साढ़ेसाती,Sadesati

शनि की साढ़ेसाती और साढ़ेसाती का प्रभाव :-

Dr.R.B.Dhawan (Astrological Consultant), top best astrologer in delhi

नीलाम्बरः शूलाधरः किरीटी गघ्रस्थित स्त्रासकरो धनुष्ठाम्।
चतुर्भुजः सूर्यसुतः प्रशान्तः सदाऽतु महां वरदोऽल्पगामी।।

शरीर पर नीले वस्त्राभूषण धारण करने वाले, सिर पर मुकुट को, हाथों में धनुष और शूल को धारण करने वाले, गीध पर विराजमान, प्राणियों को भय देने वाले, मंदगति से चलने वाले और चार भुजाओं से युक्त सूर्य के पुत्र शनिदेव हमारे प्रति शांत और शुभ वर देने वाले हों।

शनि ग्रह का परिचय-
भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया ने शनिदेव को जन्म दिया। शनिदेव का स्तवन काश्यपेयं महद्रद्युतिम कहकर किया जाता है। क्योंकि शनि को महर्षि कश्यप की वंश परम्पराओं में माना गया है। एक मत के अनुसार महर्षि कश्यप के अभिभावकत्व में संपन्न काश्यपेय यज्ञ का संबंध शनि की उत्पत्ति से है। भारतीय ज्योतिष के सात ग्रहों में शनिग्रह सबसे दूरस्थ है। यह सूर्य की एक परिक्रमा 29.5 वर्षों में पूरी करता है, तथा एक राशि में लगभग 2.5 वर्ष तक रहता है। शनि के दस चन्द्रमा हैं। शनि अस्त होने के 38 दिन बाद उदय होता है। तत्पश्चात 135 दिनों तक सामान्य गति से उसके बाद 105 दिनों तक वक्री गति से संचरणशील रहता है। वक्र गति से परिक्रमा करते हुए पश्चिम से अस्त होता है।

ज्योतिर्विदों एवं खगोलविदों ने शनि ग्रह को नीलनिलय का सुन्दरतम ग्रह स्वीकार किया है। विषय यहां साढ़ेसाती से सम्बध है, अतः शनि की साढ़ेसाती sadesati का मुख्यतः कारण उसके वलय हैं। शनिग्रह एक नीली गेंद की भांति प्रतीत होते हैं, ये तीन पीले वलयों के बीच स्थित हैं। यही वलय साढ़ेसाती का कारण है। क्योंकि शनिदेव जिस राशि पर भ्रमण करते हैं एक वलय उस राशि से आगे वाली राशि पर प्रभाव डालता है, तथा पीछे वाला वलय पीछे वाली राशि पर प्रभाव डालता है। मध्य राशि में शनिदेव स्वयं स्थित होते हैं। अतः गोचर में शनिदेव जिस राशि पर भ्रमण करते हैं, उसके आगे-पीछे की राशियों को प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए वर्तमान में शनि धनु राशि में स्थित हैं, अतः धनु राशि वाले जातकों के लिए तो शनि की साढ़ेसाती चल ही रही है। वृश्चिक राशि वालों के लिए उतरती साढ़ेसाती तथा मकर राशि वालों के लिए चढ़ती हुई साढ़ेसाती लगी हुई है। चूंकि शनि ग्रह एक राशि में 2.5 वर्ष रहते हैं, तथा उसके वलय आगे पीछे रहते हैं अतः गोचर कालीन शनि से एक राशि 2.5×3=7.5 वर्ष तक प्रभावित होती है, इसे ही शनि की साढ़ेसाती कहते हैं।

जब एक जातक के जन्मकालीन चन्द्रमा से शनि 12वें हो तब साढ़ेसाती का प्रारंभ होता है। जन्मकालीन चन्द्रमा पर शनि का गोचर योग कहलाता है, तथा अन्यकालीन चन्द्रमा से द्वितीयस्थ शनि पाद कहलाता है। जिन जातकों की जन्मपत्रिका नहीं है। उनको साढ़ेसाती के प्रभाव उनकी मानसिक स्थिति से अनुमान द्वारा जाना जा जाता है।

ज्योतिष तत्व प्रकाश के अनुसार-
द्वादशे जन्मगे राशौ द्वितीये च शनैश्चरः।
सार्धानि सप्तवर्षाणि तदा दुःखेर्युतो भवेत्।। रिष्फ रूप धनमेषु भास्करिः संस्थितो भवति यस्य जन्मजात्।
लोचनोदरपदेषु संस्थितिः कथ्यते रविजलोकजैर्जनं।। (ज्योतिष तत्व प्रकाश)

शनि जन्म राशि से द्वादश भाव (12), जन्म राशि (1), एवं जन्मराशि से द्वितीयस्थ (2) हो तो, शनि की साढ़ेसाती आरोपित होती है। शनि के आगे वाले वलय को नेत्रों की संज्ञा दी गई है, स्वयं शनि देव जिस राशि में रहते हैं, उसे उदर की संज्ञा दी गई है, तथा शनिदेव के पीछे वाले वलय को पाद (पावो) की संज्ञा दी गई है। अर्थात लगती हुई साढ़ेसाती sadesati को नेत्रों पर, बीच वाली (मध्य) साढ़ेसाती को भोग तथा उतरती हुई साढ़ेसाती को पाद काल कहा जाता है। शनि की साढ़ेसाती स्वयं में भीषण भय तथा सघन संत्रास उत्पन्न करने वाले शब्द हैं। साढ़ेसाती के विषय में अनेकानेक भ्रांतियाँ भी प्रचलित हैं। लौकिक कथाओं में साढ़ेसाती विनाशक काल प्रहार के रूप में प्रस्तुत होती है। शनि की विकरालता में साढ़ेसाती की क्रूरता संयुक्त होकर प्रकम्पन उत्पन्न कर देती है। परंतु प्रत्येक जातक के लिए शनि की साढ़ेसाती विकरालता या क्रूरता लिये नहीं आती, अतः शनि की साढ़ेसाती के प्रभावों को समझने के लिए शनिदेव की प्रकृति को समझना आवश्यक है।

शनि देव की प्रकृतिः-
शनि के पर्याय नाम- शनि, मन्द, छायायुक्त-पंगु, पंगुकाय, कोण, तरणि, तनय, घुमणिसुत, पातंगी, मृदु, नील, कपिलाक्ष, कृशांग, दीर्घ, छायातज, यम, अर्कपुत्र, सौरि, क्रोड, क्रूरलोचन, दुःख।

शनि का सामान्य/विशेष स्वरूपः-
मन्दोऽलसः कपलिदृक कृश दीर्घगात्रः।
स्थूलद्विजः परुष रोम कचोऽनिलात्मा।।

शनि प्रधान पुरुष आलसी, पिंगलवर्ण, दृष्टियुक्त, दुबला तथा लम्बी देहवाला, मोटे दांतों वाला होता है। इसके रोम और केश रूखे होते हैं। यह वात प्रकृति प्रधान होता है। सूर्यपुत्र शनि दुःखदायक काले वर्ण का होता है। स्नायुतंत्र, कूड़ा करकट फेंकने की जगह, फटे पुराने कपड़े, लोहा, कबाड़, शिशिर तथा नमकीन रूचि पर शनि का अधिकार है।

कान्नियरोमावयवः कृशात्मा दुर्वासिताङ्ग कफ मारू मात्मा।
पीनद्विजश्चारूपिशङ्ग दृष्टिः सौरिस्तमो बुद्धि रतोऽलसः स्यात।। (वेधनाथ)

