सूर्य sun

ज्योतिष मतानुसार सूर्य से पृथ्वी की दूरी अनुमानित सवा करोड़ मील है। सूर्य ग्रह न होकर एक तारा है, जो कि स्थिर है, और अपने अक्ष पर निरन्तर घूमता है। अन्य सभी ग्रह उसकी परिक्रमा करते हैं। सूर्य सदैव मार्गी व उदित रहने वाला ग्रह है।

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ज्योतिष मतानुसार सूर्य नवग्रहों में से एक ग्रह है, ग्रहों में सूर्य आत्मा, आँख, हृदय, हड्डियों, शारीरिक संगठन, आरोग्यता, निजी व्यवहार, सत्वगुण, राज-कृपा, आविष्कार, अधिकार तथा सत्ता का कारक (अधिपति) ग्रह माना गया है, इसे लग्न, धर्म तथा कर्म 1, 9, 10 भाव का कारक भी माना जाता है, तथा इसके द्वारा विशेष रूप से पिता के सम्बंध का विचार किया जाता है।

कुण्डली में सूर्य जिस स्थान पर स्थित हो, गोचर काल में उससे छठे स्थान में किसी ग्रह के होने से सूर्य का वेध हो जाता है, वेधित सूर्य सदैव अशुभ फलदायक है, सूर्य के विद्व स्थान है – 1, 12, 4 तथा 5। सूर्य के शुभ स्थान 3-6-10 व 11 हैं, सूर्य तथा शनि में आपस में कभी वेध नहीं होता, यदि सूर्य विद्ध स्थान पर हो, तथा अन्य ग्रह सूर्य के स्थान शुभ पर ही हो तो उसे विलोम-वेध कहाँ जाता है। विलोम-वेध भी अशुभ फल देने वाला माना गया है।

अन्य:- निसर्ग बल में सूर्य को सब ग्रहों में बलवान माना गया है, यह सर्वाेच्च, स्वराशि, देष्काण, होरा, रविवार, नवांश, उत्तरायण, दिन में मध्य भाग, रात्रि के प्रवेश-काल, मित्र के नवांश तथा लग्न से दशम में (मतान्तर से सप्तम भाव) सदैव बलवान रहते हैं, मकर से 6 राशियों तक इसे चेष्टा बली माना गया है। जन्म कुण्डली में सूर्यदेव ऐसे कई योगों का निर्माण करते हैं, जो विशेष होते हैं, सूर्य समस्त ग्रहों में राजा होता है। अतः इसका जन्मपत्रिका में बलवान एवं योगकारक होना जातक के राजसी गुणों को प्रकट करता है। जातक परिजात, फलदीपिका, बृहत पाराशर होरा शास्त्र इत्यादि ज्योतिषीय ग्रंथों में योग बताये गये हैं जो निम्न प्रकार के हैं :-

1. जन्मपत्रिका में सूर्य से चन्द्रमा केन्द्र में है तो अधम योग से धन, सवारी, बुद्धि, ज्ञान, विद्या, उदारता, यश, मान-सम्मान, सुख-सुविधा के योग में कमी या कम फल प्राप्त करता है।

2. जन्मपत्रिका में सूर्य से द्वितीय मंगल, बुध व बृहस्पति, शुक्र या शनि में से कोई एक ग्रह या अधिक ग्रह हो तो शुभ वेसि योग व जब इनमें से कोई ग्रह या अधिक ग्रह द्वादश में तो शुभ वासि योग, इससे जातक विद्वान, धर्म पालक, प्रतिष्ठिता सुन्दर, धीर एवं अधिकार प्राप्त करने वाला होता है।

3. सूर्य यदि परम उच्च अर्थात मेष के दस अंश पर रहने से उसकी दशा में जातक की धर्म-कर्म में प्रीति बढ़े व पिता द्वारा संचय किया धन तथा भूमि का लाभ हो वहीं उच्चस्थ सूर्य में धन-अन्न व सम्मान की वृद्धि पर बंधु वर्गाें से झगड़ों के कारण परदेश वास की संभावना रहे, वाहनों का सुख प्राप्त होना सम्भव।

