्मा केतु।

अपने नक्षत्रों में ग्रहों अर्थात् देवताओं के गोचर (आगमन) पर एक दूसरे को प्रभावित कर फल प्रदान करते है। भृगु संहिता के अनुसार- लगनस्थ शनि हो तो जातक शत्रु का नाश करने वाला, समृद्ध, धन धान्य पुत्र, स्थूल शरीर दूर दृष्टि वाला एवं वात से पीड़ित होता है। उच्चस्थ शनि जातक को प्रधान या नगर का मुखिया बनाता है। मकरस्थ या कुम्भस्त शनि जातक को पैतृक धन दौलत का वारिस बनाता है। वृहद पवन में वाला बताया है। यदि शनि मूल त्रिकोणस्थ हो तो जातक को राष्ट्र प्रमुख या प्रांत प्रमुख की प्रतिष्ठा प्रदान करता है। जातक पारिजात में दुर्बल शनि हो तो जातक दुष्कर्मों का फल भोगता है। श्वास रोग, शरीर पीड़ा, पार्श्व, पार्श्व पीड़ा, गुदृ विकार, हृदय ताप, कंपन, संधि रोग तथा वात विकार से पीड़ित होता है। कुछ राशियों में जयदेव ने अच्छा बताया है। धनु, मीन, मकर, तुला, कुम्भ, राशि का शनि पांडित्य, ऐश्वर्य तथा सुदर्शन शरीर, कामावेग एवं आलसी होता है।

वारहमिहिर के अनुसार- स्वगृही शनि,उच्च मीन, धनु, मकर, तुला, कुम्भ, राशि गत शनि श्रेष्ठ फल प्रदान करना है। ऐसे जातक ज्ञान शिरोमणि, सुदर्शन, अग्रणी, नरपति एवं समृद्ध होते हैं।

मानसागरी के अनुसार- मकर तथा कुम्भ राशि लग्न में जातक शत्रुहन्ता सिद्ध करता है। अन्य राशियों में विरल केशी, नीच कर्मी, वासना युक्त, धूर्त एवं आलसी होता है।

जातक पर शनि का प्रभाव- रूखे-सूखे बाल, लम्बे बड़े अंग, दांत तथा वृद्ध शरीर काला रंग का दिखता है। यह अशुभ ग्रह है। मंद गति ग्रह है। नैतिक पतन का द्योतक है। वायु संबंधी बीमारियों का प्रतिनिधि है। यह दुःख, निराशा तथा जुआ का प्रतीक है। गंदा स्थान, अंधेरा स्थान का कारक ग्रह है।

शनि से प्रभावित वस्तुएं- लोहा, काला, चना, भांग, तेल, नीलम, दाह संस्कार गृह, कब्रिस्तान, जेल, बिस्तरे पर लिटाएं रखना, पुरानी बीमारियां, लाइलाज बीमारियां, वृद्धावस्था का स्वामी है। शनि से प्रभावित शरीर के अंग- दांत, वात, कलाई, पेशियां, पीठ, पैर।

शनि से प्रभावित रोग- गुदा के रोग, व्रण, जख्म व जोड़ों का और पुराने दर्द, लाइलाज रोग, दांत, सांस, क्षय, वातज यह शुद्र वर्ण, वायु तत्व, नपुंसक तथा पश्चिमी स्वामी है।

जन्मकुण्डली में शनि के लग्न भाव से स्थित का फल-
1 लग्न (प्रथम) भावस्थ शनि मकर, कुम्भ तथा तुला का हो तो धनाढ्य, सुखी, धनु और मीन राशियों में हो तो अत्यंत धनवान और सम्मानित एवं अन्य राशियों का हो तो अशुभ होता है।

2 द्वितीय भावस्थ शनि हो तो जातक, कटुभाषी, साधुद्वेषी, मुखरोगी और कुम्भ या तुला का शनि हो तो धनी, लाभवान् एवं कुटुम्ब तथा भातृवियोगी होता है।

3 तृतीय भावस्थ शनि हो तो जातक शीघ्रकार्यकर्ता, सभाचतुर, चंचल, भाग्यवान, शत्रुहन्ता, निरोगी, विद्वान योग, मल्ल एवं विवेकी होता हैै।

4 चतुर्थ भावस्थ शनि हो तो जातक अपयशी, बलहीन, धूर्त, कपटी, शीघ्रकोपी, कृशदेही, उदासीन, वातपित्तयुक्त एवं भाग्यवान होता है।