शनि प्रधान व्यक्ति के केश और अव्यव कठिन (मोटे) होते हैं। इसका शरीर दुर्बल होता है। शरीर का रंग दूर्वा जैसा (श्याम) होता है। इसकी प्रकृति कफ-वात होती है। इसके मोटे दांत होते है। दृष्टि पिंगलवर्ण की, यह तामसी बुद्धि वाला तथा आलसी होता है। शनि का उदय पृष्ठ भाग से होता है। यह चैपाया है पर्वत वनों में घूमने वाला, सौ वर्ष की आयु का मूल प्रधान होता है। इसके देवता ब्रह्मा है, इसका रत्न नीलम है। इसका प्रदेश गंगा से हिमालय तक है। यह वायु तत्व प्रधान कसैली रूचिवाला, निम्न दृष्टि वाला और तीक्ष्ण स्वभाव वाला होता है, तुला, मकर, कुम्भ राशि में, जाया स्थान (स्त्री स्थान) में, विषुव के दक्षिणायान में स्वग्रह (मकर कुम्भ) में, शनिवार में, अपनी दशा में, राशि के अन्त भाग में, युद्ध के समय में, कृष्ण पक्ष, वक्री होने पर किसी भी स्थान में शनि बलवान होता है।

श्यामलोऽति मालिनश्च शिरालः सालसश्च जटिलः कृश दीर्घ।
स्थूल नख पिगंल नेत्रोयुक् शनिश्च खलता निलकोपः। (टुण्डीराज)

शनि श्याम वर्ण, हृदय से अर्थात् अन्तरात्मा से मलिन, नसों से व्याप्त देह वाला, स्वभाव से आलसी, जटायुक्त, दुर्बल तथा लम्बा शरीर दांत और नाखून मोटे, पीतवर्ण की आंखों वाला, दुष्ट स्वभाव, क्रोधी तथा वायु प्रधान प्रकृति का होता है।
विद्वानों का मत है कि दशम तथा एकादश राशियों पर शनि का अधिकार है, अर्थात् मकर और कुम्भ राशियों का स्वामी शनि है। इसका उच्च स्थान सप्तम राशि तुला है। नीच राशि मेष है। यह सीमांतक ग्रह कहलाता है, क्योंकि यहां पर सूर्य का प्रभाव समाप्त हो जाता है, वहां पर शनि के प्रभाव का प्रारंभ होता है। शनि सूर्य से पराजित होता है, और मंगल को परास्त कर देता है। पाश्चात्य ज्योतिर्विद विलियम लिलि के अनुसार, शनि प्रधान व्यक्ति का शरीर साधारणतः शीतल और रूक्ष होता है, मझंला कद, फीका काला रंग, आंखें बारीक और काली, दृष्टि नीचे की ओर, भाल भव्य, केश काले और लहरीले तथा रूक्ष, कान बड़े लटकते जैसे, भौंहे झुकी हुई, होंठ और नाक मोटा, दाढ़ी पतली, इस प्रकार का स्वरूप बतलाया जा सकता है। इसका चेहरा देखने से प्रसन्नता नहीं होती। सिर झुका हुआ और चेहरा अटपटा सा लगता है। कंधे चौड़े, फैले, टेढ़े होते हैं। पेट पतला, जघाएं पतली तथा घुटने और पैर टेढे-मेढ़े होते हैं। चाल शराबी जैसी लड़खड़ाती प्रतीत होती है। घुटने एक-दूसरे से सटे रखकर चलते हैं। शनि पूर्व की ओर हो तो प्रमाण बद्धता और मृदुता कुछ हद तक होती है। कद मोटा होता है। पश्चिम की ओर हो तो कृश और अधिक काले रंग का होता है। शरीर पर केश बहुत कम होते हैं। शनि के शर कम हों तो कृशता ज्यादा होती है। शर अधिक हों तो मांसल शरीर होता है।

शनि का कारकत्वः-
प्रत्येक ग्रह किन-किन का कारक होता है। इसके संबंध में उतर कालामृत ज्योतिष ग्रंथ के रचयिता कालिदास ने सभी प्राचीन ग्रंथों से अधिक ग्रहों के कारकत्व का वर्णन किया है। अतः सर्वप्रथम शनि का कारकत्व उत्तर कालामृत से उद्धृत किया जा रहा है-

शनि से इन विषयों का विचार करना चाहिए-
जड़ता अथवा आलस्य, रूकावट, घोड़ा, हाथी, चमड़ा, आय, बहुत कष्ट, रोग, विरोध, दुःख, मरण, स्त्री से सुख, दासी, गधा अथवा खच्चर, चाण्डाल, विकृत अंगों वाले, वनों में भ्रमण करने वाले डरावनी सूरत, दान, स्वामी, आयु, नपुंसक, अन्त्यज, खग, तीन अग्नियां, दासता का कर्म करने वाले, अधार्मिक कृत्य, पौरुषहीन, मिथ्या भाषण, चिरस्थायी, वायु, वृद्धावस्था, नसें, दिन के अंतिम भाग में बलवान, शिशिर ऋतु, क्रोध, परिश्रम, नीच जन्मा, हरामी, गौलिक, गन्दा कपड़ा, घर, बुरे विचार, दुष्ट से मित्रता, काला, पाप कर्म, क्रूर कर्म, राख, काले धान्य, मणि, लोहा, उदारता, वर्ष, शूद्र, वैश्य, पिता का प्रतिनिधि, दूसरे के कुल की विद्या सीखने वाला, लंगड़ापन, उग्रता, कम्बल, पश्चिमाभिमुख, जिलाने के उपाय, नीचे देखना, कृषि द्वारा जीवन निर्वाह, शस्त्रागार, जाति से बाहर वाले स्थान, ईशान दिशा का प्रिय, नागलोक, पतन, युद्ध, भ्रमण, शल्यविद्या, सीसा धातु, शक्ति का दुरूपयोग, शुष्क, पुराना तेल, लकड़ी, ब्राह्मण, तामस गुण, विष, भूमि पर भ्रमण, कठोरता, इच्छुक, वस्त्रों से सजाना, यमराज का पुजारी, कुत्ता, चित्त, की कठोरता आदि शनि के कारकत्व है।

जैसे सौर मण्डल में शनि का स्थान सबसे अंत में है ऐसे ही गुणों आदि में भी शनि का स्थान अंत में अर्थात घटिया, निकृष्ट अधम है। यही कारण है कि शनि निम्न वर्ग का (मजदूरों का, सफाई कर्मचारियों का ग्रह) माना गया है। वर्णों में इसीलिए शूद्र की पदवी प्राप्त है। घर में नौकर, भ्रत्य की सी निम्न स्थिति है, सूर्य से दूर रहने के कारण इसमें प्रकाश कम है। यही कारण है कि शनि को विद्याहीन, प्रकाशहीन, काला, विद्याहीन माना गया है। प्रकाश की रश्मियों से जो पदार्थ वंचित हैं उनकी पूरी उन्नति नहीं हो पाती। अतः शनि अपूर्णता, हीनता, अभाव आदि का द्योतक है। इसी प्रकाश आदि के अभाव से कई रोगों की उत्पत्ति होती है। इसीलिए शनि को रोग का कारण माना गया है। नवग्रह परिवार में मंद गति से भ्रमण करने (शनैः शनैःश्चर) धीरे-धीरे चलाने वाला शनैश्चर कहा गया है। मन्द गति होने के कारण शनि को लंगड़े की उपाधि भी दी गई है। शनि की कुण्डली में स्थिति मनुष्य की टांगों की स्थिति को बतला देती है। प्रकाशहीन वनस्पति तथा अन्य जीवन, मृत पदार्थों, जैसे चमड़ा और पत्थर इनसे भी शनि का घनिष्ठ संबंध है। मन्दगति होने के कारण कार्यों का विलम्ब से सम्पादन होना स्वाभाविक ही है। अतः विलम्ब से, बहुत काल से, आयु से, दीर्घ रोग से, दीर्घ आकार से शनि का संबंध है और इन वस्तुओं का शनि इसलिए कारक भी है।

