दीपावली पूजन 2018

दीपावली पूजन के शुभ मुहूर्त:-

(Dr.R.B.Dhawan, Top best Astrologer in Delhi)

इस वर्ष दीपावली पर्व 7 नवम्बर 2018 के दिन है, इस दिन अमावस्या तिथि दिल्ली की गणना अनुसार लगभग 20:32 तक रहेगी। महालक्ष्मी पूजन किसी स्थिर लग्न में होना उचित है, इस दिन वृषभ और सिंह दो स्थिर लग्न होंगी। वृषभ लग्न सांयकाल 17 बजकर 57 मिनट से रात्रि 19 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। और सिंह लग्न मध्य रात्रि को 00 (24) बजकर 27 मिनट से 02 बजकर 54 मिनट तक रहेगी। इन दोनो महूर्त में स्वाती नक्षत्र 19 बजकर 37 मिनट तक, इसके पश्चात विशाखा नक्षत्र पढेगा। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इन दोनो लग्नों का यह समय दिल्ली प्रदेश के लिये है। शेष भारत अथवा विदेशों में रहने वाले पाठक अपने देश या प्रदेश के लिये उपरोक्त स्थिर लग्नों का समय shukracharya कार्यालय से फोन द्वारा पता कर सकते हैं। इन्हीं दो स्थिर लग्न में से किसी लग्न में जब अनुकूल चौघड़िया भी हो तब महालक्ष्मी पूजन किया जा सकता है।

महालक्ष्मी पूजन के लिए पूजा स्थल एक दिन पहले से सजाना चाहिए पूजन के लिए सामग्री दिपावली से पहले ही एकत्रित कर लें। इसमें यदि माता लक्ष्मी के पसंद को ध्यान में रख कर पूजा की जाए तो शुभत्व की वृद्धि होती है। माता के पसंदीदा रंग लाल, व गुलाबी हैं, इसके बाद फूलों की बात करें, तो कमल और गुलाब माता लक्ष्मी के प्रिय फूल हैं। पूजा में फलों का भी खास महत्व होता है। फलों में उन्हें श्रीफल, सीताफल, बेर, अनार व सिंघाड़े पसंद हैं। आप इनमें से कोई भी फल पूजा के लिए प्रयोग कर सकते हैं। अनाज रखना हो तो चावल रखें, वहीं मिठाई में माता लक्ष्मी की पसंद शुद्ध केसर से बनी मिठाई या हलवा, शीरा और नैवेद्य हैं।

माता के स्थान को सुगंधित करने के लिए केवड़ा, गुलाब और चंदन के इत्र का प्रयोग करें। दीये के लिए आप गाय के घी, मूंगफली या तिल्ली के तेल का इस्तेमाल कर सकते हैं। यह माता लक्ष्मी को शीघ्र प्रसन्न करते हैं। पूजा के लिए महत्वपूर्ण दूसरी वस्तुओं में गन्ना, कमल गट्टा, खड़ी हल्दी, बिल्वपत्र, पंचामृत, गंगाजल, ऊन का आसन, रत्न आभूषण, गाय का गोबर, सिंदूर और भोजपत्र शामिल हैं।

चौकी सजाना :-

1. लक्ष्मी-गणेश की चांदी या फिर मिट्टी से बनी छोटी प्रतिमा, 2. चांदी पर उत्कीर्ण महालक्ष्मी यंत्र (पहले से प्राणप्रतिष्ठित)। 3. मिट्टी के बने हुए 21, 31 या 51 छोटे और 3 बड़े दीपक। 4. एक तांबे का कलश जिस पर नारियल रखेंगे, व आचमनी। 5. चांदी और तांबे के सिक्के, बहीखाता, कलम और दवात। 6. नकदी, थालियां, जल पात्र, चावल, फूल, सुपारी, रोली, कलावा, पानी वाला नारियल, लाल वस्त्र,।

1. ग्यारह दीपक, 2. खील, बताशे, मिठाई, वस्त्र, आभूषण, चन्दन का लेप, सिन्दूर, कुंकुम, सुपारी, पान, 3. फूल, दुर्वा, चावल, लौंग, इलायची, केसर-कपूर, हल्दी-चूने का लेप, सुगंधित पदार्थ, धूप, अगरबत्ती, एक दीपक।

सबसे पहले एक लकड़ी की चौकी पर लक्ष्मी व गणेश की मूर्तियां इस प्रकार रखें, कि उनका मुख पूर्व या पश्चिम की ओर रहे। लक्ष्मीजी, गणेशजी की दाहिनी ओर रहें। पूजा करने वाले मूर्तियों के सामने की तरफ बैठें। कलश को लक्ष्मीजी के पास चावलों पर रखें। नारियल को लाल वस्त्र में इस प्रकार लपेटें कि नारियल का अग्रभाग दिखाई देता रहे, व इसे कलश पर रखें। यह कलश वरुण का प्रतीक है। दो बड़े दीपक रखें, एक में घी भरें व दूसरे में तेल। एक दीपक चौकी के दाईं ओर रखें, व दूसरा मूर्तियों के चरणों में। इसके अलावा एक बड़ा दीपक गणेशजी के पास रखें।

मूर्तियों वाली चौकी के सामने छोटी चौकी रखकर उस पर लाल वस्त्र बिछाएं। कलश की ओर एक मुट्ठी चावल से लाल वस्त्र पर नवग्रह की प्रतीक नौ ढेरियां बनाएं। गणेशजी की ओर चावल की सोलह ढेरियां बनाएं। ये सोलह मातृका की प्रतीक हैं। नवग्रह व षोडश मातृका के बीच स्वस्तिक का चिह्न बनाएं।
इसके बीच में सुपारी रखें, व चारों कोनों पर चावल की ढेरी। सबसे ऊपर बीचों बीच ॐ लिखें। छोटी चौकी के सामने तीन थाली व जल भरकर कलश रखें। थालियों की निम्नानुसार व्यवस्था करें- 1. ग्यारह दीपक, 2. खील, बताशे, मिठाई, वस्त्र, आभूषण, चन्दन का लेप, सिन्दूर, कुंकुम, सुपारी, पान, 3. फूल, दुर्वा, चावल, लौंग, इलायची, केसर-कपूर, हल्दी-चूने का लेप, सुगंधित पदार्थ, धूप, अगरबत्ती, एक दीपक।

इन थालियों के सामने पूजा करने वाला बैठे। आपके परिवार के सदस्य आपकी बाईं ओर बैठें। कोई आगंतुक हो तो वह आपके या आपके परिवार के सदस्यों के पीछे बैठे। हर वर्ष दीपावली पूजन में नया सिक्का लें, और पुराने सिक्को के साथ इकट्ठा रख कर दीपावली पर पूजन करें, और पूजन के बाद सभी सिक्को को तिजोरी में रख दें।

पूजा की संक्षिप्त विधि स्वयं पूजा करने के लिए :- हाथ में पूजा के जलपात्र से थोड़ा सा जल ले लें, और अब उसे मूर्तियों के ऊपर छिड़कें। साथ में नीचे दिया गया पवित्रीकरण मंत्र पढ़ें। इस मंत्र और पानी को छिड़ककर आप अपने आपको पूजा की सामग्री को और अपने आसन को भी पवित्र कर लें।

शरीर एवं पूजा सामग्री पवित्रीकरण मन्त्र :-

ॐ पवित्रः अपवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपिवा।
यः स्मरेत्‌ पुण्डरीकाक्षं स वाह्यभ्यन्तर शुचिः॥

पृथ्वी पवित्रीकरण विनियोग:-

पृथ्वी देवता मंत्रस्य मेरुपृष्ठः ग षिः सुतलं छन्दः
कूर्मोदेवता आसने विनियोगः॥

अब पृथ्वी पर जिस जगह आपने आसन बिछाया है, उस जगह को पवित्र कर लें, और मां पृथ्वी को प्रणाम करके मंत्र बोलें-
पृथ्वी पवित्रीकरण मन्त्र :-

ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता। त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्‌॥ पृथिव्यै नमः आधारशक्तये नमः।

अब आचमन करें :-

पुष्प, चम्मच या अंजुलि से एक बूंद पानी अपने मुंह में छोड़िए और बोलिए-

ॐ केशवाय नमः।

और फिर एक बूंद पानी अपने मुंह में छोड़िए और बोलिए-

ॐ नारायणाय नमः।

फिर एक तीसरी बूंद पानी की मुंह में छोड़िए और बोलिए-

ॐ वासुदेवाय नमः।

इसके बाद संभव हो तो किसी किसी ब्राह्मण द्वारा विधि विधान से पूजन करवाना अति लाभदायक रहेगा। ऐसा संभव ना हो तो सर्वप्रथम दीप प्रज्वलन कर गणेश जी का ध्यान कर अक्षत पुष्प अर्पित करने के पश्चात दीपक का गंधाक्षत से तिलक कर निम्न मंत्र से पुष्प अर्पण करें।

शुभम करोति कल्याणम, अरोग्यम धन संपदा, शत्रु-बुद्धि विनाशायः, दीपःज्योति नमोस्तुते !

पूजन हेतु संकल्प :-

इसके बाद बारी आती है संकल्प की। जिसके लिए पुष्प, फल, सुपारी, पान, चांदी का सिक्का, नारियल (पानी वाला), मिठाई, मेवा, आदि सभी सामग्री थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लेकर संकल्प मंत्र बोलें-

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु:, ऊं तत्सदद्य श्री पुराणपुरुषोत्तमस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय पराद्र्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे सप्तमे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे जम्बुद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गत ब्रह्मवर्तैकदेशे पुण्य (अपने नगर/गांव का नाम लें) क्षेत्रे बौद्धावतारे वीर विक्रमादित्यनृपते : 2070, तमेऽब्दे शोभन नाम संवत्सरे दक्षिणायने/उत्तरायणे हेमंत ऋतो महामंगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमे कार्तिक मासे कृष्ण पक्षे अमावस तिथौ (जो वार हो) रवि वासरे स्वाति नक्षत्रे आयुष्मान योग चतुष्पाद करणादिसत्सुशुभे योग (गोत्र का नाम लें) गोत्रोत्पन्नोऽहं अमुकनामा (अपना नाम लें) सकलपापक्षयपूर्वकं सर्वारिष्ट शांतिनिमित्तं सर्वमंगलकामनया– श्रुतिस्मृत्यो- क्तफलप्राप्तर्थं— निमित्त महागणपति नवग्रहप्रणव सहितं कुलदेवतानां पूजनसहितं स्थिर लक्ष्मी महालक्ष्मी देवी पूजन निमित्तं एतत्सर्वं शुभ-पूजोपचारविधि सम्पादयिष्ये।

गणेश पूजन :-

किसी भी पूजन की शुरुआत में सर्वप्रथम श्री गणेश को पूजा जाता है। इसलिए सबसे पहले श्री गणेश जी की पूजा करें। इसके लिए हाथ में पुष्प लेकर गणेश जी का ध्यान करें। मंत्र पढ़े –

गजाननम्भूतगणादिसेवितं कपित्थ जम्बू फलचारुभक्षणम्। उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्।

गणपति आवाहन:- ॐ गं गणपतये इहागच्छ इह तिष्ठ।। इतना कहने के बाद पात्र में अक्षत छोड़ दे।

इसके पश्चात गणेश जी को पंचामृत से स्नान करवाये पंचामृत स्नान के बाद शुद्ध जल से स्नान कराए अर्घा में जल लेकर बोलें- एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम् ऊं गं गणपतये नम:।

रक्त चंदन लगाएं:- इदम रक्त चंदनम् लेपनम् ऊं गं गणपतये नम:। इसी प्रकार श्रीखंड चंदन बोलकर श्रीखंड चंदन लगाएं। इसके पश्चात सिन्दूर चढ़ाएं :- इदं सिन्दूराभरणं लेपनम् ॐ गं गणपतये नम:। दूर्वा और विल्बपत्र भी गणेश जी को अर्पित करें। उन्हें वस्त्र पहनाएं और कहें – इदं रक्त वस्त्रं ऊं गं गणपतये समर्पयामि।