4. परम नीच सूर्य की दशा में पिता-माता की मृत्यु, स्त्री पुत्र, सम्पत्ति व स्वयं के गृह में हानि होती है, भय सदैव व्याप्त रहे जबकि नीचस्थ सूर्य से राजकोष से धन-मान की हानि, स्त्री-पुत्र-मित्रादि से क्लेश व किसी स्वजन की मृत्यु की आशंका रहे।

5. उच्च नवांशस्थ रवि जातक में साहस की वृद्धि कर झगड़े में विजय दिलाकर धन वृद्धि करवाता है (कोर्ट केस में विजय), पर पितृ कुल के जनों में बारम्बार क्षति होती रहे। नीचस्थ नवांश का बृहस्पति परदेश यात्रा में स्त्री-पुत्र, धन तथा पृथ्वी से हानि कराता है, मानसिक व्यथाकारी, ज्वरादि से पीड़ित व गुप्तेन्द्रियों की वेदना से कष्ट पाता है। उच्चस्थ सूर्य नवमांश में नीचस्थ हो जाये तो स्त्री, समीपी कुटुम्बियों की मृत्यु व संतान पर आपत्ति का कारण बनता है वहीं नीचस्थ सूर्य यदि नवमांश में उच्च हो तो वह महान सुख व सम्मान प्राप्त करवाता है परन्तु जब दशा का अंत हो रहा हो तो इसका फल विपरीत हो जाता है।

सूर्य महादशाः-
1. लग्नस्थ सूर्य की महादशा में जब मंगल, चंद्र, शनि या राहु की अंतर्दशा होती है तो दुःख राजकीय-अधिकार और गृह तथा धन का नाश हों, लग्नस्थ सूर्य को महादशा में जब गोचर मंगल, चन्द्रमा शनि अथवा राहु की अंतर्दशा आदि है तब सुख, राज्य, अधिकार और गृह तथा धन-सुख की प्राप्ति हो।

2. द्वितीयस्थ सूर्य की महादशा में जब पापग्रहों की अंतर्दशा आये तब धन क्षय, अपमानकारक शब्दों का श्रवण, मानसिक अशांति अकारण भय, नेत्र-रोग वहीं शुभ ग्रहों की अंतर्दशा में सुख, विद्या की प्राप्ति राजनेताओं से प्रेम व भूषण, वस्त्र वाहनादि का सुख मिले।

3. तृतीयस्थ सूर्य की महादशा में गोचर ग्रह की अंतर्दशा आने से सुख जबकि अगोचर ग्रह की अंतर्दशा आने से निकृष्ट फल।

4. चतुर्थस्थ सूर्य की महादशा में पापाग्रह की अंतर्दशा मानसिक अशांति राज, अग्नि, चोर भय व भ्राता की मृत्यु का भय रहें, शुभग्रह की अंतर्दशा में अत्यंत सुख, राज, धन, वस्त्र, सुंगधादि पदार्थ व स्त्री-पुत्रादि का सुख होता है।

5. पंचमस्थ सूर्य की महादशा में जब शनि, मंगल, केतु या राहु की अंतर्दशा चोर, अग्नि व राज पीड़ा दे, संतान को क्लेश रहें, शुभ ग्रह की अंतर्दशा में आनंद, राज्य भूषण व वाहन प्राप्ति व संतान सुख करवायें।

6. षष्ठस्थ सूर्य की महादश में पापग्रह की अंतर्दशा ऋण-ग्रस्त करवाये, शत्रुपक्ष से विशेष भय वहीं शुभ ग्रहान्र्तदशा में सुख व उत्तम फल पर अंत में दुखी होता है।