साढ़ेसाती sadesati स्वयं में भयप्रद शब्द है किन्तु संपूर्ण साढ़ेसाती काल विध्वंसक या खराब नहीं होता, कारण कि सभी राशियों पर शनि की साढेसाती का प्रभाव समान नहीं होता, क्योंकि साढ़ेसाती का संबंध गोचर से है। अतः गोचर में शनि जन्मांग में अपनी स्थिति प्रत्येक राशि में उसके अधिपति के साथ अपने संबंध के अनुसार ही फल प्रदान करेगा। जैसा कि विदित है, शनि मकर एवं कुम्भ राशि का स्वामी, कुम्भ राशि में मूल त्रिकोण, तुला राशि में उच्च के तथा मेष राशि में नीच के होते हैं। बुध एवं शुक्र, राहु ग्रह मित्र हैं। सूर्य चन्द्र मंगल शत्रु हैं, गुरु केतु सम है। अतः शनि जन्मागीय स्थिति के अनुसार फल प्रदान करता है। कुछ ज्योतिषाचार्यों के अनुसार शनि जन्म राशि के अनुसार निम्नानुसार फल प्रदान करता हैं :-

1. मेष राशि- मध्य भाग घातक।
2. वृष राशि- प्रारंभ घातक।
3. मिथुन राशि- अंत भाग घातक।
4. कर्क राशि- मध्य व अंत घातक।
5. सिंह राशि- प्रारंभ व मध्य घातक।
6. कन्या राशि- प्रारंभ घातक।
7. तुला राशि- अंत घातक।
8. वृश्चिक राशि- मध्य व अंत घातक।
9. धनु राशि- प्रारंभ व मध्य घातक।
10. मकर राशि- समस्त समय सम।
11. कुम्भ राशि- समस्त समय शुभ।
12. मीन राशि- अंत घातक।

इसके अतिरिक्त तीनों चरणों का समग्र परिणाम निम्नानुसार रहता है, व्यवहार में ऐसा पाया जाता है।

1. प्रथम चरण- जन्म राशि से 12वें भाव में आते ही शनि साढ़ेसाती का प्रथम चरण प्रारंभ हो जाता है। साढ़ेसाती के प्रथम चरण अर्थात् साढ़ेसाती sadesati के प्रथम ढ़ाई वर्ष में व्यक्ति आर्थिक रूप से अत्यंत पीड़ित होता है। आय की अपेक्षा व्यय की अधिकता होने से पूर्व नियोजित योजनाएं विघटित होती हैं। अप्रत्याशित आर्थिक हानि चकित करती है। शैय्या सुख में कमी आती है। जातक का स्वयं स्वास्थ्य बाधित रहता है। फलस्वरूप शारीरिक सुखों में कमी आती है। व्यक्ति निरूद्देश भटकता रहता है। यात्रा का सुफल प्राप्त नहीं होता। नेत्र व्याधि संभव है। चश्में का प्रयोग जातक के लिए अपेक्षित हो सकता है। जातक के पिता की माता अर्थात दादी को मारक कष्ट होता है। व्यक्ति का स्नायुतंत्र व्याधिग्रस्त रहता है। अभिभावक एवं आत्मीय जन कष्ट का अनुभव करते हैं। कुटुम्ब से वियोग या अलगाव (बंटवारा) होता है। पिता को कष्ट होता है। लाभ एवं आय नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है।

2. द्वितीय चरण- साढे़साती का द्वितीय चरण तब प्रारंभ होता है जब शनि जन्मकालीन चन्द्रमा पर गोचर करता है। इसे उदर या पेट की या द्वितीय चरण साढे़साती sadesati कहते हैं। द्वितीय चरण का प्रभाव जातक को आर्थिक, शारीरिक एवं मानसिक रूप से प्रभावित करता है। आर्थिक चिन्ताएं निरन्तर रहती हैं। शारीरिक सार्मथ्य, प्रभाव व गति आक्रान्त होती है। मानसिक स्तर पर प्रबल उद्वेलन रहता है। व्यर्थ का व्यय व्यथित करता है। कोई कार्य मनोनुकूल नहीं होता। अपूर्ण कार्य दु:खी करते हैं, व्यवधान एवं बाधाएं प्रबल रहती हैं। व्यक्तित्व मन्द होता है। गृहस्थ का पारिवारिक तथा व्यवसायिक जीवन अस्तव्यस्त रहता है। किसी सगे-संबंधी को मारक कष्ट होता है। दीर्घयात्राएं, शरीर से कष्ट, आत्मीयों से पृथक्य द्वारा कष्ट, संपत्ति की हानि, सामाजिक प्रतिष्ठा पर आंच, मित्रों का अभाव एवं कार्य में अवरोध द्वितीय चरण के फल हैं। प्रयास निष्फल होते हैं, अर्थात प्रत्यय फलीभूत नहीं होते।

3. तृतीय चरण- साढ़ेसाती का तृतीय चरण तब प्रारंभ होता है जब शनिदेव जन्मकालीन चन्द्रमा से द्वितीयस्थ होते हैं। यह उतरती साढ़ेसाती या पाद (पावों) पर साढ़ेसाती कही जाती है। इसका फल यह होता है कि आत्मीय जनों से निष्प्रयोजन संघर्ष होता है। इन्हें गंभीर व्याधि अथवा किसी को मारक होता है। व्यक्ति का स्वास्थ्य, सन्तति सुख एवं आयुबल प्रभावित होता है। सुखों का नाश होता है। पदाधिकार विलुप्त होता है, किन्तु धनागम होता रहता है। शारीरिक रूप से जड़ता अथवा निर्बलता का अनुभव होता है। आनन्द बाधित होता है। निम्न व्यक्ति से प्रवचना होती है। धन का व्यय एवं अपव्यय होता है।

साढ़ेसाती की आवृत्तियांः-
सामान्यता एक जातक को अपने जीवन काल में तीन बार शनि की साढ़ेसाती झेलनी होती है। चतुर्थ कोई बिरला जातक ही प्राप्त करता है। क्योंकि शनि एक चक्र लगभग 30 वर्ष में पूरा करता है। 30×3=90 वर्ष की आयु तक तीसरी आवृत्ति संभावित होती है। चतुर्थ आवृति दु:साध्य एवं अपवाद स्वरूप ही प्राप्त होती है। प्रत्येक आवृत्ति में शनि की साढ़ेसाती की सार्मथ्य अलग-अलग होती है। जीवन में साढ़ेसाती की प्रथम आवृत्ति अत्यंत प्रबल होती है। प्रभावित व्यक्ति कष्टों अवरोधों क्षतियों से आक्रांत होता है। जातक के जीवन में प्राप्त द्वितीय साढ़ेसाती का प्रभाव मारक न्यूनतम होता है। व्यक्ति थोडी सुविधा का अनुभव करता है। तृतीय आवृत्ति भीषण परिणामों से परिपूर्ण होती है। व्यक्ति अनेक अनापत्तियों से आक्रांत रहता है। शनि अपने क्रूर प्रभाव से जीवन का सर्वनाश करने पर आमादा होता है। आयुबल निर्बल हो तो जातक को जीवन हानि होती है। इस आक्रमण से कोई सौभाग्यशाली जातक ही अपने को सुरक्षित रख पाते हैं।

शनि की साढेसाती एक विश्लेषणः-
परम्परागत रूप से यह माना जाता है कि जन्मकालीन चन्द्रमा से द्वादश भाव में आते ही (शनि के) साढे़साती प्रारंभ हो जाती है। यह स्थूलरूप से सही हो सकती है किन्तु सूक्ष्म रूप से सही नहीं हो सकती। गोचर का शनि जब जन्मकालीन चन्द्रमा के आस-पास रहता है। तब साढ़ेसाती का प्रभाव जातक को प्रभावित करता है। गणितीय दृष्टि से जन्मकालीन चन्द्रमा के राशि अंश कला विकला से 45 अंश पहले तथा 45 अंश बाद तक गोचर के शनि का भ्रमण साढ़ेसाती sadesati कहलायेगी। इसे एक उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है।

उदाहरण के लिए किसी जातक का चन्द्र स्पष्ट 4/10/18 है तो इस जातक के साढ़ेसाती कब प्रारंभ होगी।

