नारायण नागबली

नारायण नागबली (संतान बाधा निवारण हेतु पितृ दोष का प्रभावशाली उपाय):-

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नारायण नागबली छविनारायण नागबलि ये दोनो अनुष्ठान पद्धतियां संतान सुख की अपूर्ण इच्छा, कामना पूर्ति के उद्देश से किय जाते हैं, इसीलिए ये दोनो अनुष्ठान काम्य प्रयोग कहलाते हैं। वस्तुत: नारायणबलि और नागबलि ये अलग-अलग पूजा अनुष्ठान हैं। नारायण बलि का उद्देश मुखत: पितृदोष निवारण करना है। और नागबलि का उद्देश सर्प शाप, नाग हत्या का दोष निवारण करना है। इन में से केवल एक नारायण बलि या नागबलि अकेले नहीं कर सकते, इस लिए ये दोनो अनुष्ठान एक साथ ही करने पड़ते हैं।

पितृदोष निवारण के लिए ही नारायण नागबलि अनुष्ठान करने के लिये शास्त्रों मे निर्देशित किया गया है । प्राय: यह अनुष्ठान जातक के पूर्वजन्म के दुर्भाग्य संबधी दोषों से मुक्ति दिलाने के लिए किये जाते हैं। ये अनुष्ठान किस प्रकार व कौन इन्हें कर सकता है? इसकी पूर्ण जानकारी होना आवश्यक है। ये अनुष्ठान जिन जातकों के माता पिता जिवित हैं, वे भी विधिवत सम्पन्न कर सकते हैं, यज्ञोपवीत धारण करने के बाद कुंवारा ब्राह्मण यह अनुष्ठान सम्पन्न करा सकता है। संतान प्राप्ति एवं वंशवृद्धि के लिए ये अनुष्ठान सपत्नीक करने चाहीयें। यदि पत्नी जीवित न हो तो कुल के उद्धार के लिए पत्नी के बिना भी ये कर्म किये जा सकते हैं। यदि पत्नी गर्भवती हो तो गर्भ धारण से पाचवें महीने तक यह अनुष्ठान किया जा सकता है। घर में कोई भी मांगलिक कार्य हो तो ये अनुष्ठान एक साल तक नही किये जाते हैं। माता या पिता की मृत्यु् होने पर भी एक साल तक ये अनुष्ठान करने निषिद्ध माने गये हैं।

दोनों प्रकार यह अनुष्ठान एक साथ और निम्नलिखित इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए किये जाते हैं :-

1. काला जादू के प्रभाव से मुक्ति पाने के लिए।
2. संतान प्राप्ति के लिए।
3. भूत प्रेत से छुटकारा पाने के लिए।
4. घर के किसी व्यक्ति की दुर्घटना के कारण मृत्यु होती है (अपघात, आत्महत्या, पानी में डूबना) इस की वजह से अगर घर में कोई समस्याए आती है तो, उन समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए यह अनुष्ठान किया जाता है।

संतान प्राप्ति के लिए :-
सनातन मान्यता के अनुसार प्रत्येक दम्पत्ती की कम से कम एक पुत्र संतान प्राप्ति की प्रबल इच्छा होती है, और इस इच्छा की पूर्ति न होना दम्पत्ती के लिए बहुत दुःखदाई होता है, हालांकि इस आधुनिक युग में टेस्ट ट्यूब बेबी जैसी उपचार पद्धतियां उपलब्ध हैं, लेकिन कुछ जोड़ों की कमाई के हिसाब से यह बहुत खर्चीली होती हैं। इस लिये बहुत से लोग इन महेंगे उपचारों के कारण खर्च करने में समर्थ नहीं होते, और कुछ इस के लिए कर्जा लेते हैं, लेकिन जब कभी इस महेंगे उपचारों का भी कोई लाभ नहीं होता, तब यह जोड़े ज्योतिषीयों के पास जाते हैं, और एक अच्छा अनुभवी ज्योतिषी ही इस समस्या का समाधान और उपचारों की विफलता का कारण बता सकता है।