5 पंचम भावस्थ शनि हो तो जातक आलसी, संतानयुक्त, चंचल, उदासीन, विद्वान, भ्रमणशील एवं वातरोगी होता है।

6 षष्ठ भावस्थ शनि जातक को बलवान, आचारहीन, व्रणी, जाति विरोधी, श्वास रोगी, कण्ठ रोगी, योगी, शत्रु हन्ता भोगी एवं कवि बनता है।

7 सप्तम भावस्थ शनि हो तो जातक क्रोधी, कामी, विलासी, अविवाहित रहने वाला, या दुःखी अविवाहित जीवन, धन सुख हीन, भ्रमणशील, नीचकर्मरत, स्त्रीभक्त होता है।

8 अष्टम भावस्थ शनि जातक को विद्वान स्थूल शरीर, उदार प्रकृति, कपटी, गुप्तरोगी, वाचाल, डरपोक, कुष्ठरोगी एवं धूर्त बनाता है।

9 नवम भावस्थ शनि हो तो जातक धर्मात्मा, साहसी, प्रवासी, कृशदेही, भीरू, भ्रातृहीन, शत्रुनाशक वात रोगी, भ्रमणशील एवं वाचाल होता है।

10 दशम भावस्थ शनि हो तो जातक विद्वान, ज्योतिषी, राजयोगी, न्यायी, नेता, धनवान, राजमान्य, उदरविकारी, अधिकारी, चतुर, भाग्यवान, परिश्रमी, निरूद्पयोगी एवं महात्वाकांक्षी होता है।

11 ग्यारहवें भावस्थ शनि हो तो जातक बलवान विद्वान, दीर्घायु, शिल्पी, सुखी, चंचल, क्रोधी, योगाभ्यासी, नीतिवान, परिश्रमी, व्यवसायी, पुत्रहीन, कन्याप्रज्ञ एवं रोगहीन होता है

12 बारहवें भावस्थ शनि हो तो जातक आलसी, दुष्ट, व्यसनी, अपस्मार, उन्माद रोगी, मातुल कष्टदायक, अविश्वासी एवं कटुभाषी होता है।

शनि की दशा आ गयी हैः-
प्रत्येक ग्रह का अपना-अपना अस्तित्व है। यहां शनि ग्रह के बारे में कहना चाहूंगा कि शनि ग्रह सर्वथा कष्टकारी या पीड़ादायक नहीं होता। शनि बुरे फलों के साथ-साथ अच्छे फल भी बहुत देता है। शनि के बारे में जितना भय या जितनी भ्रांतियां लोगों को हैं, उतना खराब वह नहीं है। शनि का नाम आते ही लोग ज्यादातर डरने लगते हैं-‘शनि की दशा आ गयी है’ या ‘शनि की साढे़साती’ लघु ढैय्या है। इस कारण कुछ लोग डर या वहम बैठा देते हैं, जिसकी वजह से साधारण व्यक्ति तरह-तरह से भ्रमित होकर परेशान हो उठता है। ग्रहों को शुभ व अशुभ भागों में बांटा जाता है। जब शुभ ग्रह राशि परिवर्तित करते हैं तो उस समय गोचर का चन्द्रमा जन्म चन्द्रमा से किस भाव में स्थित है उसके अनुसार गोचर के शुभाशुभ ग्रह का फल बतलाते हैं।
कई अन्य मत भी प्रचलित हैं जिससे गोचर के ग्रह या ‘शनि की साढ़ेसाती’ का शुभाशुभ फल निकालते हैं। दैवज्ञ श्री काटवे, का कहना है कि जब शनि चन्द्रमा से 13 अंश 20 कला पीछे होता है शनि की साढ़ेसाती उस समय आरम्भ होती है, तथा जब तक वह 13 अंश 20 कला आगे रहते हैं, तब तक रहती है। इस प्रकार जन्म चन्द्रमा के अंशों में से 13 अंश 20 कला घटाओ तथा 13 अंश 20 कला जोड़ो। इससे प्राप्त होने वाली चाप पर जब तक शनि रहता है शनि की साढ़ेसाती रहती है। इस प्रकार ग्रह की राशि परिवर्तन समय कोई महत्व नहीं रखता। इस 13 अंश 20 कला मूर्ति निर्णय पद्धति महत्वहीन हो जाती है। परन्तु लग्न, सप्तशलाका, तारा तथा अष्टक वर्ग से ग्रह को शुभाशुभ उत्तम है।

