कर्म और भाग्य

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant)

कर्म और भाग्य का सम्बन्ध अटूट है, कर्म जैसे रहे हों भाग्य भी वैसा ही होगा, कर्म कैसे किये हैं, जिस कारण भाग्य ऐसा बना है? यह जातक की जन्मकुंडली (कर्म कुंडली) से सांकेतिक भाषा से पता चलता है।
मनुष्य को सामान्य सफलतायें यद्यपि पुरूषार्थ से मिल जाती हैं। लेकिन असाधारण सफलतायें पुरूषार्थ के साथ-साथ भाग्य की देन हैं। जातक की जन्म पत्रिका उसके संचित कर्मो का अभिलेखा होती है। क्योंकि व्यक्ति का जन्म उसके पूर्व जन्मार्जित कर्म फल भोग के लिये होता है। व्यक्ति के जन्मांग के 12 भाव 12 राशियों का प्रतिनीधित्व करते हैं। तथा उनके स्वामी ग्रह (7 ग्रह) भावेश कहलाते हैं। वे कुंडली में अपनी स्थिति के अनुसार शुभाशुभ फल देते हैं। ये ग्रह क्रमशः लग्नेश, धनेश, पराक्रमेश, सुखेश, पंचमेश, ऋणेश, सप्तमेश, अष्टमेश, भाग्येश, कर्मेश (राज्येश) लाभेश एवं व्ययेश कहलाते हैं।
चन्द्र, बुध, गुरू, शुक्र को सौम्य ग्रह कहा गया है। सूर्य, मंगल, शनि एवं राहु, केतु को पाप ग्रह कहा गया है। सौम्य ग्रह केन्द्र एवं त्रिकोण में बैठकर जीवन को सुखद बनाते हैं। पाप ग्रह जहाँ बैठते हैं, वहाँ हानि करते हैं। प्रत्येक ग्रह अपने से सातवें भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है, लेकिन गुरू, राहु, केतु को पाँचवी, नौवीं भी पूर्ण दृष्टि होती है। इसी प्रकार मंगल की चौथी और आठवीं भी पूर्ण दृष्टि होती है। तथा शनि की तीसरी और दसवीं भी पूर्ण दृष्टि होती है। ज्योतिष के दो सिद्धान्त देखें, स्थान वृद्धि करे शनि, दृष्टि वृद्धि करो गुरू।‌ इस के अलावा जो भाव अपने स्वामी से दृष्ट होगा। वह ग्रह उस भाव की वृद्धि होगी। ग्रह स्वराशि, उच्च राशि, मित्र राशि, नीच राशि, एवं शत्रु राशि में स्थिति अनुसार अपना शुभाशुभ फल देते हैं। वक्री ग्रह भी अपनी प्रकृति अनुसार फल देते हैं। जन्म कुंडली में ग्रह जिस राशि में है, यदि नवांश कुंडली में भी वह ग्रह उसी राशि में हो तो श्रेष्ठ फल देता है। जन्म कुंडली के एक, चार, सात एवं दसवां भाव केन्द्र भाव कहलाते हैं। तथा पाँचवां एवं नौवां भाव त्रिकोण और छठा, आठवां एवं बारहवाँ भाव त्रिक भाव होते हैं। तृतीय एकादश भाव को उपचय कहा जाता है।
जन्म लग्न की भाँति चन्द्र लग्न एवं सूर्य लग्न को भी पृथक महत्व दिया गया है। चलित गोचर ग्रह फल के लिये तो चन्द्र लग्न ही प्रमुख है। इस प्रकार तीनो लग्नों, चलित ग्रह, नवांश, विंशोत्तरी महादशा आदि का समन्वय युक्त फल कथन ही सही बैठता है।
जन्म कुंडली का दूसरा भाव धन संचय का, चौथा भाव अचल सम्पति का दशम भाव कमाई का/तनख्वाह का, ग्यारहवां भाव दिन प्रतिदिन के लाभ का तथा पाँचवे एवं नौवे भाव एकाएक सम्पत्ति लाभ के माने जाते हैं। छठे भाव से रोग, ऋण एवं शत्रुता का विचार करते हैं। आठवें भाव से दरिद्रता एवं द्वादश भाव से व्यय तथा हानि देखते हैं। पाप ग्रह अपनी प्रकृति के अनुसार फलनाश करते हैं। वहीं सौम्य ग्रह केन्द्र एवं त्रिकोण में स्थित होकर जीवन को सुखमय बनाते हैं। यदि स्थिति उल्टी हो अर्थात शुभ ग्रह त्रिक स्थानों मे हों और अशुभ ग्रह केन्द्र त्रिकोण मे हों तो निश्चित ही व्यक्ति का जीवन अत्यंत संघर्षमय हो जाता है। ज्योतिष विज्ञान इस तथ्य को प्रमाणित करता है। कि व्यक्ति उच्च ग्रहों की महादशा में जन्म जन्मांतर में किये गये सत्कर्मो का फल भोगता है। और नीच ग्रहों की दशा में पूर्व जन्मार्जित दुष्कर्मो का स्वराशि एवं वर्गोतमी ग्रहों की महादशा में उस जन्म के कर्मो का फल भी मिलता है। जन्मांग गत ग्रह हमारे कर्म फलभोग की सूचना देते हैं।
यदि चन्द्र लग्न एवं सूर्य लग्न पाप ग्रहों के मध्य पाप कर्तरी योग बनायें तो जीवन घोर संघर्ष युक्त रहता है। और वहीं यदि ये लग्ने शुभ मध्यत्व (अर्थात सूर्य लग्नः चन्द्र लग्न के दोनों ओर शुभ ग्रह हों) में हों तो जातक सामान्य परिश्रम प्रयास से ही अच्छी सफलता पा लेता है। यदि धनेश एवं लाभेश दोनों छठे भाव में स्थित हों तो व्यक्ति जीवन भर ऋण भार से दबा रहता है। यदि लग्नेश एवं नवमेश में भाव परिवर्तन हो तो व्यक्ति भौतिक उन्नति के साथ आध्यात्मिक उन्नत्ति भी करता है। चन्द्र एवं गुरू एक दूसरे से सम-सप्तक हों तो व्यक्ति दूसरे के धन का सुखोपभोग करता है। वैसे भी चन्द्र से गुरू का केन्द्र में होना गज केसरी राज योग देता है। और व्यक्ति शासकीय सेवा से जुड़ता है। यदि द्वितीय, पंचम, नवम, दशम एवं लाभ भाव में उच्च राशि के ग्रह विशेषतः शुक्र या केतु हों तो व्यक्ति को अचानक धन लाभ देते हैं। ये ग्रह अपनी दशा एवं महादशा तथा गोचर में श्रेष्ठ स्थिति बनने पर अवश्य लाभ देते हैं। ग्रहों का भाव परिवर्तन फलो में वृद्धि करता है, यथा लाभेश दूसरे भाव में हो और द्वितीयेश लाभ भाव में हो तो व्यक्ति की सुख-समृद्धि बढ़ती रहती है। छठे, आठवें, बारहवें भाव के स्वामियों की दशा में खर्चे अधिक एवं आय कम हो जाती है। केन्द्र एवं त्रिकोण स्थित ग्रहों की महादशा में आय-व्यय का श्रेष्ठ संतुलन बना रहता है। गुरू एवं शुक्र की महादशा उचित एवं न्यायिक मार्गों से धन देती है। वहीं शनि एवं राहु दो नम्बर के मार्ग से धन लाभ कराते हैं। यदि दशम भाव में राहु अपनी उच्च राशि में हो तो अपनी महादशा में व्यक्ति को करोड़ों रूपयों का लाभ देता है। महादशा के साथ अन्तर्दशा पर भी गौर करें यदि अन्तर्दशा का स्वामी ग्रह महादशा के स्वामी से छठा, आठवां, बारहवां हो तो धन प्राप्ति में बाधाये आती हैं। यदि अन्तर्दशा का स्वामी महादशा नाथ से दूसरा हो तो धन संग्रह होता है। चतुर्थ होने पर अचल संपत्ति का लाभ एवं वृद्धि देता है। त्रिकोण होने पर आकस्मिक लाभ तथा दसवें होने पर राज्य से लाभ देता है। लाभेश की महादशा प्रचुर धन लाभ देती है।
यज्जातकेषु द्रतिणं प्रदिष्टं या कर्म वार्ता कथिता ग्रहस्य। आलोक योगोद् भावंज, तत्सर्व कृतिन्योजय तद् दशायाम।।
अर्थात् ग्रहों के जो द्रव्य, आजीविका, वर्ण, स्वभाव, दृष्टि तथा योगज फल कहे गये हैं। वे सब फल उन ग्रहों की दशा अन्तर्दशा में धटित होते हैं। यदि लग्नेश छठे, आठवें, बारहवें, भाव को छोड़कर कहीं विद्यमान हो तो मनुष्य राजाओं द्वारा सम्मानित होता है। लग्नेश की स्थिति शुक्र के साथ होना अनिवार्य है। दशमेश से लग्नेश का सम्बन्ध राजयोगकारी कहा गया है। यदि दोनों ही बलशाली हों, क्रूर ग्रहों के प्रभाव से मुक्त हों तो अवश्य ही राज पद की प्राप्ति होती है। दशम भाव में लग्नेश तथा लग्न में दशमेश होने से व्यक्ति बहुत सी भूमि का स्वामी धन एवं सौन्दर्य के कारण विख्यात् तथा बहुत धन सम्पत्ति का स्वामी होता है। एकादश स्थान में लग्नेश तथा लग्न में एकादशेश व्यक्ति को राजा एवं दीर्घायु बनाता है।
लग्नाधीशेऽर्थगेचेद् धन भवन पतौ लग्नयातेऽर्थवान् स्यात्। बुध्या चार प्रवीणः परम सूकृत्कृत्सारभृद् भोग शलीः जातकंलकार।।
लग्नेश धन भाव में धनेश लग्न में होने पर जातक धनी, बुद्धि से आचरण करने वाला धार्मिक अच्छे कार्य करने वाला यथार्थवान एवं भोगी होता है। राहु-केतु के नाम से लोग भयभीत रहते हैं। लेकिन:-
केन्द्रऽथवा कोण गृहे वसेतां, तमोग्रहावन्य तरेज चाँदि। नाथेन सम्बन्धवशाद् भवेतां, तौ कारकावुक्तमि हेति विज्ञै।।
यदि राहु-केतु केन्द्र या त्रिकोण में स्थित हो तथा उनका दूसरे केन्द्र से या त्रिकोण से सम्बन्ध हो अथवा केन्द्र में होते हुये त्रिकोणेश से या त्रिकोण में रहते हुये केन्द्रेश से सम्बन्ध हो तो ये उत्तम योग कारक होते हैं। या तीसरे, छठे, ग्यारहवें भाव में हो तो इनकी दशा शुभ फल देती है। वक्री ग्रह की दशा में धन, स्थान और सुख हानि होती है। व्यर्थ भ्रमण एवं सम्मान हानि भी होती है। मार्गी ग्रह की महादशा धन, सम्मान, सुख, यशवृद्धि एवं श्रेष्ठ आजीविका दायक होती है। यदि पंचमेश एवं नवमेश केन्द्र में हो तथा बुध, चन्द्र व गुरू द्वारा दृष्ट हो तो जातक धनी, सुखी, संतुष्ट एवं धर्मात्मा होता है। लग्न के नवांश का स्वामी और नवमेश दोनों परम उच्चांश में हो, और लाभेश बलवान हो तो, व्यक्ति के पास अटूट सम्पत्ति होती है। नवम भाव में सूर्य, गुरू तथा दशम भाव में मंगल बुध हो तो जातक राज्य में सर्वोच्च पद पाता है। सर्व दृष्टि से सुखी एवं सम्पन्न रहता है। यदि लग्न को छोड़कर सभी ग्रह परस्पर त्रिकोण भाव में स्थित हो या लग्नेश बली होकर केन्द्र में हो तथा चतुर्थेश लग्न में हो और शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो जातक भूमिपति बनता है। भूमि से ही अथाह लाभ पाता है।
इस प्रकार व्यक्ति के जन्मांग में अनेकानेक सूयोग्य- कूयोग उसके जीवन का संचालन करते हैं। हमारे शुभ कर्म हमें सुयोग्य तथा अशुभ कर्म कुयोग प्रदान करते हैं। कर्म ही हमारे भाग्य का निर्माण करते हैं। कर्म फल भोग का सिद्धान्त होने से व्यक्ति के पूर्व जन्मार्जित कर्म ही वर्तमान भाग्य का निर्धारण करते हैं। रीति-नीति धर्माचरणा तथा देवी-देव पूजा, जप, अनुष्ठान दानादि के द्वारा कुयोगों के दुष्परिणामों से बचा जा सकता है। तथा सूयोगों को बलवान बनाकर पूर्ण लाभ लिया जा सकता है।

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त्राटक

त्राटक एक यौगिक क्रिया या साधना है, त्राटक कहते हैं- बिना पलक झपके एकटक किसी वस्तु या व्यक्ति की ओर देखते रहने को, यह साधना मन को एकाग्र और केन्द्रित करने के लिये बहुत उपयोगी है। वस्तुत: मन को एकाग्र करना ही मनुष्य के लिये सब से कठिन कार्य है। मन की शक्ति आपार है, इस शक्ति को यदि ठीक प्रकार से समझकर (संंगठित करके) सही दिशा में प्रयोग किया जाये तो मनुष्य ऐसे-ऐसे आश्चर्यजनक कार्य करने लगता है, जिनके परिणाम भौतिक अविष्कारों से भी अधिक महत्व के होते हैं, तथा लौकिक व अलौकिक सिद्धियाँ भी प्राप्त हो सकती हैं, जिनका प्रयोग कर साधक एक महान विभूति की तरह सम्मानित हो सकता है।