7. सप्तमस्थ सूर्य की महादशा में शुक्र, बृहस्पति, चन्द्रमा, बुध की जब अंतर्दशा आयें तो मन में उत्साह, भूषण, वस्त्र-वाहन की प्राप्ति स्त्री लाभ जबकि पाप ग्रह की अंतर्दशा ज्वर अतिसार, पित्त प्रकोप, प्रमेह, मूत्रकृच्छ इत्यादि रोग व शत्रु भय कराती है।

8. अष्ठमस्थ सूर्य की महादशा में जब शुभ ग्रह की अंतर्दशा आये तब भूषण-वस्त्रादि की प्राप्ति अधिक शुभ फल हो, पर किंचित दुख भी रहें, पाप ग्रह अंतर्दशा में नाना प्रकार के भय, पराधीनता, व्याधि, दुःख, पीड़ा व मरण भय।

9. नवमस्थ सूर्य की महादशा में शुभ ग्रह की अंतर्दशा दान की प्रवृत्ति, उत्सवादि सुख, यज्ञादि क्रिया की संभावना व उत्तम कार्यों को करने का अवकाश मिलता हैं, पाप ग्रह की अंतर्दशा में दुःख वृद्धि गुरू व पिता की मृत्यु हों।

10. दशमस्थ सूर्य की महादशा में पाप ग्रह की अंतर्दशा हो तो उत्तम कर्म की हानि, कर्म क्षेत्र में व्यवधान, अकारण संकट, चोर-भय वही शुभ ग्रह की महादशा में धन की प्राप्ति, आय के स्रोतों में वृद्धि, कर्म क्षेत्र में विस्तार की संभावना व अस्थायी कीर्ति हों।

11. एकादशस्थ सूर्य की महादशा में पाप ग्रह की अंतर्दशा आरम्भ में दुख अंत में सुख दें, शुभ ग्रह की अंतर्दशा राजकीय अनुग्रह की प्राप्ति, धन की उपलब्धि, स्त्री-पुत्र सुख दे।

12. द्वादशस्थ सूर्य की महादशा में पाप ग्रह की अंतर्दशा डिमोशन, पद-छूटना, प्रवास, राज-कोष से मानहानि करवायें, शुभ ग्रह की अंतर्दशा भूमि, पशु, धन-धान्य प्राप्त करायें।

जन्मराशि से सूर्य का गोचर का भ्रमण फल :

1. गोचर का सूर्य जब जन्म राशि पर से गुजरता है तो अशुभ स्वप्न, सिरदर्द, मस्से की तकलीफ, सम्मान में गिरावट पत्नी से तकरार संभव, रक्त-विकार, नेत्रपीड़ा, रिश्तेदारों व करीबी मित्रों से झगड़ा संभव। कार्यों के छूटने की संभावना रहें।

2. गोचर का सूर्य जन्मराशि से दूसरे स्थान पर से गुजरता है तो अशुभ कर्म में रत, आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों से मिलना, कमजोर मन, दुश्मनी बढ़े वेगपीड़ा, कीमती वस्तु की चोरी संभव, बुरे परिणामों की अनुभूति।

3. गोचर का सूर्य जन्म राशि से तीसरे आवे तो धन लाभ, पराक्रम वृद्धि शत्रुओं पर विजय, सामाजिक कार्यों में व्यस्त, रोग कर्ज से मुक्ति दूसरो के हित संघर्ष, विजय, जातक के निर्णय सही होगें, स्थानान्तरण अथवा दूरस्थ यात्रायें संभव।

4. गोचर का सूर्य जन्मराशि से जब चैथे भ्रमण करता है तो घरेलू परेशानी, संतान कष्ट, मानसिक कलह, व्यसनी, निर्णय लेने में असफल, घर की स्त्रियाँ बीमार या दुर्घटनाग्रस्त, कृषि में हानि, अहं को ठेस पहुँचे, मित्र-परिजनों में टकराव सम्भव।