पूजन के बाद श्री गणेश को प्रसाद अर्पित करें और बोले – इदं नानाविधि नैवेद्यानि ऊं गं गणपतये समर्पयामि:। मिष्ठान अर्पित करने के लिए मंत्र:- इदं शर्करा घृत युक्त नैवेद्यं ॐ गं गणपतये समर्पयामि:। प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन करायें। इदं आचमनयं ऊं गं गणपतये नम:। इसके बाद पान सुपारी चढ़ायें: इदं ताम्बूल पुगीफल समायुक्तं ऊं गं गणपतये समर्पयामि:। अब एक फूल लेकर गणपति पर चढ़ाएं और बोलें: एष: पुष्पान्जलि ऊं गं गणपतये नम:।
इसी प्रकार अन्य देवताओं का भी पूजन करें बस जिस देवता की पूजा करनी हो गणेश जी के स्थान पर उस देवता का नाम लें।

कलश पूजन:- इसके लिए लोटे या घड़े पर मोली बांधकर कलश के ऊपर आम के पत्ते रखें। कलश के अंदर सुपारी, दूर्वा, अक्षत व् मुद्रा रखें। कलश के गले में मोली लपेटे। नारियल पर वस्त्र लपेट कर कलश पर रखें। अब हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर वरुण देव का कलश में आह्वान करें।

ओ३म् त्तत्वायामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो हविभि:। अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुशंस मान आयु: प्रमोषी:। (अस्मिन कलशे वरुणं सांगं सपरिवारं सायुध सशक्तिकमावाहयामि, ओ३म्भूर्भुव: स्व:भो वरुण इहागच्छ इहतिष्ठ। स्थापयामि पूजयामि॥)

इसके बाद इस प्रकार श्री गणेश जी की पूजन की है उसी प्रकार वरुण देव की भी पूजा करें। इसके बाद इंद्र और फिर कुबेर जी की पूजा करें। एवं वस्त्र सुगंध अर्पण कर भोग लगाये इसके बाद इसी प्रकार क्रम से कलश का पूजन कर लक्ष्मी पूजन आरम्भ करें।

लक्ष्मी पूजन:-

सर्वप्रथम निम्न मंत्र कहते हुए माँ लक्ष्मी का ध्यान करें। ॐ या सा पद्मासनस्था, विपुल-कटि-तटी, पद्म-दलायताक्षी। गम्भीरावर्त-नाभिः, स्तन-भर-नमिता, शुभ्र-वस्त्रोत्तरीया।। लक्ष्मी दिव्यैर्गजेन्द्रैः। मणि-गज-खचितैः, स्नापिता हेम-कुम्भैः।नित्यं सा पद्म-हस्ता, मम वसतु गृहे, सर्व-मांगल्य-युक्ता।।

अब माँ लक्ष्मी की प्रतिष्ठा करें, हाथ में अक्षत लेकर मंत्र कहें – “ॐ भूर्भुवः स्वः महालक्ष्मी, इहागच्छ इह तिष्ठ, एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम्।”

प्रतिष्ठा के बाद स्नान कराएं और मंत्र बोलें – ॐ मन्दाकिन्या समानीतैः, हेमाम्भोरुह-वासितैः स्नानं कुरुष्व देवेशि, सलिलं च सुगन्धिभिः।। ॐ लक्ष्म्यै नमः।। इदं रक्त चंदनम् लेपनम् से रक्त चंदन लगाएं। इदं सिन्दूराभरणं से सिन्दूर लगाएं। ‘ॐ मन्दार-पारिजाताद्यैः, अनेकैः कुसुमैः शुभैः। पूजयामि शिवे, भक्तया, कमलायै नमो नमः।। ॐ लक्ष्म्यै नमः, पुष्पाणि समर्पयामि।’

इस मंत्र से पुष्प चढ़ाएं फिर माला पहनाएं। अब लक्ष्मी देवी को इदं रक्त वस्त्र समर्पयामि कहकर लाल वस्त्र पहनाएं। इसके बाद मा लक्ष्मी के क्रम से अंगों की पूजा करें। माता लक्ष्मी की अंग पूजा बाएं हाथ में अक्षत लेकर दाएं हाथ से थोड़े थोड़े छोड़ते जाए और मंत्र कहें :–

ॐ चपलायै नम: पादौ पूजयामि ॐ चंचलायै नम: जानूं पूजयामि, ॐ कमलायै नम: कटि पूजयामि, ॐ कात्यायिन्यै नम: नाभि पूजयामि, ॐ जगन्मातरे नम: जठरं पूजयामि, ॐ विश्ववल्लभायै नम: वक्षस्थल पूजयामि, ॐ कमलवासिन्यै नम: भुजौ पूजयामि, ॐ कमल पत्राक्ष्य नम: नेत्रत्रयं पूजयामि, ॐ श्रियै नम: शिरं: पूजयामि।

अष्टसिद्धि पूजा :-

अंग पूजन की ही तरह हाथ में अक्षत लेकर मंतोच्चारण करते रहे। मंत्र इस प्रकर है – ॐ अणिम्ने नम:, ॐ महिम्ने नम:, ॐ गरिम्णे नम:, ॐ लघिम्ने नम:, ॐ प्राप्त्यै नम: ॐ प्राकाम्यै नम:, ॐ ईशितायै नम: ॐ वशितायै नम:।

अष्टलक्ष्मी अंग पूजन :-

अंग पूजन एवं अष्टसिद्धि पूजा की ही तरह हाथ में अक्षत लेकर मंत्रोच्चारण करें। ॐ आद्ये लक्ष्म्यै नम:, ॐ विद्यालक्ष्म्यै नम:, ॐ सौभाग्य लक्ष्म्यै नम:, ॐ अमृत लक्ष्म्यै नम:, ॐ लक्ष्म्यै नम:, ॐ सत्य लक्ष्म्यै नम:, ॐ भोगलक्ष्म्यै नम:, ॐ योग लक्ष्म्यै नम:।

नैवैद्य अर्पण :-

पूजन के बाद देवी को “इदं नानाविधि नैवेद्यानि ॐ महालक्ष्मियै समर्पयामि” मंत्र से नैवैद्य अर्पित करें। मिष्टान अर्पित करने के लिए मंत्र: “इदं शर्करा घृत समायुक्तं नैवेद्यं ॐ महालक्ष्मियै समर्पयामि” बालें। प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन करायें। इदं आचमनयं ऊं महालक्ष्मियै नम:। इसके बाद पान सुपारी चढ़ायें: इदं ताम्बूल पुगीफल समायुक्तं ॐ महालक्ष्मियै समर्पयामि। अब एक फूल लेकर लक्ष्मी देवी पर चढ़ाएं और बोलें: एष: पुष्पान्जलि ऊं महालक्ष्मियै नम:।
माँ को यथा सामर्थ वस्त्र, आभूषण, नैवेद्य अर्पण कर दक्षिणा चढ़ाए दूध, दही, शहद, देसी घी और गंगाजल मिलकर चरणामृत बनाये और गणेश लक्ष्मी जी के सामने रख दे। इसके बाद 5 तरह के फल, मिठाई खील-पताशे, चीनी के खिलोने लक्ष्मी माता और गणेश जी को चढ़ाये और प्राथना करे की वो हमेशा हमारे घरो में विराजमान रहे। इनके बाद एक थाली में विषम संख्या में दीपक 11, 21 अथवा यथा सामर्थ दीप रख कर इनको भी कुंकुम अक्षत से पूजन करे इसके बाद माता लक्ष्मी को श्री सूक्त अथवा ललिता सहस्त्रनाम का पाठ सुनाये पाठ के बाद माँ से क्षमा याचना कर माँ लक्ष्मी जी की आरती कर बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लेने के बाद थाली के दीपो को घर में सब जगह रखे। लक्ष्मी-गणेश जी का पूजन करने के बाद, सभी को जो पूजा में शामिल हो, उन्हें खील, पताशे, चावल दें। सब फिर मिल कर प्राथना करे की माँ लक्ष्मी हमने भोले भाव से आपका पूजन किया है ! उसे स्वीकार करें और गणेशा, माँ सरस्वती और सभी देवताओं सहित हमारे घरों में निवास करें, प्रार्थना करने के बाद जो सामान अपने हाथ में लिया था वो मिटटी के लक्ष्मी गणेश, हटड़ी और जो लक्ष्मी गणेश जी की फोटो लगायी थी उस पर चढ़ा दे।

लक्ष्मी पूजन के बाद आप अपनी तिजोरी की पूजा भी करें :- रोली को देसी घी में घोल कर स्वस्तिक बनाये और धुप दीप दिखा करें, मिठाई का भोग लगाए।

लक्ष्मी माता और सभी भगवानों को आपने अपने घर में आमंत्रित किया है, अगर हो सके तो पूजन के बाद शुद्ध बिना लहसुन-प्याज़ का भोजन बना कर गणेश-लक्ष्मी जी सहित सबको भोग लगाए। दीपावली पूजन के बाद आप मंदिर, गुरद्वारे और चौराहे में भी दीपक और मोमबतियां जलाएं।

रात को सोने से पहले पूजा स्थल पर मिटटी का चार मुहं वाला दिया सरसों के तेल से भर कर जगा दें, और उसमे इतना तेल हो की वो सुबह तक जग सके।

माँ लक्ष्मी जी की आरती :-

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता तुम को निस दिन सेवत, मैयाजी को निस दिन सेवत, हर विष्णु विधाता …..

ॐ जय लक्ष्मी माता …
उमा रमा ब्रह्माणी, तुम ही जग माता ओ मैया तुम ही जग माता, सूर्य चन्द्र माँ ध्यावत, नारद ऋषि गाता…

ॐ जय लक्ष्मी माता ..
दुर्गा रूप निरन्जनि, सुख सम्पति दाता ओ मैया सुख सम्पति दाता …. जो कोई तुम को ध्यावत, ऋद्धि सिद्धि धन पाता।

ॐ जय लक्ष्मी माता ..
तुम पाताल निवासिनि, तुम ही शुभ दाता ओ मैया तुम ही शुभ दाता …. कर्म प्रभाव प्रकाशिनि, भव निधि की दाता …

ॐ जय लक्ष्मी माता ..
जिस घर तुम रहती तहँ सब सद्गुण आता ओ मैया सब सद्गुण आता … सब संभव हो जाता, मन नहीं घबराता…

ॐ जय लक्ष्मी माता …
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता ओ मैया वस्त्र न कोई पाता … ख़ान पान का वैभव, सब तुम से आता..

ॐ जय लक्ष्मी माता ..
शुभ गुण मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि जाता.. ओ मैया क्षीरोदधि जाता … रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता..

ॐ जय लक्ष्मी माता ..
महा लक्ष्मीजी की आरती, जो कोई जन गाता ओ मैया जो कोई जन गाता … उर आनंद समाता, पाप उतर जाता

ॐ जय लक्ष्मी माता ..।।

7 नवम्बर 2018 के चौघड़िया मुहूर्त-

दिन की चौघड़िया:-
लाभ 06:42 से 08:02
अमृत 08:02 से 09:22
काल 09:22 से 10:42
शुभ 10:42 से 12:02
रोग। 12:02 से 13:21
उद्वेग 13:21 से 14:40
चर 14:40 से 16:00
लाभ 16:00 से 17:20

रात्रि की चौघड़िया:-
उद्वेग 17:10 से 19:00
शुभ 19:00 से 20:41
अमृत 20:41 से 22:22
चर 22:22 से 24:02
रोग 24:02 से 25:42
काल 25:42 से 27:22
लाभ 27:22 से 29:02
उद्वेग 29:02 से 30:42

1. चर, लाभ, अमृत और शुभ की चौघड़िया पूजन के समय होनी चाहिये। इस प्रकार शुद्ध ज्योतिषीय गणनाओं तथा विशेष दृष्टिकोंण से यह स्पष्ट होता है, कि साधना व पूजन के लिये 7 नवम्बर 2018 की रात्रि 19:00 से 19:52 वृषभ लग्न के साथ साथ शुभ का चौघडिया भी अत्यन्त विशेष फलदायक तथा सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त हैं। अतः सभी गृहस्थ तथा साधक-साधिकाओं से मेरा यही आग्रह है की वे इस वर्ष इसी मुहूर्त में दीपावली पूजन अथवा तंत्र-मंत्र सम्बंधी साधनायें सम्पन्न करें।

शुभ स्थिर लग्न :-

महालक्ष्मी पूजन किसी स्थिर लग्न में होना उचित है, इस दिन वृषभ और सिंह दो स्थिर लग्न होंगी। वृषभ लग्न सांयकाल 19 बजकर 00 मिनट से रात्रि 19 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। और सिंह लग्न मध्य रात्रि को 00 (24) बजकर 27 मिनट से 02 बजकर 54 मिनट तक रहेगी।

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अधिक जानकारी के लिए अथवा ज्योतिषीय परामर्श के लिए :- गुरू जी के कार्यालय में सम्पर्क करें :- 011-22455184, 09810143516

गुरू जी के लेख देखें :- astroguruji.in, aap ka bhavishya.in, rbdhawan@wordpress.com, guruji ke totke.com.