कैसे करें त्राटक साधना- मनुष्य के मन में एक पल में सैकडों विचार आते हैं (यह मानव मस्तिष्क की कार्य प्रणाली है।) और वे सैकडों विचारों पर एक समय में कार्य नहीं कर सकता। अतः उनमें से अधिकांश विचार निरर्थक हो जाते हैं, यदि उनमें से मस्तिष्क दो चार विचार चुन लेता है, तो फिर यह निर्णय करता है कि इनमें से कौन सा विचार उत्तम है? कौन सा गलत है? परंतु आमतौर पर इसमें भी वह सही या गलत का चुनाव नहीं कर पाता, तब वह असमजस की स्थिति में रहता है, और परिणाम स्वरूप कोई भी कार्य नहीं कर पाता। क्योकि उसका आज्ञाचक्र सक्रीय नहीं होता, और यदि उसका आज्ञाचक्र सक्रीय हो, तब क्या हो? तब वह हर उस विचार और उसके परणाम की बखूबी पहचान कर लेगा जो उसके लिये विशेष उपयोगी हो सकता है। यदि ऐसा करने में साधक सफल होता है तो एक दिन वह साधारण साधक से एक ऐसी विभूति के रूप में परिवर्तित होगा कि लाखों लोगों को मार्गदर्शन करेगा। और यह तभी संभव है जब वे अभ्यास के द्वारा अपना आज्ञाचक्र सक्रीय कर ले, इसके लिये सर्वोंत्तम यौगिक क्रिया है- त्राटक त्राटक साधना। त्राटक एकमात्र वह यौगिक क्रिया है, जिससे द्वारा साधक आज्ञाचक्र पर तो विजय पा ही सकता है, साथ ही साथ वह प्रकृति के अनेक रहस्यों का ज्ञान भी अर्जित कर सकता है। यह आज्ञाचक्र मानव शरीर में दोनो भ्रकुटियों के मध्य में एक महत्वपूर्ण ग्रन्थि है, जो कि अन्य चक्रों की तरह
लगभग सुप्तावस्था में ही रहती है, जिसके सक्रीय हो
जाने पर साधक न केवल अपने ही नहीं अपितु दूसरों के भविष्य में भी झाँक सकता है। वे जान सकता है कि उसके सामने वाले व्यक्ति के मन में क्या चल रहा है? वे जान सकता है कि कौन उसके लिये भविष्य में कैसे काम आ सकता है। कौन उसके प्रति कैसे विचार रखता है। आने वाले समय में किस प्रकार की योजना उसे सफलता के शिखर तक ले जा सकती है। यहां तक की उसके आस-पास किस प्रकार की विचार धारायें अथवा अशरीरी आत्मायें भ्रमण कर रही हैं, वह उसके लिये किस प्रकार से सहायक हो सकती हैं? अथवा उनसे किस प्रकार कोई जनहित का कार्य करवाया जा सकता है? यह सभी कुछ तभी संभव है
जब सुप्त आज्ञाचक्र को सक्रिय किया जाये। जब इस
चक्र को सिद्ध (स्क्रीय) कर लिया जाये तब त्राटक का अभ्यास सहज है, और इस चक्र को सिद्ध करने के लिये यह बहुत ही उपयोगी और सरल मार्ग है, सरल यौगिक क्रिया है।
कैसे करें त्राटक का अभ्यास?- एक सफेद रंग के कागज में एक रूपये के सिक्के जितना बडा और गोल छेद कर लें, इस छेद को कागज के पीछे से एक पीले कागज को चिपकाकर बंद कर दें, आगे से देखने पर पीले रंग की एक गोल बिन्दी दिखाई देगी, अब इस गोल पीली बिन्दी में बीचोबीच एक काली मिर्च के आकार का काले रंग से निशान बना लें बस इसी काले निशान पर ही आप की दृष्टि रहेगी। एक दूसरे प्रकार के अभ्यास में यही काले निशान वाली पीली बिन्दी एक दर्पण पर भी चिपका सकते हैं, इस सफेद कागज अथवा दर्पण को अपने से दो फुट के फासले पर ऐसे टांग दें कि काला बिन्दु बिल्कुल आपकी आंखों के सामने पड़े और इस काले बिन्दु को पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर स्थिर दृष्टि से देखने का अभ्यास करें।
दाहिने नेत्र में काल का, बायें नेत्र ने शक्ति का और शिव नेत्र (त्रिकुटी में) ब्रह्म का निवास है। शिव नेत्र से विचार उत्पन्न होता है। दाहिने नेत्र से इच्छा पैदा होती है और बांये नेत्र से क्रिया उत्पन्न होती है। पद्मासन से बैठो, नेत्रों को बंद करो, जीभ को तालु की ओर चढ़ा लो, अपने ध्यान को दोनों भृकुटियों के मेल के स्थान से (अर्थात् नाक की जड़ से) दो अंगुल ऊपर भू्रमध्य पर जमाओ, यह ध्यान सिर के बाहरी भाग पर न होना चाहिए। (आज्ञाचक्र पर) ध्यान के समय शिवमंत्र (ऊँ नमः शिवाय) का मन से जाप करना चाहिए। ऐसा करने से धीरे-धीरे मन स्वयं एकाग्र हो जाता है, और साधक का दिव्यचक्षु खुल जाता है, उसको सब स्थानों की घटनाएं दिखलाई पड़ने लगती हैं, और देव-दर्शन प्राप्त होता है। अभ्यास के समय जो विचार या दृश्य ध्यान में आये उसे प्रभु का छद्मवेश समझो, उसे भी प्रभु ही मानों, ब्रह्ममय मानो जो कुछ भी लीलायें आप ध्यान में देखें या समझें ऐसा समझें कि वह क्रियाएं आप प्रभु के साथ ही कर रहे हैं। ऐसा करने से प्राण स्थिर होकर ब्रह्मनाद भी सुनाई देगा, ब्रह्मनाद दाहिने कर्ण में सुनाई देता है, सद्गुरु भी दाहिने ही कान में मंत्र फूंकते हैं, ब्रह्मनाद का दूसरा नाम परा है।
त्राटक करने से आरम्भ में उष्णता के कारण आंखों से गरम पानी जायेगा, उसे जाने दे, बंद न करें लगभग एक सप्ताह के अंदर ही पानी का जाना बंद हो जावेगा, पानी से यदि आंखें बीच में ही बंद हो जायें तो कोई हर्ज नहीं, आंखें पोंछकर फिर से अभ्यास आरंभ करे, चित्त-वृत्ति को स्थिर करके बिना पलक गिराये, जितनी अधिक देर तक अभ्यास किया जा सके उतना ही अधिक लाभप्रद होगा। पहले प्रतिदिन दस पन्द्रह मिनट ही अभ्यास करें, पीछे धीरे-धीरे घंटा सवा घंटे तक का अभ्यास बढ़ा लें, जब आधे घंटे तक चित्त को स्थिर रखकर बिना पलक गिराये एकाग्र दृष्टि से देखने का अभ्यास हो जाता है तब इष्टदेवता के दर्शन होते हैं और अनेक चमत्कार दीखाई पड़ने लगते हैं, लेकिन साधक को चाहिए कि इन चमत्कारों में न पड़कर भगवत्स्वरूप की भावना को ही दृढ़ रखकर उसका प्रत्यक्ष होते ही उसमें तन्मय हो जायें, उसी में लीन हो जायें। यदि पलकों पर अधिक तनाव प्रतीत हो तो पलकों पर जोर देकर भौंहाें को कस दें, इससे आंखें अधिक देर तक खुली रहेंगी।
बहुत अभ्यास हो जाने के पश्चात् बिन्दु-ज्योतिर्बन्दु, त्रिकुटि (भ्रुमध्य) या नासाग्र पर स्थिर दृष्टि से अभ्यास करना बहिर्मुख (बाह्य) त्राटक कहलाता है। हृदय अथवा भू्रमध्य में नेत्र बंद रखकर एकाग्रता पूर्वक चक्षुवृत्ति की भावना करने को अन्तरत्राटक कहते हैं। इन अन्तत्राटक और ध्यान में बहुत समानता है। भ्रुमध्य में त्राटक करने से आरंभ में कुछ दिनों तक सिर में दर्द हो जाता है, तथा नेत्र को बरौनी में चंचलता प्रतीत होने लगती है, परन्तु कुछ दिनों के पश्चात् नेत्रवृत्ति में स्थिरता आ जाती है, हृदय प्रदेश में वृत्ति की स्थिरता के लिए प्रयत्न करने वालों को ऐसी प्रतिकूलता नहीं होती।
त्राटक के बाद आंखों को इधर-उधर ऊपर नीचे घुमाकर कुच्छ समय तक देखने का अभ्यास करना चाहिए ताकि आपकी दृष्टि बाईं और स्थिर रहे, बाईं ओर देखने से दिमाग कमजोर नहीं होता, त्राटक के बाद अंखों को गुलाब जल से धो लिया करें, इससे नेत्रों को तरावट मिलती है। प्रारंभ में त्राटक करने से शीघ्र थकावट हो जाती है, थक जाने पर आंखें बंद कर लें और त्राटक करें, अंतर त्राटक से संयम सिद्ध होती है, यह षटचक्रों पर, इष्ट पर, बीजमंत्र या यंत्र पर भी किया जाता है। इस त्राटक में संयम सिद्धि का लक्षण है। वास्तव में त्राटक का अनुकूल समय रात्रि के दो से पांच बजे तक है शांति के समय चित्त की एकाग्रता बहुत शीघ्र होने लगती है। त्राटक के अभ्यास के समय मुुंह बंद रखिये, परन्तु दांत छू न जाये, जीभ न ऊपर लगे न नीचे, मुख के अंदर उसकी नोंक खड़ी कर दीजिए, आपका मन स्थिर हो जायेगा।
सुखासन में (जिसे जिस आसन का अभ्यास हो) बैठकर मस्तक, गर्दन, पीठ और उदर बराबर सीधे रख, अपने शरीर को सीधा करके बैठें, इसके बाद नाभि-मण्डल में (तोंद की जगह) दृष्टि जमाकर कुछ देर तक पलक न झपकें। नाभि स्थान में दृष्टि और मन रखने से मन स्थिर होता जायेगा। इसी भाव में नाभि के ऊपर दृष्टि और मन लगाकर बैठने से कुछ दिन के बाद मन स्थिर होगा, मन स्थिर करने का त्राटक जैसा सरल उपाय दूसरा और नहीं है।

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नीलम Neelam धारण

नीलम कब धारण करें-

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नीलम रत्न शनि ग्रह का रत्न है, यह रत्न नवरत्नों में से एक और मूल्यवान तथा अति प्रभावशाली रत्न है, शनि ग्रह का प्रतिनिधि यह रत्न चमत्कारी और तुरंत अपना प्रभाव प्रकट करने वाला, किस्मत पलटने की ताकत रखने वाला माना गया है।
इस रत्न के विषय में लोक मान्यता यह है कि, यह रत्न विरले ही किसी जातक को अनुकूल बैठता है। जिस किसी को अनुकूल बैठता है, उसकी किस्मत ही पलट देता है। यह रत्न रंक से राजा भी बना देता है, और अनूकूल नहीं बैठने पर राजा से रंक भी बना देता है।
मैने अनेक ऐसे जातकों को नीलम धारण करने की सलाह दी है, जिनकी जन्म कुंडली में शनि ग्रह योगकारक है, अथवा योगकारक होकर शुभ ग्रहों के साथ युति बना रहा है, या फिर योगकारक होकर शुभ स्थान में स्थित है।

वस्तुत: मैंने नीलम धारण करवाने के बाद उन जातकों के जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन देखा है। उनमें से कुछ तो आर्थिक संकट के चलते न केवल अपना व्यापार ही बंद कर चुके थे, बल्कि भयंकर कर्ज से दबे हुये भी थे, और कुछ का व्यापार बंद होने के कागार पर था। कुछ लोग ऐसे भी थे जो नौकरी-पेशा थे, और अपने अधिकारियों से तंग आकर नौकरी छोड चुके थे, उनके सामने भी भयंकर आर्थिक संकट मंडरा रहा था। ऐसी स्थिति में कुंडली का पूर्ण विश्लेषण करने की आवश्यकता होती है, मैंने अपने 32 वर्ष के अनुभव से और ज्योतिष के मूल सिद्धांतों को कुंडलियों पर लागू करने के बाद ही कहा कि, जातक की कुंडली में शनि ग्रह विशेष स्थिति में स्थित है। इस लिये नीलम धारण करने से न केवल समस्या का समाधान होगा अपितु अत्यंत आर्थिक सहायता भी प्राप्त होगी।
नीलम धारण करने के मामले में पहले किसी दीर्घ-अनुभवी विद्वान ज्योतिषाचार्य से सलाह अवश्य लेनी चाहिये। क्योकि कभी-कभी शनि ग्रह का चमत्कारी रत्न ‘‘नीलम’’ शनिग्रह जैसे क्रूर स्वाभाव को भी धारक पर प्रकट कर देता है, इसी लिये विशेष परिस्थितीयों में ही तथा शनि ग्रह की अनुकूलता प्राप्त करने के लिये ‘‘नीलम रत्न’’ धारण करने की सलाह अवश्य दी जाती है।

कब धारण करें नीलम :-
नीलम के विषय में मेरा अपना पिछले 32 वर्ष का अनुभव रहा है कि, नीलम रत्न केवल वृष एवं तुला लग्न वालों को ही धारण करना चाहिये, वह भी कुंडली का पूर्ण विश्लेषण के उपरांत क्योकि तुला लग्न के लिये शनि चतुर्थेश-पंचमेश होता है, और वृष लग्न के लिये शनि नवम और दशम स्थान का स्वामी होकर योगकारक ग्रह कहलता है। परंतु वृष-तुला लग्न में जब शनि की स्थिति कुंडली के किसी केन्द्र या त्रिकोण स्थान में हो। जैसे-

1. वृष लग्न की कुंडली में नवमेश-दशमेश शनि की स्थिति यदि नवम स्थान में हो, तो (शनि इस लग्न में केन्द्र-त्रिकोण नवम-दशम दोनो स्थान) का स्वामी होगा, और नवम स्थान में स्वगृही (अपनी मकर राशि) में योगकारक स्थित में होने के कारण अत्यंत शुभ फल प्रकट करेगा। परंतु इस शुभ योग के लिये शर्त यह है कि इस स्थान में शनि के साथ कोई पाप स्थान का स्वामी ग्रह स्थित नहीं होना चाहिये, अथवा कुंडली के इस स्थान में शनि वक्री नहीं होना चाहिये। यदि शनि नवम में वक्री या किसी पाप स्थान के स्वामी के साथ स्थित होगा, तब शनि रत्न नीलम का अशुभ फल होगा अथवा नीलम धारण के शुभ प्रभाव में कमी हो जायेगी। वृष लग्न की कुंडली में नवम भाव स्थित शनि के शुभ प्रभाव में कमी तब भी होती है, जब शनि ग्रह अपनी इस राशि में वाल्यावस्था, कुमारावस्था, वृद्धावस्था अथवा मृतावस्था में हो। वृष लग्न और नवम भाव में पाप युक्त या वक्री स्थिति में शनि नहीं है, तब भी अवस्था देखना आवश्यक है।

शनि की अवस्था (शनि की स्थिति वृष या तुला लग्न तथा कुम्भ राशि में) –

बाल्यावस्था- में शनि (24 से 30 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 25 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
कुमारावस्था- में शनि (18 से 24 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 50 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
युवावस्था- में शनि (12 से 18 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 100 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
वृद्धावस्था- में शनि (06 से 12 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 50 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
मृतावस्था- में शनि (00 से 06 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 25 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।

शनि की अवस्था- (शनि की स्थिति वृष या तुला लग्न तथा मकर राशि में) –

मृतावस्था- में शनि (00 से 06 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 25 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
वृद्धावस्था- में शनि (06 से 12 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 50 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
युवावस्था- में शनि (12 से 18 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 100 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
कुमारावस्था- में शनि (18 से 24 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 50 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।
बाल्यावस्था- में शनि (24 से 30 अंश) की स्थिति में हो, तब नीलम धारण से 25 प्रतीशत ही शुभफल की प्राप्ति होगी।

2. वृष लग्न की कुंडली में दशम स्थान कुम्भ राशि (मूल त्रिकोण राशि) का शनि न केवल योगकारक होता है, मकर से अधिक शुभ फल प्रदान करता है। इस कुम्भ राशि में दशम (केन्द्र) में स्थित शनि भी यदि किसी पाप स्थान के स्वामी के साथ स्थित नहीं, वक्री नहीं है, और युवावस्था में भी है, शनि ग्रह शुभ व बलवान माना जाता है, और नीलम धारण करने वाले धारक को अत्यंत शुभफल की प्राप्ति होती है। परंतु यदि अवस्था में भी कमजोर हो, तो तब यह शनि का रत्न नीलम पूर्ण शुभ फल नहीं देता, अपितु नीलम धारण करने वाले को न्यून शुभफल ही प्राप्त होता है।

3. तुला लग्न की कुंडली में शनि चतुर्थ व पंचम स्थान का स्वामी होकर योगकारक होता है, इस लिये तुला लग्न वाले जातक की कुंडली में शनि की स्थिति यदि चतुर्थ या पंचम में हो, और शनि ग्रह के मार्गी तथा युवावस्था में होने पर जातक नीलम धारण करके 100 प्रतीशत शुभ फल प्राप्त करते हैं। तथा बाल्य, कुमार, वृद्ध और मृत अवस्था में अथवा शनि ग्रह का पाप स्थान के स्वामी से सम्बंध अथवा शनि के वक्री होने पर शुभ फल में कमी हो जाती है।
विशेष– वृष तथा तुला लग्न वाले जातक के लिये शनि की स्थिति इन दो स्थानों (नवम-दशम अथवा चतुर्थ-पंचम स्थान) के अतिरिक्त भी (कुंडली के अन्य भावों में) शुभ हो सकती है, परंतु वह स्थिति कितनी शुभ या अशुभ होगी, कुंडली के अन्य ग्रहों की स्थिति के अनुसार ही निर्णय किया जा सकता है। अतः नीलम धारण से शुभाशुभ फल प्राप्त हो सकता है, अथवा नहीं? यदि शुभफल प्राप्त हो सकता है, तो कितने प्रतीशत? इस शुभाशुभ का निर्णय कुंडली का पूर्ण विश्लेषण करने के पश्चात ही हो सकता है।