पाठकों को याद दिला दूं कि जिस जन्म कुण्डली में योग नहीं वह दशा अन्तर दशा नहीं दे सकती। इसलिए फल के लिए योग का होना आवश्यक होता है। माना कि जातक की जन्म कुण्डली में शादी का योग ही नहीं हो, तो दशान्तर दशा सप्तमेश की हो, या कारक ग्रह की, शादी नहीं हो सकती। इसलिए फल के लिए योग का होना आवश्यक है इसी प्रकार जो ग्रह की दशान्तरदशा नहीं दे सकती, वह उस फल को देता है। यदि दशान्तर दशा ही हो तो गोचर कितना भी शुभाशुभ हो, फल नहीं दे सकता। पहले दशान्तर दशा का होना आवश्यक है फिर गोचर उस फल को देता है। यदि महादशा, अंतरदशा ही नहीं तो गोचर कितना भी शुभाशुभ हो वह फल नहीं दे सकता। इसको इस प्रकार भी कहा जा सकता है।

सबसे पहले जातक के लिए फल होना चाहिए। दशा अन्तरदशा उस फल को संदेश वाहक, गोचर को देती है। संदेश वाहक, गोचर वह फल जातक को देता है। यदि दशान्तर दशा संदेश वाहक को फल नहीं देगी तो संदेश वाहक जातक को फल कहां से देगा? इसलिए क्रम निश्चित है, पहले फल होना चाहिए। (योग) दूसरे उन ग्रहों की दशान्तर दशा होनी चाहिए तब गोचर जातक को फल देता है। अन्यथा फल प्राप्त नहीं होता गोचर केवल सहायक है। गोचर के फल को प्रभावित करने वाले भिन्न-भिन्न पहलुओं का अध्ययन करने के बाद साढ़े साती का अध्ययन करते हैं। जन्म राशि से 12वें स्थान जन्म राशि पर एवं द्वितीय भाव पर जब शनि गोचर करता है उसे शनि की साढ़ेसाती कहते हैं। शनि एक राशि पर लगभग 2.5 वर्ष रहता है। इस प्रकार तीन राशियों पर 7.5 वर्ष हुए। इसलिए इसे साढ़ेसाती कहते हैं। साढ़ेसाती अच्छी भी हो सकती है और बुरी भी। यह सब जन्मकुण्डली में चन्द्रमा तथा शनि की स्थिति तथा बल पर निर्भर करता है। लग्न, सप्तशलाका, तारा तथा अष्टक वर्ग के बल पर भी निर्भर करता है। परन्तु फिर भी यह मानसिक कष्ट कारक हो सकती है। जब शनि चन्द्रमा से 13 अंश 20 कला कम पर 12वें भाव में रहता है तो, शनि का प्रभाव आरंभ हो जाता है। यदि शनि वक्री हो जाए तो 7.5 वर्ष से भी ज्यादा समय तक तीनों राशियों पर रह सकता है।

जिनका दीर्घ जीवन है उनके जीवन में 3 बार साढे़साती आती है। पहले फेरे में कुछ बुरा फल देती है, परन्तु आक्रमण बड़े वेग से होता है। दूसरे फेरे में वेग तो कम हो जाता है परन्तु फिर भी कष्ट तो मिलता ही है, परन्तु इतना हानिकारक नहीं होता तथा कुछ शुभ फल भी प्राप्त होता है। परन्तु तीसरे पर्याय में जातक की मृत्यु हो जाती है। बहुत कम भाग्यवान जातक ही इस तीसरे फेरे को झेल पाते हैं। साढे़साती में साधारणतया हम यह देखते हैं कि शनि किस राशि से गोचर कर रहा है। उस राशि के स्वामी से उसका कैसा संबंध है। यदि उसका संबंध मित्रता का है तो अशुभ फल नहीं होता। वैसा तो यह संबंध पंचधा मैत्री से देखना चाहिए। परन्तु पंचधा मैत्री तो कुण्डली के अनुसार बनेगी। समझाने के लिए हम लिखते हैं मित्र राशि की रााशि से गोचर कर रहा है। माना कि शनि गोचर कर रहा है। मेष राशि से प्रथम 2.5 वर्ष मीन, जिसका स्वामी बृहस्पति है तथा शनि के गुरु के साथ सम नैसर्गिक संबंध हैं तो प्रथम 2.5 वर्ष सम होंगे। द्वितीय 2.5 वर्ष मेष, जिसमें चन्द्रमा स्थित हैं उसका स्वामी मंगल है जो शनि का शत्रु है। अर्थात द्वितीय ढैय्या अशुभ। तीसरी ढैय्या में शनि वृष राशि मे गोचर करेगा। वृष के स्वामी शुक्र को शनि मित्र समझता है, इसलिए तीसरे ढैय्या शुभ अथात् मेष राशि वालों के लिए केवल दूसरे ढैय्या अशुभ हुई इस प्रकार इसको इस तालिका में लिख सकते हैं।
कुछ विशेष नियमः-