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करवा चौथ

करवा चौथ 27 अक्तूबर 2018

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in delhi)

करवा चौथ भारतीय नारियों के लिए एक मंगल पर्व है। इस दिन विवाहित स्त्रीयाँ अपने पति की दीर्घायु के लिए निर्जल व्रत रखती हैं। इस व्रत को सौभाग्यवती स्त्रियाँ एवं उसी वर्ष विवाहित हुई लड़कियाँ करती हैं। इस व्रत में प्रमुखतः गौरी व गणेश का पूजन किया जाता है। शिव-कार्तिकेय व चंद्रमा का पूजन भी प्रशस्य है। करवा चौथ के व्रत में कथा कहने या सुनने का विधान है। हांलाकि क्षेत्र के अनुसार कथाओं में थोड़ा बहुत परिवर्तन होता है, लेकिन सभी कथाओं का सार सौभाग्य वृद्धि से जुड़ा है। हम यहाँ करवा चौथ की अलग-अलग क्षेत्रों में कही जाने वाली प्रमुख कथाओं का उल्लेख कर रहे हैं।

करवा चौथ कथा -(1):-
बहुत समय पहले की बात है, एक साहूकार के सात बेटे और उनकी एक बहन करवा थी। सभी सातों भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। यहाँ तक कि वे पहले उसे खाना खिलाते और बाद में स्वयं खाते थे। एक बार उनकी बहन ससुराल से मायके आई हुई थी। शाम को भाई जब अपना व्यापार-व्यवसाय बंद करके घर आए तो देखा उनकी बहन बहुत व्याकुल थी। सभी भाई खाना खाने बैठे और अपनी बहन से भी खाने का आग्रह करने लगे लेकिन बहन ने बताया कि आज उसका करवा चौथ का निर्जल व्रत है, और वह खाना सिर्फ चंद्रमा को देखकर उसे अर्घय देकर ही खा सकती है। चूँकि अभी चंद्रमा नहीं निकला है, इसलिये वह भूख-प्यास से व्याकुल हो उठी है। सबसे छोटे भाई को अपनी बहन की हालत देखी नहीं गई और दूर पीपल के पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है। दूर से देखने पर वह ऐसा प्रतीत होता जैसे चतुर्थी का चाँद निकल रहा हो। इसके बाद भाई अपनी बहन को बताता है कि चाँद निकल आया है, तुम उसे अर्घय देने के बाद भोजन कर सकती हो। बहन खुशी के मारे सीढ़ियों पर चढ़कर चाँद को देखती है, उसे अर्घय देकर खाना खाने बैठ जाती है। वह पहला टुकड़ा मुँह में डालती है तो उसे छींक आ जाती है। दूसरा टुकड़ा डालती है, तो उसमें बाल निकल आता है, और जैसे ही तीसरा टुकड़ा मुँह में डालने की कोशिश करती है तो उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिलता है। वह बौखला जाती है। उसकी भाभी उसे सच्चाई से अवगत कराती है। कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ। करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से टुटने के कारण देवता उससे नाराज हो गये हैं, उन्होंने ऐसा किया है। सच्चाई जानने के बाद करवा निश्चय करती है कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी और अपने सतीत्व से उन्हें पुर्नजीवन दिलाकर रहेगी। वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रहती है। उसकी देखभाल करती है। उसके ऊपर उगने वाली सूईनुमा घास को वह एकत्रित करती जाती है। एक साल बाद फिर करवा चैथ का दिन आता है। उसकी सभी भाभियाँ करवा चौथ का व्रत रखती हैं। जब भाभियाँ उससे आशीर्वाद लेने आती हैं तो वह प्रत्येक भाभी से ‘यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो’ मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो ऐसा आग्रह करती है, लेकिन हर बार भाभी उसे अगली भाभी से आग्रह करने को कहकर चली जाती है। इस प्रकार जब छठे नंबर की भाभी आती है तो करवा उससे भी यही बात दोहराती है। यह भाभी उसे बताती है कि चूँकि सबसे छोटे भाई की वजह से उसका व्रत टूटा था अतः उसकी पत्नी में ही शक्ति है कि वह तुम्हारे पति को दोबारा जीवित कर सकती है, इसलिये जब वह आए तो तुम उसे पकड़ लेना और जब तक वह तुम्हारे पति को जिंदा न कर दे तब तक उसे नहीं छोड़ना। ऐसा कहकर वह चली जाती है। सबसे अंत में छोटी भाभी आती है। करवा उनसे भी सुहागिन बनने का आग्रह करती है लेकिन वह टाल-मटोल करने लगती है। इसे देख करवा उसे जोर से पकड़ लेती है, और अपने सुहाग को जिंदा करने के लिये कहती है। भाभी उससे छुड़ाने के लिये नोचती-खसोटती है लेकिन करवा नहीं छोड़ती है। अंत में उसकी तपस्या को देख भाभी पसीज जाती है, और अपनी छोटी अँगुली को चीरकर उसमें से अमृत उसके पति के मुँह में डाल देती है। करवा का पति तुरंत श्रीगणेश-श्रीगणेश कहता हुआ उठ बैठता है। इस प्रकार प्रभुकृपा से उसकी छोटी भाभी के माध्यम से करवा को अपना सुहाग वापस मिल जाता है। हे श्री गणेश माँ गौरी जिस प्रकार करवा को चिर सुहागन का वरदान आपसे मिला है, वैसा ही सब सुहागिनों को मिले।

करवा चौथ कथा – (2) :-
एक के सात लड़के और एक लड़की थी। सेठानी सहित उसकी बहुओं और बेटी ने करवा चौथ का व्रत रखा था। रात्रि को साहूकार के लड़के भोजन करने लगे तो उन्होंने अपनी बहन से भोजन के लिये कहा। इस पर बहन ने उत्तर दिया भाई ! चाँद नहीं निकला है। उसके निकलने पर अर्घ्य देकर भोजन करूँगी, बहन की बात सुनकर भाईयों ने नगर के बाहर जाकर अग्नि जला दी और छलनी लेकर उसमें से प्रकाश दिखाते हुए उन्होंने बहन से कहा बहन! चाँद निकल आया है। अर्घ्य देकर भोजन कर लो। यह सुन उसने अपनी भाभियों से कहा कि आओ तुभ भी चंद्रमा को अर्घ्य दे लो, परंतु वे इस काण्ड को जानती थीं। उन्होंने कहा बहनजी! अभी चाँद नहीं निकला, तेरे भाई तेरे साथ धोखा करते हुए अग्नि का प्रकाश छलनी से दिखा रहे हैं। भाभियों की बात सुनकर भी उसने कुछ ध्यान न दिया और भाइयों द्वारा दिखाए प्रकाश को ही अध्र्य देकर भोजन कर लिया। इस प्रकार व्रत भंग करने से गणेशजी उस पर अप्रसन्न हो गये। इसके बाद उसका पति बीमार हो गया और जो कुछ घर में था, उसकी बीमारी में लग गया। जब उसे अपने किये हुए दोषों का पता लगता है, तो उसने पश्चाताप किया। गणेशजी की प्रार्थना करते हुए। विधि-विधान से पुनः चतुर्थी का व्रत करना आरंभ कर दिया। श्रद्धानुसार सबका आदर करते हुए सबसे आशीर्वाद ग्रहण करने में ही मन को लगा दिया। इस प्रकार उसके श्रद्धा-भक्ति सहित कर्म को देखकर भगवान गणेश उस पर प्रसन्न हो गये और उसके पति को जीवनदान देकर उसे आरोग्य प्रदान करने के पश्चात् धन-संपत्ति से युक्त कर दिया। इस प्रकार जो कोई छल-कपट को त्यागकर श्रद्धा-भक्ति से चतुर्थी का व्रत करेंगे, वे सब प्रकार से सुखी होते हुये क्लेशों से मुक्त हो जायेंगे।

श्री गणेश विनायकजी की कथाः-
एक अंधी बुढ़िया थी, जिसका एक लड़का और बहू थी। वह बहुत गरीब थी। वह अंधी बुढ़िया नित्य प्रति गणेशजी की पूजा किया करती थी। गणेशजी साक्षात् सम्मुख आकर कहते थे कि बुढ़िया माई तू जो चाहे माँग ले। बुढ़िया कहती है मुझे माँगना नहीं आता सो कैसे और क्या माँगू। तब गणेशजी बोले कि अपने बहू-बेटे से पूछकर माँग ले। तब बुढ़िया ने अपने पुत्र और बहू से पूछा तो बेटा बोला कि धन माँग ले और बहू ने कहा कि पोता माँग ले। तब बुढ़िया ने सोचा कि बेटा-बहू तो अपने-अपने मतलब कि बातें कर रहे हैं। अतः उस बुढ़िया ने पड़ोसियों से पूछा तो पड़ोसियों ने कहा कि बुढ़िया तेरी थोड़ी-सी जिंदगी है। क्यों माँगे धन और पोता, तू तो केवल अपने नेत्र माँग ले, जिससे तेरी शेष जिंदगी सुख से व्यतीत हो जाए। उस बुढ़िया ने बेटे, बहू तथा पड़ोसियों की बात सुनकर घर में जाकर सोचा, जिससे बेटा-बहू और मेरा सबका ही भला हो वह भी माँग लूँ और अपने मतलब की चीज भी माँग लूँ। जब दूसरे दिन गणेशजी आये और बोले, बोल बुढ़िया क्या माँगती है। हमारा वचन है जो तू माँगेगी सो ही पाऐगी। गणेशजी के वचन सुनकर बुढ़िया बोली हे गणराज यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे नौ करोड़ की माया दें, निरोगी काया दें, अमर सुहाग दें, आँखों में प्रकाश दें, नाती-पोता दें और समस्त परिवार को सुख दें और अंत में मोक्ष दें। बुढ़िया की बात सुनकर गणेशजी बोले बुढ़िया माँ तूने तो मुझे ठग लिया। खैर, जो कुछ तूने माँग लिया वह सब तुझे मिलेगा। ये कहकर गणेशजी अंर्तध्यान हो गये। हे गणेशजी जैसे बुढ़िया माँ के माँगने पर आपने सब कुछ दिया है। वैसे ही सबको देना और हमको भी देने की कृपा करना।

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कुबेर पूजन

धन त्रयोदशी तिथि पर किया जाता है- कुबेर पूजन।

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पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवलोक में वास करने वाले देवताओं के धनाध्यक्ष कुबेर हैं। कुबेर न केवल देवताओं के धनाध्यक्ष हैं, बल्कि समस्त यक्षों, गुह्यकों और किन्नरों, इन तीन देवयोनियों के अधिपति भी कहे गये हैं। ये नवनिधियों में पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील और वर्चस् के स्वामी भी हैं। जब एक निधि भी अनन्त वैभवों को देने वाली मानी गयी है, और धनाध्यक्ष कुबेर तो गुप्त या प्रकट संसार के समस्त वैभवों के अधिष्ठाता देव हैं। यह देव उत्तर दिशा के अधिपति हैं, इसी लिये प्रायः सभी यज्ञ, पूजा उत्सवों तथा दस दिक्पालों के पूजन में उत्तर दिशा के अधिपति के रूप में कुबेर का पूजन होता है।