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तेरह मुखी रूद्राक्ष, 13 Mukhi Rudraksha

तेरह मुखी रूद्राक्ष, 13 Mukhi Rudraksha Nepal, 13 Mukhi Rudraksha Original Nepal –

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तेरह मुखी रूद्राक्ष में तेरह धारियाँ होती हैं, तेरह मुखी रूद्राक्ष, साक्षात इंद्र का स्वरूप है, तथा सम्पूर्ण कामनाओं को देने वाला है, कहा गया है कि इन्द्र देव ने अपना साम्राज्य खोने के बाद बृहस्पति देव और ब्रह्माणों की सलाह पर त्रयोदश मुखी रूद्राक्ष धारण किया, और अपना राज्य और सम्मान वापस पाया। हिमालय में स्थित तपस्वी और योगीगण तेरहमुखी रूद्राक्ष की अध्यात्मिक उपलब्धियों से वशीभूत होकर इस रूद्राक्ष को अवश्य धारण करते हैं। यह रूद्राक्ष सभी प्रकार के अर्थ तथा सिद्धियों की पूर्ति करता है, जिससे हर प्रकार की मनोकामनायें पूर्ण होती हैं, तथा यश की प्राप्ति होती है। देवराज इंद्र का प्रिय व समस्त मनोंकामनाओं को पूर्ण करने वाला यह रूद्राक्ष साक्षात् कामदेव का प्रतीक भी है। इस रूद्राक्ष को धारण कर देवराज इंद्र को प्रसन्न किया जा सकता है, जो अपने उपासकों को तेज, वैभव, प्रतिष्ठा और अद्वितीय सफलता प्रदान करते हैं। धारक का स्वभाव निर्मल और दयावान हो जाता है, और मानसिक अवरोध, या दूसरों के लिये बुरे विचार या कपट भावना उनके मन में नहीं आती। इस रूद्राक्ष के प्रभाव से धारक अपने परिजनों का विश्वास भी जीत लेता है। यह रूद्राक्ष साक्षात् विश्वेश्वर का स्वरूप है।

इस 13 mukhi rudraksh से कीमियागिरी, सुधा-रसायन (कैमिकल या ऐलौपैथिक औषधीयां) के अनुसंधान और औषधि में ख्याती अर्थात् पूर्णत्व भी मिलता है। जीवन के पूर्ण सुख-साधन मिलते हैं। कामदेव का यह प्रतीक होने के कारण शारीरिक सुंदरता बनाये रख कर पूर्ण यौवन प्रदान करता है। इसको धारण् करने से इन्द्र तथा कामदेव प्रसन्न होकर सभी प्रकार की सांसारिक कामनायें पूर्ण करते हैं, यह परम प्रतापी तथा तेजस्वी रूद्राक्ष माना गया है। इसको धारण करने से राज्य की ओर से सम्मान में वृद्धि होती है, समाज में मान-प्रतिष्ठा बढ़ती है, मन चाहे स्त्री-पुरूष को वशीकरण करने की शक्ति देता है। इसको पहनने से विपरीत लिंगी धारक की तरफ आकर्षित होता है। इस रूद्राक्ष पर कामदेव के साथ उनकी पत्नी रति का भी निवास है, इसी कारण ये रूद्राक्ष दाम्पत्य जीवन की सभी खुशियाँ प्रदान कराने में सक्षम है। यह लक्ष्मी प्राप्ति में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है। इसके धारणकर्ता को कार्तिकेय के समान माना गया है। धारणकर्ता इंद्र के समान ऐश्वर्य का भोगी बनता है। तंत्र क्रिया में इसे वशीकरण के लिये काफी महत्वपूर्ण माना गया है। निःसंतान वालों को संतान प्रदान कराता है, यह अतुल संपत्ति दिलाता है, यह मेडिकल केमेस्ट्री से जुड़े लोगों के लिये विशेष धन व वैभव देने वाला रूद्राक्ष है। इससे आकर्षण तथा विश्वसीनयता में वृद्धि होती है, यह यौन शक्ति का प्रदाता है।

इसका धारण मंत्र है- ॐ हृी नमः। ॐ इन्द्राय नमः।
चैतन्य मंत्र- ॐ ई या आपः ॐ। इस मंत्र से रूद्राक्ष को चैतन्य कर धारण करना चाहिये।
उपयोग- नाम और यश, आकर्षण, ललित कला में प्रवीणता की आवश्यकता हो तो पूर्ति होती है।

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प्रेम रोग, Prem rog

प्रेम रोग और शुक्र ग्रह (ज्योतिष में प्रेम का कारक ग्रह शुक्र को माना गया है।

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आजकल चारों ओर योग की चर्चा हो रही है। इसके ठीक विपरीत भोग के लिए भी कानून सरल हो गये हैं, विपरीत लिंग के प्रेम पाश में बंधे कुछ युवक-युवती पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित होकर दैहिक सुख के भंवर में फंस जाते हैं, उन्हें लगता है कि जीवन में उसे आत्मसंतुष्टि प्राप्त हो यही जीवन का उद्देश्य है। कुछ लोगों का कहना है की भोग भी इसी योग का ही एक स्वरूप प्रेम है। तर्क दिया जाता है कि भगवत प्राप्ति के लिए भी प्रेम आवश्यक है, कहा भी है –

मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा।
किये जोग तप ग्मान विराग।।

योग, तप, ज्ञान और वैराग्य में भी यदि प्रेम का पुट नहीं हो तो, भगवद् प्राप्ति नहीं होती। प्रेम का जब प्रथम बार हृदय में प्रवेश होता है तो, प्रत्येक जीव एक विशेष ऊर्जा से आहत हो जाता है। अपने प्रेमी के दर्शन न होने पर वह इतना व्याकुल हो जाता है कि, उसे कहीं भी चैन सुख नहीं मिल पाता। चाहे प्रेम का स्वरूप कोई भी हो। मीरा के प्रेम का स्वरूप पूर्णतः आध्यात्मिकता से प्रेरित था फिर भी मीरा कहती थी-

हे री मैं तो प्रेम दिवानी मेरो दरद न जाने कोय।
घायल की गति घायल जाने और न जाने कोय।
मीरा री प्रभु परी मिटेगी जब वैध सांवरो होय।

वर्तमान में भी इस प्रकार के प्रेम का स्वरूप कहीं-कहीं प्रतीत होता है, लेकिन अधिकांश तथा मात्र धोखा ही नजर आता है। पश्चिमी सभ्यता एवं संस्कृति के प्रभाव के कारण वर्तमान में प्रेम सिर्फ दिल्लगी बनकर रह गया है। अर्थात एक से बिछुड़ना दूसरे से जुड़ना, (अफेयर्स और ब्रेकप) इस प्रकार से क्रम चलता रहता है, एवं जिंदगी गुजरती रहती है। पुराने वस्त्र उतार कर जिस प्रकार नये वस्त्र धारण किये जाते हैं, उसी प्रकार इसका स्वरूप भी बन गया है। इसी प्रेम के स्वरूप को समझने हेतु हम ज्योतिष शास्त्र की शरण में जाए तो हमें कुछ संकेत अवश्य प्राप्त होंगे कि जातक का प्रेम स्वच्छ एवं निर्मल है, अर्थात पूर्णतः पवित्र मन से प्रेरित है, या कामवासना से प्रेरित है।
ज्योतिष में शुक्र को प्रेम का स्थायी कारक माना गया है। जन्मांग चक्र का पंचम भाव प्रेम का आधिपत्य की सूचना देता है, पंचम से पंचम अर्थात नवम भी प्रेम का भाव है। चतुर्थ भाव हृदय का, तृतीय भाव जातक की इच्छा का तो एकादश भाव सर्वविधि लाभ का एवं अष्टम कामेन्द्रियों का और द्वादश स्थान काम वासना की संतुष्टि का भाव माना जाता है। ग्रहों में चन्द्र को चंचल एवं मन का कारक भाव माना जाता है। शुक्र प्रेम तथा कामेच्छा को पैदा एवं मंगल काम वासना को ऊर्जा देता है, बृहस्पति शुद्ध आध्यात्मिकता का एवं शनि ग्रह वैराग्य व राहु, केतु विजातीय स्वभाव के ग्रह होने से विजातीय संबंधों को दर्शाते हैं। इन कारकों और कुंडली के ग्रहों की परस्पर युति एवं दृष्टि पर ही शु़क्र अर्थात प्रेम का स्वरूप निर्धारित होता है। शुक्र की युति किस भाव में एवं किस ग्रह के साथ है, शुक्र पर किस ग्रह की दृष्टि है, आदि स्थितियां प्रेम के स्वरूप को नियंत्रित एवं नियमित करती है।

विभिन्न ग्रहों की शुक्र से युति एवं प्रेम का स्वरूप :-

सूर्य एवं शुक्र की युति होने पर जातक अपने प्रेम में प्रतिष्ठा को महत्वपूर्ण मानता है। उसका प्रेम हमेशा अपने से उच्च स्तर के लोगों से प्रेरित होता है, उनसे सुख प्राप्त करने की कोशिश भी करता है। लग्न से पंचम, नवम या दशम से युति होने पर प्रेमी से मान- सम्मान एवं सुख की प्राप्ति बिना किसी परेशानी के प्राप्त हो जाती है, लेकिन अन्य भावों में युति होने पर संघर्ष प्रेम प्राप्ति हेतु बना रहता है।
चन्द्र एव शुक्र की युति होने पर जातक प्रेम के मामले में चंचल रहता है। विशेष रूप से जब दोनों में से कोई एक लग्नेश हो या लाभ भाव में युति हो। लाभ भाव में युति होने एवं दोनों में से कोई एक अष्टम या द्वादश का स्वामी भी हो तो ऐसा जातक शारीरिक सुखी की प्राप्ति होने तक ही प्रेम संबंध रखता है। अन्य भावों में युति होने पर भी जातक प्रेम संबंधाें को स्थायी नहीं रख पाता दशम या द्वादश से युति हो तो, विदेशी स्त्रियों से प्रेम करवाकर आर्थिक सुख भी देता है।
मंगल व शुक्र की युति होने पर जातक का प्रेम वासना से युक्त होता है। वासना पूर्ति हेतु प्रेम परिवर्तन होता रहता है, लग्न में यदि युति बन रही हो तो, ऐसा जातक सभी सीमाएं पार कर व्याभिचारी बन जाता है। सप्तम या अष्टम में होने पर वासना पूर्ति हेतु अपने चारित्रिक पतन को बढ़ाता है एवं दु:ख प्राप्त करता है।
बुध व शुक्र की युति होने पर जातक-जातिका का प्रेम राजकुमार की भांति होता है। ऐसा जातक प्रेम के मामले में किसी की दखलांदाजी पसंद नहीं करता है, एवं प्रेम की स्थिति अनुसार परिवर्तित भी कर लेता है। ऐसे जातक रोमांटिक प्रेमी होते हैं। प्रेम को रोमांच मानकर चलना इनकी नियति बन जाती है। सप्तम में युति होने पर जातक अपनी महिला मित्र का पूर्णतया सुखोपभोग करने में कुशल रहता है।
बृहस्पति एवं शुक्र की युति होने पर प्रेम में सौंदर्य, सौशिष्यता, आध्यात्मिकता व दार्शनिकता का प्रभाव देखने को मिलता है। बृहस्पति व शुक्र दोनों धन के कारक हैं। इसलिए आर्थिक स्तर, ज्ञान से प्रभावित होकर प्रेम का आविर्भाव होता है। इस प्रकार की युति जातक को पूर्णतः धन, मान, सम्मान एवं आत्म स्वाभिमान को जागृत करने वाली होती है।
शनि, राहु व केतु से यदि शुक्र की युति बन रही हो तो, प्रेम अन्य वर्गों से होता है। प्रेम विजातीय स्वरूप का हो जाता है। ऐसा जातक भोगी एवं व्याभिचारी होता है। विषय लाभ की प्राप्ति के लिए हमेशा आतुर रहता है। उसका प्यार बिना द्वंद्व वाला एवं जल्दी ही प्रचारित हो जाता है। राहु की युति प्रेम के लिए पृथक्कता का वातावरण निर्मित करवाती है, तो केतु से युति होने पर प्रेम संबंध घनिष्ठ बनाने हेतु जातक को प्रेरित करती है।
इन युतियों के होने पर भी पूर्णतः प्रभाव कभी कभार नहीं दिखता क्योंकि जब शुक्र से युति कारक ग्रह की शुक्र से अंशात्मक दूरी अधिक हो तो, जातक के प्रेम में उस ग्रह संबंधी भावों, विशेषताओं का स्पष्ट एवं पूर्णतः प्रभाव दृष्टिगोचर होगा। लेकिन दूरी होने पर प्रभाव का असर तो रहेगा, लेकिन जातक की प्रेम को अभिव्यक्त करने की क्षमता कम होगी। प्रेम के स्वरूप को पूर्णतया प्रकट करने की जातक की अभिलाषा मूर्त रूप नहीं ले पाएगी। जातक के अन्तर्मन पर ही इसका प्रभाव अधिक होगा। बाह्य मन पर एवं व्यवहार पर नहीं।

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रोग और ज्योतिष

आयुर्वेद के अनुसार कुछ जटिल रोग पूर्वजन्मों के दोष के कारण शरीर के लिए कष्टकारी होते हैं –

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आयुर्वेद और ज्योतिष शास्त्र का चोली-दामन का संबंध रहा है, पूर्वकाल में हर वैद्य आयुर्वेद के साथ ग्रह-नक्षत्रों का भी अच्छा खासा ज्ञान रखता था। औषधि किस मुहूर्त में ग्रहण करनी है, और किस नक्षत्र में रोगी को सेवन करना आरम्भ करनी है? रोग किस नक्षत्र में आरम्भ हुआ है, वह साध्य होगा या असाध्य अथवा कष्ट साध्य होगा, इस का अच्छा-खासा ज्ञान वैद्य को होता था। वात-पित्त-कफ तीनों प्रकृतियों के साथ ग्रहों का सम्बन्ध, शरीरांगों में राशियों एवं ग्रहों का विनिवेश, बालारिष्ट, आयु आदि विषयों का ज्योतिषीय विश्लेषण, रोग की स्थिति में महत्वपूर्ण उपाय प्राप्त करने के लिए मंत्र-अनुष्ठान व दान अथवा रत्न धारण, यह सब औषधियों के सहायक अंग हैं। ज्योतिष में रोगों का वर्गीकरण, लक्षण (ग्रहयोग) तथा ज्योतिष शास्त्र ग्रहों की प्रकृति, धातु, रस, अंग, अवयव, स्थान, बल एवं अन्यान्य विशेषताओं के आधार पर रोगों का निर्णय करता है, तथा निदान के ज्योतिषीय उपाय भी इस शास्त्र में बताये गये हैं। ज्योतिष शास्त्र ही एक ऐसा शास्त्र है, जिसकी सहायता से भविष्य में होने वाले किसी भी रोग की सूचना प्राप्त हो सकती है। इस प्रकार रोग का पूर्व ज्ञान प्राप्त कर तथा उसके लिये ग्रहोपचार द्वारा अथवा सावधान रहकर मनुष्य उस रोग के कष्ट से किसी सीमा तक सुरक्षित रह सकता है।