1 जन्म कुण्डली में 6, 8, 12 भाव में शनि गोचर में अशुभ ग्रह से दृष्ट या युक्त हो तो अशुभ फल प्राप्त होता है।

2 जन्म चन्द्रमा यदि 2 या 12 भाव में अशुभ ग्रह से युक्त हो तो शनि की साढे़साती अशुभ होती है।

3 जन्म चन्द्रमा निर्बल हो तथा अशुभ भाव में स्थित हो तो शनि की साढे़साती अशुभ होती है।

4 जन्म चन्द्रमा से 2 या 12वें भाव में शुभ ग्रह हो तथा शुभ दृष्ट हो तो शनि की साढे़साती शुभ फल देती है।

5 जन्म चन्द्रमा शनि से युक्त हो, मंगल से दृष्ट न हो, तो साढे़ साती शुभ फल देती है।

6 जन्म कुण्डली में चन्द्रमा की स्थिति युत तथा दृष्टि साढे़साती शुभ फल देती है।

अष्टम शनि का ढैय्या- जब शनि चन्द्रमा से चतुर्थ भाव में जाता है तो चन्द्रमा को दशम दृष्टि से देखता है। उस समय पर भी चन्द्रमा शनि से पीड़ित हो। तो फल चन्द्र, शनि, लग्न, तारा, सप्तशलाका, दशान्तरदशा पर निर्भर करता है। इसको कष्टक शनि भी कहते हैं। इसी प्रकार शनि जब जन्म चन्द्रमा से अष्टम भाव में गोचर करता है तो शुभाशुभ फल देता है। शुभाशुभ फल का निर्णय अष्टक वर्ग, तथा तारा, दशान्तर दशा ही करेगी। यदि सर्वाष्टक वर्ग में 28 से ज्यादा शुभ बिन्दु हों तो शनि का उस भाव में गोचर, जातक को कष्ट न देकर आकस्मिक अच्छा फल देता है। कहावत है कि भले-भले को छोड़िये, खोटे ग्रह जप ध्यान वाली। बुरे दिन किसी को पूछ कर नहीं आते, जब समय अनुकूल रहता है। तब व्यक्ति प्रसन्न रहता है, परन्तु बुरा समय आने पर वह चारों ओर हाथ-पैर मारता है। येनकेन प्रकारेण अपनी स्थिति सुधरने के लिए हर संभव-असंभव प्रयास करता है। दान-दक्षिण, पूजा-पाठ, जप-तप, यंत्र-तंत्र-मंत्र करता है। साधु संन्यासी, ज्योतिषी, तांत्रिक, कोई भी हो, वह उन सब तक जा पहुंचता है। खेद! ग्रहों में शनि-मंगल-राहु पर प्रायः दोष दिया जाता है तो शनि की साढ़ेसाती को सुनकर सब का हृदय कांप उठता है। शनि, अकस्मात, कुप्रभाव देने वाला ग्रह है। अतः भय सहज स्वभाविक है। यह समय मृत्यु, रोग, भिन्न-भिन्न कष्ट, व्यवसाय हानि अपमान धोखा द्वेष, ईर्ष्या का माना जाता है।