कुबेर कैसे बने धनाध्यक्ष ? :-
अधिकांश पुराण कथाओं के अनुसार पूर्वजन्म में कुबेर गुणनिधि नामक एक वेदज्ञ ब्राह्मण थे। उन्हें सभी शास्त्रों का ज्ञान था और सन्ध्या, देववंदन, पितृपूजन, अतिथि सेवा तथा सभी प्राणियों के प्रति सदा दया, सेवा एवं मैत्री का भाव रखते थे। वे बड़े धर्मात्मा थे, किंतु द्यूतकर्मियों की कुसंगति में पड़कर धीरे-धीरे अपनी सारी पैतृक सम्पत्ति गंवा बैठे थे। इतना ही नहीं, आदर्श आचरणों से भी च्युत हो गये थे। परंतु इनकी माता इनसे अत्यंत स्नेह करती थीं और इसी कारण वे इनके पिता से पुत्र के दुष्कर्मों की चर्चा न कर पाती थीं। एक दिन किसी अन्य माध्यम से उनके पिता को पता चला और उन्होंने गुणनिधि की माता से अपनी सम्पत्ति तथा पुत्र के विषय में पूछा तो पिता के कोपभय से गुणनिधि घर छोड़कर वन में चले गये। इधर-उधर भटकते हुये संध्या के समय वहां गुणनिधि को एक शिवालय दिखाई पड़ा। उस शिवालय में समीपवर्ती ग्राम के कुछ शिवभक्तों ने शिवरात्रिव्रत के लिए समस्त पूजन-सामग्री और नैवेद्यादि के साथ शिवाराधना का प्रबंध किया हुआ था। गुणनिधि भूखे तो थे ही, नैवेद्यादि देखकर उसकी भूख और तीव्र हो गयी। वह वहीं समीप में छुपकर उन भक्तों के सोने की प्रतीक्षा में उनके संपूर्ण क्रियाकलापों को बड़े ध्यान से देख रहे थे। रात्रि में उनके सो जाने पर जब एक कपड़े की बत्ती जलाकर पकवानों को लेकर भाग ही रहे थे कि उसका पैर एक सोये हुये पुजारी के पैर से टकरा गया और वह व्यक्ति चोर-चोर चिल्लाने लगा। गुणनिधि भागे जा रहे थे कि चोर-चोर की ध्वनि सुनकर नगर रक्षक ने उनके ऊपर बाण छोड़ा, जिससे उसी क्षण गुणनिधि के प्राण निकल गये। यमदूत जब उन्हेे लेकर जाने लगे तो भगवान् शंकर की आज्ञा से उनके गणों ने वहाँ पहुँचकर उन्हें यमदूतों से छुड़ा लिया और उन्हें कैलाशपुरी में ले आये। आशुतोष भगवान् शिव उनके अज्ञान में ही हो गये व्रतोपवास, रात्रि जागरण, पूजा-दर्शन तथा प्रकाश के निमित्त जलाये गये वस्त्रवर्तिका को आर्तिक्य मानकर उन पर पूर्ण प्रसन्न हो गये और उन्हें अपना शिवपद प्रदान किया। बहुत दिनों के पश्चात् वही गुणनिधि भगवान शंकर की कृपा से कलिंग नरेश होकर शिवाराधना करते रहे। पुनः पाद्मकल्प में वही गुणनिधि प्रजापति पुलस्त्य के पुत्र विश्रवामुनि की पत्नी और भारद्वाज मुनि की कन्या इडविडा (इलविला) के गर्भ से उत्पन्न हुये। विश्रवा के पुत्र होने से ये वैश्रवण कुबेर के नाम से प्रसिद्ध हुये तथा इडविडा के गर्भ से उत्पन्न होने के कारण ऐडविड भी कहलाये। उत्तम कुल में उत्पन्न होने तथा जन्मान्तरीय शिवाराधना के अभ्यास योग के कारण वे बाल्यकाल से ही दिव्य तेज से सम्पन्न, सदाचारी एवं देवताओं के भक्त थे। उन्होंने दीर्घकाल तक ब्रह्माजी की तपस्या द्वारा आराधना की, इससे प्रसन्न होकर ब्रह्माजी देवताओं के साथ प्रकट हो गये और उन्होंने उसे लोकपाल पद, अक्षय निधियों का स्वामी, सूर्य के समान तेजस्वी पुष्पक विमान तथा देवपद प्रदान किया-

तग्दच्छ बत धर्मज्ञ निधीशत्वमपाप्रुहि।।
शक्राम्बुपयमानां च चतुर्थस्त्वं भविष्यसि।
एतच्च पुष्पकं नाम विमानं सूर्यसंनिभम्।।
प्रतिगृण्हीष्व यानार्थं त्रिदशैः समतां व्रज।
वा. रा. उ. 3। 18-20

वर देकर ब्रह्मादि देवगण चले गये। तब कुबेर ने अपने पिता विश्रवा से हाथ जोड़कर कहा कि ‘भगवन् ब्रह्माजी ने सब कुछ तो मुझे प्रदान कर दिया, किंतु मेरे निवास का कोई स्थान नियत नहीं किया। अतः आप ही मेरे योग्य कोई ऐसा सुखद स्थान बतलाइये, जहां रहने से किसी भी प्राणी को कोई कष्ट न हो।’ इस पर उनके पिता विश्रवा ने दक्षिण समुद्रतट पर त्रिकूट नामक पर्वत पर स्थित विश्वकर्मा द्वारा निर्मित, देवराज इन्द्र की अमरावती के समान अद्वितीय लंका नगरी कुबेर को प्रदान की और कहा कि वह नगरी स्वर्णनिर्मित है और वहां कोई कष्ट, बाधा नहीं है। पिता की आज्ञा से कुबेर लंकाध्यक्ष होकर बड़ी प्रसन्नता के साथ वहां निवास करने लगे। कुबेर शंकरजी के परम भक्त थे। बाद में इन्होंने भगवान शंकर की विशेष रूप में आराधना की तथा भगवान शंकर की कृपा से उन्होंने उत्तर दिशा का आधिपत्य, अलकानाम की दिव्यपुरी, नन्दनवन के समान दिव्य उद्यानयुक्त चैत्ररथ नामक वन तथा एक दिव्य सभा प्राप्त की। साथ ही वे माता पार्वती के कृपापात्र और भगवान शंकर के घनिष्ठ मित्र भी बन गये। भगवान शंकर ने कहा-

तत्सखित्वं मया सौम्य रोचयस्व धनेश्वर।
तपसा निर्जितश्चैव सखा भव ममानघ।।

‘हे सौम्य धनेश्वर! अब तुम मेरे साथ मित्रता का संबंध स्थापित करो, यह संबंध तुम्हें रूचिकर लगना चाहिये। तुमने अपने तप से मुझे जीत लिया है, अतः मेरा मित्र बनकर (यहां अलकापुरी में) रहो।’

पुराणों में कुबेर सभा का वर्णन:-
महाभारत, सभापर्व के 10वें अध्याय में राजाधिराज कुबेर की सभा का विस्तार से वर्णन है। तदनुसार उस सभा का विस्तार सौ योजन लम्बा और सत्तर योजन चौड़ा है। उसमें चन्द्रमा की शीतल श्वेतवर्ण की आभा उदित होती रहती है। इस सभा को कुबेर ने अपनी दीर्घ तपस्या के बलपर प्राप्त किया था। यह वैश्रवणी अथवा कौबेरी नाम की सभा कैलास के पार्श्रवभाग में स्थित है। इसमें अनेक दिव्य सुवर्णमय प्रासाद बने हुए हैं।
बीच-बीच में मणिजड़ित स्वर्णस्तम्भ बने हैं, जिसके मध्य में मणिमयमण्डित चित्र-विचित्र दिव्य सिंहासन पर ज्वलित कुण्डलमण्डित और दिव्य आभरणों से अलंकृत महाराज कुबेर सुशोभित रहते हैं। देवगण, यक्ष, गुह्यक, किन्नर तथा ऋषि-मुनि एवं दिव्य अप्सरायें उनकी महिमा का गान करते हुये वहाँ स्थित रहती हैं। इस सभा के चारों ओर मंदार, पारिजात और सौगन्धिक वृक्षों के उद्यान तथा उपवन हैं, जहां से सुगन्धित, सुखद शीतल, मंद हवा सभामंडप में प्रविष्ट होती रहती है। देवता, गंधर्व और अप्सरा के गण संगीत एवं नृत्य आदि से सभा को सुशोभित करते रहते हैं। इनकी सभा में रम्भा, चित्रसेना, मिश्रकेशी, घृताची, पुजिंकस्थला तथा उर्वशी आदि दिव्य अप्सरा नृत्य-गीत के द्वारा इनकी सेवा में तत्पर रहती हैं। यह सभा सदा ही नृत्य-वाद्य आदि से निनादित रहती है, कभी शून्य नहीं होती। कुबेर के सेवकों में मणिभद्र, श्वेतभद्र, प्रद्योत, कुस्तुम्बुरु, हंसचूड, विभीषण, पुष्पानन तथा पिंगलक आदि मुख्य सेवक हैं। राज्यश्री के रूप में साक्षात् महालक्ष्मी भी वहां नित्य निवास करती हैं। महाराज कुबेर के पुत्र मणिग्रीव और नलकूबर भी वहां स्थित होकर अपने पिता की उपासना करते हैं। साथ ही अनेक ब्रह्मर्षि, देवर्षि, राजर्षि भी महात्मा वैश्रवण की उपासना में रत रहते हैं।

गंधर्वों में तुम्बुरु, पर्वत, शैलूष, विश्वावसु, हाहा, हूहू, चित्रसेन तथा अनेक विद्याधर आदि भी अपने दिव्य गीतों द्वारा महाराज वैश्रवण की महिमा का गान करते रहते हैं। हिमवान्, पारियात्र, विन्ध्यादि पर्वत सेवा में प्रस्तुत रहते हैं तथा सभी देवयोनियाँ और शंख, पद्म आदि निधियां भी मूर्तिमान् रूप धारण कर उनकी सभा में नित्य उपस्थित रहती हैं। उमापति भगवान शिव भी महाराज कुबेर के अभिन्न मित्र होने के कारण त्रिशूल धारण किये हुये भगवती पार्वती के साथ वहां सुशोभित रहते हैं। इस प्रकार महाराज वैश्रवण की सभा ब्रह्मा तथा सभी लोकपाल की सभा से अति विचित्र एवं दिव्य है। राजाधिराज कुबेर इस सभा में स्थित होकर अपने वैभव का दान करते रहते हैं।

धनकुबेर और धन त्रयोदशी :-

धन त्रयोदशी तथा दीपावली के दिन धनाधिपति कुबेर के साथ साथ महालक्ष्मी की विधिपूर्वक पूजा की जाती है। देवताओं के धनाध्यक्ष महाराज कुबेर राजाओं के भी अधिपति हैं, क्योकि सभी निधियों, धनों के स्वामी यही देव हैं, अतः सभी प्रकार की निधियों या सुख, वैभव तथा वर्चस्व की कामना की पूर्ति, फल की वृष्टि करने में वैश्रवण कुबेर समर्थ हैं। सारांश में कहा जा सकता है कि धनाध्यक्ष कुबेर की साधना ध्यान करने से मनुष्य का दुःख-दारिद्रय दूर होता है और अनन्त ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। सनातन धर्म में गहरा विश्वास रखने वालों का अटल विश्वास है कि शिव के अभिन्न मित्र होने से कुबेर अपने भक्त की सभी विपत्तियों से रक्षा करते हैं, और उनकी कृपा से साधक में आध्यात्मिक ज्ञान-वैराग्य आदि के साथ-साथ उदारता, सौम्यता, शांति तथा तृप्ति आदि सात्त्विक गुण भी स्वाभाविक रूप से विकसित हो जाते हैं।

राजाधिराज कुबेर की साधना-
महाराज वैश्रवण कुबेर की उपासना से संबंधित मंत्र, यंत्र, ध्यान एवं उपासना आदि की सारी प्रक्रियायें श्रीविद्यार्णव, मंत्रमहार्णव, मंत्रमहोदधि, श्रीतत्त्वनिधि तथा विष्णुधर्मोत्तरादि पुराणों में विस्तार से निर्दिष्ट हैं। तदनुसार इनके अष्टाक्षर, षोडशाक्षर तथा पंचत्रिंशदक्षरात्मक छोटे-बड़े अनेक मंत्र प्राप्त होते हैं। मंत्रों के अलग-अलग ध्यान भी निर्दिष्ट हैं। मंत्र साधना में गहन रूची रखने वाले साधक उपरोक्त ग्रन्थों का अवलोकन करें। यहाँ पाठकों के लिये धनाध्यक्ष कुबेर की एक सहज व सरल साधना पद्धति दी जा रही है। यह साधना धनत्रयोदशी के दिन की जानी चाहिये यदि कोई साधक इस साधना को दीपावली की रात्रि में करना चाहे तो उस महापर्व पर भी यह साधना कर सकते हैं। अथवा दोनो ही दिन (धनत्रयोदशी तथा दीपावली) यह साधना सम्पन्न की जा सकती है।