राशि अंश कला
04 10 18’
01 15 00 (- 45 अंश = 1 राशि 15 अंश)

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02 25 18’

अर्थात मिथुन राशि में शनि के 25 अंश 18’ पर आते ही शनि की साढ़ेसाती प्रारंभ होगी। यह शनि की सा़ढ़ेसाती का प्रारंभ होगा। शनि की साढ़ेसाती कब तक रहेगी ? पुनः जन्मकालीन चन्द्रमा में 45 अंश जोड़कर गणना करेंगे :-

राशि अंश कला
04 10 18’
01 15 00 (+ 1 राशि 15 अंश)

————————
05 25 18’

अर्थात शनि जब तक कन्या राशि के 25 अंश 18’ तक गोचर करेंगे, तब तक शनि की साढ़ेसाती रहेगी।

किसी भी कुंडली के लिये शनि की साढे़साती sadesati का फलादेश बहुत कुछ जातक की कुंडली में शनि की स्थिति पर निर्भर करता है। कुंडली में शनि की स्थिति कैसी है, शनि उच्च है, नीच राशि में है, या मित्र, शत्रु, सम स्थिति का प्रभाव गोचर नियमों को प्रभावित करता है, अतः साढ़ेसाती फल कथन के समय अग्रलिखित नियमों को ध्यान में रखते हुए भविष्यवाणी की जाये तो फल कथन में उत्कृष्टता रहती है :-

✓ शनि जन्मांग में उच्चस्थ हो, स्वराशिस्थ हो, मित्र राशिस्थ हो या मूल त्रिकोणस्थ हो तो परिणामों में अपेक्षतया शुभता अधिक रहती है।

✓ जन्मांगीय शनि सबल और गोचरीय शनि दुर्बल हो तो परिणाम मध्यम रहता है।

✓ जन्मांगीय शनि निर्बल (नीचस्थ, शत्रुग्रही) हो और गोचरीय शनि भी दुर्बल हो तो अत्यधिक अप्रिय फल प्राप्त होते हैं।

✓ यदि गोचरीय शनि अवांछित अमंगल परिणाम प्रदान कर रहा हो तो अन्य ग्रहों से प्राप्त होने वाले शुभ फलों में भी न्यूनता होती है।

✓ यदि गोचरीय शनि अप्रिय फलदाता हो, और बृहस्पति सर्वदा शुभ फल प्रदाता हो तो अप्रिय फलों में कमी होती है।

✓ जिस समय गोचरीय शनि शुभ फल प्रदाता हो, और बृहस्पति अप्रिय फल प्रदाता हो तो-उसमें प्रायः अनुकूल परिणाम ही प्राप्त होते हैं।

✓ बृहस्पति एवं राहु के अप्रिय फल सूचित हों, और शनि अनुकूल परिणाम प्रदाता हो तो प्रिय फलों की मात्रा अधिक रहती है।

✓शनि की भीषणता जातकों को स्मरण मात्र से प्रकम्पित कर देती है। महाराजा दशरथ ने शनि की संहारक क्षमता का वर्णन इन शब्दों में किया है-

ब्रह्मा शक्रा हरिश्चैव ऋषयः सप्ततारकाः।
राज्यभ्रष्ट्राः पतन्त्येतो त्वया दृष्टयाऽवलोकिताः।।
देशाश्च नगर ग्राम द्वीपाश्चैव तथा दु्रमाः।
तव्या विलोकिताः सर्वे विनश्यन्ति समूलतः।।
प्रसादं कुरू हे सौरे! वरदो भव भास्करे।।

अर्थात :- ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु और सप्त ऋषि भी तुम्हारे दृष्टि निक्षेप से पदच्यूत हो जाते हैं। देश, नगर, गांव, द्वीप वृक्ष तुम्हारी दृष्टि से समूल विनष्ट हो जाते हैं। अतः हे सूर्यदेव के पुत्र शनिदेव! प्रसन्न होकर हमें मंगलमय वर प्रदान करो।

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गुरू की महिमा

जब महादेवजी ने बताई पार्वतीजी को गुरु की महिमा :-

(गुरू पूर्णिमा 27/07/2018 पर विशेष) :-

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गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वर:।

गुरु: साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नम:।।

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।

तत्पदं दर्शितं येनं तस्मै श्रीगुरवे नम:।।

एक बार पार्वतीजी ने महादेवजी से गुरु की महिमा बताने के लिए कहा। तब महादेवजी ने कहा :-

गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु, गुरु ही शिव और गुरु ही परमब्रह्म है; ऐसे गुरुदेव को नमस्कार है। अखण्ड मण्डलरूप इस चराचर जगत में व्याप्त परमात्मा के चरणकमलों का दर्शन जो कराते हैं; ऐसे गुरुदेव को नमस्कार है।

ध्यानमूलं गुरोर्मूर्ति: पूजामूलं गुरो: पदम्। मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरो: कृपा।।

अर्थात्– गुरुमूर्ति का ध्यान ही सब ध्यानों का मूल है, गुरु के चरणकमल की पूजा ही सब पूजाओं का मूल है, गुरुवाक्य ही सब मन्त्रों का मूल है, और गुरु की कृपा ही मुक्ति प्राप्त करने का प्रधान साधन है। गुरु शब्द का अभिप्राय जो अज्ञान के अंधकार से बंद मनुष्य के नेत्रों को ज्ञानरूपी सलाई से खोल देता है, वह गुरु है। जो शिष्य के कानों में ज्ञानरूपी अमृत का सिंचन करता है, वह गुरु है। जो शिष्य को धर्म, नीति आदि का ज्ञान कराए, वह गुरु है। जो शिष्य को वेद आदि शास्त्रों के रहस्य को समझाए, वह गुरु है।

गुरुपूजा का अर्थ :-
गुरुपूजा का अर्थ किसी व्यक्ति का पूजन या आदर नहीं है वरन् उस गुरु की देह में स्थित ज्ञान का आदर है, ब्रह्मज्ञान का पूजन है।

गुरुपूर्णिमा मनाने का कारण :-
वैसे तो गुरू सदा पूजनीय हैं, परंतु आषाढ़ पूर्णिमा के दिन सभी अपने-अपने गुरु की पूजा विशेष रूप से करते हैं। यह सद्गुरु के पूजन का पर्व है, इसलिए इसे गुरुपूर्णिमा कहते हैं। जिन ऋषियों-गुरुओं ने इस संसार को इतना ज्ञान दिया, उनके प्रति कृतज्ञता दिखाने का, ऋषिऋण चुकाने का और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का पर्व है गुरुपूर्णिमा। यह श्रद्धा और समर्पण का पर्व है। गुरुपूर्णिमा का पर्व पूरे वर्षभर की पूर्णिमा मनाने के पुण्य का फल तो देता ही है, साथ ही मनुष्य में कृतज्ञता का सद्गुण भी भरता है। गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय।।
माता-पिता जन्म देने के कारण पूजनीय हैं, किन्तु गुरु धर्म और अधर्म का ज्ञान कराने से अधिक पूजनीय हैं। इष्टदेव के रुष्ट हो जाने पर तो गुरु बचाने वाले हैं,‌ परन्तु गुरु के अप्रसन्न होने पर कोई भी बचाने वाला नहीं हैं। गुरुदेव की सेवा-पूजा से जीवन जीने की कला के साथ परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग भी दिखाई पड़ जाता है। कवच अभेद विप्र गुरु पूजा। एहि सम विजय उपाय न दूजा।।

अर्थात् :- वेदज्ञ ब्राह्मण ही गुरु है, उन गुरुदेव की सेवा करके, उनके आशीर्वाद के अभेद्य कवच से सुरक्षित हुए बिना संसार रूपी युद्ध में विजय प्राप्त करना मुश्किल है।