ब्रह्माण्ड और मानव शरीर की समानता पर पुराणों व अन्य धर्मग्रन्थों में व्यापक विचार हुआ है। जो ब्रह्माण्ड में है, वह मानव शरीर में भी है। ब्रह्माण्ड को समझने का श्रेष्ठ साधन मानव शरीर ही है। वैज्ञानिको ने भी सावययी-सादृश्यता के सिद्धांत को इसी आधार पर निर्मित किया है। मानव शरीर व संपूर्ण समाज को एक दूसरे का प्रतिबिंब माना गया है। आज का मानव सौर मंडल को भली-भांति जानता है, इसी सौरमंडल में व्याप्त पंचतत्वों को प्रकृति ने मानव निर्माण हेतु पृथ्वी को प्रदान किया है। मानव शरीर जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु व आकाश तत्व से निर्मित हुआ है। ज्योतिष ने सौरमंडल के ग्रहों, राशियों तथा नक्षत्रों में इन तत्वों का साक्षात्कार कर प्राकृतिक सिद्धांतो को समझा है।
ज्योतिष का फलित भाग इन ग्रह, नक्षत्रों व राशियों के मानव शरीर पर पढ़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करता है, जो पंचतत्व इन ग्रह नक्षत्र व राशियों में हैं। वही मानव शरीर में भी हैं, तो निश्चित ही इनका मानव शरीर पर गहरा प्रभाव होगा ही।
वैदिक ज्योतिष ने सात ग्रहों को प्राथमिकता दी है। सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि। राहु व केतु छाया ग्रह हैं। पाश्चात्य ज्योतिष जगत में युरेनस, नेप्चयुन व प्लुटो का भी महत्व है। ज्योतिष ने पंचतत्वों में प्रधानता के आधार पर ग्रहों में इन तत्वों को अनुभव किया है, सूर्य व मंगल अग्नि तत्व प्रधान ग्रह हैं। अग्नि तत्व शरीर की ऊर्जा व जीने की शक्ति का कारक है। अग्नि तत्व की कमी शरीर के विकास को अवरूद्ध कर रोगों से लड़ने की शक्ति को कम करती है। शुक्र व चंद्रमा जल तत्व प्रधान ग्रह हैं, शरीर में व्याप्त जल पर चंद्रमा का आधिपत्य है। शरीर में स्थित जल शरीर का पोषण करता है। जल तत्व की कमी आलस्य या तनाव उत्पन्न कर, शरीर की संचार व्यवस्था पर विपरीत प्रभाव डालती है। जल व मन दोनो की प्रकृति चंचल है, इसलिये चंद्रमा को मन का कारकत्व भी प्रदान किया गया है। उदाहारणार्थ देखें:- शुक्राणु जो तरल में ही जीवित रहते हैं, और यह सृष्टि के निर्माण में व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शुक्र काम जीवन का कारक है, यही कारण है कि, शुक्र के अस्त होने पर विवाह के मुहुर्त नहीें निकाले जाते। बृहस्पति व राहु आकाश तत्व से सम्बंध रखते हैं। यह व्यक्ति के पर्यावरण व आध्यात्मिक जीवन से सीधा सम्बंध रखते हैं। बुध पृथ्वी तत्व का कारक ग्रह है। यह बुद्धिमता व निर्णय लेने की शक्ति शरीर को देता है। इस तत्व की कमी बुद्धिमता व निर्णय लेने की शक्ति पर विपरीत असर डालती है। शनि वायु तत्व प्रधान ग्रह है। शरीर में व्याप्त वायु तत्व पर इसका पूर्ण आधिपत्य है। केतु को मंगल की तरह माना गया है।
मानव जीवन के कुछ गुण मूल प्रकृति के रूप में भी मौजूद होते हैं। प्रत्येक मनुष्य में प्राकृतिक रूप से आत्मा, मन, वाँणी, ज्ञान, काम, व दुखः विद्यमान होते हैं। यह उसके जन्म समय की ग्रहस्थिति पर निर्भर करता है, कि किस मानव में इनकी प्रबलता कितनी है? विशेष रूप से प्रथम दो तत्वों को छोड़कर क्योंकि आत्मा से ही शरीर है। यह सूर्य का अधिकार क्षेत्र है। मन चंद्रमा का, बल मंगल का, वाँणी बुध का, ज्ञान बृहस्पति का, काम शुक्र व दुखः पर शनि का आधिपत्य है। आधुनिक मनोविज्ञान मानव की चार मूल प्रवृत्तियाँ मानता है- भय, भूख, यौन व सुरक्षा। भय पर शनि व केतु का आधिपत्य है। भूख पर सूर्य व बृहस्पति का, यौन पर शुक्र तथा सुरक्षा पर चंद्र व मंगल का। मानव शरीर के विभिन्न धातु तत्वों का भी बह्माण्ड के ग्रहों से सीधा सम्बंध है। शरीर की हड्ढियों पर सूर्य, रक्त की तरलता पर चंद्रमा, शरीर के माँस व गर्मी पर मंगल, त्वचा पर बुध, चर्बी पर बृहस्पति, वीर्य पर शुक्र तथा स्नायुमंडल पर शनि का अधिपत्य है। राहु एवं केतु चेतना से सम्बंधित ग्रह हैं। शरीर क्रिया-विज्ञान के अनुसार मानव शरीर त्रिदोष से पीड़ित होता है, जो विभिन्न रोगों के रूप में प्रकट होते हैं। वात-पित्त-कफ, सूर्य, मंगल, पित्त, चंद्रमा व शुक्र कफ, शनि वायु तथा बुध त्रिदोष; यह प्रतीकात्मक हैं। नेत्र व्यक्ति को अच्छा या बुरा देखने व समझने का शक्तिशाली माध्यम है। आंतरिक व बाह्य रहस्यों को देखने में नेत्रों की भूमिका महत्वपूर्ण है। प्राचीन ज्योतिष के सभी सिद्धांत योगियों व ऋषियोें ने सिर्फ नेत्रों से देखकर व योगमार्ग से अनुभव करके बनाये हैं। बिना कोई वैज्ञानिक यंत्रों की सहायता से यह अपने आप में आंतरिक व बाह्य रहस्यों में ज्योतिष के महत्व को स्पष्ट करने के लिये पर्याप्त हैं। सूर्य व चंद्रमा साक्षी हैं, अतः ज्योतिष के विज्ञान या सत्य होने में कोई संदेह नही है।

रोग निर्णय-
सूर्य- जब सूर्य रोगकारक ग्रह होता है, तब निम्नलिखित रोगों की संभावना होती है, या यह समझिये कि सूर्य निम्नलिखित रोग और क्लेशों का कारक है- पित्त, उष्ण ज्वर, शरीर में जलन रहना, अपस्मार (मिर्गी), हृदय रोग (हार्ट डिजीज), नेत्र रोग, नाभि से नीचे प्रदेश में या कोख में बीमारी, चर्मरोग, अस्थि श्रुति, शत्रुओं से भय, काष्ठ अग्नि, अस्त्र या विष से पीड़ा, स्त्री या पुत्रों से पीड़ा, चोर या चैपायों से भय, सर्प से भय, राजा, धर्मराज (यम) भगवान् भूतेश (रूद्र) से भय होता है।

चन्द्रमा- चन्द्रमा निम्नलिखित रोग या कष्ट उत्पन्न करता है- निद्रा रोग या तो नींद न आयेगी या बहुत नींद आयेगी, अथवा सोते सोते चलना इसे संन्यास रोग भी कहते हैं। आलस्य, कफवृद्धि, अतिसार (संग्रहणी), पिटक, कारबंकिल, शीतज्वर (ठंड देकर जो बुखार आता है) या ठंड के कारण जो बुखार हो। सींग वाले जानवर या जल में रहने वाले जानवर मगरमच्छ आदि से भय, मंदाग्नि (भूख न लगना), अरुचि (यह भी मन्दाग्नि का एक प्रकार है) जब जठराग्नि के मंद हो जाने से भूख नहीं लगती है तो, भोजन की इच्छा नहीं होती है। स्त्रियों से व्यथा, पीलिया, खून की खराबी, जल से भय, मन की थकावट, बाल ग्रह-दुर्गा-किन्नर-धर्मराज (यम) सर्प और यक्षिणी से भय होता है।

मंगल- जब मंगल रोग और क्लेश उत्पन्न करता है- तृष्णा (बहुत अधिक प्यास लगना) प्रकोप (वायु जनित या पित्त प्रकोप), पित्तज्वर, अग्नि, विष या शस्त्र से भय, कुष्ठ (कोढ़), नेत्र रोग, गुल्म (पेट में फोड़ा या एपिन्डिसाइटीज), अपस्मार (मिर्गी), मज्जा रोग (हड्डी के अन्दर मज्जा होती है, उसकी कमी से जो रोग हो जाते हैं), खुजली, चमड़ी में खुर्दरापन, देह-भंग (शरीर का कोई भाग टूट जाना), राजा, अग्नि और चोरों से भय, भाई, मित्र, पुत्रों से कलह, शत्रुओं से युद्ध, राक्षस, गन्धर्व घोर ग्रह से भय और शरीर के ऊपर के भाग में बीमारियाँ होती हैं।

बुध- बुध नीचे लिखे हुये रोग और कलेश उत्पन्न करता है- भ्रान्ति (बहम), सोचने में अव्यवस्था हो जाना, विचार में तर्क शक्ति का आभाव, व्यर्थ की चिंता से मन उलटा-पुलटा सोचने में लग जाना, मन में मिथ्या चिन्ता, बिना कारण भय, आशंका बनी रहे, जो बात यथार्थ हो उसको भूल कर गलत बात याद रहे या गलत धारणा हो जाती है, यह सब भ्रान्ति के लक्ष्ण हैं। दुर्वचन बोलना, नेत्र-रोग, गले का रोग, नासिका रोग, वात-पित्त-कफ इस त्रिदोष से उत्पन्न ज्वर, विष की बीमारी, चर्मरोग, पीलिया, दुःस्वप्न, खुजली, अग्नि में पड़ने का डर, (लोग जातक के साथ अपरुषता का व्यवहार करते हैं), श्रम (अधिक परिश्रम वाला काम करना पड़े), गन्धर्व आदि से उत्पन्न रोग। यह सब बुध के कारण होने वाले रोग हैं।

बृहस्पति- बृहस्पति के कारण जो रोग, क्लेश आदि होते हैं- गुल्म, पेट का फोड़ा-रसोली आदि का रोग, एपिन्डसाइटीज, अंतड़ियों का ज्वर (टायफाईड़), मूच्र्छा यह सब रोग कफ के दोष से होते हैं, क्योंकि कफ का अधिष्ठाता बृहस्पति है, कान के रोग, देव स्थान सम्बंधी पीड़ा अर्थात मंदिर आदि की जायदाद लेकर मुकद्दमेबाजी, ब्राह्मणों के शाप से कष्ट, किसी खजाने, ट्रस्ट या बैंक के मामलों के कारण कलह, या अदालती कार्रवाई, विद्याधर, यक्ष-किन्नर, देवता, सर्प आदि के द्वारा किया हुआ उपद्रव, अपने गुरुओं माननीयों तथा बड़ों के साथ किया हुआ अभद्र या अशिष्ट अव्यवहार या उनके प्रति कत्र्तव्य पालन न किया हो तो उस अपराध का दंड बृहस्पति की दशा, अन्तर्दशा में होता है, यह दैवी नियम हैं।

शुक्र- शुक्र ग्रह के कारण क्या रस-रक्त की कमी, ओजक्षय के कारण पीलापन, कफ और वायु के दोष से नेत्र रोग, प्रमेह, जननेन्द्रिय आदि में रोग, पेशाब करने में कठिनता या कष्ट (उपदंश, सुजाक आदि के कारण या प्रोस्टेट ग्लैण्ड बढ़ जाने की वजह से), वीर्य की कमी, संभोग में अक्षमता, अत्यंत संभोग के कारण शरीर में कमजोरी तथा चेहरे पर कान्ति हीनता, शोष (शरीर का सूखना), योगिनी, यक्षिणी एवं मातृगण से भय, शुक्र क्लेश कारक होने से मित्रों से मित्रता भी टूट जाती है।

रोग जो शनि के कारण उत्पन्न होते हैं- वात और कफ के द्वारा उत्पन्न रोग, टांग में दर्द या लंगड़ाना, अत्यधिक श्रम के कारण थकान, भ्रांति। कुक्षि (कांख के रोग), शरीर के भीतर बहुत उष्णता हो जाती है, नौकरों से कष्ट, नौकर नौकरी छोड़ कर चले जायें या धोखा या दगा दें, भार्या और पुत्र सम्बंधी विपत्ति, अपने शरीर के किसी भाग में चोट, हृदय ताप (मानसिक चिंता), पेड़ या पत्थर से चोट, पिशाच आदि की पीड़ा, आपत्ति।

राहु ग्रह के कारण होने वाले रोग- क्लेश, रोग व चिन्ता आदि- हृदय रोग, हृदय में ताप (जलन), कोढ़, दुर्मति, भ्रांति, विष के कारण उत्पन्न हुई बीमारियाँ, पैर में पीड़ा या चोट, स्त्री, पुत्र को कष्ट या उनके कारण कष्ट, सर्प और पिशाचों से भय।

केतु क्या कष्ट उत्पन्न करता है- ब्राह्मणों और क्षत्रियों से कलह के कारण कष्ट, शत्रुओं से भय।

गुलिक के कारण होने वाले कष्ट- गुलिक को ही मान्दि भी कहते हैं। गुलिक यदि छठे घर में हो या छठे ग्रह के स्वामी के साथ हो तो शरीर में पीड़ा, किसी स्वजन की मृत्यु और प्रेत से भय होता है।

रोगों के कुछ अन्य कारण हैं-
1. यदि चन्द्रमा और सूर्य बारहवें या दूसरे स्थान में हों, और उनको मंगल और शनि देखते हों तो, नेत्र रोग होता है। यहाँ यह ध्यान रखना चाहिये कि यदि सूर्य, चन्द्र दोनों एक साथ या एक दूसरे के घर में हों, और उनको मंगल और शनि दोनों पूर्ण दृष्टि से देखते हों तो, संभवतः उस आंख से दिखाई देना बिल्कुल बन्द हो जायेगा। दूसरा स्थान दाहिने नेत्र का है। इस कारण दाहिने नेत्र में रोग होगा। ऊपर जो योग बताया गया है, वह यदि बारहवें घर में होगा तो बायें नेत्र की दृष्टि नष्ट होगी। इसी प्रकार यदि सूर्य और चन्द्रमा इन दोनों में से कोई एक-दूसरे या बारहवें घर में बैठा हो, और उसको शनि या मंगल देखते हों तो, दूसरे में सूर्य या चन्द्र बैठने से दाहिने नेत्र का रोग होगा, और बारहवें घर में सूर्य या चन्द्र बैठने से और उसको मंगल या शनि के देखने से बायें नेत्र में रोग होगा। दूसरे और बारहवें घर को नेत्र स्थान कहते हैं। नेत्र स्थान में बैठे हुये सूर्य या चन्द्र को केवल मंगल या केवल शनि देखें तो थोड़ा कष्ट और यदि मंगल और शनि दोनों देखें तो, विशेष कष्ट समझाना चाहिये। यदि नेत्र स्थान में सूर्य, चन्द्र न भी बैठे हों अन्य पाप ग्रह बैठे हों या पाप ग्रह की दृष्टि भी हो तो भी नेत्र की दृष्टि में कमी हो जाती है।

2. यदि तीसरे और ग्यारहवें घर और बृहस्पति-मंगल शनि से युक्त या दृष्ट हों तो, कान का रोग होता है। तीसरे से दाहिने कान का विचार किया जाता है, ग्याहरवें से बांये कान का। सुनना (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध इन पांचो गुणों में से) शब्द से सम्बंध रखता है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश यह पांच तत्त्व हैं। सूर्य और मंगल ग्रह का अग्नि तत्त्व, चन्द्रमा और शुक्र का जल तत्त्व, बुध का पृथ्वी तत्त्व, शनि का वायु तत्त्व और बृहस्पति का आकाश तत्त्व है। शब्दगुण का अधिष्ठाता आकाश तत्त्व है। आकाश तत्त्व बृहस्पति से संबंधित होने के कारण यह कहा गया है कि, यदि बृहस्पति, मंगल, शनि से (मंगल से या शनि से या शनि, मंगल दोनों से) पूर्ण दृष्टि से देखा जाता हो, या मंगल, शनि के साथ हो तो कान के रोग अथवा बहरापन होता है। यहाँ तारतम्य से यह विचार कर लेना चाहिये कि तृतीय और एकादश घर जितने निर्बल होंगे, और जितनी अधिक पाप दृष्टि इन दोनों पर पड़ेगी-या जितने अधिक पाप ग्रहों के साथ ये तथा बृहस्पति (शब्द गुण का अधिष्ठाता होने के कारण), होंगे उतना ही तीव्र (अधिक) कान का रोग होगा। मंगल पित्त प्रधान है, इसलिये मंगल की युति या दृष्टि पित्त के कारण या फोड़ा-फुंसी, रक्त स्राव आदि का रोग कान में करेगा। शनि वायु प्रधान है, इस कारण, शनि जब कान के रोग उत्पन्न करेगा तो वात के कारण। वात, पित्त, कफ यही तीन दोष आयुर्वेद के अनुसार त्रिदोष हैं। जिनके कुपित हो जाने से या असांमजस्य से शरीर में रोग होते हैं।