इस वर्ष धन त्रयोदशी 5 नवम्बर 2018 तथा दीपावली पर्व 7 नवम्बर 2018 के दिन है। यह साधना स्थिर लग्न में ही सम्पन्न की जाती है। क्योंकि स्थिर लग्न में जिस कार्य को किया जाता है वह स्थिरता को प्राप्त होता है, और लक्ष्मी को तो सभी स्थिर ही रखना चाहते हैं। अतः यह साधना तो अवश्य स्थिर लग्न में ही करनी चाहिये। ‘स्थिर लग्न’ इन दिनों में वृष तथा सिंह लग्न ही पढ रही हैं। वृषभ लग्न 5 नवम्बर 2018 धनत्रयोदशी के दिन सांयकाल 18 बजकर 05 मिनट से रात्रि 20 बजकर 00 मिनट तक रहेगी। तथा सिंह लग्न मध्य रात्रि में ठीक 24 बजकर 35 मिनट से 02 बजकर 52 मिनट तक रहेगी।

साधना पद्धति:- धनत्रयोदशी की रात्रि में उत्तर दिशा की ओर मुख करके पुरूष साधक पीले वस्त्र तथा महिलायें पीली साड़ी पहनकर बैठें सामने एक लकड़ी के पटरे पर पीला रेशमी वस्त्र बिछाकर उस पर शुद्ध चांदी पर उत्कीर्ण प्राण प्रतिष्ठित श्री कुबेर यंत्र स्थापित करें, और साथ ही शुद्ध घी का दीपक जलाकर पंचोपचार पूजा करें मिठाई का भोग लगावें तथा विनियोगादि क्रिया करके 11 माला सप्तमुखी रूद्राक्ष की माला से कुबेर मंत्र का जप करें। जप सम्पूर्ण होने पर प्रसादरूप में मिठाई का परिजनों को वितरण करें और फिर रात्रि में उसी पूजा स्थल में ही निद्रा विश्राम करें। प्रातः शेष फूलादि सामग्री जल में विसर्जित कर दें तथा ‘शुद्ध चांदी पर उत्कीर्ण तथा प्राणप्रतिष्ठित श्री कुबेर यंत्र’ को पीले आसन सहित अपनी तिजोरी कैश बाॅक्स या अलमारी अथवा संदूक में रख दें। तथा रूद्राक्ष की जप माला को गले में धारण करें।

सम्पन्नता के लिये कुबेर मंत्र-
यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं में देहि दापय स्वाहा।

वैसे तो इस मंत्र की जप संख्या एक लक्ष (एक लाख) कही गयी है। परंतु धन त्रयोदशी की रात्रि में जितना हो सके विधि-विधान से इस मंत्र का जप करना ही पर्याप्त होता है। मंत्र का जप सम्पन्न होने पर तिल एवं शुद्ध घी से दशांश हवन करना चाहिये। यह साधना कार्तिक कृष्ण 13 अर्थात् धन त्रयोदशी पर की जाती है, पूरे भारतवर्ष के लोग धन त्रयोदशी के दिन धनाधिपति कुबेर के साथ महालक्ष्मी तथा आरोग्य प्रदान करने वाले देव धनवंतरि की पूजा-आराधना एवं साधना करते हैं, और सुख संपदा के अभिलाषी तो इस दिन कुछ विशेष प्रयोग सम्पन्न करते हैं जिससे कि अगले पूरे वर्ष तक घर के सभी सदस्य प्रसन्न व निरोगी रहें, और उनके घर में श्रीलक्ष्मी का निवास और प्रसन्नता बनी रहे।

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सौभाग्य लक्ष्मी प्रयोग

सौभाग्य-लक्ष्मी दीपावली सिद्ध प्रयोग-2018

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in delhi)

सौभाग्य लक्ष्मी उपनिषद में भगवान आदिनारायण देवताओं को सौभाग्यलक्ष्मी साधना का उपदेश देतु हुये कहते हैं- सौभाग्यलक्ष्मी स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण रूप तीनों अवस्थाओं से परे तुरियस्वरूपा हैं। सभी मंत्रों को अपना आसन बनाकर उन पर विराजमान हैं। इस प्रकार सौभाग्यलक्ष्मी के इस महत्वपूर्ण यंत्र की परिभाषा और निर्माण की पूर्ण प्रक्रिया पूर्णतः समझाई है, उनका कहना है कि ऐसा महायंत्र निर्माण करना अत्यंत ही कठिन है, क्योंकि इस महायंत्र का निर्माण केवल एक विशेष मुहूर्त में ही सम्पन्न किया जाना चाहिये। और फिर सौभाग्यलक्ष्मी का सिद्ध यंत्र यदि साधक के पास होता है, तो वास्तव में ही वह समस्त भू-सम्पदा का स्वामी होता है, केवल मात्र घर में यंत्र रखने से ही उसे धर्म-अर्थ-काम, और मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। यह यंत्र अन्धकार में प्रकाश की तरह है, मध्य रात्रि में सूर्य की तरह तेजस्वी है।

दीपावली के पर्व पर रात्रि काल में साधक अपने घर में पूजा स्थान में इस अद्वितीय महायंत्र की स्थापना कर सौभाग्यलक्ष्मी मंत्र से साधना करता है, तो वह साधक वास्तव में ही सौभाग्यशाली माना जाता है, सौभाग्यलक्ष्मी अवश्य उसके घर में निवास करती हैं, यह वास्तव में ही उसके घर में लक्ष्मी को आना ही पड़ता है, और जब तक वह महायंत्र घर में स्थापित होता है, तब तक उस घर में सौभाग्य सहित लक्ष्मी का निवास हमेशा बना रहता है।

दीपावली की रात्रि में मंत्रों द्वारा सिद्ध करके यह महायंत्र घर में स्थापित होने पर न केवल कर्ज, मिट जाता है, अपितु घर के लड़ाई झगड़े भी समाप्त हो जाते है, व्यापार में वृद्धि होने लगती है, आर्थिक उन्नति और राज्य से सम्मान प्राप्ति होती है, और उसके जन्म जन्म के दुःख और दारिद्रय समाप्त हो जाते हैं। इस महायंत्र की जितनी प्रशंसा सौभाग्यलक्ष्मी उपनिषद में की है, और आगे के ऋषियों ने इस महायंत्र की जितनी विशेषतायें बतलाई हैं, वे अपने आप में अन्यतम है वशिष्ठ, विश्वामित्र, आदि ऋषियों ने इस प्रकार के महायंत्र को कामधेनु की संज्ञा दी है। गौतम और कणाद जैसे ऋषियों ने इस महायंत्र को कल्पवृक्ष के समान फलदायक बताया है। स्वयं शंकराचार्यजी ने इस महायंत्र को स्थापित कर, इससे संबंधित मंत्र सिद्धि के द्वारा असीम लक्ष्मी भण्डार प्राप्त कर जीवन की पूर्णता प्राप्त की थी। स्वयं तंत्रगुरू गोरखनाथ ने स्वीकार किया है, कि इस यंत्र में तांत्रिक और मांत्रिक दोनों विधियों का पूर्ण रूप से समावेश है। यह महायंत्र अपने आप में देवताओं के समान फलदायक है। आगे के विद्वानों ने भी यह स्वीकार किया है कि यदि साधक इस साधना को सम्पन्न कर लें और घर में ऐसा महायंत्र स्थापित कर लें, तो फिर उसके जीवन में किसी प्रकार की न्यूनता नहीं रह सकती, जीवन में किसी प्रकार का अभाव नहीं रह सकता, उसके जीवन में असफलता नहीं रह सकती।

महायंत्र की रचना- इस महायंत्र की रचना गुरुपुष्य योग में शुद्ध चांदी के पतरे पर करनी चाहिये। ऊपर की पंक्ति में 22 अंक से आरम्भ कर अंतिम पंक्ति में 4 अंक तक उत्कीर्ण करना चाहिये। और फिर रविपुष्य योग में इस यंत्र की प्राणप्रतिष्ठा करनी चाहिए।

दीपावली सिद्ध प्रयोग- 2018 :- यद्यपि शास्त्रों में बताया गया है, कि एक बार ऐसा महायंत्र सिद्ध करके स्थापित होने के बाद इससे संबंधित किसी भी प्रकार की साधना करने की आवश्यक नहीं होती। यह प्रयोग केवल एक ही दिन का है, जो कि दीपावली की रात्रि में सम्पन्न किया जाता है। सबसे पहले साधक दीपावली के दिन सांयकाल स्नानादि से शुद्ध होकर अपने पूजा स्थान में बैठ जाये और सामने एक लकड़ी के तख्ते पर पीला रेशमी वस्त्र बिछा कर उस पर प्राणप्रतिष्ठित महायंत्र स्थापित कर फूल, अक्षत्, नवैद्य, धूप-दीप से इसकी पूजा करें। पूजा के उपरांत इस महायंत्र को स्थापित कर दें। इससे पहले एक अलग पात्र में इस महायंत्र को जल से तथा दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से स्नान कराकर इसे पीले रेशमी वस्त्र पर स्थापित कर दें, और केसर से इस महायंत्र के बाहर नौ बिन्दियां लगायें जो नव निधि की प्रतीक हैं, इसके बाद हाथ में जल ले कर विनियोग करे-

विनियोग-
अस्य श्री सौभाग्यलक्ष्मी मंत्रस्य भृगु ऋषिः आद्यादि श्री महालक्ष्मी देवता, नीचृद्रगायत्रीछन्दांसि, श्रीं बीजम् श्रीं शक्तिः, श्रीं कीलकम् श्री महालक्ष्मी प्रसाद सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।

इसके बाद साधक हाथ में जल ले कर संकल्प करें कि मैं अमुक गौत्र अमुक पिता का पुत्र, अमुक नाम का साधक दीपावली पर्व पर भगवती सौभाग्यलक्ष्मी को नवनिधियों के साथ अपने घर में स्थापित करने के लिये यह सिद्ध प्रयोग सम्पन्न कर रहा हूं, ऐसा कह कर हाथ में लिया हुआ जल भूमि पर छोड़ दे, और फिर प्राण प्रतिष्ठित यंत्र के सामने शुद्ध घृत के पांच दीपक लगावे, सुगन्धित अगरबत्ती प्रज्वलित करें, गुलाब तथा संभव हो तो कमल का भी एक पुष्प चढावें, थोडे चावल, रोली, कलावा, पान तथा साबुत सुपारी चढाकर पूजा करें, और दूध के बने हुए प्रसाद का नैवेद्य समर्पित करें, इसके बाद हाथ में जल लेकर अंगन्यास करें-

अंगन्यास-
श्रां हृदयायनमः। श्रीं शिरसे स्वाहा। श्रूं शिखाये वषट्। श्रैं कवचाय हुम्। श्रौं नेत्रत्रयाय वौष्ट्। श्रःअस्त्राय फट्। इसके बाद हाथ जोड़ कर ध्यान का पाठ करें-

ध्यान-
भुयादभुयो द्विपद्मभयवरदकरा तत्पकार्तस्वराभ शुभ्राभ्राभेभयुग्मद्वयकर धृतकुम्भादिभरासिच्यमाना।
रक्तौघाबद्धमौलिर्विमलतरदुकूलार्तवालेपनाढया पद्मक्षी पद्मनाभोरसि कृतवसतिः पद्मगा श्रीः श्रियै नः।।

इसके बाद साधक सिद्ध सौभाग्यलक्ष्मी माला (कमलगट्टे की सिद्ध माला) से एकाक्षरी मंत्र की 51 माला जप करें, इसमें सौभाग्यलक्ष्मी माला’ का ही प्रयोग होता है। एकाक्षरी महामंत्र- ‘श्रीं’ 51 माला मंत्र जप के बाद साधक सौभाग्यलक्ष्मी की आरती करें और यंत्र को प्रातः अपनी तिजोरी में रख दें या पूजा स्थान में रहने दें, तथा प्रसाद को घर के सभी सदस्यों में वितरित कर दे, इस प्रकार यह साधना सम्पन्न होती है जो कि वर्ष की श्रेष्ठतम और अद्वितीय साधना कही जाती है।