गुरुपूर्णिमा को व्यासपूजा क्यों कहते हैं? :-
आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को भगवान वेदव्यास का अवतरण पृथ्वी पर हुआ था इसलिए यह व्यासपूजा या व्यासपूर्णिमा कहलाती है। व्यासजी ऋषि वशिष्ठ के पौत्र व पराशर ऋषि के पुत्र हैं। व्यासदेवजी गुरुओं के भी गुरु माने जाते हैं। वेदव्यासजी ज्ञान, भक्ति, विद्वत्ता और अथाह कवित्व शक्ति से सम्पन्न थे। इनसे बड़ा कवि मिलना मुश्किल है। उन्होंने ब्रह्मसूत्र बनाया, संसार में वेदों का विस्तार करके ज्ञान, उपासना और कर्म की त्रिवेणी बहा दी, इसलिए उनका नाम ‘वेदव्यास’ पड़ा। पांचवा वेद ‘महाभारत’ और श्रीमद्भागवतपुराण की रचना व्यासजी ने की। अठारह पुराणों की रचना करके छोटी-छोटी कहानियों द्वारा वेदों को समझाने की चेष्टा की। संसार में जितने भी धर्मग्रन्थ हैं, चाहे वे किसी भी धर्म या पन्थ के हों, उनमें अगर कोई कल्याणकारी बात लिखी है तो वह भगवान वेदव्यास के शास्त्रों से ली गयी है। इसलिए कहा जाता है–‘व्यासोच्छिष्टं जगत्सर्वम्’ अर्थात् जगत में सब कुछ व्यासजी का ही उच्छिष्ट है।
विलक्षण गुरु समर्थ रामदास के अदम्य साहसी शिष्य छत्रपति शिवाजी छत्रपति शिवाजी महाराज समर्थ गुरु रामदास स्वामी के शिष्य थे। एक बार सभी शिष्यों के मन में यह बात आयी कि शिवाजी के राजा होने से समर्थ गुरु उन्हें ज्यादा प्यार करते हैं। स्वामी रामदास शिष्यों का भ्रम दूर करने के लिए सबको लेकर जंगल में गए और एक गुफा में जाकर पेटदर्द का बहाना बनाकर लेट गए। शिवाजी ने जब पीड़ा से विकल गुरुदेव को देखा तो पूछा– ‘महाराज! इसकी क्या दवा है?’
गुरु समर्थ ने कहा – शिवा! रोग असाध्य है। परन्तु एक दवा काम कर सकती है, पर जाने दो।
शिवा ने कहा ‘गुरुदेव दवा बताएं, मैं आपको स्वस्थ किए बिना चैन से नहीं रह सकता।’
गुरुदेव ने कहा इसकी दवा है– सिंहनी का दूध और वह भी ताजा निकला हुआ; परन्तु यह मिलना असंभव सा है।
शिवा ने पास में पड़ा गुरुजी का तुंबा उठाया और गुरुदेव को प्रणाम कर सिंहनी की खोज में चल दिए। कुछ दूर जाने पर उन्हें एक सिंहनी अपने दो शावकों (बच्चों) के साथ दिखायी पड़ी। अपने बच्चों के पास अनजान मनुष्य को देखकर वह शिवा पर टूट पड़ी और उनका गला पकड़ लिया। शूरवीर शिवा ने हाथ जोड़कर सिंहनी से विनती की– ‘गुरुदेव की दवा के लिए तुम्हारा दूध चाहिए’ उसे निकाल लेने दो। गुरुदेव को दूध दे आऊँ, फिर तुम मुझे खा लेना।’ ऐसा कहकर उन्होंने ममता भरे हाथों से सिंहनी की पीठ सहलाई। मूक प्राणी भी ममता की भाषा समझते हैं। सिंहनी ने शिवा का गला छोड़ा और बिल्ली की तरह शिवा को चाटने लगी। मौका देखकर शिवा ने उसका दूध निचोड़कर तुंबा में भर लिया और सिंहनी पर हाथ फेरते हुए गुरुजी के पास चल दिए।
उधर गुरुजी सभी शिष्यों को आश्चर्य दिखाने के लिए शिवा का पीछा कर रहे थे। शिवा जब सिंहनी का दूध लेकर लौट रहे थे तो रास्ते में गुरुजी को शिष्यों के साथ देखकर शिवा ने पूछा– ‘गुरुजी, पेटदर्द कैसा है?’
गुरु समर्थ ने शिवा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा– ‘आखिर तुम सिंहनी का दूध ले आए। तुम्हारे जैसे शिष्य के होते गुरु की पीड़ा कैसे रह सकती है?’
भारतीय परम्परा में गुरुसेवा से ही भक्ति की सिद्धि हो जाती है। गुरु की सेवा तथा प्रणाम करने से देवताओं की कृपा भी मिलने लगती है।
‘गुरु को राखौ शीश पर सब विधि करै सहाय।’
कलिकाल में सद्गुरु न मिलने पर भगवान शिव ही सभी के गुरु हैं क्योंकि ‘गुरु’ शब्द से जगद्गुरु परमात्मा ईश्वर का ही बोध होता है; इसलिए कहा भी गया है :-

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूर मर्दनम्। देवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।।

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दो मुखी रुद्राक्ष, 2 Mukhi Rudraksh

दो मुखी रूद्राक्ष, 2 Mukhi Rudraksh Nepal, 2 Mukhi Rudraksh Original Nepal,

Dr.R.B.Dhawan,Astrological Consultant, specialist: marriage problems, top best astrologer in delhi

असुराचार्य shukracharya का कथन है कि- दो मुखी रूद्राक्ष अर्धनारिश्वर स्वरूप है, यह शिव तथा शक्ति दोनो का संयुक्त रूप है। इसे धारण करने से भगवान शिव तथा पार्वती दोनों ही प्रसन्न होते हैं। दो मुखी रूद्राक्ष गोहत्या के पाप से मुक्ति दिलाता है, तथा यह मन और मस्तिष्क को सन्तुलित रखता है, Dr.R.B.Dhawan अपने अनुभवों के आधार पर कहते हैं- इसको धारण करने से मनुष्य की बुद्धि सक्रिय होती है, तथा घर में हर प्रकार की सुख-सुविधा उपलब्ध होती है। इसको धारण करने से पति-पत्नी में एकात्मय भाव उत्पन्न होता है, यह रूद्राक्ष श्रद्धा एवं विश्वास का स्वरूप है। यह व्यापार में सफलता दिलाता है। आचार्य shukracharya लिखते हैं- दो मुखी रूद्राक्ष सांसारिक ऐश्वर्य व उपलब्धियां कराता है, तथा घर से क्लेश की जड़ को दूर करता है। दो मुखी रूद्राक्ष शिव और पार्वती का सम्मिलित स्वरूप है। इस रूद्राक्ष को धारण करने वाले व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहते हैं। इस रूद्राक्ष की अद्भुत शक्ति से धारक का मन मस्तिष्क संतुलित रहता है। Dr.R.B.Dhawan के अनुसार शिवपुराण में दो मुखी रूद्राक्ष के लिए कहा गया है कि यह बेहद दुर्लभ और कल्याणकारी रूद्राक्ष है। नेपाल के द्विमुखी रूद्राक्ष चपटे, आँख की आकृति के होते हैं। दो मुखी रूद्राक्ष नेपाल में काफी कम होता है, तथा बहुत मँहगा भी होता है, इसलिये दो मुखी रूद्राक्ष रामेश्वरम का ही अधिक देखने को मिलता है। दो मुखी रूद्राक्ष को धारण करने से भगवान् शिव तथा माता पार्वती दोनों ही प्रसन्न होते हैं। दो मुखी रूद्राक्ष गोहत्या के पाप से मुक्ति दिलाता है, तथा यह मन मस्तिष्क दोनों को सन्तुलित रखता है। दो मुखी रूद्राक्ष अर्ध-नारीश्वर स्वरूप है, इसे शिव-शिवा रूप भी कह सकते हैं, दोमुखी रूद्राक्ष साक्षात् अग्नि स्वरूप हैं, जिसके शरीर पर ये प्रतिष्ठित करके धारण किया होता है, आचार्य shukracharya का मानना है कि उसके जन्म जन्मांतर के पाप उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे अग्नि ईंधन को जला डालती है।