(3) मंगल पंचम में होने से उदर (पेट के विकार) करता है। इनमें से कोई भी उग्र ग्रह सूर्य, मंगल, शनि, राहु, केतु पंचम में होने से पेट में पीड़ा करता है, पांचवा स्थान पेट का है।

(4) शुक्र यदि सप्तम या अष्टम स्थान में हो तो वीर्य सम्बंधी प्रमेहादि या मूत्ररोग करता है।

(5) यदि षष्ठेश या अष्टमेश, सप्तम में या षष्ठेश अष्टम में हो तो, गुदा रोग होता है। सप्तम स्थान गुह्य जननेन्द्रिय प्रदेश, अष्टम गुदा का स्थान है। यहाँ पाप ग्रह बैठे हों, या दुःस्थान (छठे आठवें) के स्वामी बैठे हों, तो शरीर के उस भाग में रोग उत्पन्न करते हैं।
यदि छठे या आठवें घर में सूर्य हो तो, ज्वर (बुखार) का भय, यदि छठे या आठवें घर मंे मंगल या केतु हों तो व्रण (घाव, चोट, जख्म), छठे या आठवें घर में शुक्र हो तो, जननेन्द्रिय प्रदेश में रोग (उदाहरण के लिये मूत्र रोग, वीर्य रोग, सुजाक, आतशक आदि), यदि छठे या आठवें घर में बृहस्पति हो तो (यक्ष्मा, टी. बी. आदि), यदि छठे या आठवें शनि हो तो वात (वायु रोग), यदि छठे या आठवें मंगल राहु हों, या उस पर मंगल की दृष्टि हो तो पिटिका (अदीठ आदि फोड़ा या सामान्य फोड़ा), यदि छठे या आठवें घर में चन्द्रमा और शनि एक साथ हों तो गुल्म (तिल्ली के कारण तथा तिल्ली बढ़ जाने के कारण पेट में पसलियों के नीचे-दाहिनी ओर यकृत (जिगर) और बाँयी और प्लीहा (तिल्ली होती है), यदि कृष्ण पक्ष का क्षीण चन्द्रमा पाप ग्रह के साथ हो, और जिस राशि में छठे या आठवें हों तो, अम्बुर्द रोग (पेट या शरीर के अन्य भाग में पानी भर जाना, जलोदर) या क्षय (यक्ष्मा टी. बी.) का रोग होता है।जो ग्रह अष्टम में होते हैं, या अष्टम को देखते हैं, उनमें जो बलवान होता है, उस ग्रह के रोग से जातक की मृत्यु होती है। आठवाँ आयु का स्थान है। ऊपर बताया जा चुका है कि, कौन-सा ग्रह किस रोग का कारक है। यदि आठवें भाव में ग्रह हों, या ग्रह देखते हों, तब किस प्रकार के रोग से मृत्यु होगी यह ऊपर बताया गया है, परन्तु आठवें घर में कोई ग्रह न हो, और न कोई ग्रह आठवें घर को देखता हो; ऐसी स्थिति में किस रोग से मृत्यु होगी? आठवें घर के जो रोग बताये गये हैं, उनसे या आठवें घर का मालिक जिस राशि या भाव में बैठा हो, उसके दोष से, उदाहरण के लिये आठवें घर का मालिक पांचवे घर में हो तो, उदर (पेट के) रोग से, चैथे घर में बैठा हो तो, हृदय रोग से यदि अष्टमेश सूर्य या मंगल हो तो, पित्तज रोग से, शनि हो तो वात रोग से इत्यादि। जन्म लग्न (द्रेष्काण) से जो 22वां द्रेष्काण होता है, उसका स्वामी भी मृत्यु कारक होता है। ऊपर जो योग अष्टम भाव संबंधी बताये गये हैं कि, वह लागू न हों तो जन्म द्रेष्काण से जो 22वां दे्रष्काण हो उस 22वें द्रेष्काण का जो स्वामी हो, उस स्वामी के जो रोेग हों, उनमें से किसी रोग के कारण मृत्यु होती है। जो ग्रह आठवें घर में हो, या आठवें घर को देखते हैं, उन ग्रहों में जो बलवान हो, उसके रोग या दोष से मृत्यु होती है। यदि कोई ऐसा ग्रह न हो, तो अष्टम भाव में जो राशि हो उसके रोग के कारण मृत्यु होती है।

सूर्य- अग्नि, उष्ण ज्वर, पित्त या शस्त्र से मृत्यु करता है।

चन्द्रमा- विषूचिका (हैजा), जलोदर (इस रोग में हाथ, पैर या अन्य स्थान में पानी इकट्ठा हो जाता है) जल की बीमारियाँ (प्ल्यूरेसी या अन्य बीमारी जिसमें जल कहीं इकट्ठा हो जावे, यक्ष्मा, टी. बी. आदि रोगों से आयु समाप्त करता है।)

मंगल- जलने से (अग्नि प्रकोप, बिजली आदि भी इसी के अन्तर्गत आ जाती है), रक्त विकार या रक्त बहने से, क्षुद्र अभिचार (जादू, टोना, मारण आदि के अनुष्ठानों आदि) के कारण, मृत्यु करता है।

बुध- पाण्डु (पीलिया) या रक्त की कमी, भ्रांति (स्नायु संबंधी विकार) आदि रोगों से जातक के प्राण हरण करता है। रक्त का कम बनना जिससे ‘पाण्डु’ आदि रोग होते हैं, यकृत की खराबी इत्यादि।

बृहस्पति- कफ का अधिष्ठाता है, और कफ से मृत्यु करता है। इसमें विशेष कष्ट नहीं होता।

शुक्र- जब प्राण हरण करता है, तो इसमें कारण अति स्त्री प्रसंग, वीर्य की कमी से शरीर निस्तेज हो जाना होता है। धातुक्षय इत्यादि बीमारी का शिकार होना, मूत्र रोग, जननेन्द्रिय सम्बंधी रोग शुक्र के अन्तर्गत आते हैं।

शनि- सन्निपात, वातरोग (लकवा आदि के द्वारा) आदि से मृत्यु करता है।

राहु- कुष्ठ (कोढ से) या, आंत्रशोथ, फूड प्रोसेसिंग विष या जम्र्स (रोग कीटाणु) युक्त वस्तु खाने से, सर्प आदि विषैले जन्तुओं के काटने से, जिस रोग में शरीर पर ददोड़े, फुंसियाँ हो जाते हैं, उसमें मृत्यु करता है।

केतु- मृत्यु का कारण दुर्मरण होता है, दुर्मरण का अर्थ है, अपमृत्यु (जैसा आकस्मिक मोटर, रेल आदि से, मकान के गिरने से, कुचल जाने से, कोई कर दे, यह सब दुर्मरण के उदाहरण हैं)। शत्रुओं के विरोध से, कीड़ों या शरीर में किसी कीड़े या जन्तु काटने से सेप्टिक हो जाने या भोजन आदि के द्वारा विषाक्त कीटाणु शरीर में प्रवेश कर जायें। कुण्डली के आठवें घर से जो दोष या रोग सूचित हों, उनसे (इसमें आठवें घर का मालिक, आठवें, घर को जो देखते हैं, वे सभी आ जाते हैं, या आठवें घर का मालिक जिस नवांश में बैठा हो, उस नवांश राशि के रोग स्वाभाविक हैं-

मेष- पित्त के कारण ज्वर, उष्णता (गर्मी के कारण उत्पन्न रोग लू लगना आदि, जठाराग्नि, पेट में भोजन पचाने वाली जो अग्नि है) के रोग।

वृष- त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) के उत्पात से, शस्त्र से, अग्नि से जलने के कारण।

मिथुन- श्वास की बीमारी, दमा, उष्ण शूल (पित्त के कारण जो तीव्र दर्द होते हैं)।

कर्क- पागलपन, उन्माद, वात के कारण रोग, अरुचि (भोजन में अरुचि आदि लक्ष्ण वाले रोग, ऐनोरेक्सिया)।

सिंह- जंगली पशुओं के कारण, मृत्यु, ज्वर, स्फोट (फोड़ा) शत्रुओं के कारण।

कन्या- स्त्रियों के कारण, गुप्तरोग (मूत्रेन्द्रिय या जननेन्द्रिय सम्बंधी रोग), ऊपर से गिरने से।

तुला- मस्तिष्क ज्वर (ब्रेन फीवर) सन्निपात।

वृश्चिक- प्लीहा (तिल्ली) संग्रहणी, पाण्डु (पीलिया) रोग।

धनु- पेड़ के कारण (पेड़ से गिरने, या अपने ऊपर पेड़ गिर जाने से), जल लकड़ी के कारण (लकड़ी चीरते समय, या लकड़ी की चोट से), शस्त्र से।

मकर- शूल (पेट का दर्द, एपिण्डीसाइटिज आदि, पेट में फोड़ा, आदि, कोलिक दर्द) अरुचि, मंदाग्नि या बुद्धिभ्रम (नर्वस स्नायु मंडल की अव्यवस्था या रोग के कारण संयत विचार करने की शक्ति जब नष्ट हो जाती है) आदि से।

कुम्भ- खांसी, ज्वर, क्षय।

मीन- पानी से, पानी में डूबने से, जल रोगों से।
यदि आठवें घर का मालिक पापग्रह हो, और आठवें घर में पापग्रह बैठे भी हों (या एक भी पापग्रह अष्टम में हो) तो शस्त्र, अग्नि, व्याघ्र, सर्प आदि की पीड़ा होती है। यदि केन्द्र में बैठे हुये दो पाप ग्रह एक दूसरे को पूर्ण दृष्टि से देखते हों, तो सरकार की नाराजगी से, शस्त्र, विष, अग्नि आदि के कारण मृत्यु होती है।
यदि बारहवें घर का मालिक सौम्य ग्रह की राशि या सौम्य ग्रह के नवांश में हो, या सौम्य ग्रह के साथ बैठा हो, अथवा बारहवें घर में सौम्य ग्रह बैठा हो, और बारहवें घर का मालिक भी सौम्य ग्रह हो तो, मरते समय विशेष क्लेश या पीड़ा नहीं होती। यदि उसे उल्टा हो अर्थात बाहरवें घर का मालिक क्रूर ग्रह की राशि या क्रूर ग्रह के नवांश में बैठा हो या क्रूर ग्रह के साथ हो, अथवा बारहवें घर में क्रूर ग्रह बैठा हो, बारहवें घर को क्रूर देखते हों तो कष्ट, पीड़ा क्लेश के साथ मृत्यु होती है। कफ-वात-पित्त तीनों प्रकृतियों के साथ ग्रहों का सम्बन्ध, शरीरांगों में राशियों एवं ग्रहों का विनिवेश, बालारिष्ट, आयु आदि विषयों की प्राप्ति, रोग की स्थिति में महत्वपूर्ण उपाय प्राप्त हैं। ज्योतिष में रोगों का वर्गीकरण, लक्षण (ग्रहयोग) तथा ज्योतिष शास्त्र ग्रहों की प्रकृति, धातु, रस, अंग, अवयव, स्थान, बल एवं अन्यान्य विशेषताओं के आधार पर रोगों का निर्णय करता है, तथा निदान के ज्योतिषीय उपाय भी बताये गये हैं। लेख के अंत में यही कहना चाहूंगा कि ज्योतिष शास्त्र ही एक ऐसा शास्त्र है, जिसकी सहायता से भविष्य में होने वाले किसी भी रोग की सूचना प्राप्त हो सकती है। इस प्रकार रोग का पूर्व ज्ञान प्राप्त कर तथा उसके लिये ग्रहोपचार द्वारा अथवा सावधान रहकर मनुष्य उस रोग के कष्ट से किसी सीमा तक बच सकता है।

मानव शरीर और ज्योतिष-
ब्रह्माण्ड और मानव शरीर की समानता पर पुराणों व अन्य धर्मग्रन्थों में व्यापक विचार हुआ है। जो ब्रह्माण्ड में है, वह मानव शरीर में भी है। ब्रह्माण्ड को समझने का श्रेष्ठ साधन मानव शरीर ही है। वैज्ञानिको ने भी सावययी-सादृश्यता के सिद्धांत को इसी आधार पर निर्मित किया है। मानव शरीर व संपूर्ण समाज को एक दूसरे का प्रतिबिंब माना गया है।

आज का मानव सौर मंडल को भली-भांति जानता है, इसी सौरमंडल में व्याप्त पंचतत्वों को प्रकृति ने मानव निर्माण हेतु पृथ्वी को प्रदान किया है। मानव शरीर जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु व आकाश तत्व से निर्मित हुआ है। ज्योतिष ने सौरमंडल के ग्रहों, राशियों तथा नक्षत्रों में इन तत्वों का साक्षात्कार कर प्राकृतिक सिद्धांतो को समझा है। ज्योतिष का फलित भाग इन ग्रह, नक्षत्रों व राशियों के मानव शरीर पर पढ़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करता है। जो पंचतत्व इन ग्रह नक्षत्र व राशियों में हैं। वही मानव शरीर में भी हैं, तो निश्चित ही इनका मानव शरीर पर गहरा प्रभाव होगा ही।

वैदिक ज्योतिष ने सात ग्रहों को प्राथमिकता दी है। सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि। राहु व केतु छाया ग्रह हैं। पाश्चात्य ज्योतिष जगत में युरेनस, नेप्चयुन व प्लुटो का भी महत्व है। ज्योतिष ने पंचतत्वों में प्रधानता के आधार पर ग्रहों में इन तत्वों को अनुभव किया है, सूर्य व मंगल अग्नि तत्व प्रधान ग्रह हैं। अग्नि तत्व शरीर की ऊर्जा व जीने की शक्ति का कारक है। अग्नि तत्व की कमी शरीर के विकास को अवरूद्ध कर रोगों से लड़ने की शक्ति को कम करती है। शुक्र व चंद्रमा जल तत्व प्रधान ग्रह हैं। शरीर में व्याप्त जल पर चंद्रमा का आधिपत्य है। शरीर में स्थित जल शरीर का पोषण करता है। जल तत्व की कमी आलस्य या तनाव उत्पन्न कर, शरीर की संचार व्यवस्था पर विपरीत प्रभाव डालती है। जल व मन दोनो की प्रकृति चंचल है, इसलिये चंद्रमा को मन का कारकत्व भी प्रदान किया गया है। उदाहारणार्थ देखें शुक्राणु जो तरल में ही जीवित रहते हैं, और यह सृष्टि के निर्माण में व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

शुक्र काम जीवन का कारक है, यही कारण है कि, शुक्र के अस्त होने पर विवाह के मुहुर्त नहीें निकाले जाते। बृहस्पति व राहु आकाश तत्व से सम्बंध रखते हैं। यह व्यक्ति के पर्यावरण व आध्यात्मिक जीवन से सीधा सम्बंध रखते हैं। बुध पृथ्वी तत्व का कारक ग्रह है। यह बुद्धिमता व निर्णय लेने की शक्ति शरीर को देता है। इस तत्व की कमी बुद्धिमता व निर्णय लेने की शक्ति पर विपरीत असर डालती है। शनि वायु तत्व प्रधान ग्रह है। शरीर में व्याप्त वायु पर इसका पूर्ण आधिपत्य है। केतु को मंगल की तरह माना गया है।
मानव जीवन के कुछ गुण मूल प्रकृति के रूप में भी मौजूद होते हैं। प्रत्येक मनुष्य में प्राकृतिक रूप से आत्मा, मन, वाँणी, ज्ञान, काम, व दुखः विद्यमान होते हैं। यह उसके जन्म समय की ग्रहस्थिति पर निर्भर करता है, कि किस मानव में इनकी प्रबलता कितनी है? विशेष रूप से प्रथम दो तत्वों को छोड़कर क्योंकि आत्मा से ही शरीर है। यह सूर्य का अधिकार क्षेत्र है। मन चंद्रमा का, बल मंगल का, वाँणी बुध का, ज्ञान बृहस्पति का, काम शुक्र व दुखः पर शनि का आधिपत्य है।