कम श्रम अधिक लाभ, भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति, ऐश्वर्य लाभ, दीर्घायु होने व स्वस्थ रहने विघ्न-बाधाओं को नाश करने, ग्रह-शांति, कलह से मुक्ति, ईश-भक्ति, कुटुम्ब-वृद्धि, योग्य संतान उत्पन्न होने, संघर्ष से मुक्ति जैसी इच्छाएं मानव मात्र की सदैव से रही हैं। वह निरन्तर इसके लिए प्रयत्नशील रहता है। इस प्रकार शनि मानव जीवन हेतु अत्यंत ही पीड़ाकारक ग्रह है। हम चाहें तो शनि की पीड़ादायक दृष्टि से छुटकारा पा सकते हैं। कुछ तंत्र-मंत्र एवं टोटकों का उपयोग करें। शनि पीड़ितों को पुराने कम्बल या पुराने लोहे का दान, काला तिल दान, उडद दान करना चाहिए। लोहे का प्रयोग ज्यादा करना चाहिए।

शनैश्चर ग्रह की पूजन विधिः-
नवग्रहों में शनि देवता को सूर्य का पुत्र कहा जाता है। शनि देव विशाल शरीर तथा बड़े-बड़े नेत्रों वाले, कृष्ण वर्ण वाले हैं। शनि देव की साढ़े साती सभी के जीवन को प्रभावित करती है। जीवन की तीसरी साढ़े साती को पार करना बहुत भाग्य वाले को ही नसीब होता है। आरोग्य प्राप्ति, सुख शांति एवं समृद्धि के लिए शनि देव की पूजा करने से अशुभ प्रभाव नष्ट हो जाता है। शुक्ल पक्ष के प्रथम शनिवार से 21 शनिवार या कार्य पूर्ति न होने तक व्रत करें। गणेश पूजन करने के उपरान्त शनि देव का अवाह्न करना चाहिए। शनि देव की पूजा काले या नीले पुष्प से करें। शनि यंत्र की स्थापना कर शनि के मंत्रों व बीज मंत्रों से पूजन कर, शनि गायत्री मंत्र, शनि कवच व स्त्रोत का पाठ करना चाहिए। अपनी श्रद्धा व सामर्थ के अनुसार काला वस्त्र, तिल, तेल, काली उड़द व स्वर्ण का दान करें। अाठ मुखी रूद्राक्ष धारण करें, पूजन करने के बाद काले उड़द की खिचड़ी भोजन एक बार करना चाहिए।
शनि ग्रह पीड़ा निवारक यंत्र :-

ध्यान मंत्र-
ऊँ नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रहम्।
छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि श्नैश्चरम्।।

जप- ॐ शं श्नैश्चरायः नमः।
अथवा – ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः श्नैश्चराय नमः

जप संख्या – 23000

जप माला – रूद्राक्ष।

आसन – काला कम्बल।

दीपक – तिल के तेल का दीपक जलाएं।

जल पात्र – दीपक के साथ स्टील का जलपात्र रखें।

जप के लिए दिशा – पश्चिम की ओर मुख करके बैठें।

हवन करें- शमी की लकड़ी से ।

धारण करें – बिछुआ की जड़।

लाल किताब से शनि के उपचारः-

जिसके जन्मांग में चतुर्थ स्थान में शनि हो ऐसा जातक काले सांप को दूध पिलाये। भैंसे को चारा डालें। मजदूरों को भोजन खिलायें। आर्थिक अड़चन हमेशा रहती हो तो थोड़ा दूध कुएं में डालें। चतुर्थ स्थान में शनि हो तो ऐसा जातक रात को दूध न पिये दूध विषाक्त होकर शनि के द्वारा अधिक कष्ट पहुंचाता है

षष्ठ स्थान में शनि गुरु दोनों हों तो नारियल पानी में बहायें। ऐसी ग्रह स्थिति 28 वर्ष की उमर से पूर्व ही जातक का विवाह करायें। और 48 उम्र तक मकान न बनायें। संतति होने में बाधा हो तो काले सांप को दूध पिलायें और पूजा करें।

सप्तम स्थान में शनि हो, ऐसा जातक यदि मद्यपान करे तो यह मद्यपान तुरन्त बंद कर दें, अन्यथा उसका सर्वनाश कोई रोक नहीं सकता। कम से कम तीन सौ ग्राम हल्दी चालू कुएं में गुरुवार को डालें।

अष्टम स्थान में शनि हो एवं द्वितीय स्थान में अन्य कोई ग्रह न हो तो, जातक ब्याज का धंधा, कारखाना, छापाखाना, प्रिंटिंग प्रेस, तेल का व्यापार, लोहे की चीजों का व्यापार, वकालत, चमड़ा, पेट्रोल, आॅयल, मोबाइल, ग्रीस बेचने का व्यापार चुने। व्यापार से पूर्व एक मिट्टी के मटके में राई का तेल भरकर काले कपड़े से मुंह बंद करके तालाब या नदी में प्रवाहित करें। उसके बाद कृष्ण पक्ष के मध्य रात्रि में व्यवसाय का शुभ आरंभ करें। काफी धन मिलेगा।