इस रूद्राक्ष के धारण करने से कुंडली में चन्द्रमा से उत्पन्न सभी दोषों का निवारण हो जाता है। ज्योतिषीय दृष्टि से चन्द्रमा हृदय, फेफडा, मन, वामनेत्र, गुर्दा, भोजन नली इत्यादि का कारक है। चन्द्रमा की प्रतिकूल स्थिति तथा दुष्प्रभाव के कारण हृदय तथा फेफड़ों के रोग हो सकते हैं। बांयी आँख की खराबी, खून की कमी, जल सम्बन्धी रोग, गुर्दा कष्ट, मासिक धर्म के रोग, स्मृति-भ्रंश इत्यादि रोग भी हो सकते हैं। इसके दुष्प्रभाव से दरिद्रता तथा मन मस्तिष्क विकार भी होते हैं। गुणों के हिसाब से यह मोती से कई गुना अधिक प्रभावी है। दो मुखी रुद्राक्ष धारण करने वाले धारक के परिजन परस्पर आदर व श्रद्धा की सतत् वृद्धि अनुभव करते हैं। द्विमुखी रूद्राक्ष शिक्षक व छात्र के बीच, पिता व पुत्र के बीच, पति व पत्नी के बीच या मित्रों में मतभेद मिटाता है, और एकात्मता उत्पन्न करता है। धारक शांतिमय पारिवारिक जीवन जीने के लिये सक्षम बन जाता है। इस रूद्राक्ष में अंर्तगर्भित ऐसी विद्युत तरंगें होती हैं कि जिन के प्रभाव से यह रूद्राक्ष सभी शारीरिक व्याधियों से रक्षा करता है, गुरू जी (Dr.R.B.Dhawan) अपने अनुभव लिखते हुए आगे कहते हैं- इस रूद्राक्ष को धारण करने से इनकम/सेल्स टैक्स अधिकारी व्यापारी को व सरकारी नौकरी वालों को उनके अधिकारी बेकार परेशान नहीं करते इस लिये इन्हें यह रूद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिये। यह शरीर की गर्मी को निकालता है, इससे रक्तचाप नियंत्रण में रहता है। मन मस्तिष्क की बीमारी भी सही हो जाती हैं। दो मुखी रूद्राक्ष को देवेश्वर भी कहा जाता है। दो मुखी रूद्राक्ष दांपत्य जीवन सुखमय बनाने के लिये अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है। शिव और शक्ति की उपासना करने वाले को यह रूद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिये। इस रूद्राक्ष के स्वामी ग्रह चंद्रदेव हैं।

दो मुखी रूद्राक्ष धारण मंत्र- ॐ नमः ॐ शिव शक्तिभ्यां नमः।
चैतन्य करने का मंत्र- ॐ क्षी हृो क्षौं वो ॐ।।
उपयोग- आदर्श पारिवारिक जीवन, शांतिपूर्ण व स्थाई संबधों के लिये।

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पंद्रह मुखी रूद्राक्ष, 15 Mukhi Rudraksh

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Dr.R.B.Dhawan (गुरूजी) astrologer, Astrological Consultant, specialist : marriage problems, top best astrologer in delhi

रक्ष जाति के आचार्य shukracharya का वचन है कि- पंद्रहमुखी रूद्राक्ष अत्यन्त दुर्लभ रूद्राक्षों की श्रेणी में आता है। यह रूद्राक्ष परम प्रभावशाली तथा अल्प कालावधि में ही शिवजी को प्रसन्न करने वाला रूद्राक्ष है, यह रूद्राक्ष साक्षात् देवमणि है। गुरू जी (Dr.R.B.Dhawan) और पुराणों के अनुसार पंद्रह विद्या, का साक्षात रूप है। इसमें महादेव की विशेष शक्ति निहित होती है, इसलिये नवग्रहों से उत्पन्न दोष इसे धारण करने मात्र से शांत होते हैं। यह रूद्राक्ष कठिन से कठिन परिस्थितियों में धारण करने वाले का मार्गदर्शन करता है। जो व्यक्ति इस रूद्राक्ष को कंठ के मध्य में धारण करते हैं, वह सर्वत्र पूजित होते हैं, और अंत समय वे स्वर्ग को प्राप्त होते हैं। चमड़ी के जटिल से जटिल रोगों को दूर करने की इसमें शक्ति है। धारक को आत्मरक्षा करने में समर्थ बनाता है। यह रूद्राक्ष धारक को हानि, दुर्घटना, जटिल रोग, आर्थिक चिन्ता से मुक्त रखकर धारक को सुरक्षा-समृद्धि देता है। वैसे तो यह रूद्राक्ष सभी जटिल रोगों को दूर करने वाला माना गया है, फिर भी Dr.R.B.Dhawan के अनुभव अनुसार इस रूद्राक्ष में पौरुष रोग को दूर करने की महान शक्ति है। इसी लिए दुर्बल पुरुष के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है, और इसीलिये इस की मांग अधिक होने से यह अधिक मूल्यावान भी होता है। वैसे भी यह रूद्राक्ष बहुत ही कम मात्रा में उत्पन्न होता है, और इसकी मांग इसकी उपलब्धता से कहीं अधिक है। पंद्रहमुखी रूद्राक्ष स्वास्थ्य लाभ, रोगमुक्ति और शारीरिक तथा मानसिक-व्यापारिक उन्नति में सहायक होता है। धारण करने पर आध्यात्मिक तथा भौतिक सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। इस रूद्राक्ष को धारण करने से शत्रुओं का नाश होता है, इस लिए यह रूद्राक्ष त्रिकाल सुखदायक है, यह समस्त रोगों का हरण करने वाला, सदैव आरोग्य प्रदान करने वाला है। इसके धारण करने से कुल की मर्यादा और कुल वृद्धि अवश्य होती है। इससे बल और उत्साह का वर्धन होता है, और निर्भयता प्राप्त होती है, तथा संकट काल में सरंक्षण भी प्राप्त होता है। पंद्रहमुखी रूद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति सदा सही निर्णय लेता है, और संकटों, कुपरिस्थितियों एवं चिंताओं से छुटकारा पाता है, धारणकर्ता में विशेष ओजस गुणों का विकास होने लगते हैं। यह शास्त्रोक्त सत्य है कि जिसने पंद्रहमुखी रूद्राक्ष धारण कर लिया, उसेे उत्तम संतान की प्राप्ति होती है, और गृहस्थ जीवन भी अच्छा होता है। गर्भपात रूक जाता है, व गुणवान संतान उत्पन्न होती है।

पंद्रहमुखी रूद्राक्ष धारण का मंत्र है- ॐ पशुपतय नम:’ मंत्र का 108 बार जाप करते हुए धारण करें।
लाभ- अलौकिक मार्गदर्शन, जटिल और पौरुष रोगों की शांति।

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चौदह मुखी रूद्राक्ष, 14 Mukhi Rudraksh