साधना सामग्री में:- एक प्राणप्रतिष्ठित सौभाग्यलक्ष्मी यंत्र जो कि शुद्ध चांदी पर उत्कीर्ण तथा प्राणप्रतिष्ठित हो और सौभाग्यलक्ष्मी माला (कमलगट्टे की सिद्ध माला) की आवश्यकता होगी।

यदि आप यह प्रयोग नहीं कर सकते:-

यदि आप ‘सौभाग्य लक्ष्मी प्रयोग’ सम्पन्न नहीं कर सकते, अथवा आप को साधना पद्धति जटिल लगती है, तब एेसी स्थिति में आप दीपावली की रात्रि सिद्ध मुहूर्त में सिद्ध किया गया ‘सौभाग्य लक्ष्मी यंत्र’ तथा कमलगट्टे की माला हमारे कार्यालय में सम्पर्क करके आर्डर कर सकते हैं। ——————————————————————————–

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सूर्य sun

ज्योतिष मतानुसार सूर्य से पृथ्वी की दूरी अनुमानित सवा करोड़ मील है। सूर्य ग्रह न होकर एक तारा है, जो कि स्थिर है, और अपने अक्ष पर निरन्तर घूमता है। अन्य सभी ग्रह उसकी परिक्रमा करते हैं। सूर्य सदैव मार्गी व उदित रहने वाला ग्रह है।

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ज्योतिष मतानुसार सूर्य नवग्रहों में से एक ग्रह है, ग्रहों में सूर्य आत्मा, आँख, हृदय, हड्डियों, शारीरिक संगठन, आरोग्यता, निजी व्यवहार, सत्वगुण, राज-कृपा, आविष्कार, अधिकार तथा सत्ता का कारक (अधिपति) ग्रह माना गया है, इसे लग्न, धर्म तथा कर्म 1, 9, 10 भाव का कारक भी माना जाता है, तथा इसके द्वारा विशेष रूप से पिता के सम्बंध का विचार किया जाता है।

कुण्डली में सूर्य जिस स्थान पर स्थित हो, गोचर काल में उससे छठे स्थान में किसी ग्रह के होने से सूर्य का वेध हो जाता है, वेधित सूर्य सदैव अशुभ फलदायक है, सूर्य के विद्व स्थान है – 1, 12, 4 तथा 5। सूर्य के शुभ स्थान 3-6-10 व 11 हैं, सूर्य तथा शनि में आपस में कभी वेध नहीं होता, यदि सूर्य विद्ध स्थान पर हो, तथा अन्य ग्रह सूर्य के स्थान शुभ पर ही हो तो उसे विलोम-वेध कहाँ जाता है। विलोम-वेध भी अशुभ फल देने वाला माना गया है।

अन्य:- निसर्ग बल में सूर्य को सब ग्रहों में बलवान माना गया है, यह सर्वाेच्च, स्वराशि, देष्काण, होरा, रविवार, नवांश, उत्तरायण, दिन में मध्य भाग, रात्रि के प्रवेश-काल, मित्र के नवांश तथा लग्न से दशम में (मतान्तर से सप्तम भाव) सदैव बलवान रहते हैं, मकर से 6 राशियों तक इसे चेष्टा बली माना गया है। जन्म कुण्डली में सूर्यदेव ऐसे कई योगों का निर्माण करते हैं, जो विशेष होते हैं, सूर्य समस्त ग्रहों में राजा होता है। अतः इसका जन्मपत्रिका में बलवान एवं योगकारक होना जातक के राजसी गुणों को प्रकट करता है। जातक परिजात, फलदीपिका, बृहत पाराशर होरा शास्त्र इत्यादि ज्योतिषीय ग्रंथों में योग बताये गये हैं जो निम्न प्रकार के हैं :-

1. जन्मपत्रिका में सूर्य से चन्द्रमा केन्द्र में है तो अधम योग से धन, सवारी, बुद्धि, ज्ञान, विद्या, उदारता, यश, मान-सम्मान, सुख-सुविधा के योग में कमी या कम फल प्राप्त करता है।

2. जन्मपत्रिका में सूर्य से द्वितीय मंगल, बुध व बृहस्पति, शुक्र या शनि में से कोई एक ग्रह या अधिक ग्रह हो तो शुभ वेसि योग व जब इनमें से कोई ग्रह या अधिक ग्रह द्वादश में तो शुभ वासि योग, इससे जातक विद्वान, धर्म पालक, प्रतिष्ठिता सुन्दर, धीर एवं अधिकार प्राप्त करने वाला होता है।

3. सूर्य यदि परम उच्च अर्थात मेष के दस अंश पर रहने से उसकी दशा में जातक की धर्म-कर्म में प्रीति बढ़े व पिता द्वारा संचय किया धन तथा भूमि का लाभ हो वहीं उच्चस्थ सूर्य में धन-अन्न व सम्मान की वृद्धि पर बंधु वर्गाें से झगड़ों के कारण परदेश वास की संभावना रहे, वाहनों का सुख प्राप्त होना सम्भव।

4. परम नीच सूर्य की दशा में पिता-माता की मृत्यु, स्त्री पुत्र, सम्पत्ति व स्वयं के गृह में हानि होती है, भय सदैव व्याप्त रहे जबकि नीचस्थ सूर्य से राजकोष से धन-मान की हानि, स्त्री-पुत्र-मित्रादि से क्लेश व किसी स्वजन की मृत्यु की आशंका रहे।

5. उच्च नवांशस्थ रवि जातक में साहस की वृद्धि कर झगड़े में विजय दिलाकर धन वृद्धि करवाता है (कोर्ट केस में विजय), पर पितृ कुल के जनों में बारम्बार क्षति होती रहे। नीचस्थ नवांश का बृहस्पति परदेश यात्रा में स्त्री-पुत्र, धन तथा पृथ्वी से हानि कराता है, मानसिक व्यथाकारी, ज्वरादि से पीड़ित व गुप्तेन्द्रियों की वेदना से कष्ट पाता है। उच्चस्थ सूर्य नवमांश में नीचस्थ हो जाये तो स्त्री, समीपी कुटुम्बियों की मृत्यु व संतान पर आपत्ति का कारण बनता है वहीं नीचस्थ सूर्य यदि नवमांश में उच्च हो तो वह महान सुख व सम्मान प्राप्त करवाता है परन्तु जब दशा का अंत हो रहा हो तो इसका फल विपरीत हो जाता है।

सूर्य महादशाः-
1. लग्नस्थ सूर्य की महादशा में जब मंगल, चंद्र, शनि या राहु की अंतर्दशा होती है तो दुःख राजकीय-अधिकार और गृह तथा धन का नाश हों, लग्नस्थ सूर्य को महादशा में जब गोचर मंगल, चन्द्रमा शनि अथवा राहु की अंतर्दशा आदि है तब सुख, राज्य, अधिकार और गृह तथा धन-सुख की प्राप्ति हो।

2. द्वितीयस्थ सूर्य की महादशा में जब पापग्रहों की अंतर्दशा आये तब धन क्षय, अपमानकारक शब्दों का श्रवण, मानसिक अशांति अकारण भय, नेत्र-रोग वहीं शुभ ग्रहों की अंतर्दशा में सुख, विद्या की प्राप्ति राजनेताओं से प्रेम व भूषण, वस्त्र वाहनादि का सुख मिले।

3. तृतीयस्थ सूर्य की महादशा में गोचर ग्रह की अंतर्दशा आने से सुख जबकि अगोचर ग्रह की अंतर्दशा आने से निकृष्ट फल।

4. चतुर्थस्थ सूर्य की महादशा में पापाग्रह की अंतर्दशा मानसिक अशांति राज, अग्नि, चोर भय व भ्राता की मृत्यु का भय रहें, शुभग्रह की अंतर्दशा में अत्यंत सुख, राज, धन, वस्त्र, सुंगधादि पदार्थ व स्त्री-पुत्रादि का सुख होता है।

5. पंचमस्थ सूर्य की महादशा में जब शनि, मंगल, केतु या राहु की अंतर्दशा चोर, अग्नि व राज पीड़ा दे, संतान को क्लेश रहें, शुभ ग्रह की अंतर्दशा में आनंद, राज्य भूषण व वाहन प्राप्ति व संतान सुख करवायें।

6. षष्ठस्थ सूर्य की महादश में पापग्रह की अंतर्दशा ऋण-ग्रस्त करवाये, शत्रुपक्ष से विशेष भय वहीं शुभ ग्रहान्र्तदशा में सुख व उत्तम फल पर अंत में दुखी होता है।

7. सप्तमस्थ सूर्य की महादशा में शुक्र, बृहस्पति, चन्द्रमा, बुध की जब अंतर्दशा आयें तो मन में उत्साह, भूषण, वस्त्र-वाहन की प्राप्ति स्त्री लाभ जबकि पाप ग्रह की अंतर्दशा ज्वर अतिसार, पित्त प्रकोप, प्रमेह, मूत्रकृच्छ इत्यादि रोग व शत्रु भय कराती है।

8. अष्ठमस्थ सूर्य की महादशा में जब शुभ ग्रह की अंतर्दशा आये तब भूषण-वस्त्रादि की प्राप्ति अधिक शुभ फल हो, पर किंचित दुख भी रहें, पाप ग्रह अंतर्दशा में नाना प्रकार के भय, पराधीनता, व्याधि, दुःख, पीड़ा व मरण भय।

9. नवमस्थ सूर्य की महादशा में शुभ ग्रह की अंतर्दशा दान की प्रवृत्ति, उत्सवादि सुख, यज्ञादि क्रिया की संभावना व उत्तम कार्यों को करने का अवकाश मिलता हैं, पाप ग्रह की अंतर्दशा में दुःख वृद्धि गुरू व पिता की मृत्यु हों।

10. दशमस्थ सूर्य की महादशा में पाप ग्रह की अंतर्दशा हो तो उत्तम कर्म की हानि, कर्म क्षेत्र में व्यवधान, अकारण संकट, चोर-भय वही शुभ ग्रह की महादशा में धन की प्राप्ति, आय के स्रोतों में वृद्धि, कर्म क्षेत्र में विस्तार की संभावना व अस्थायी कीर्ति हों।

11. एकादशस्थ सूर्य की महादशा में पाप ग्रह की अंतर्दशा आरम्भ में दुख अंत में सुख दें, शुभ ग्रह की अंतर्दशा राजकीय अनुग्रह की प्राप्ति, धन की उपलब्धि, स्त्री-पुत्र सुख दे।

12. द्वादशस्थ सूर्य की महादशा में पाप ग्रह की अंतर्दशा डिमोशन, पद-छूटना, प्रवास, राज-कोष से मानहानि करवायें, शुभ ग्रह की अंतर्दशा भूमि, पशु, धन-धान्य प्राप्त करायें।

जन्मराशि से सूर्य का गोचर का भ्रमण फल :

1. गोचर का सूर्य जब जन्म राशि पर से गुजरता है तो अशुभ स्वप्न, सिरदर्द, मस्से की तकलीफ, सम्मान में गिरावट पत्नी से तकरार संभव, रक्त-विकार, नेत्रपीड़ा, रिश्तेदारों व करीबी मित्रों से झगड़ा संभव। कार्यों के छूटने की संभावना रहें।

2. गोचर का सूर्य जन्मराशि से दूसरे स्थान पर से गुजरता है तो अशुभ कर्म में रत, आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों से मिलना, कमजोर मन, दुश्मनी बढ़े वेगपीड़ा, कीमती वस्तु की चोरी संभव, बुरे परिणामों की अनुभूति।

3. गोचर का सूर्य जन्म राशि से तीसरे आवे तो धन लाभ, पराक्रम वृद्धि शत्रुओं पर विजय, सामाजिक कार्यों में व्यस्त, रोग कर्ज से मुक्ति दूसरो के हित संघर्ष, विजय, जातक के निर्णय सही होगें, स्थानान्तरण अथवा दूरस्थ यात्रायें संभव।

4. गोचर का सूर्य जन्मराशि से जब चैथे भ्रमण करता है तो घरेलू परेशानी, संतान कष्ट, मानसिक कलह, व्यसनी, निर्णय लेने में असफल, घर की स्त्रियाँ बीमार या दुर्घटनाग्रस्त, कृषि में हानि, अहं को ठेस पहुँचे, मित्र-परिजनों में टकराव सम्भव।