5. गोचर का सूर्य जन्मराशि से पंचम स्थान पर से गुजरे शारीरिक एवं मानसिक बैचेनी, आवक में कमी, संचित धन के खर्च की बढ़ोत्तरी, संतान अवज्ञाकारी-बीमार, सेक्स-प्रेम प्रसंग में असंतुष्टि, पेट की बीमारी, उच्च अधिकारियों या अच्छे सम्बंधों में गलतफहमियाँ।

6. गोचर का सूर्य जन्मराशि से छठे से भ्रमण करें तो रोगों का भय, शत्रुओं पर विजय, हाथ में लिये कार्यों में सफलता, उच्च अधिकारी प्रबल रहे, प्रतियोगिता में सभी प्रकार की सफलता, पंचम भावस्थ गोचर के अशुभ फलों का नाश हो शुभ फल मिलें।

7. गोचर का सूर्य जन्मराशि से सप्तम आये तो रोगों का प्रकोप, पेट व गुदामार्ग में रोगों का होना संभव, पत्नी-बच्चे बीमार, वैवाहिक जीवन में कटुता, यात्रायें नुकसानदायक, सम्मान हानि, नौकरी में अवनति, भागीदारी में तकरार संभव।

8. गोचर का सूर्य जन्मराशि से अष्टम आयें तो शत्रुओं से विवाद, बुरे परिणाम, राज भय संभव, पति पत्नी में तनाव, सरकार से आर्थिक दंड, धन हानि, आवक में रूकावट, स्वभाव में अस्थिरता।

9. गोचर का सूर्य जन्मराशि से नवें आये तो अशुभ, पिता से बिछोह, धन-सम्मान हानि, मिथ्या दोषारोपण, जातक अंहकार व पूर्वाग्रह से ग्रसित रहें, मन में निराशा संभव, पापनाश हेतु तीर्थयात्रा संभव।

10. गोचर का सूर्य जन्मराशि से दशम आये तो अभीष्ट कार्य हो, स्वास्थ्य लाभ, उच्च अधिकारियों का सहयोग मिले, पदोन्नति, भाग्योदय में सहायक।

11. गोचर का सूर्य जन्मराशि से एकादश आये तो अचानक उत्तम फल, आवक के जरियो में वृद्धि, धंधे-व्यापार में लाभ, चिंतायें समाप्त रोग नाश, मित्र-रिश्तेदार मदद करें, उत्तम वाहन, उत्तम भोजन मिलें।

12. गोचर का सूर्य जन्मराशि से द्वादश आये तो अशुभ समाचारों की प्राप्ति, धारा प्रवाह खर्च, बीमारी, मित्रों से कलह, नेत्र विकार पेट की समस्या, अदालती केस चलता हो तो उसमें हार, आराम का नाश।

अशुभ सूर्य के उपाय :-
1. प्रतिदिन उदित होते सूर्य को ताम्र पात्र में जल भरकर उसमें थोड़ा-सा कुकुम डालकर, लाल पुष्प सहित सूर्याध्य दें।

2. नेत्रों की व्याधियों में सूर्योपासना सहित नेत्रोपनिषद का नित्य पाठ करें।

3. रविवार को नमक रहित भोजन करें।

4. तांम्र पात्र, गेहूँ, गुड़, दक्षिणा सहित किसी ब्राह्मण को दान करें।

5. सूर्य कृत साधारण अरिष्टों में नवग्रह कवच सहित सूर्य कवच एवं शतनाम का पाठ भी पर्याप्त शुभफलप्रद रहे।

इस प्रकार सूर्य अपनी भिन्न-भिन्न स्थितियों से भिन्न-भिन्न फलों को देते हुये अपना प्रभाव देते हैं, यदि कोई विष्टि समस्या हो तो सविधिपूर्वक सूर्य योग अथवा वेदोक्त मंत्रों का अनुष्ठान रूप जप करवाना सवोत्तम रहता है।

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