शास्त्र कहते हैं :- जहां रोग है, वहां उपचार भी है। इसी नियम को ध्यान में रखते हुऐ हमारे पूर्वज ऋषियों ने इन समस्याओं के समाधान हेतु ज्योतिष शास्त्र में कुछ विशेष उपाय सुझाए हुए है, सब से पहेले ज्योतिषी यह देखते हैं की इस की पीड़ित दंपति की जन्म कुंडली में संतान प्राप्ति का योग है या नहीं? अगर है, तो गर्भधारण करने में समस्या का कारण क्या है? जैसे की पूर्व जन्म के पाप, पितरों का श्राप, कुलविनाश का योग, इनमें से कोई विशेष कारण पता चलने के बाद वह उस समस्या का निराकरण सुझाते खोजते हैं। इन उपायों में से नारायण नागबली सर्वश्रेष्ठ उपाय माना जाता है। यदि यह अनुष्ठान उचित प्रकार से और मनोभाव से किया जाए, तो संतानोत्पत्ति की काफी संभावनाए हो जाती हैं।

भूत-प्रेत बाधा के कारण संतानोत्पत्ति में रूकावटें :-
कोई स्थाई अस्थाई संपत्ति जैसे के, घर जमीन या पैसा किसी से जबरन या ठग कर हासिल की जाती है तो, मृत्यु पश्चात् उस व्यक्ति की आत्मा उसी संपत्ति के मोह रहती है, उस व्यक्ति को मृत्यु पश्चात् जलाया या दफनाया भी जाए तो भी उस की इच्छाओं की आपूर्ति न होने के कारण उस की आत्मा को माया से मुक्ति नहीं मिल पाती, और वह आत्मा प्रेत योनी में भटकती है, और उस के पतन के कारण व्यक्ति को वह पीड़ा देने लगती है, यदि किसी शापित व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात् उसकी अंतेष्ठि विधि शास्त्रों अनुसार संपन्न न हो, या श्राद्ध न किया गया हो, तब उस वजह से उस से सम्बंधित व्यक्तिओं को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है, जैसे कि– संतति का आभाव, यदि संतान होती भी है, तो उस का अल्प जीवी होना
संतति का ना होना ही है।

1. काफी कष्टों के बावजूद आर्थिक अड़चनों का सामना करना
खेती में नुकसान।
2. व्यवसाय में हानि, नौकरी छूट जाना, कर्जे में डूब जाना,
परिवार में बिमारीयाँ।
3. मानसिक या शारीरिक परेशानी, विकलांग संतति का जन्म होना, या अज्ञात कारणों से पशुधन का विनाश।
4. परिवार के किसी सदस्यों को भूत बाधा होना।
5. परिवार के सदस्यों में झगड़े या तनाव होना।
6. महिलाओं में मासिक धर्म का अनियमित होना, या गर्भपात होना।
ऊपर लिखे हुये सभी या किसी भी परेशानी से व्यक्ति झूंज रहा हो तोतो, उसे नारायण-नागबली करने की सलाह दी जाती है।

श्राप सूचक स्वप्न :-
कोई व्यक्ति यदि निम्नलिखित स्वप्न देखता है, तो वह पिछले या इसी जन्म में श्रापित होता है :-
1. स्वप्न में नाग दिखना, या नाग को मारते हुवे दिखना, या टुकड़ो में कटा हुवा नाग दिखना।
2. किसी ऐसी स्त्री को देखना, जिसके बच्चे की मृत्यु हो गई है, वह उस बच्चे के प्रेत के पास बैठ कर अपने बच्चे को उठने को कह रही है, और लोग उसे उस प्रेत से दूर कर रहे है।
3. विधवा या किसी रोगी सम्बन्धी को देखना।
4. किसी ईमारत को गिरते हुए देखना।
5. स्वप्न में झगड़े देखना।
6. खुद को पानी में डूबते हुये देखना।
इस प्रकार के स्वप्नों से मुक्ति पाने के लिए नारायण-नागबली अनुष्ठान किया जाता है। धर्मसिंधु और धर्मनिर्णय इन प्राचीन ग्रंथो में इस अनुष्ठान के विषय में लिखा हुआ है।