आधुनिक मनोविज्ञान मानव की चार मूल प्रवृत्तियाँ मानता है- भय, भूख, यौन व सुरक्षा। भय पर शनि व केतु का आधिपत्य है। भूख पर सूर्य व बृहस्पति का, यौन पर शुक्र तथा सुरक्षा पर चंद्र व मंगल का। मानव शरीर के विभिन्न धातु तत्वों का भी बह्माण्ड के ग्रहों से सीधा सम्बंध है। शरीर की हड्ढियों पर सूर्य, रक्त की तरलता पर चंद्र्रमा, शरीर के माँस व गर्मी पर मंगल, त्वचा पर बुध, चर्बी पर बृहस्पति, वीर्य पर शुक्र तथा स्नायुमंडल पर शनि का अधिपत्य है। राहु एवं केतु चेतना से सम्बंधित ग्रह हंै। शरीर क्रिया-विज्ञान के अनुसार मानव शरीर त्रिदोष से पीड़ित होता है, जो विभिन्न रोगों के रूप में प्रकट होते हैं। वात, पित्त व कफ! सूर्य, मंगल, पित्त, चंद्रमा व शुक्र कफ, शनि वायु तथा बुध त्रिदोष; यह प्रतीकात्मक हैं। नेत्र व्यक्ति को अच्छा या बुरा देखने व समझने का शक्तिशाली माध्यम है। आंतरिक व बाह्य रहस्यों को देखने में नेत्रों की भूमिका महत्वपूर्ण है। प्राचीन ज्योतिष के सभी सिद्धांत योगियों व ऋषियोें ने सिर्फ नेत्रों से देखकर व योगमार्ग से अनुभव करके बनाये हैं। बिना कोई वैज्ञानिक यंत्रों की सहायता से यह अपने आप में आंतरिक व बाह्य रहस्यों में ज्योतिष के महत्व को स्पष्ट करने के लिये पर्याप्त हैं। सूर्य व चंद्रमा साक्षी हैं, अतः ज्योतिष के विज्ञान या सत्य होने में कोई संदेह नही है।

यह थे, लेखक की पुस्तक :- “रोग एवं ज्योतिष” के कुछ अंश।

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दीपावली पूजन 2018

दीपावली पूजन के शुभ मुहूर्त:-

(Dr.R.B.Dhawan, Top best Astrologer in Delhi)

इस वर्ष दीपावली पर्व 7 नवम्बर 2018 के दिन है, इस दिन अमावस्या तिथि दिल्ली की गणना अनुसार लगभग 20:32 तक रहेगी। महालक्ष्मी पूजन किसी स्थिर लग्न में होना उचित है, इस दिन वृषभ और सिंह दो स्थिर लग्न होंगी। वृषभ लग्न सांयकाल 17 बजकर 57 मिनट से रात्रि 19 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। और सिंह लग्न मध्य रात्रि को 00 (24) बजकर 27 मिनट से 02 बजकर 54 मिनट तक रहेगी। इन दोनो महूर्त में स्वाती नक्षत्र 19 बजकर 37 मिनट तक, इसके पश्चात विशाखा नक्षत्र पढेगा। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इन दोनो लग्नों का यह समय दिल्ली प्रदेश के लिये है। शेष भारत अथवा विदेशों में रहने वाले पाठक अपने देश या प्रदेश के लिये उपरोक्त स्थिर लग्नों का समय shukracharya कार्यालय से फोन द्वारा पता कर सकते हैं। इन्हीं दो स्थिर लग्न में से किसी लग्न में जब अनुकूल चौघड़िया भी हो तब महालक्ष्मी पूजन किया जा सकता है।

महालक्ष्मी पूजन के लिए पूजा स्थल एक दिन पहले से सजाना चाहिए पूजन के लिए सामग्री दिपावली से पहले ही एकत्रित कर लें। इसमें यदि माता लक्ष्मी के पसंद को ध्यान में रख कर पूजा की जाए तो शुभत्व की वृद्धि होती है। माता के पसंदीदा रंग लाल, व गुलाबी हैं, इसके बाद फूलों की बात करें, तो कमल और गुलाब माता लक्ष्मी के प्रिय फूल हैं। पूजा में फलों का भी खास महत्व होता है। फलों में उन्हें श्रीफल, सीताफल, बेर, अनार व सिंघाड़े पसंद हैं। आप इनमें से कोई भी फल पूजा के लिए प्रयोग कर सकते हैं। अनाज रखना हो तो चावल रखें, वहीं मिठाई में माता लक्ष्मी की पसंद शुद्ध केसर से बनी मिठाई या हलवा, शीरा और नैवेद्य हैं।

माता के स्थान को सुगंधित करने के लिए केवड़ा, गुलाब और चंदन के इत्र का प्रयोग करें। दीये के लिए आप गाय के घी, मूंगफली या तिल्ली के तेल का इस्तेमाल कर सकते हैं। यह माता लक्ष्मी को शीघ्र प्रसन्न करते हैं। पूजा के लिए महत्वपूर्ण दूसरी वस्तुओं में गन्ना, कमल गट्टा, खड़ी हल्दी, बिल्वपत्र, पंचामृत, गंगाजल, ऊन का आसन, रत्न आभूषण, गाय का गोबर, सिंदूर और भोजपत्र शामिल हैं।

चौकी सजाना :-

1. लक्ष्मी-गणेश की चांदी या फिर मिट्टी से बनी छोटी प्रतिमा, 2. चांदी पर उत्कीर्ण महालक्ष्मी यंत्र (पहले से प्राणप्रतिष्ठित)। 3. मिट्टी के बने हुए 21, 31 या 51 छोटे और 3 बड़े दीपक। 4. एक तांबे का कलश जिस पर नारियल रखेंगे, व आचमनी। 5. चांदी और तांबे के सिक्के, बहीखाता, कलम और दवात। 6. नकदी, थालियां, जल पात्र, चावल, फूल, सुपारी, रोली, कलावा, पानी वाला नारियल, लाल वस्त्र,।

1. ग्यारह दीपक, 2. खील, बताशे, मिठाई, वस्त्र, आभूषण, चन्दन का लेप, सिन्दूर, कुंकुम, सुपारी, पान, 3. फूल, दुर्वा, चावल, लौंग, इलायची, केसर-कपूर, हल्दी-चूने का लेप, सुगंधित पदार्थ, धूप, अगरबत्ती, एक दीपक।

सबसे पहले एक लकड़ी की चौकी पर लक्ष्मी व गणेश की मूर्तियां इस प्रकार रखें, कि उनका मुख पूर्व या पश्चिम की ओर रहे। लक्ष्मीजी, गणेशजी की दाहिनी ओर रहें। पूजा करने वाले मूर्तियों के सामने की तरफ बैठें। कलश को लक्ष्मीजी के पास चावलों पर रखें। नारियल को लाल वस्त्र में इस प्रकार लपेटें कि नारियल का अग्रभाग दिखाई देता रहे, व इसे कलश पर रखें। यह कलश वरुण का प्रतीक है। दो बड़े दीपक रखें, एक में घी भरें व दूसरे में तेल। एक दीपक चौकी के दाईं ओर रखें, व दूसरा मूर्तियों के चरणों में। इसके अलावा एक बड़ा दीपक गणेशजी के पास रखें।

मूर्तियों वाली चौकी के सामने छोटी चौकी रखकर उस पर लाल वस्त्र बिछाएं। कलश की ओर एक मुट्ठी चावल से लाल वस्त्र पर नवग्रह की प्रतीक नौ ढेरियां बनाएं। गणेशजी की ओर चावल की सोलह ढेरियां बनाएं। ये सोलह मातृका की प्रतीक हैं। नवग्रह व षोडश मातृका के बीच स्वस्तिक का चिह्न बनाएं।
इसके बीच में सुपारी रखें, व चारों कोनों पर चावल की ढेरी। सबसे ऊपर बीचों बीच ॐ लिखें। छोटी चौकी के सामने तीन थाली व जल भरकर कलश रखें। थालियों की निम्नानुसार व्यवस्था करें- 1. ग्यारह दीपक, 2. खील, बताशे, मिठाई, वस्त्र, आभूषण, चन्दन का लेप, सिन्दूर, कुंकुम, सुपारी, पान, 3. फूल, दुर्वा, चावल, लौंग, इलायची, केसर-कपूर, हल्दी-चूने का लेप, सुगंधित पदार्थ, धूप, अगरबत्ती, एक दीपक।

इन थालियों के सामने पूजा करने वाला बैठे। आपके परिवार के सदस्य आपकी बाईं ओर बैठें। कोई आगंतुक हो तो वह आपके या आपके परिवार के सदस्यों के पीछे बैठे। हर वर्ष दीपावली पूजन में नया सिक्का लें, और पुराने सिक्को के साथ इकट्ठा रख कर दीपावली पर पूजन करें, और पूजन के बाद सभी सिक्को को तिजोरी में रख दें।

पूजा की संक्षिप्त विधि स्वयं पूजा करने के लिए :- हाथ में पूजा के जलपात्र से थोड़ा सा जल ले लें, और अब उसे मूर्तियों के ऊपर छिड़कें। साथ में नीचे दिया गया पवित्रीकरण मंत्र पढ़ें। इस मंत्र और पानी को छिड़ककर आप अपने आपको पूजा की सामग्री को और अपने आसन को भी पवित्र कर लें।

शरीर एवं पूजा सामग्री पवित्रीकरण मन्त्र :-

ॐ पवित्रः अपवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपिवा।
यः स्मरेत्‌ पुण्डरीकाक्षं स वाह्यभ्यन्तर शुचिः॥

पृथ्वी पवित्रीकरण विनियोग:-

पृथ्वी देवता मंत्रस्य मेरुपृष्ठः ग षिः सुतलं छन्दः
कूर्मोदेवता आसने विनियोगः॥

अब पृथ्वी पर जिस जगह आपने आसन बिछाया है, उस जगह को पवित्र कर लें, और मां पृथ्वी को प्रणाम करके मंत्र बोलें-
पृथ्वी पवित्रीकरण मन्त्र :-

ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता। त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्‌॥ पृथिव्यै नमः आधारशक्तये नमः।

अब आचमन करें :-

पुष्प, चम्मच या अंजुलि से एक बूंद पानी अपने मुंह में छोड़िए और बोलिए-

ॐ केशवाय नमः।

और फिर एक बूंद पानी अपने मुंह में छोड़िए और बोलिए-

ॐ नारायणाय नमः।

फिर एक तीसरी बूंद पानी की मुंह में छोड़िए और बोलिए-

ॐ वासुदेवाय नमः।

इसके बाद संभव हो तो किसी किसी ब्राह्मण द्वारा विधि विधान से पूजन करवाना अति लाभदायक रहेगा। ऐसा संभव ना हो तो सर्वप्रथम दीप प्रज्वलन कर गणेश जी का ध्यान कर अक्षत पुष्प अर्पित करने के पश्चात दीपक का गंधाक्षत से तिलक कर निम्न मंत्र से पुष्प अर्पण करें।

शुभम करोति कल्याणम, अरोग्यम धन संपदा, शत्रु-बुद्धि विनाशायः, दीपःज्योति नमोस्तुते !

पूजन हेतु संकल्प :-

इसके बाद बारी आती है संकल्प की। जिसके लिए पुष्प, फल, सुपारी, पान, चांदी का सिक्का, नारियल (पानी वाला), मिठाई, मेवा, आदि सभी सामग्री थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लेकर संकल्प मंत्र बोलें-

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु:, ऊं तत्सदद्य श्री पुराणपुरुषोत्तमस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय पराद्र्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे सप्तमे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे जम्बुद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गत ब्रह्मवर्तैकदेशे पुण्य (अपने नगर/गांव का नाम लें) क्षेत्रे बौद्धावतारे वीर विक्रमादित्यनृपते : 2070, तमेऽब्दे शोभन नाम संवत्सरे दक्षिणायने/उत्तरायणे हेमंत ऋतो महामंगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमे कार्तिक मासे कृष्ण पक्षे अमावस तिथौ (जो वार हो) रवि वासरे स्वाति नक्षत्रे आयुष्मान योग चतुष्पाद करणादिसत्सुशुभे योग (गोत्र का नाम लें) गोत्रोत्पन्नोऽहं अमुकनामा (अपना नाम लें) सकलपापक्षयपूर्वकं सर्वारिष्ट शांतिनिमित्तं सर्वमंगलकामनया– श्रुतिस्मृत्यो- क्तफलप्राप्तर्थं— निमित्त महागणपति नवग्रहप्रणव सहितं कुलदेवतानां पूजनसहितं स्थिर लक्ष्मी महालक्ष्मी देवी पूजन निमित्तं एतत्सर्वं शुभ-पूजोपचारविधि सम्पादयिष्ये।

गणेश पूजन :-

किसी भी पूजन की शुरुआत में सर्वप्रथम श्री गणेश को पूजा जाता है। इसलिए सबसे पहले श्री गणेश जी की पूजा करें। इसके लिए हाथ में पुष्प लेकर गणेश जी का ध्यान करें। मंत्र पढ़े –

गजाननम्भूतगणादिसेवितं कपित्थ जम्बू फलचारुभक्षणम्। उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्।

गणपति आवाहन:- ॐ गं गणपतये इहागच्छ इह तिष्ठ।। इतना कहने के बाद पात्र में अक्षत छोड़ दे।

इसके पश्चात गणेश जी को पंचामृत से स्नान करवाये पंचामृत स्नान के बाद शुद्ध जल से स्नान कराए अर्घा में जल लेकर बोलें- एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम् ऊं गं गणपतये नम:।

रक्त चंदन लगाएं:- इदम रक्त चंदनम् लेपनम् ऊं गं गणपतये नम:। इसी प्रकार श्रीखंड चंदन बोलकर श्रीखंड चंदन लगाएं। इसके पश्चात सिन्दूर चढ़ाएं :- इदं सिन्दूराभरणं लेपनम् ॐ गं गणपतये नम:। दूर्वा और विल्बपत्र भी गणेश जी को अर्पित करें। उन्हें वस्त्र पहनाएं और कहें – इदं रक्त वस्त्रं ऊं गं गणपतये समर्पयामि।

पूजन के बाद श्री गणेश को प्रसाद अर्पित करें और बोले – इदं नानाविधि नैवेद्यानि ऊं गं गणपतये समर्पयामि:। मिष्ठान अर्पित करने के लिए मंत्र:- इदं शर्करा घृत युक्त नैवेद्यं ॐ गं गणपतये समर्पयामि:। प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन करायें। इदं आचमनयं ऊं गं गणपतये नम:। इसके बाद पान सुपारी चढ़ायें: इदं ताम्बूल पुगीफल समायुक्तं ऊं गं गणपतये समर्पयामि:। अब एक फूल लेकर गणपति पर चढ़ाएं और बोलें: एष: पुष्पान्जलि ऊं गं गणपतये नम:।
इसी प्रकार अन्य देवताओं का भी पूजन करें बस जिस देवता की पूजा करनी हो गणेश जी के स्थान पर उस देवता का नाम लें।

कलश पूजन:- इसके लिए लोटे या घड़े पर मोली बांधकर कलश के ऊपर आम के पत्ते रखें। कलश के अंदर सुपारी, दूर्वा, अक्षत व् मुद्रा रखें। कलश के गले में मोली लपेटे। नारियल पर वस्त्र लपेट कर कलश पर रखें। अब हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर वरुण देव का कलश में आह्वान करें।

ओ३म् त्तत्वायामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो हविभि:। अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुशंस मान आयु: प्रमोषी:। (अस्मिन कलशे वरुणं सांगं सपरिवारं सायुध सशक्तिकमावाहयामि, ओ३म्भूर्भुव: स्व:भो वरुण इहागच्छ इहतिष्ठ। स्थापयामि पूजयामि॥)