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असुराचार्य shukracharya के अनुसार- चौदह मुखी रूद्राक्ष अत्यन्त दुर्लभ रूद्राक्षों की श्रेणी में आता है। परम प्रभावशाली तथा अल्प समय में ही शिवजी को प्रसन्न करने वाला यह चौदह मुखी रूद्राक्ष साक्षात् देवमणि है। Dr.R.B.Dhawana जी का कथन है कि- पुराणों में वर्णित है कि यह रूद्राक्ष चौदह विद्या, 14 लोक, 14 मनु का साक्षात् रूप है। इसमें हनुमानजी की शक्ति भी निहित होती है, इसलिये शनि से संबंधित सभी दोष इसे धारण करने मात्र से शांत होते हैं। यह रूद्राक्ष आज्ञाचक्र का नियन्ता है। जो व्यक्ति इस रूद्राक्ष को कपाल के मध्य में धारण करते हैं, उनकी पूजा देवता और ब्राह्यण करते हैं, और वे निर्वाण (स्वर्ग) को प्राप्त हो जाते हैं। यह शिवजी तीसरे नेत्र के समान है, और धारक को आत्म रक्षा एवं कार्य के सही नियोजन में सहायक बनाता है। यह रूद्राक्ष धारक को हानि, दुर्घटना, रोग, चिन्ता से मुक्त रखकर साधक को सुरक्षा-समृद्धि देता है, यह रूद्राक्ष सभी रूद्राक्षों में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है, और इसीलिये यह अधिक मूल्यावान होता है। ये बहुत ही कम संख्याओं में उत्पन्न होता है, और इसकी मांग इसकी उपलब्धता से कहीं अधिक होती है। चौदह मुखी रूद्राक्ष shukracharya संस्थान में उपलब्ध है, क्योंकि इस रूद्राक्ष को स्वयं भगवान शिव ने धारण किया था, इसे धारण करने से परिवार का कल्याण होता है, चतुर्दशमुखी रूद्राक्ष स्वास्थ्य लाभ, रोगमुक्ति और शारीरिक तथा मानसिक-व्यापारिक उन्नति में सहायक होता है। 14 मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से आध्यात्मिक लाभ तथा भौतिक सुख तथा सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। इस रूद्राक्ष को मस्तक पर धारण करना चाहिये। जो मनष्य इसे मंत्र सिद्ध करके धारण करते हैं, वह रूद्रलोक में जाकर बसते हैं। इससे परमपद की प्राप्ति होती है, शत्रुओं का नाश होता है, बैकुंठ की प्राप्ति होती है। यह जेल भय से मुक्ति भी दिलाता है। यह रूद्राक्ष त्रिकाल सुखदायक है, यह समस्त रोगों का हरण करने वाला सदैव आरोग्य प्रदान करने वाला है। इसके धारण करने से वंशवृद्धि अवश्य होती है। इससे बल और उत्साह का वर्धन होता है। इससे निर्भयता प्राप्त होती है, और संकट काल में सरंक्षण प्राप्त होता है। विपत्ति और दुर्घटना से बचाव के लिये हनुमान जी (रूद्र) के प्रतीक माने जाने वाले इस 14 मुखी रूद्राक्ष को अवश्य प्रयोग करना चाहिये। चतुर्दशमुखी रूद्राक्ष धारक को भविष्य देखने की दृष्टि प्रदान करता है, यह ‘देवमणि’ रूद्राक्ष है। चतुर्दशमुखी रूद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति सदा सही निर्णय लेता है, और संकटों, कुपरिस्थितियों एवं चिंताओं से छुटकारा पाता है, तथा भूत-पिशाच, डाकिनी, शाकिनी का प्रकोप उसके निकट भी नहीं आता। धारणकर्ता में विशेष गुण विकसित होने लगते हैं। यह आचार्य shukracharya द्वारा शास्त्रोक्त सिद्ध है कि जिसने 14 मुखी रूद्राक्ष धारण कर लिया, शनि जैसा प्रतिकूल ग्रह भी अनुकूल हो जाता है। चौदह मुखी रूद्राक्ष की माला पुरूष या स्त्री द्वारा धारण करने से उत्तम संतान की प्राप्ति होती है, और गृहस्थ जीवन भी अच्छा होता है। ग्यारह मुखी तथा चौदह मुखी दोनों रूद्राक्ष की माला को पेट पर बांधने से बार-बार हो जाने वाला गर्भपात नहीं होता। और उच्च कोटि की संतान उत्पन्न होती है।

14 मुखी रूद्राक्ष धारण का मंत्र है- ॐ नमः ॐ हनुमते नमः।
चैतन्य मंत्र- ॐ औं हस्फ्रें हसख्फ्रें। इस मंत्र से रूद्राक्ष को चैतन्य कर धारण करना चाहिये।
उपयोग- यह रूद्राक्ष भविष्य दर्शन, कल्पना शक्ति एवं ध्यान में सहायक है।

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गौरी-शंकर रुद्राक्ष Gori Shankar Rudraksh

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Aacharya, shukracharya के अनुसार गौरी शंकर रुद्राक्ष प्राकृतिक रूप से परस्पर जुड़े दो रूद्राक्षों को ही गौरी-शंकर रूद्राक्ष कहा जाता है। गौरी-शंकर रूद्राक्ष gauri Shankar Rudraksha को भगवान् शिव तथा माता गौरी का स्वरूप माना जाता है, इसलिये इसका नाम गौरी शंकर रूद्राक्ष है। यह रूद्राक्ष हर प्रकार की सिद्धियों का दाता है। यह रूद्राक्ष एक मुखी तथा चैदह मुखी की तरह बहुत दुर्लभ तथा विशिष्ट रूद्राक्ष है। कुछ लोग इसे अर्धनारीश्वर रूद्राक्ष भी कहते हैं। यह सुख-शांति, विवाह, संतान, सात्विक शक्ति, धन-धान्य, वैभव, प्रतिष्ठा, दैवीय कृपा और स्थाई लक्ष्मी प्रदाता रूद्राक्ष है। इस gauri Shankar Rudraksha रूद्राक्ष को उपयोग में लाने से भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसमें द्विमुखी रूद्राक्ष के जैसे गुण होते हैं, ऐसी मान्यता है। गौरी-शंकर रूद्राक्ष में एक मुखी रूद्राक्ष और चैदह मुखी रूद्राक्ष दोनों की शक्तियाँ समाहित होती हैं। गौरी-शंकर को पति-पत्नी के बीच, पिता-पुत्र के बीच, या दो मित्रों के बीच सम्बन्ध सुधारने के लिये धारण करते हैं। विवाह के इच्छुक युवक-युवती इसे धारण करते हैं। सामंजस्य, आकर्षण, मंगल कामनाओं की सिद्धि में यह रूद्राक्ष बहुत सहायक है। गौरी-शंकर रूद्राक्ष gauri Shankar Rudraksha सर्वसिद्धि प्रदाता रूद्राक्ष कहा गया है। यह सात्विक शक्ति में वृद्धि करने वाला, मोक्ष प्रदाता है। महिलाओं के लिये गौरी-शंकर रूद्राक्ष सफल वैवाहिक जीवन के लिये लाभकारी माना गया है। यह रूद्राक्ष भगवान शिव और उमादेवी का संयुक्त प्रतिरूप होने के कारण वंशवृद्धि द्वारा सृष्टि का विकास करता है। अतः पारिवारिक शांति एवं एकजुटता के लिये श्रेष्ठ है। गुरू जी Dr.R.B.Dhawan का कहना है की जन्म पत्री में यदि दुःखदायी कालसर्प योग पूर्णरूप से अथवा आंशिक रूप से प्रकट होकर जीवन को कष्टमय बना रहा हो तो, व्यक्ति को अविलम्ब 8 मुखी 9 मुखी और गौरी-शंकर रूद्राक्ष gauri Shankar Rudraksha अर्थात तीनों ही रूद्राक्षों का संयुक्त बन्ध बनवाकर धारण करना चाहिये क्योंकि कालसर्प दोष केवल शिव कृपा से ही दूर होता है, और गौरी-शंकर रूद्राक्ष के साथ राहू एवं केतु के 8 एवं 9 मुखी रूद्राक्ष बन्ध निश्चित रूप से कालसर्प योग से पूर्णतः मुक्ति दिलाने में सर्वश्रेष्ट हैं। गौरी-शंकर रूद्राक्ष धारण करने से पुरूषों को स्त्री सुख प्राप्त होता है, तथा परस्पर सहयोग एवं सम्मान तथा प्रेम की वृद्धि होती है। यह रूद्राक्ष शिव-शक्ति के लिये उपयोगी माना गया है। यह बहुत दुर्लभ रूद्राक्ष है। परंतु shukracharya संस्थान में उपलब्ध है। इस से जीवन सर्वतोन्मुखी विकास की ओर अग्रसर होता है। संक्षेप में यह धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को देने वाला चतुर्वर्ग प्रदाता रूद्राक्ष है, यह ध्यान में भी प्रबल सहायक है। सर्वाधिक गौरी-शंकर में कुल 1, 10 या 11 मुख होते हैं, ऐसे भी गौरी-शंकर है, जिनमें 11 मुख या फिर दोनों दानों में एक-एक मुख होता है। गौरी-शंकर कंठा जिसमें 33 बीज होते हैं, सन्यासी पहनते हैं, जिन्हें अपने ब्रह्यचर्य की रखा करनी होती है। अधिकांशतः लोग इसे पहनने की बजाय इसकी पूजा करते हैं। इसके 33 दानों के कंठे से निसृत ऊर्जा सामान्य व्यक्ति में वैराग्य की भावना पैदा करती है। गौरी शंकर रूद्राक्ष को पूजा स्थान के साथ-साथ तिजोरी, गल्ले, में स्थापित करते हैं। धारण करने के लिये इसे सोने या चांदी में मढ़वा लेना श्रेष्ठ है।