दुर्मरण :-
किसी भी प्रकार से दुर्घटना यदि मृत्यु का कारण हो, और अल्पायु में मृत्यु होना दुर्मरण कहा जाता है। किसी मनुष्य की इस प्रकार से मृत्यु उस मनुष्य के परिवार के लिए अनेक परेशानियों का कारण बनती है। निम्नलिखित कारण से आने वाली मृत्यु दुर्मरण कहलाती है :-

1. विवाह से पहले मृत्यु होना।
2. परदेस में मृत्यु होना।
3. गले में अन्न अटक कर श्वास रुकने से मृत्यु होना।
4. पंचक, त्रिपाद या दक्षिणायन काल में मृत्यु होना।
5. आग में जल कर मृत्यु होना।
6. किसी खतरनाक जानवर के हमले से मृत्यु होना।
7. छोटे बच्चे का किसी के हाथों मारा जाना।
8. पानी में डूब जाने से मृत्यु होना।
9. आत्महत्या करना।
10. आकाशीय बिजली गिरने या बिजली के झटके से मृत्यु।
यह सब कारण हैं, जिसके कारण किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो, परिवार में आर्थिक, मानसिक वा शारीरिक परेशानियां हो सकती हैं, इं परेशानियों को दूर करने के लिए परिजनों को नारायण-नागबली करवाने की सलाह दी जाती ।

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धूम उपग्रह

वृहत्पराशर होरा शास्त्र, आलेख- 1

धूम उपग्रह (भावस्थिति अनुसार फलादेश)

1. कुंडली में धूम यदि – प्रथम स्थान में हो तो, वह जातक निर्मल (सुंदर) नेत्र वाला, शूरवीर, हठी परंतु घृणा रहित, दुष्ट बुद्धि वाला और महाक्रोधी होता है।

2. कुंडली में धूम यदि – द्वितीय स्थान में हो तो, वह जातक धनवान परंतु रोगी, किसी अंग से हीन, राजपक्ष से चिंतित, मूर्खतापूर्ण व्यवहार वाला और कुछ मात्रा में नपुंसक होता है।

3. कुंडली में धूम यदि – तृतीय स्थान में हो तो, वह जातक बुद्धिमान, युद्ध की स्थिति में विचारपूर्ण नीति तय करने वाला, मिष्ठभाषी, शांतचित्त वाला और धनवान होता है।

4. कुंडली में धूम यदि – चतुर्थ स्थान में हो तो, वह जातक स्त्री से रति के समय निढाल या रतिरहित, चिंतनशील, शास्त्र अध्ययन में रूचि रखने वाला होता है।

5. कुंडली में धूम यदि – पंचम स्थान में हो तो, वह जातक कम संतान वाला, अल्पधनी, भारी शरीर वाला, शाकाहारी और मांसाहारी भी होता है, इसे मित्रता में अधिक रूचि नहीं होती।

6. कुंडली में धूम यदि – षष्ठ स्थान में हो तो, वह जातक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाला, तेजस्वी, निरोगी और विख्यात् होता है।

7. कुंडली में धूम यदि – सप्तम स्थान में हो तो, वह जातक अल्प धनी, धोखाधड़ी में विश्वास रखने वाला और रूखे चेहरे वाला होता है।

8. कुंडली में धूम यदि – अष्टम स्थान में हो तो, वह जातक कठिनाई के समय हिम्मत हीन, दूसरे समय उत्साहित, सत्य में विश्वास रखने वाला तथा निष्ठुर या कठोर होता है।

9. कुंडली में धूम यदि – नवम स्थान में हो तो, वह जातक धनवान, मान-सम्मान वाला, प्रसिद्ध व्यक्तित्व, अपनों से स्नेह रखने वाला और एेशवर्यशाली होता है।

10. कुंडली में धूम यदि – दशम स्थान में हो तो, वह जातक संतान सुख तथा ऐश्वर्य से सम्पन्न, बुद्धिमान, सुखी और सत्य में विश्वास रखने वाला होता है।