एकादश स्थान में शनि एवं सप्तम स्थान में शुक्र हो तो ऐसा जातक बहुत ही भाग्यवान होता है। किसी भी कार्यारम्भ के पूर्व पानी से भरा घड़ा दान करें। हर शनिवार को पानी में काली हल्दी डाल कर उस पानी से स्नान करें।

जन्म कुण्डली में शनि शुभ हो, या अधिक शुभ हो तो घर में लोहे का फर्नीचर इस्तेमाल करें। भोजन में काला नमक एवं काली मिर्च का प्रयोग करें आखों में काजल या सुरमा डालें

अनिष्ट शनि की पीड़ा दूर करने के लिए एवं शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या का कष्ट निवारण के लिए भोजन के पूर्व भोजन में सब चीजें थोड़ी-थोड़ी अलग निकाल कर कौआ को खिलाओ

अनिष्ट शनि की पीड़ा दूर करने के लिए राई या तिल का तेल दान करें। शनि संतान की दृष्टि से बाधक होता हो तो, गर्भपात होता है तो, ऐसी स्त्री भोजन की थाली में से भोजन के पूर्व सब चीजें थोड़ी-थोड़ी अलग निकाल कर काले कुत्ते को खिलाये।

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नवरात्र में कलश स्थापना

नवरात्रि में कलश स्थापना का भी एक विधि-विधान होता है :-

Dr.R.B.Dhawan

(Top Best Astrologer in Delhi)

इस वर्ष :- चैत्र नवरात्र 2018, मार्च में 18 तारीख से आरम्भ हो रहे हैं। सनातन मत अनुसार चैत्र या शरद् दोनों नवरात्र के प्रथम दिन अर्थात् शुक्ल प्रतिपदा (प्रथम नवरात्र) के दिन सर्वप्रथम कलश स्थापना की जाती है।

कलश स्थापना का भी एक विधि-विधान होता है। यदि कोई परिवार इस विधि को नहीं जानता तो, नवरात्रों में किसी विद्वान पुजारी को बुलाकर भी स्थापना करवा सकते हैं। 9 दिन के इस शक्ति पर्व नवरात्रो में दुर्गा माँ के नव रूपों की पूजा की जाती है। नवरात्र के आरंभ में प्रतिपदा तिथि को उत्तम मुहर्त में कलश की स्थापना की जाती है। कलश को भगवान गणेश का रूप माना गया है जो की किसी भी पूजा में प्रथम पूजनीय हैं, महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित भविष्य पुराण में बताया गया है की कलश स्थापना के लिए सबसे पहले पूजा स्थल को साफ-सुथरा करके शुद्ध किया जाना चाहिए। उसके उपरान्त एक लकड़ी का पाटे पर लाल कपडा बिछाकर उस पर थोड़े अक्षत् (चावल) गणेश भगवान को याद करते हुए रखने चाहिए, फिर जिस जगह कलश को स्थापित करना है, उस जगह बालु मिश्रित मिट्टी रख कर उसमे जौ बो देने चाहियें, फिर इसी मिट्टी पर कलश स्थापना करनी चाहिए। कलश में पवित्र (शुद्ध) जल भरकर रोली से स्वास्तिक और ॐ बनाकर कलश के मुख पर मोली से रक्षा सूत्र बांध दें, कलश में सुपारी, और एक सिक्का डालकर आम या अशोक के पत्ते रख दें, और फिर कलश के मुख को ढक्कन से ढक देना चाहिए। ढक्कन को चावल से भर दें, ढक्कन के ऊपर या पास में ही एक नारियल लाल चुनरी से लपेटकर रक्षा सूत्र से बांध देना चाहिए। इस नारियल को कलश के ढक्कन रखते समय सभी देवी देवताओं का आवाहन करें, और अंत में दीपक जलाकर कलश की पूजा करें। अंत में कलश पर फूल और मिठाइयां चढ़ा दे। इस प्रकार हर दिन नवरात्रों में इस कलश की पूजा करें।

किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य के लिए देव पूजा में साधक द्वारा पूजा सामग्री के साथ-साथ अन्य कई वस्तुओं का उपयोग भी किया जाता है। जैसे-जल, पुष्प, दीपक, घंटी, शंख, आसन, कलश आदि, जिनका अलग-अलग एक विशिष्ट महत्व एवं प्रतीकात्मक अर्थ होता है। इनमें कलश या कुंभ की भारतीय संस्कृति में एक कल्पना की गई है। कुंभ को समस्त, ब्रह्माण्ड का प्रतीक माना गया है, क्योंकि ब्रह्माण्ड या आकाश भी घट के समान है। इसको इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि घट में समस्त सृष्टि का समावेश है। इसी में सभी देवी-देवता, नदी-पर्वत, तीर्थ आदि उपस्थित रहते हैं-

कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रूद्रः समाश्रितः। मूले तवस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः।। कुक्षौ तु सागराः सर्वे, सप्तद्वीपाः वसुन्धरा।

ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः।।
अंगैश्च सहिताः सर्वे कलशन्तु समाश्रिताः।
अत्र गायत्री सावित्री, शांति-पुष्टिकरी सदा।।
त्वयि तिष्ठन्ति भूतानि, त्वयि प्राणाः प्रतिष्ठिताः।
शिवः स्वयं त्वमेवासि, विष्णुस्तवं च प्रजापतिः।।
आदित्या वसवो रूद्रा, विश्वेदेवाः सपैतृकाः।
त्वयि तिष्ठन्ति सर्वेऽपि, यतः कामफलप्रदा।।
त्वत्प्रसादादिमं यज्ञं, कर्तुमीहे जलोद्भव।
सान्निध्यं कुरू मे देव! प्रसन्नो भव सर्वदा।।

अतः नवरात्र के अतिरिक्त भी (किसी भी) पूजा, पर्व व संस्कार में सबसे पहले कलश स्थापना करने का विधान है। कलश स्थापना तथा पूजन के बिना कोई भी मंगल कार्य प्रारंभ नहीं किया जाता है। कलश स्थापना का भी एक विधान है। इसे पूजा स्थल पर ईशान कोण में स्थापित किया जाना चाहिए। प्रायः कलश ताम्बे का ही सर्वोत्तम माना गया है। यदि यह उपलब्ध न हो तो मिट्टी का भी प्रयोग में लिया जा सकता है। सोने व चांदी का भी कलश प्रयोग में ले सकते हैं। शास्त्रों में कलश कितना बडा या छोटा हो इसका भी वर्णन मिलता है। मध्य में पचास अंगुल चौडा और सोलह अंगुल ऊंचा, नीचे बारह अंगुल चौडा और ऊपर से आठ अंगुल का मुख रखें तो यह कलश सर्वश्रेष्ठ माना गया है। सामान्यता कलश को जल से भरा जाता है, परन्तु विशेष प्रयोजन में किए जाने वाले अनुष्ठानों में विशेष वस्तुए भी रखे जाने का विधान है:-

धर्म लाभ हेतु अनुष्ठान किया जा रहा हो तो कलश में जल के स्थान में यज्ञ भस्म का प्रयोग होता है। धन के लाभ हेतु मोती व कमल का प्रयोग करते है, विषय भोग हेतु गोरोचन, मोक्ष हेतु वस्त्र, युद्ध अथवा मुकदमें में विजय के लिए अपराजिता का प्रयोग करते हैं। किसी का उच्चाटन करना हो तो व्याघ्री (छोटी कटेरी), वशीकरण के लिए मोर पंखी, मारण हेतु काली मिर्च तथा आकर्षण करने हेतु धतूरा भरने का विधान है।

कलश को भूमि पर नहीं रखना चाहिए। इसको रखने से पूर्व भूमि की शुद्धि करना आवश्यक है। फिर बिन्दू षटकोण अष्टदल आदि बना कर उसके ऊपर कलश की स्थापना करनी चाहिये अथवा इसे धान्य (जौ) के ऊपर भी रखा जा सकता है। कलश उपरोक्त में से किसी भी पदार्थ से भरकर विभिन्न देवताओं का कलश में आवाहन किया जाता है। इसके पश्चात प्रधान देवता (जिसकी आराधना या अनुष्ठान किया जाना है) का आवाहन किया जाता है। साथ ही नवग्रहों एवं पितरों की स्थापना की जाती है, तत्पश्चात ही मांगलिक कार्य का शुभारम्भ किया जाता है।

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