इसके बाद इस प्रकार श्री गणेश जी की पूजन की है उसी प्रकार वरुण देव की भी पूजा करें। इसके बाद इंद्र और फिर कुबेर जी की पूजा करें। एवं वस्त्र सुगंध अर्पण कर भोग लगाये इसके बाद इसी प्रकार क्रम से कलश का पूजन कर लक्ष्मी पूजन आरम्भ करें।

लक्ष्मी पूजन:-

सर्वप्रथम निम्न मंत्र कहते हुए माँ लक्ष्मी का ध्यान करें। ॐ या सा पद्मासनस्था, विपुल-कटि-तटी, पद्म-दलायताक्षी। गम्भीरावर्त-नाभिः, स्तन-भर-नमिता, शुभ्र-वस्त्रोत्तरीया।। लक्ष्मी दिव्यैर्गजेन्द्रैः। मणि-गज-खचितैः, स्नापिता हेम-कुम्भैः।नित्यं सा पद्म-हस्ता, मम वसतु गृहे, सर्व-मांगल्य-युक्ता।।

अब माँ लक्ष्मी की प्रतिष्ठा करें, हाथ में अक्षत लेकर मंत्र कहें – “ॐ भूर्भुवः स्वः महालक्ष्मी, इहागच्छ इह तिष्ठ, एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम्।”

प्रतिष्ठा के बाद स्नान कराएं और मंत्र बोलें – ॐ मन्दाकिन्या समानीतैः, हेमाम्भोरुह-वासितैः स्नानं कुरुष्व देवेशि, सलिलं च सुगन्धिभिः।। ॐ लक्ष्म्यै नमः।। इदं रक्त चंदनम् लेपनम् से रक्त चंदन लगाएं। इदं सिन्दूराभरणं से सिन्दूर लगाएं। ‘ॐ मन्दार-पारिजाताद्यैः, अनेकैः कुसुमैः शुभैः। पूजयामि शिवे, भक्तया, कमलायै नमो नमः।। ॐ लक्ष्म्यै नमः, पुष्पाणि समर्पयामि।’

इस मंत्र से पुष्प चढ़ाएं फिर माला पहनाएं। अब लक्ष्मी देवी को इदं रक्त वस्त्र समर्पयामि कहकर लाल वस्त्र पहनाएं। इसके बाद मा लक्ष्मी के क्रम से अंगों की पूजा करें। माता लक्ष्मी की अंग पूजा बाएं हाथ में अक्षत लेकर दाएं हाथ से थोड़े थोड़े छोड़ते जाए और मंत्र कहें :–

ॐ चपलायै नम: पादौ पूजयामि ॐ चंचलायै नम: जानूं पूजयामि, ॐ कमलायै नम: कटि पूजयामि, ॐ कात्यायिन्यै नम: नाभि पूजयामि, ॐ जगन्मातरे नम: जठरं पूजयामि, ॐ विश्ववल्लभायै नम: वक्षस्थल पूजयामि, ॐ कमलवासिन्यै नम: भुजौ पूजयामि, ॐ कमल पत्राक्ष्य नम: नेत्रत्रयं पूजयामि, ॐ श्रियै नम: शिरं: पूजयामि।

अष्टसिद्धि पूजा :-

अंग पूजन की ही तरह हाथ में अक्षत लेकर मंतोच्चारण करते रहे। मंत्र इस प्रकर है – ॐ अणिम्ने नम:, ॐ महिम्ने नम:, ॐ गरिम्णे नम:, ॐ लघिम्ने नम:, ॐ प्राप्त्यै नम: ॐ प्राकाम्यै नम:, ॐ ईशितायै नम: ॐ वशितायै नम:।

अष्टलक्ष्मी अंग पूजन :-

अंग पूजन एवं अष्टसिद्धि पूजा की ही तरह हाथ में अक्षत लेकर मंत्रोच्चारण करें। ॐ आद्ये लक्ष्म्यै नम:, ॐ विद्यालक्ष्म्यै नम:, ॐ सौभाग्य लक्ष्म्यै नम:, ॐ अमृत लक्ष्म्यै नम:, ॐ लक्ष्म्यै नम:, ॐ सत्य लक्ष्म्यै नम:, ॐ भोगलक्ष्म्यै नम:, ॐ योग लक्ष्म्यै नम:।

नैवैद्य अर्पण :-

पूजन के बाद देवी को “इदं नानाविधि नैवेद्यानि ॐ महालक्ष्मियै समर्पयामि” मंत्र से नैवैद्य अर्पित करें। मिष्टान अर्पित करने के लिए मंत्र: “इदं शर्करा घृत समायुक्तं नैवेद्यं ॐ महालक्ष्मियै समर्पयामि” बालें। प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन करायें। इदं आचमनयं ऊं महालक्ष्मियै नम:। इसके बाद पान सुपारी चढ़ायें: इदं ताम्बूल पुगीफल समायुक्तं ॐ महालक्ष्मियै समर्पयामि। अब एक फूल लेकर लक्ष्मी देवी पर चढ़ाएं और बोलें: एष: पुष्पान्जलि ऊं महालक्ष्मियै नम:।
माँ को यथा सामर्थ वस्त्र, आभूषण, नैवेद्य अर्पण कर दक्षिणा चढ़ाए दूध, दही, शहद, देसी घी और गंगाजल मिलकर चरणामृत बनाये और गणेश लक्ष्मी जी के सामने रख दे। इसके बाद 5 तरह के फल, मिठाई खील-पताशे, चीनी के खिलोने लक्ष्मी माता और गणेश जी को चढ़ाये और प्राथना करे की वो हमेशा हमारे घरो में विराजमान रहे। इनके बाद एक थाली में विषम संख्या में दीपक 11, 21 अथवा यथा सामर्थ दीप रख कर इनको भी कुंकुम अक्षत से पूजन करे इसके बाद माता लक्ष्मी को श्री सूक्त अथवा ललिता सहस्त्रनाम का पाठ सुनाये पाठ के बाद माँ से क्षमा याचना कर माँ लक्ष्मी जी की आरती कर बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लेने के बाद थाली के दीपो को घर में सब जगह रखे। लक्ष्मी-गणेश जी का पूजन करने के बाद, सभी को जो पूजा में शामिल हो, उन्हें खील, पताशे, चावल दें। सब फिर मिल कर प्राथना करे की माँ लक्ष्मी हमने भोले भाव से आपका पूजन किया है ! उसे स्वीकार करें और गणेशा, माँ सरस्वती और सभी देवताओं सहित हमारे घरों में निवास करें, प्रार्थना करने के बाद जो सामान अपने हाथ में लिया था वो मिटटी के लक्ष्मी गणेश, हटड़ी और जो लक्ष्मी गणेश जी की फोटो लगायी थी उस पर चढ़ा दे।

लक्ष्मी पूजन के बाद आप अपनी तिजोरी की पूजा भी करें :- रोली को देसी घी में घोल कर स्वस्तिक बनाये और धुप दीप दिखा करें, मिठाई का भोग लगाए।

लक्ष्मी माता और सभी भगवानों को आपने अपने घर में आमंत्रित किया है, अगर हो सके तो पूजन के बाद शुद्ध बिना लहसुन-प्याज़ का भोजन बना कर गणेश-लक्ष्मी जी सहित सबको भोग लगाए। दीपावली पूजन के बाद आप मंदिर, गुरद्वारे और चौराहे में भी दीपक और मोमबतियां जलाएं।

रात को सोने से पहले पूजा स्थल पर मिटटी का चार मुहं वाला दिया सरसों के तेल से भर कर जगा दें, और उसमे इतना तेल हो की वो सुबह तक जग सके।

माँ लक्ष्मी जी की आरती :-

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता तुम को निस दिन सेवत, मैयाजी को निस दिन सेवत, हर विष्णु विधाता …..

ॐ जय लक्ष्मी माता …
उमा रमा ब्रह्माणी, तुम ही जग माता ओ मैया तुम ही जग माता, सूर्य चन्द्र माँ ध्यावत, नारद ऋषि गाता…

ॐ जय लक्ष्मी माता ..
दुर्गा रूप निरन्जनि, सुख सम्पति दाता ओ मैया सुख सम्पति दाता …. जो कोई तुम को ध्यावत, ऋद्धि सिद्धि धन पाता।

ॐ जय लक्ष्मी माता ..
तुम पाताल निवासिनि, तुम ही शुभ दाता ओ मैया तुम ही शुभ दाता …. कर्म प्रभाव प्रकाशिनि, भव निधि की दाता …

ॐ जय लक्ष्मी माता ..
जिस घर तुम रहती तहँ सब सद्गुण आता ओ मैया सब सद्गुण आता … सब संभव हो जाता, मन नहीं घबराता…

ॐ जय लक्ष्मी माता …
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता ओ मैया वस्त्र न कोई पाता … ख़ान पान का वैभव, सब तुम से आता..

ॐ जय लक्ष्मी माता ..
शुभ गुण मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि जाता.. ओ मैया क्षीरोदधि जाता … रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता..

ॐ जय लक्ष्मी माता ..
महा लक्ष्मीजी की आरती, जो कोई जन गाता ओ मैया जो कोई जन गाता … उर आनंद समाता, पाप उतर जाता

ॐ जय लक्ष्मी माता ..।।

7 नवम्बर 2018 के चौघड़िया मुहूर्त-

दिन की चौघड़िया:-
लाभ 06:42 से 08:02
अमृत 08:02 से 09:22
काल 09:22 से 10:42
शुभ 10:42 से 12:02
रोग। 12:02 से 13:21
उद्वेग 13:21 से 14:40
चर 14:40 से 16:00
लाभ 16:00 से 17:20

रात्रि की चौघड़िया:-
उद्वेग 17:10 से 19:00
शुभ 19:00 से 20:41
अमृत 20:41 से 22:22
चर 22:22 से 24:02
रोग 24:02 से 25:42
काल 25:42 से 27:22
लाभ 27:22 से 29:02
उद्वेग 29:02 से 30:42

1. चर, लाभ, अमृत और शुभ की चौघड़िया पूजन के समय होनी चाहिये। इस प्रकार शुद्ध ज्योतिषीय गणनाओं तथा विशेष दृष्टिकोंण से यह स्पष्ट होता है, कि साधना व पूजन के लिये 7 नवम्बर 2018 की रात्रि 19:00 से 19:52 वृषभ लग्न के साथ साथ शुभ का चौघडिया भी अत्यन्त विशेष फलदायक तथा सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त हैं। अतः सभी गृहस्थ तथा साधक-साधिकाओं से मेरा यही आग्रह है की वे इस वर्ष इसी मुहूर्त में दीपावली पूजन अथवा तंत्र-मंत्र सम्बंधी साधनायें सम्पन्न करें।

शुभ स्थिर लग्न :-

महालक्ष्मी पूजन किसी स्थिर लग्न में होना उचित है, इस दिन वृषभ और सिंह दो स्थिर लग्न होंगी। वृषभ लग्न सांयकाल 19 बजकर 00 मिनट से रात्रि 19 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। और सिंह लग्न मध्य रात्रि को 00 (24) बजकर 27 मिनट से 02 बजकर 54 मिनट तक रहेगी।

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गुरू की महिमा

जब महादेवजी ने बताई पार्वतीजी को गुरु की महिमा :-

(गुरू पूर्णिमा 27/07/2018 पर विशेष) :-

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गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वर:।

गुरु: साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नम:।।

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।

तत्पदं दर्शितं येनं तस्मै श्रीगुरवे नम:।।

एक बार पार्वतीजी ने महादेवजी से गुरु की महिमा बताने के लिए कहा। तब महादेवजी ने कहा :-

गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु, गुरु ही शिव और गुरु ही परमब्रह्म है; ऐसे गुरुदेव को नमस्कार है। अखण्ड मण्डलरूप इस चराचर जगत में व्याप्त परमात्मा के चरणकमलों का दर्शन जो कराते हैं; ऐसे गुरुदेव को नमस्कार है।

ध्यानमूलं गुरोर्मूर्ति: पूजामूलं गुरो: पदम्। मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरो: कृपा।।

अर्थात्– गुरुमूर्ति का ध्यान ही सब ध्यानों का मूल है, गुरु के चरणकमल की पूजा ही सब पूजाओं का मूल है, गुरुवाक्य ही सब मन्त्रों का मूल है, और गुरु की कृपा ही मुक्ति प्राप्त करने का प्रधान साधन है। गुरु शब्द का अभिप्राय जो अज्ञान के अंधकार से बंद मनुष्य के नेत्रों को ज्ञानरूपी सलाई से खोल देता है, वह गुरु है। जो शिष्य के कानों में ज्ञानरूपी अमृत का सिंचन करता है, वह गुरु है। जो शिष्य को धर्म, नीति आदि का ज्ञान कराए, वह गुरु है। जो शिष्य को वेद आदि शास्त्रों के रहस्य को समझाए, वह गुरु है।

गुरुपूजा का अर्थ :-
गुरुपूजा का अर्थ किसी व्यक्ति का पूजन या आदर नहीं है वरन् उस गुरु की देह में स्थित ज्ञान का आदर है, ब्रह्मज्ञान का पूजन है।

गुरुपूर्णिमा मनाने का कारण :-
वैसे तो गुरू सदा पूजनीय हैं, परंतु आषाढ़ पूर्णिमा के दिन सभी अपने-अपने गुरु की पूजा विशेष रूप से करते हैं। यह सद्गुरु के पूजन का पर्व है, इसलिए इसे गुरुपूर्णिमा कहते हैं। जिन ऋषियों-गुरुओं ने इस संसार को इतना ज्ञान दिया, उनके प्रति कृतज्ञता दिखाने का, ऋषिऋण चुकाने का और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का पर्व है गुरुपूर्णिमा। यह श्रद्धा और समर्पण का पर्व है। गुरुपूर्णिमा का पर्व पूरे वर्षभर की पूर्णिमा मनाने के पुण्य का फल तो देता ही है, साथ ही मनुष्य में कृतज्ञता का सद्गुण भी भरता है। गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय।।
माता-पिता जन्म देने के कारण पूजनीय हैं, किन्तु गुरु धर्म और अधर्म का ज्ञान कराने से अधिक पूजनीय हैं। इष्टदेव के रुष्ट हो जाने पर तो गुरु बचाने वाले हैं,‌ परन्तु गुरु के अप्रसन्न होने पर कोई भी बचाने वाला नहीं हैं। गुरुदेव की सेवा-पूजा से जीवन जीने की कला के साथ परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग भी दिखाई पड़ जाता है। कवच अभेद विप्र गुरु पूजा। एहि सम विजय उपाय न दूजा।।

अर्थात् :- वेदज्ञ ब्राह्मण ही गुरु है, उन गुरुदेव की सेवा करके, उनके आशीर्वाद के अभेद्य कवच से सुरक्षित हुए बिना संसार रूपी युद्ध में विजय प्राप्त करना मुश्किल है।