11. कुंडली में धूम यदि – एकादश स्थान में हो तो, वह जातक धन और प्रचूर सम्पत्ति युक्त, कलाप्रेमी और गायन विद्या या वाद्य में निपुण होता है।

12. कुंडली में धूम यदि – द्वादश स्थान में हो तो, वह जातक दोषी, अपराध करने वाला, धोखाधड़ी वाला, दूसरी स्त्रीयों में रूचि वाला, नशे के वशीभूत और दुष्टप्रवृती वाला होता है।

(आलेख- 19-07-2018)

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दो मुखी रुद्राक्ष, 2 Mukhi Rudraksh

दो मुखी रूद्राक्ष, 2 Mukhi Rudraksh Nepal, 2 Mukhi Rudraksh Original Nepal,

Dr.R.B.Dhawan,Astrological Consultant, specialist: marriage problems, top best astrologer in delhi

असुराचार्य shukracharya का कथन है कि- दो मुखी रूद्राक्ष अर्धनारिश्वर स्वरूप है, यह शिव तथा शक्ति दोनो का संयुक्त रूप है। इसे धारण करने से भगवान शिव तथा पार्वती दोनों ही प्रसन्न होते हैं। दो मुखी रूद्राक्ष गोहत्या के पाप से मुक्ति दिलाता है, तथा यह मन और मस्तिष्क को सन्तुलित रखता है, Dr.R.B.Dhawan अपने अनुभवों के आधार पर कहते हैं- इसको धारण करने से मनुष्य की बुद्धि सक्रिय होती है, तथा घर में हर प्रकार की सुख-सुविधा उपलब्ध होती है। इसको धारण करने से पति-पत्नी में एकात्मय भाव उत्पन्न होता है, यह रूद्राक्ष श्रद्धा एवं विश्वास का स्वरूप है। यह व्यापार में सफलता दिलाता है। आचार्य shukracharya लिखते हैं- दो मुखी रूद्राक्ष सांसारिक ऐश्वर्य व उपलब्धियां कराता है, तथा घर से क्लेश की जड़ को दूर करता है। दो मुखी रूद्राक्ष शिव और पार्वती का सम्मिलित स्वरूप है। इस रूद्राक्ष को धारण करने वाले व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहते हैं। इस रूद्राक्ष की अद्भुत शक्ति से धारक का मन मस्तिष्क संतुलित रहता है। Dr.R.B.Dhawan के अनुसार शिवपुराण में दो मुखी रूद्राक्ष के लिए कहा गया है कि यह बेहद दुर्लभ और कल्याणकारी रूद्राक्ष है। नेपाल के द्विमुखी रूद्राक्ष चपटे, आँख की आकृति के होते हैं। दो मुखी रूद्राक्ष नेपाल में काफी कम होता है, तथा बहुत मँहगा भी होता है, इसलिये दो मुखी रूद्राक्ष रामेश्वरम का ही अधिक देखने को मिलता है। दो मुखी रूद्राक्ष को धारण करने से भगवान् शिव तथा माता पार्वती दोनों ही प्रसन्न होते हैं। दो मुखी रूद्राक्ष गोहत्या के पाप से मुक्ति दिलाता है, तथा यह मन मस्तिष्क दोनों को सन्तुलित रखता है। दो मुखी रूद्राक्ष अर्ध-नारीश्वर स्वरूप है, इसे शिव-शिवा रूप भी कह सकते हैं, दोमुखी रूद्राक्ष साक्षात् अग्नि स्वरूप हैं, जिसके शरीर पर ये प्रतिष्ठित करके धारण किया होता है, आचार्य shukracharya का मानना है कि उसके जन्म जन्मांतर के पाप उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे अग्नि ईंधन को जला डालती है।