5. गोचर का सूर्य जन्मराशि से पंचम स्थान पर से गुजरे शारीरिक एवं मानसिक बैचेनी, आवक में कमी, संचित धन के खर्च की बढ़ोत्तरी, संतान अवज्ञाकारी-बीमार, सेक्स-प्रेम प्रसंग में असंतुष्टि, पेट की बीमारी, उच्च अधिकारियों या अच्छे सम्बंधों में गलतफहमियाँ।

6. गोचर का सूर्य जन्मराशि से छठे से भ्रमण करें तो रोगों का भय, शत्रुओं पर विजय, हाथ में लिये कार्यों में सफलता, उच्च अधिकारी प्रबल रहे, प्रतियोगिता में सभी प्रकार की सफलता, पंचम भावस्थ गोचर के अशुभ फलों का नाश हो शुभ फल मिलें।

7. गोचर का सूर्य जन्मराशि से सप्तम आये तो रोगों का प्रकोप, पेट व गुदामार्ग में रोगों का होना संभव, पत्नी-बच्चे बीमार, वैवाहिक जीवन में कटुता, यात्रायें नुकसानदायक, सम्मान हानि, नौकरी में अवनति, भागीदारी में तकरार संभव।

8. गोचर का सूर्य जन्मराशि से अष्टम आयें तो शत्रुओं से विवाद, बुरे परिणाम, राज भय संभव, पति पत्नी में तनाव, सरकार से आर्थिक दंड, धन हानि, आवक में रूकावट, स्वभाव में अस्थिरता।

9. गोचर का सूर्य जन्मराशि से नवें आये तो अशुभ, पिता से बिछोह, धन-सम्मान हानि, मिथ्या दोषारोपण, जातक अंहकार व पूर्वाग्रह से ग्रसित रहें, मन में निराशा संभव, पापनाश हेतु तीर्थयात्रा संभव।

10. गोचर का सूर्य जन्मराशि से दशम आये तो अभीष्ट कार्य हो, स्वास्थ्य लाभ, उच्च अधिकारियों का सहयोग मिले, पदोन्नति, भाग्योदय में सहायक।

11. गोचर का सूर्य जन्मराशि से एकादश आये तो अचानक उत्तम फल, आवक के जरियो में वृद्धि, धंधे-व्यापार में लाभ, चिंतायें समाप्त रोग नाश, मित्र-रिश्तेदार मदद करें, उत्तम वाहन, उत्तम भोजन मिलें।

12. गोचर का सूर्य जन्मराशि से द्वादश आये तो अशुभ समाचारों की प्राप्ति, धारा प्रवाह खर्च, बीमारी, मित्रों से कलह, नेत्र विकार पेट की समस्या, अदालती केस चलता हो तो उसमें हार, आराम का नाश।

अशुभ सूर्य के उपाय :-
1. प्रतिदिन उदित होते सूर्य को ताम्र पात्र में जल भरकर उसमें थोड़ा-सा कुकुम डालकर, लाल पुष्प सहित सूर्याध्य दें।

2. नेत्रों की व्याधियों में सूर्योपासना सहित नेत्रोपनिषद का नित्य पाठ करें।

3. रविवार को नमक रहित भोजन करें।

4. तांम्र पात्र, गेहूँ, गुड़, दक्षिणा सहित किसी ब्राह्मण को दान करें।

5. सूर्य कृत साधारण अरिष्टों में नवग्रह कवच सहित सूर्य कवच एवं शतनाम का पाठ भी पर्याप्त शुभफलप्रद रहे।

इस प्रकार सूर्य अपनी भिन्न-भिन्न स्थितियों से भिन्न-भिन्न फलों को देते हुये अपना प्रभाव देते हैं, यदि कोई विष्टि समस्या हो तो सविधिपूर्वक सूर्य योग अथवा वेदोक्त मंत्रों का अनुष्ठान रूप जप करवाना सवोत्तम रहता है।

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सिंह राशि और प्रेम सम्बन्ध

सिंह राशि वालों का प्रेम सम्बंध व वैवाहिक जीवन कैसा होता है, इस लेख के माध्यम से बताया गया है :-

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सिंह राशि भचक्र में 120 अंश से 150 अंश तक होती है। यह अग्नि तत्व की स्थिर राशि है। सिंह राशि का प्रतीकात्मक चिन्ह भी सिंह (शेर) है। इस राशि का स्वामी ग्रह सूर्य होता है। सिंह राशि के पुरूषों की बात की जाय तो ये अपनी प्रेमिका को यह बात मनवाने में कामयाब होते हैं कि वे उसके लिये सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति है। ये बनावटी प्रेम को पसंद नहीं करते बल्कि ये प्रेम में स्वाभाविक आनंद और खुशी तलाशते हैं। वैवाहिक और पारिवारिक जीवन में इनकी यही विशेषता इनको सबसे अलग व्यक्तित्व वाला सिद्ध करवाती है। ये अपने बच्चों और पत्नी के लिये सभी सुख सुविधाओं का प्रबंध करते हैं। ये भी परिवार के द्वारा मिलने वाले सुखों को ही अपने जीवन का आधार मानते हैं।

यदि कभी ऐसा हो कि इन्हें परिवार या प्रेमिका का प्रेम न मिले तो ये बड़े उदास हो जाते हैं। ये स्वाभाविक और उन्मुक्त प्रेम कि इच्छा रखते हैं। अतः एक पत्नी के रूप में इनका साथ निभाना आसान काम नहीं है। ऐसे में यदि इनकी पत्नी एक बार इनके गुणों और स्वभाव को अपने भीतर आत्मसात कर ले तो फिर जीवन भर वैवाहिक जीवन सुखमय रहता है। यदि ये प्रेम में एक बार धोखा खा गये या असफल हो गये तो दोबारा प्रेम प्रसंगों में पड़ने से ये हिचकिचाते हैं, और कुछ हद तक प्रेम प्रसंगों के प्रति घृणा के भाव रखने लगते हैं।

सिंह राशि वाली स्त्रियाँ :- अपने प्रेमी के प्रति बड़ी उदारता का भाव रखती हैं। सिंह राशि वाली स्त्रियाँ बड़े सुलझे हुये विचारों वाली होती हैं, परन्तु प्रेम के मामलों में ये आसानी से फंस जाती हैं। अतः कुछ मामलों में इन्हें मायूसी भी हाथ लगती है। ये स्वच्छ हृदय, सरल और उदार स्वभाव, भावुक और उन्मुक्त स्वभाव वाली होती हैं। ये अपने प्रेमी के प्रति सदैव वफादार रहती हैं। अतः ये एक आदर्श प्रेमिका साबित होती हैं। ये एक उत्तम पत्नी भी होती हैं ये अपने चाहने वाले को उसकी चाहत से बढ़कर प्यार करने वाली होती हैं। इनके प्रेम में गहराई और विश्वसनीयता होती है। ये पूर्ण उत्साह के साथ सदैव सहयोग के लिये तत्पर रहती है। अपने पति के व्यापार व्यवसाय में ये सदैव सहयोग देने के लिये तैयार रहती हैं। ये अपने पति और परिवार दोनों से बहुत प्यार करती हैं। ये इनकी परेशानियों को भी अपने ऊपर लेने को तैयार रहती हैं। परन्तु फिर भी इन्हें कभी-कभी ऐसा लगता है कि इनके प्यार के बदले जो प्यार घर परिवार से इन्हें मिल रहा है वो कुछ कम है।

सिंह और मेष राशि प्रेम:- मेष राशि वाले आपके लिये एक अच्छे जीवन साथी सिद्ध हो सकते हैं। इनके साथ होने से आप स्वयं को गौरवान्ति अनुभव करेंगे। इनसे आपको सुख और उत्साह मिलेगा। विवाह के बाद ये आपके प्रतिपूर्ण जिम्मेदार रहेंगे। अतः ये आपके लिये अच्छे जीवन साथी हो सकते हैं।

सिंह और वृष राशि प्रेम:- वृष राशि वालोें के साथ आप स्वयं को अधिक सुखी अनुभव नहीं करेंगे। इनके साथ का वैवाहिक जीवन आपको संघर्ष पूर्ण लगेगा। इनके साथ रहते हुये आप अपने आपको पुराने और रूढ़िवादी विचारों से घिरा हुआ महसूस करेंगे। दोनों की पसंद न पसंद भी अलग हो सकती है अतः वैवाहिक जीवन को व्यवस्थित करने में आपको कठिनाई होगी।

सिंह और मिथुन राशि प्रेम:- मिथुन राशि वाले आपके लिये एक अच्छे जीवन साथ सिद्ध हो सकते हैं। इनकी आदत सदैव प्रसन्न रहने और हंसने खिलखिलाने की होती है, जो आपकी भी पसंद आयेगी। ये आपके आस-पास कुछ ऐसा माहौल निर्मित करेंगे जिससे आपको लगेगा कि ये आपसे बहुत प्यार करते हैं। इनका स्वभाव उतावला और शीघ्र निर्णय लेने वाला होता है। कभी-कभी आपको ऐसा भी लग सकता है कि इनका सम्बंध आपके अलावा भी कहीं है कि इनका सम्बंध आपके अलावा भी कहीं है परन्तु इसकी सत्यत, कुण्डली के अन्य योगों पर निर्भर करती है, फिर भी इनके साथ आपका वैवाहिक जीवन सफल रहेगा।

सिंह और कर्क राशि प्रेम:- इनके साथ आपका वैवाहिक जीवन सफल रहेगा इसमें संदेह है। इनके प्रति आपका आकर्षण जीवन साथी के रूप में न रहकर मित्रवत् रह सकता है। जब आप घर के अलावा अन्य बातों में रूचि लेंगे उस समय इनको आपत्ति रह सकती है। इन सब कारणों से बड़ी कठिनाई के बाद ही इनके साथ आपका वैवाहिक जीवन सफल हो पायेगा।

सिंह और सिंह राशि प्रेम:- एक-दूसरे की तकरीबन सभी आदतें समान होना ही अनेक कठिनाइयों का उद्गम स्रोत है। आप लोग एक-दूसरे से जल्दी ही ऊबने लगेंगे। दोनों में ही अभिमान और स्वतंत्र रहने की आदत पाई जायेगी अतः एक-दूसरे की बात आप लोग मानेंगे, इसमें संदेह है। दोनों ही मेहनत वाले कामों से बचना चाहेंगे। दोनों ही एक दूसरे पर हावी होना चाहेंगे अतः इन कारणों से आपके बीच एक वैचारिक खाई तैयार हो जायेगी। विवाह के बाद दोनों ही यदि संयमी और सहनशील हो जाते हैं तभी वैवाहिक जीवन सफल हो सकता है।

सिंह और कन्या राशि प्रेम:- कन्या राशि वालों के साथ आपके वैवाहिक जीवन को अधिक सुखी वही कहा जायेगा। आप उनके प्रति जितना आकर्षित रहेंगे वे आपके प्रति उससे बहुत कम आकर्षण रखेंगे। आपके अधिक प्यार के बदले आपको बहुत कम प्यार मिलेगा। इन सब कारणों से आपको आत्मिक कष्ट होगा। इतने पर भी आप उनकी आलोचना नहीं करेंगे जबकि वो आपको नसीहत देते रहेंगे। ये सब होने पर आप मायूस होकर गलत दिशा में भी सोच सकते हैं। इन सब कारणों से इनके साथ आपके वैवाहिक जीवन को सफल नहीं कहा जायेगा।

सिंह और तुला राशि प्रेम:- तुला राशि वालों के साथ आपका वैवाहिक जीवन सुखमय रहेगा। ये आपके प्रति बहुत आकर्षण का भाव रखते हैं। इनके अंदर कई ऐसे गुण मौजूद होते हैं जिन्हें आप बहुत पसंद करते हैं। ये मृदुभाषी, स्नेही, सजग और सदैव प्रसन्न रहने वाले होते हैं। ये जीवन के प्रत्येक पहलू को ध्यान में रखकर काम करते हैं। जिसके कारण जीवन में आनन्द बना रहता है। प्रेम और अंतरंग सम्बंधों को ये जीवन का महत्वपूर्ण पहलू समझते हैं इन सब कारणों से आपका जीवन सुखी रहेगा।