गुरुपूर्णिमा को व्यासपूजा क्यों कहते हैं? :-
आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को भगवान वेदव्यास का अवतरण पृथ्वी पर हुआ था इसलिए यह व्यासपूजा या व्यासपूर्णिमा कहलाती है। व्यासजी ऋषि वशिष्ठ के पौत्र व पराशर ऋषि के पुत्र हैं। व्यासदेवजी गुरुओं के भी गुरु माने जाते हैं। वेदव्यासजी ज्ञान, भक्ति, विद्वत्ता और अथाह कवित्व शक्ति से सम्पन्न थे। इनसे बड़ा कवि मिलना मुश्किल है। उन्होंने ब्रह्मसूत्र बनाया, संसार में वेदों का विस्तार करके ज्ञान, उपासना और कर्म की त्रिवेणी बहा दी, इसलिए उनका नाम ‘वेदव्यास’ पड़ा। पांचवा वेद ‘महाभारत’ और श्रीमद्भागवतपुराण की रचना व्यासजी ने की। अठारह पुराणों की रचना करके छोटी-छोटी कहानियों द्वारा वेदों को समझाने की चेष्टा की। संसार में जितने भी धर्मग्रन्थ हैं, चाहे वे किसी भी धर्म या पन्थ के हों, उनमें अगर कोई कल्याणकारी बात लिखी है तो वह भगवान वेदव्यास के शास्त्रों से ली गयी है। इसलिए कहा जाता है–‘व्यासोच्छिष्टं जगत्सर्वम्’ अर्थात् जगत में सब कुछ व्यासजी का ही उच्छिष्ट है।
विलक्षण गुरु समर्थ रामदास के अदम्य साहसी शिष्य छत्रपति शिवाजी छत्रपति शिवाजी महाराज समर्थ गुरु रामदास स्वामी के शिष्य थे। एक बार सभी शिष्यों के मन में यह बात आयी कि शिवाजी के राजा होने से समर्थ गुरु उन्हें ज्यादा प्यार करते हैं। स्वामी रामदास शिष्यों का भ्रम दूर करने के लिए सबको लेकर जंगल में गए और एक गुफा में जाकर पेटदर्द का बहाना बनाकर लेट गए। शिवाजी ने जब पीड़ा से विकल गुरुदेव को देखा तो पूछा– ‘महाराज! इसकी क्या दवा है?’
गुरु समर्थ ने कहा – शिवा! रोग असाध्य है। परन्तु एक दवा काम कर सकती है, पर जाने दो।
शिवा ने कहा ‘गुरुदेव दवा बताएं, मैं आपको स्वस्थ किए बिना चैन से नहीं रह सकता।’
गुरुदेव ने कहा इसकी दवा है– सिंहनी का दूध और वह भी ताजा निकला हुआ; परन्तु यह मिलना असंभव सा है।
शिवा ने पास में पड़ा गुरुजी का तुंबा उठाया और गुरुदेव को प्रणाम कर सिंहनी की खोज में चल दिए। कुछ दूर जाने पर उन्हें एक सिंहनी अपने दो शावकों (बच्चों) के साथ दिखायी पड़ी। अपने बच्चों के पास अनजान मनुष्य को देखकर वह शिवा पर टूट पड़ी और उनका गला पकड़ लिया। शूरवीर शिवा ने हाथ जोड़कर सिंहनी से विनती की– ‘गुरुदेव की दवा के लिए तुम्हारा दूध चाहिए’ उसे निकाल लेने दो। गुरुदेव को दूध दे आऊँ, फिर तुम मुझे खा लेना।’ ऐसा कहकर उन्होंने ममता भरे हाथों से सिंहनी की पीठ सहलाई। मूक प्राणी भी ममता की भाषा समझते हैं। सिंहनी ने शिवा का गला छोड़ा और बिल्ली की तरह शिवा को चाटने लगी। मौका देखकर शिवा ने उसका दूध निचोड़कर तुंबा में भर लिया और सिंहनी पर हाथ फेरते हुए गुरुजी के पास चल दिए।
उधर गुरुजी सभी शिष्यों को आश्चर्य दिखाने के लिए शिवा का पीछा कर रहे थे। शिवा जब सिंहनी का दूध लेकर लौट रहे थे तो रास्ते में गुरुजी को शिष्यों के साथ देखकर शिवा ने पूछा– ‘गुरुजी, पेटदर्द कैसा है?’
गुरु समर्थ ने शिवा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा– ‘आखिर तुम सिंहनी का दूध ले आए। तुम्हारे जैसे शिष्य के होते गुरु की पीड़ा कैसे रह सकती है?’
भारतीय परम्परा में गुरुसेवा से ही भक्ति की सिद्धि हो जाती है। गुरु की सेवा तथा प्रणाम करने से देवताओं की कृपा भी मिलने लगती है।
‘गुरु को राखौ शीश पर सब विधि करै सहाय।’
कलिकाल में सद्गुरु न मिलने पर भगवान शिव ही सभी के गुरु हैं क्योंकि ‘गुरु’ शब्द से जगद्गुरु परमात्मा ईश्वर का ही बोध होता है; इसलिए कहा भी गया है :-

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूर मर्दनम्। देवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।।

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नारायण नागबली

नारायण नागबली (संतान बाधा निवारण हेतु पितृ दोष का प्रभावशाली उपाय):-

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नारायण नागबली छविनारायण नागबलि ये दोनो अनुष्ठान पद्धतियां संतान सुख की अपूर्ण इच्छा, कामना पूर्ति के उद्देश से किय जाते हैं, इसीलिए ये दोनो अनुष्ठान काम्य प्रयोग कहलाते हैं। वस्तुत: नारायणबलि और नागबलि ये अलग-अलग पूजा अनुष्ठान हैं। नारायण बलि का उद्देश मुखत: पितृदोष निवारण करना है। और नागबलि का उद्देश सर्प शाप, नाग हत्या का दोष निवारण करना है। इन में से केवल एक नारायण बलि या नागबलि अकेले नहीं कर सकते, इस लिए ये दोनो अनुष्ठान एक साथ ही करने पड़ते हैं।

पितृदोष निवारण के लिए ही नारायण नागबलि अनुष्ठान करने के लिये शास्त्रों मे निर्देशित किया गया है । प्राय: यह अनुष्ठान जातक के पूर्वजन्म के दुर्भाग्य संबधी दोषों से मुक्ति दिलाने के लिए किये जाते हैं। ये अनुष्ठान किस प्रकार व कौन इन्हें कर सकता है? इसकी पूर्ण जानकारी होना आवश्यक है। ये अनुष्ठान जिन जातकों के माता पिता जिवित हैं, वे भी विधिवत सम्पन्न कर सकते हैं, यज्ञोपवीत धारण करने के बाद कुंवारा ब्राह्मण यह अनुष्ठान सम्पन्न करा सकता है। संतान प्राप्ति एवं वंशवृद्धि के लिए ये अनुष्ठान सपत्नीक करने चाहीयें। यदि पत्नी जीवित न हो तो कुल के उद्धार के लिए पत्नी के बिना भी ये कर्म किये जा सकते हैं। यदि पत्नी गर्भवती हो तो गर्भ धारण से पाचवें महीने तक यह अनुष्ठान किया जा सकता है। घर में कोई भी मांगलिक कार्य हो तो ये अनुष्ठान एक साल तक नही किये जाते हैं। माता या पिता की मृत्यु् होने पर भी एक साल तक ये अनुष्ठान करने निषिद्ध माने गये हैं।

दोनों प्रकार यह अनुष्ठान एक साथ और निम्नलिखित इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए किये जाते हैं :-

1. काला जादू के प्रभाव से मुक्ति पाने के लिए।
2. संतान प्राप्ति के लिए।
3. भूत प्रेत से छुटकारा पाने के लिए।
4. घर के किसी व्यक्ति की दुर्घटना के कारण मृत्यु होती है (अपघात, आत्महत्या, पानी में डूबना) इस की वजह से अगर घर में कोई समस्याए आती है तो, उन समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए यह अनुष्ठान किया जाता है।

संतान प्राप्ति के लिए :-
सनातन मान्यता के अनुसार प्रत्येक दम्पत्ती की कम से कम एक पुत्र संतान प्राप्ति की प्रबल इच्छा होती है, और इस इच्छा की पूर्ति न होना दम्पत्ती के लिए बहुत दुःखदाई होता है, हालांकि इस आधुनिक युग में टेस्ट ट्यूब बेबी जैसी उपचार पद्धतियां उपलब्ध हैं, लेकिन कुछ जोड़ों की कमाई के हिसाब से यह बहुत खर्चीली होती हैं। इस लिये बहुत से लोग इन महेंगे उपचारों के कारण खर्च करने में समर्थ नहीं होते, और कुछ इस के लिए कर्जा लेते हैं, लेकिन जब कभी इस महेंगे उपचारों का भी कोई लाभ नहीं होता, तब यह जोड़े ज्योतिषीयों के पास जाते हैं, और एक अच्छा अनुभवी ज्योतिषी ही इस समस्या का समाधान और उपचारों की विफलता का कारण बता सकता है।

शास्त्र कहते हैं :- जहां रोग है, वहां उपचार भी है। इसी नियम को ध्यान में रखते हुऐ हमारे पूर्वज ऋषियों ने इन समस्याओं के समाधान हेतु ज्योतिष शास्त्र में कुछ विशेष उपाय सुझाए हुए है, सब से पहेले ज्योतिषी यह देखते हैं की इस की पीड़ित दंपति की जन्म कुंडली में संतान प्राप्ति का योग है या नहीं? अगर है, तो गर्भधारण करने में समस्या का कारण क्या है? जैसे की पूर्व जन्म के पाप, पितरों का श्राप, कुलविनाश का योग, इनमें से कोई विशेष कारण पता चलने के बाद वह उस समस्या का निराकरण सुझाते खोजते हैं। इन उपायों में से नारायण नागबली सर्वश्रेष्ठ उपाय माना जाता है। यदि यह अनुष्ठान उचित प्रकार से और मनोभाव से किया जाए, तो संतानोत्पत्ति की काफी संभावनाए हो जाती हैं।

भूत-प्रेत बाधा के कारण संतानोत्पत्ति में रूकावटें :-
कोई स्थाई अस्थाई संपत्ति जैसे के, घर जमीन या पैसा किसी से जबरन या ठग कर हासिल की जाती है तो, मृत्यु पश्चात् उस व्यक्ति की आत्मा उसी संपत्ति के मोह रहती है, उस व्यक्ति को मृत्यु पश्चात् जलाया या दफनाया भी जाए तो भी उस की इच्छाओं की आपूर्ति न होने के कारण उस की आत्मा को माया से मुक्ति नहीं मिल पाती, और वह आत्मा प्रेत योनी में भटकती है, और उस के पतन के कारण व्यक्ति को वह पीड़ा देने लगती है, यदि किसी शापित व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात् उसकी अंतेष्ठि विधि शास्त्रों अनुसार संपन्न न हो, या श्राद्ध न किया गया हो, तब उस वजह से उस से सम्बंधित व्यक्तिओं को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है, जैसे कि– संतति का आभाव, यदि संतान होती भी है, तो उस का अल्प जीवी होना
संतति का ना होना ही है।

1. काफी कष्टों के बावजूद आर्थिक अड़चनों का सामना करना
खेती में नुकसान।
2. व्यवसाय में हानि, नौकरी छूट जाना, कर्जे में डूब जाना,
परिवार में बिमारीयाँ।
3. मानसिक या शारीरिक परेशानी, विकलांग संतति का जन्म होना, या अज्ञात कारणों से पशुधन का विनाश।
4. परिवार के किसी सदस्यों को भूत बाधा होना।
5. परिवार के सदस्यों में झगड़े या तनाव होना।
6. महिलाओं में मासिक धर्म का अनियमित होना, या गर्भपात होना।
ऊपर लिखे हुये सभी या किसी भी परेशानी से व्यक्ति झूंज रहा हो तोतो, उसे नारायण-नागबली करने की सलाह दी जाती है।

श्राप सूचक स्वप्न :-
कोई व्यक्ति यदि निम्नलिखित स्वप्न देखता है, तो वह पिछले या इसी जन्म में श्रापित होता है :-
1. स्वप्न में नाग दिखना, या नाग को मारते हुवे दिखना, या टुकड़ो में कटा हुवा नाग दिखना।
2. किसी ऐसी स्त्री को देखना, जिसके बच्चे की मृत्यु हो गई है, वह उस बच्चे के प्रेत के पास बैठ कर अपने बच्चे को उठने को कह रही है, और लोग उसे उस प्रेत से दूर कर रहे है।
3. विधवा या किसी रोगी सम्बन्धी को देखना।
4. किसी ईमारत को गिरते हुए देखना।
5. स्वप्न में झगड़े देखना।
6. खुद को पानी में डूबते हुये देखना।
इस प्रकार के स्वप्नों से मुक्ति पाने के लिए नारायण-नागबली अनुष्ठान किया जाता है। धर्मसिंधु और धर्मनिर्णय इन प्राचीन ग्रंथो में इस अनुष्ठान के विषय में लिखा हुआ है।

दुर्मरण :-
किसी भी प्रकार से दुर्घटना यदि मृत्यु का कारण हो, और अल्पायु में मृत्यु होना दुर्मरण कहा जाता है। किसी मनुष्य की इस प्रकार से मृत्यु उस मनुष्य के परिवार के लिए अनेक परेशानियों का कारण बनती है। निम्नलिखित कारण से आने वाली मृत्यु दुर्मरण कहलाती है :-

1. विवाह से पहले मृत्यु होना।
2. परदेस में मृत्यु होना।
3. गले में अन्न अटक कर श्वास रुकने से मृत्यु होना।
4. पंचक, त्रिपाद या दक्षिणायन काल में मृत्यु होना।
5. आग में जल कर मृत्यु होना।
6. किसी खतरनाक जानवर के हमले से मृत्यु होना।
7. छोटे बच्चे का किसी के हाथों मारा जाना।
8. पानी में डूब जाने से मृत्यु होना।
9. आत्महत्या करना।
10. आकाशीय बिजली गिरने या बिजली के झटके से मृत्यु।
यह सब कारण हैं, जिसके कारण किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो, परिवार में आर्थिक, मानसिक वा शारीरिक परेशानियां हो सकती हैं, इं परेशानियों को दूर करने के लिए परिजनों को नारायण-नागबली करवाने की सलाह दी जाती ।

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धूम उपग्रह

वृहत्पराशर होरा शास्त्र, आलेख- 1

धूम उपग्रह (भावस्थिति अनुसार फलादेश)

1. कुंडली में धूम यदि – प्रथम स्थान में हो तो, वह जातक निर्मल (सुंदर) नेत्र वाला, शूरवीर, हठी परंतु घृणा रहित, दुष्ट बुद्धि वाला और महाक्रोधी होता है।

2. कुंडली में धूम यदि – द्वितीय स्थान में हो तो, वह जातक धनवान परंतु रोगी, किसी अंग से हीन, राजपक्ष से चिंतित, मूर्खतापूर्ण व्यवहार वाला और कुछ मात्रा में नपुंसक होता है।

3. कुंडली में धूम यदि – तृतीय स्थान में हो तो, वह जातक बुद्धिमान, युद्ध की स्थिति में विचारपूर्ण नीति तय करने वाला, मिष्ठभाषी, शांतचित्त वाला और धनवान होता है।

4. कुंडली में धूम यदि – चतुर्थ स्थान में हो तो, वह जातक स्त्री से रति के समय निढाल या रतिरहित, चिंतनशील, शास्त्र अध्ययन में रूचि रखने वाला होता है।

5. कुंडली में धूम यदि – पंचम स्थान में हो तो, वह जातक कम संतान वाला, अल्पधनी, भारी शरीर वाला, शाकाहारी और मांसाहारी भी होता है, इसे मित्रता में अधिक रूचि नहीं होती।

6. कुंडली में धूम यदि – षष्ठ स्थान में हो तो, वह जातक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाला, तेजस्वी, निरोगी और विख्यात् होता है।

7. कुंडली में धूम यदि – सप्तम स्थान में हो तो, वह जातक अल्प धनी, धोखाधड़ी में विश्वास रखने वाला और रूखे चेहरे वाला होता है।

8. कुंडली में धूम यदि – अष्टम स्थान में हो तो, वह जातक कठिनाई के समय हिम्मत हीन, दूसरे समय उत्साहित, सत्य में विश्वास रखने वाला तथा निष्ठुर या कठोर होता है।

9. कुंडली में धूम यदि – नवम स्थान में हो तो, वह जातक धनवान, मान-सम्मान वाला, प्रसिद्ध व्यक्तित्व, अपनों से स्नेह रखने वाला और एेशवर्यशाली होता है।

10. कुंडली में धूम यदि – दशम स्थान में हो तो, वह जातक संतान सुख तथा ऐश्वर्य से सम्पन्न, बुद्धिमान, सुखी और सत्य में विश्वास रखने वाला होता है।

11. कुंडली में धूम यदि – एकादश स्थान में हो तो, वह जातक धन और प्रचूर सम्पत्ति युक्त, कलाप्रेमी और गायन विद्या या वाद्य में निपुण होता है।

12. कुंडली में धूम यदि – द्वादश स्थान में हो तो, वह जातक दोषी, अपराध करने वाला, धोखाधड़ी वाला, दूसरी स्त्रीयों में रूचि वाला, नशे के वशीभूत और दुष्टप्रवृती वाला होता है।

(आलेख- 19-07-2018)

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