धारण करने के लिये मंत्र- ॐ ऐं हृीं युगलरूपिण्यै नमः। ॐ गौरी-शंकराभ्यां नमः।
चैतन्य मंत्र- ॐ ऐं हृीं क्लीं क्ष्म्यौं स्वाहा।। इस मंत्र से रूद्राक्ष को चैतन्य कर धारण करना चाहिये।
उपयोग- बड़े से बड़ा विघ्न इस रूद्राक्ष को धारण करने से समूल नष्ट होता है, मानसिक शारीरिक रोगों से पीड़ित पुरूषों/स्त्रियों के लिये ये रूद्राक्ष दिव्यौषधि की तरह काम करता है।

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गर्भगौरी रूद्राक्ष Garbh Gori Rudraksh

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यह रूद्राक्ष गौरी-शंकर रूद्राक्ष का वह रूप है, जिसमें दो रूद्राक्ष एक दूसरे से जुड़े होते हैं, और इनमें से एक दाना दूसरे से छोटा होता है। असुर गुरु shukracharya का कथन है कि इस रुद्राक्ष को धारण करने से गर्भरक्षा होती है, यह भगवान गणेश और माता गौरी की शक्ति तथा सायुज्यता का घोेतक तथा प्रेमपूर्ण संबध का प्रतीक है, इसी लिए इस रूद्राक्ष को गर्भगौरी रूद्राक्ष कहते हैं। उपाय के रूप में यदि किसी गर्भवती को गर्भपात abortion का भय हो तो यह रूद्राक्ष धारण करने से गर्भरक्षा होती है। यह गौरी-शंकर रूद्राक्ष जैसा होता है, परंतु एक रूद्राक्ष छोटा और दूसरा सामान्य आकार का होता है। और जिसमें दो रूद्राक्ष प्राकृतिक ढंग से जुड़े हुये होते हैं। इस रूद्राक्ष को धारण करने से गर्भरक्षा होती है, और गर्भपात abortion होने के भय से मुक्ति मिलती है। किसी स्त्री के गर्भ धारण में शारीरिक कठिनाई हो या बार-बार गर्भपात abortion हो जाता हो तो यह रूद्राक्ष अवश्य धारण करें।

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गणेश रूद्राक्ष, Ganesh Rudraksh

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गणेश रूद्राक्ष की पहचान यह है कि उस पर प्राकृतिक रूप से एक उभरी हुई सूंड की आकृति बनी रहती है, जैसा कि भगवान गणेश के मुख पर होती है।

सृष्टि का नियम है कि हमेशा से पढ़ने लिखने का युग रहा है, जिसके पास विद्या है, वह सम्माननीय होता है, एवं जिसके पास ज्ञान है वही पूजनीय होता है। समाज में लोग उसे आदर की दृष्टि से देखते हैं, Ganesh Rudraksha की यह विशेषता है की पढ़ने-लिखने वालों के लिये यह वरदान साबित होता है, तथा बच्चों के लिये भी अद्भुत रूप से लाभदायक होता है। आसुर गुरु shukracharya का कथन है कि गणेश रुद्राक्ष को धारण करने से स्मरण शक्ति तीव्र होती है, इस विषय में Dr.R.B.Dhawan का मानना है कि ganesh Rudraksha को धारण करने से विद्यार्थी को पढ़ा-लिखा याद रहता है, तथा बच्चों का पढ़ाई में मन लगता है, जिससे कि वह अच्छे अंकों से पास हो सकते हैं, तथा प्रतियोगिता परीक्षा में भी अद्भुत रूप से सफलता प्राप्त कर सकते हैं।

जो बच्चे प्रतियोगिता परीक्षा में या फिर उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें गणेश रूद्राक्ष ganesh Rudraksha अवश्य ही धारण करना चाहिये, ताकि वे अपने लक्ष्य तक पहुँच सकें, जिससे कि वह अपने जीवन में उच्च पद की प्राप्ति कर सकने में समर्थ हों। Ganesh Rudraksha धारण करने वाले पर श्री गणेश की विशेष अनुकम्पा होती है। धारण करने वाले व्यापारियों को यह बुद्धि, रिद्धि-सिद्धि प्रदान कर व्यापार में आश्चर्यजनक प्रगति देते हैं। यह रूद्राक्ष विघ्न-बाधाओं से रक्षा करता है। गणेश रूद्राक्ष ganesh Rudraksha को धारण करने से धारक का भाग्योदय होता है। सन्तान प्राप्ति में बाधा एवं वैवाहिक विलम्ब दूर हो जाते हैं। गणेश रूद्राक्ष के धारक को इसके चमत्कारी प्रभाव शीघ्र ही दिखाई देते हैं। विघ्न विनाशक गणेश माँ पार्वती एवं देवाधि देव भगवान शंकर की पूर्ण कृपा प्रदायक ये रूद्राक्ष दिव्य है, परम दुर्लभ भी है, विशेष रूप से संतान बाधा child problems एवं पुत्र-पुत्री के विवाह में आ रही बाधा को निश्चित रूप से दूर करके अविलम्ब कार्य सिद्धि प्रदान करता है। यह ‘गणेश रूद्राक्ष’ दुर्लभ होता है। इस रूद्राक्ष में 4, 5, 6, 7 या 8 धारियों के बीच में गणेश जी की शूंड की तरह का आकार बना होता है, अष्टमुखी और एकादश मुखी गणेश रूद्राक्ष का महत्व अधिक है, और इसे विशेष परिस्थितियों में ही धारण किया जाता है। व्यापार के लिए इसे बहुत शुभ मानते हैं। इसलिये यह अष्टमुखी गणेश रूद्राक्ष कहलाता है। इस रूद्राक्ष में अष्टसिद्धियों का एवं अष्टमातृकाओं का वास होता है, एवं नौ ग्रह में राहु देव का प्रतीक होता है, अतः जिस किसी जातक का जब राहु अशुभ हो, अथवा राहु की महादशा चल रही हो, उसे इस अष्टमुखी गणेश रूद्राक्ष को गले में धारण करना चाहिये इससे राहु अनुकूल प्रभाव देने लगता है।

देवगुरु बृहस्पति ओर आसुर गुरु shukracharya के अनुसार – अष्ठ मुखी गणेश रूद्राक्ष अत्यंत ही दुर्लभ एवं अद्भुत रूप से भाग्योदय कारक रूद्राक्ष होता है। अष्टमुखी रूद्राक्ष में गणेश रूद्राक्ष मिलना काफी कठिन होता है, अगर जिस किसी को यह प्राप्त हो जाये तो समझो उसके सौभाग्य का द्वार खोलने से उसे कोई नहीं रोक करता है तथा अद्भुत रूप से भाग्य उसका साथ देने लगता है। गणेश जी की कृपा से धारक को ऋद्धि-सिद्धि, बुद्धि, बल, चतुर्य की प्राप्ति एवं समस्त शत्रुओं का नाश होता है। पर सभी रूद्राक्ष उपलब्ध हैं।

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