सिंह और वृश्चिक राशि प्रेम:- वृश्चिक राशि वालों के साथ आपके वैवाहिक जीवन को अधिक सुखी नहीं कहा जायेगा। यद्यपि ये आपके प्रति अधिक आकर्षित रहते हैं परन्तु फिर भी आप में अभिमान या स्वाभिमान सम्बंधी पेरशानियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। जीवन की गाड़ी सहजता से चलेगी इसमें संदेह होता है। अतः आपका वैवाहिक जीवन उसी स्थिति में सुखी रह सकता है जब आप लोग अभिमान का त्याग कर एक दूसरे के आगे झुकना चाहेंगे।

सिंह और धनु राशि प्रेम:- धनु राशि वालों के साथ आपका वैवाहिक जीवन सुखमय रहेगा। ये आपके प्रति सहजता से आकर्षित होते हैं। धनु राशि वाले बड़े संवेदनशील और उदार मन के होते हैं। इनकी आदत किसी पर धौंस जमाना या नुकसान पहुँचाना नहीं होती। इनकी आदतें आपको बहुत पसंद आयेगी। ये आप पर पूर्ण विश्वास करते हैं तथा ये यही चाहते हैं कि आप भी इन पर पूर्ण विश्वास करें। इस प्रकार आप इनके साथ सुखी और अनन्दमयी वैवाहिक जीवन प्राप्त कर सकेंगे।

सिंह और मकर राशि प्रेम:- मकर राशि वालों के साथ आपका वैवाहिक जीवन तभी सफल होगा जब आप भी इसके लिये पूर्ण प्रयास करें। ये आपके प्रति बहुत कम आकर्षण रखते हैं, हाँ आपके अंदर वह योग्यता जरूर है जिसके कारण आप इन्हें अपने आकर्षण में बाँध सकते हैं। इनकी कुछ ऐसी पसंद या नापसंद भी हो सकती हैं जो आपके विपरीत होती है लेकिन ये उनको भी आपसे मनवाना चाहेंगे। ये सामाजिक कार्यों में भी रूचि नहीं लेते। इन सबको कारणों पर नियंत्रण पाकर ही आप इनके साथ सुखी रह सकते हैं।

सिंह और कुंभ राशि प्रेम:- कुंभ राशि वालों के साथ आपका वैवाहिक जीवन पूर्णरूपेण सफल हो, इसमें संदेह होता है। विवाह के पहले तक ये आपके प्रति बड़ा अगाध प्रेम रखते हैं परन्तु विवाह के पश्चात ये प्रेम कम और अधिकार ज्यादा जताते हैं। ये आपके स्वतंत्र प्रवृत्ति पर भी अंकुश लगाना चाहते हैं। इनका चरित्र और व्यवहार पूर्णरूपेण आपके विपरीत होता है। इन सब सफल नहीं कहा जायेगा।

सिंह और मीन राशि प्रेम:- मीन राशि वालों के साथ आपका वैवाहिक सम्बंध सामान्य कहा जायेगा। यद्यपि ये आपके प्रति अधिक आकर्षण नहीं रखते फिर भी ये आपको भरपूर प्रेम देने का प्रयास करेंगे लेकिन इनके प्रेम में आपको गंभीरता या सापेक्षता का अभाव लगेगा। यदि आप इन्हें अपने प्रभाव में रखकर प्यार से दिशा निर्देश करते हैं तो ऐसी स्थित में आपके वैवाहिक जीवन के सफल होने की सम्भावनायें बढ़ जायेगी।

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गुरू की महिमा

जब महादेवजी ने बताई पार्वतीजी को गुरु की महिमा :-

(गुरू पूर्णिमा 27/07/2018 पर विशेष) :-

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गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वर:।

गुरु: साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नम:।।

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।

तत्पदं दर्शितं येनं तस्मै श्रीगुरवे नम:।।

एक बार पार्वतीजी ने महादेवजी से गुरु की महिमा बताने के लिए कहा। तब महादेवजी ने कहा :-

गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु, गुरु ही शिव और गुरु ही परमब्रह्म है; ऐसे गुरुदेव को नमस्कार है। अखण्ड मण्डलरूप इस चराचर जगत में व्याप्त परमात्मा के चरणकमलों का दर्शन जो कराते हैं; ऐसे गुरुदेव को नमस्कार है।

ध्यानमूलं गुरोर्मूर्ति: पूजामूलं गुरो: पदम्। मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरो: कृपा।।

अर्थात्– गुरुमूर्ति का ध्यान ही सब ध्यानों का मूल है, गुरु के चरणकमल की पूजा ही सब पूजाओं का मूल है, गुरुवाक्य ही सब मन्त्रों का मूल है, और गुरु की कृपा ही मुक्ति प्राप्त करने का प्रधान साधन है। गुरु शब्द का अभिप्राय जो अज्ञान के अंधकार से बंद मनुष्य के नेत्रों को ज्ञानरूपी सलाई से खोल देता है, वह गुरु है। जो शिष्य के कानों में ज्ञानरूपी अमृत का सिंचन करता है, वह गुरु है। जो शिष्य को धर्म, नीति आदि का ज्ञान कराए, वह गुरु है। जो शिष्य को वेद आदि शास्त्रों के रहस्य को समझाए, वह गुरु है।

गुरुपूजा का अर्थ :-
गुरुपूजा का अर्थ किसी व्यक्ति का पूजन या आदर नहीं है वरन् उस गुरु की देह में स्थित ज्ञान का आदर है, ब्रह्मज्ञान का पूजन है।

गुरुपूर्णिमा मनाने का कारण :-
वैसे तो गुरू सदा पूजनीय हैं, परंतु आषाढ़ पूर्णिमा के दिन सभी अपने-अपने गुरु की पूजा विशेष रूप से करते हैं। यह सद्गुरु के पूजन का पर्व है, इसलिए इसे गुरुपूर्णिमा कहते हैं। जिन ऋषियों-गुरुओं ने इस संसार को इतना ज्ञान दिया, उनके प्रति कृतज्ञता दिखाने का, ऋषिऋण चुकाने का और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का पर्व है गुरुपूर्णिमा। यह श्रद्धा और समर्पण का पर्व है। गुरुपूर्णिमा का पर्व पूरे वर्षभर की पूर्णिमा मनाने के पुण्य का फल तो देता ही है, साथ ही मनुष्य में कृतज्ञता का सद्गुण भी भरता है। गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय।।
माता-पिता जन्म देने के कारण पूजनीय हैं, किन्तु गुरु धर्म और अधर्म का ज्ञान कराने से अधिक पूजनीय हैं। इष्टदेव के रुष्ट हो जाने पर तो गुरु बचाने वाले हैं,‌ परन्तु गुरु के अप्रसन्न होने पर कोई भी बचाने वाला नहीं हैं। गुरुदेव की सेवा-पूजा से जीवन जीने की कला के साथ परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग भी दिखाई पड़ जाता है। कवच अभेद विप्र गुरु पूजा। एहि सम विजय उपाय न दूजा।।

अर्थात् :- वेदज्ञ ब्राह्मण ही गुरु है, उन गुरुदेव की सेवा करके, उनके आशीर्वाद के अभेद्य कवच से सुरक्षित हुए बिना संसार रूपी युद्ध में विजय प्राप्त करना मुश्किल है।

गुरुपूर्णिमा को व्यासपूजा क्यों कहते हैं? :-
आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को भगवान वेदव्यास का अवतरण पृथ्वी पर हुआ था इसलिए यह व्यासपूजा या व्यासपूर्णिमा कहलाती है। व्यासजी ऋषि वशिष्ठ के पौत्र व पराशर ऋषि के पुत्र हैं। व्यासदेवजी गुरुओं के भी गुरु माने जाते हैं। वेदव्यासजी ज्ञान, भक्ति, विद्वत्ता और अथाह कवित्व शक्ति से सम्पन्न थे। इनसे बड़ा कवि मिलना मुश्किल है। उन्होंने ब्रह्मसूत्र बनाया, संसार में वेदों का विस्तार करके ज्ञान, उपासना और कर्म की त्रिवेणी बहा दी, इसलिए उनका नाम ‘वेदव्यास’ पड़ा। पांचवा वेद ‘महाभारत’ और श्रीमद्भागवतपुराण की रचना व्यासजी ने की। अठारह पुराणों की रचना करके छोटी-छोटी कहानियों द्वारा वेदों को समझाने की चेष्टा की। संसार में जितने भी धर्मग्रन्थ हैं, चाहे वे किसी भी धर्म या पन्थ के हों, उनमें अगर कोई कल्याणकारी बात लिखी है तो वह भगवान वेदव्यास के शास्त्रों से ली गयी है। इसलिए कहा जाता है–‘व्यासोच्छिष्टं जगत्सर्वम्’ अर्थात् जगत में सब कुछ व्यासजी का ही उच्छिष्ट है।
विलक्षण गुरु समर्थ रामदास के अदम्य साहसी शिष्य छत्रपति शिवाजी छत्रपति शिवाजी महाराज समर्थ गुरु रामदास स्वामी के शिष्य थे। एक बार सभी शिष्यों के मन में यह बात आयी कि शिवाजी के राजा होने से समर्थ गुरु उन्हें ज्यादा प्यार करते हैं। स्वामी रामदास शिष्यों का भ्रम दूर करने के लिए सबको लेकर जंगल में गए और एक गुफा में जाकर पेटदर्द का बहाना बनाकर लेट गए। शिवाजी ने जब पीड़ा से विकल गुरुदेव को देखा तो पूछा– ‘महाराज! इसकी क्या दवा है?’
गुरु समर्थ ने कहा – शिवा! रोग असाध्य है। परन्तु एक दवा काम कर सकती है, पर जाने दो।
शिवा ने कहा ‘गुरुदेव दवा बताएं, मैं आपको स्वस्थ किए बिना चैन से नहीं रह सकता।’
गुरुदेव ने कहा इसकी दवा है– सिंहनी का दूध और वह भी ताजा निकला हुआ; परन्तु यह मिलना असंभव सा है।
शिवा ने पास में पड़ा गुरुजी का तुंबा उठाया और गुरुदेव को प्रणाम कर सिंहनी की खोज में चल दिए। कुछ दूर जाने पर उन्हें एक सिंहनी अपने दो शावकों (बच्चों) के साथ दिखायी पड़ी। अपने बच्चों के पास अनजान मनुष्य को देखकर वह शिवा पर टूट पड़ी और उनका गला पकड़ लिया। शूरवीर शिवा ने हाथ जोड़कर सिंहनी से विनती की– ‘गुरुदेव की दवा के लिए तुम्हारा दूध चाहिए’ उसे निकाल लेने दो। गुरुदेव को दूध दे आऊँ, फिर तुम मुझे खा लेना।’ ऐसा कहकर उन्होंने ममता भरे हाथों से सिंहनी की पीठ सहलाई। मूक प्राणी भी ममता की भाषा समझते हैं। सिंहनी ने शिवा का गला छोड़ा और बिल्ली की तरह शिवा को चाटने लगी। मौका देखकर शिवा ने उसका दूध निचोड़कर तुंबा में भर लिया और सिंहनी पर हाथ फेरते हुए गुरुजी के पास चल दिए।
उधर गुरुजी सभी शिष्यों को आश्चर्य दिखाने के लिए शिवा का पीछा कर रहे थे। शिवा जब सिंहनी का दूध लेकर लौट रहे थे तो रास्ते में गुरुजी को शिष्यों के साथ देखकर शिवा ने पूछा– ‘गुरुजी, पेटदर्द कैसा है?’
गुरु समर्थ ने शिवा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा– ‘आखिर तुम सिंहनी का दूध ले आए। तुम्हारे जैसे शिष्य के होते गुरु की पीड़ा कैसे रह सकती है?’
भारतीय परम्परा में गुरुसेवा से ही भक्ति की सिद्धि हो जाती है। गुरु की सेवा तथा प्रणाम करने से देवताओं की कृपा भी मिलने लगती है।
‘गुरु को राखौ शीश पर सब विधि करै सहाय।’
कलिकाल में सद्गुरु न मिलने पर भगवान शिव ही सभी के गुरु हैं क्योंकि ‘गुरु’ शब्द से जगद्गुरु परमात्मा ईश्वर का ही बोध होता है; इसलिए कहा भी गया है :-

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूर मर्दनम्। देवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।।

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