इस रूद्राक्ष के धारण करने से कुंडली में चन्द्रमा से उत्पन्न सभी दोषों का निवारण हो जाता है। ज्योतिषीय दृष्टि से चन्द्रमा हृदय, फेफडा, मन, वामनेत्र, गुर्दा, भोजन नली इत्यादि का कारक है। चन्द्रमा की प्रतिकूल स्थिति तथा दुष्प्रभाव के कारण हृदय तथा फेफड़ों के रोग हो सकते हैं। बांयी आँख की खराबी, खून की कमी, जल सम्बन्धी रोग, गुर्दा कष्ट, मासिक धर्म के रोग, स्मृति-भ्रंश इत्यादि रोग भी हो सकते हैं। इसके दुष्प्रभाव से दरिद्रता तथा मन मस्तिष्क विकार भी होते हैं। गुणों के हिसाब से यह मोती से कई गुना अधिक प्रभावी है। दो मुखी रुद्राक्ष धारण करने वाले धारक के परिजन परस्पर आदर व श्रद्धा की सतत् वृद्धि अनुभव करते हैं। द्विमुखी रूद्राक्ष शिक्षक व छात्र के बीच, पिता व पुत्र के बीच, पति व पत्नी के बीच या मित्रों में मतभेद मिटाता है, और एकात्मता उत्पन्न करता है। धारक शांतिमय पारिवारिक जीवन जीने के लिये सक्षम बन जाता है। इस रूद्राक्ष में अंर्तगर्भित ऐसी विद्युत तरंगें होती हैं कि जिन के प्रभाव से यह रूद्राक्ष सभी शारीरिक व्याधियों से रक्षा करता है, गुरू जी (Dr.R.B.Dhawan) अपने अनुभव लिखते हुए आगे कहते हैं- इस रूद्राक्ष को धारण करने से इनकम/सेल्स टैक्स अधिकारी व्यापारी को व सरकारी नौकरी वालों को उनके अधिकारी बेकार परेशान नहीं करते इस लिये इन्हें यह रूद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिये। यह शरीर की गर्मी को निकालता है, इससे रक्तचाप नियंत्रण में रहता है। मन मस्तिष्क की बीमारी भी सही हो जाती हैं। दो मुखी रूद्राक्ष को देवेश्वर भी कहा जाता है। दो मुखी रूद्राक्ष दांपत्य जीवन सुखमय बनाने के लिये अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है। शिव और शक्ति की उपासना करने वाले को यह रूद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिये। इस रूद्राक्ष के स्वामी ग्रह चंद्रदेव हैं।

दो मुखी रूद्राक्ष धारण मंत्र- ॐ नमः ॐ शिव शक्तिभ्यां नमः।
चैतन्य करने का मंत्र- ॐ क्षी हृो क्षौं वो ॐ।।
उपयोग- आदर्श पारिवारिक जीवन, शांतिपूर्ण व स्थाई संबधों के लिये।

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पंद्रह मुखी रूद्राक्ष, 15 Mukhi Rudraksh

पंद्रह मुखी रूद्राक्ष, 15 Mukhi Rudraksh Nepal, 15 Mukhi Rudraksh Original Nepal,

Dr.R.B.Dhawan (गुरूजी) astrologer, Astrological Consultant, specialist : marriage problems, top best astrologer in delhi

रक्ष जाति के आचार्य shukracharya का वचन है कि- पंद्रहमुखी रूद्राक्ष अत्यन्त दुर्लभ रूद्राक्षों की श्रेणी में आता है। यह रूद्राक्ष परम प्रभावशाली तथा अल्प कालावधि में ही शिवजी को प्रसन्न करने वाला रूद्राक्ष है, यह रूद्राक्ष साक्षात् देवमणि है। गुरू जी (Dr.R.B.Dhawan) और पुराणों के अनुसार पंद्रह विद्या, का साक्षात रूप है। इसमें महादेव की विशेष शक्ति निहित होती है, इसलिये नवग्रहों से उत्पन्न दोष इसे धारण करने मात्र से शांत होते हैं। यह रूद्राक्ष कठिन से कठिन परिस्थितियों में धारण करने वाले का मार्गदर्शन करता है। जो व्यक्ति इस रूद्राक्ष को कंठ के मध्य में धारण करते हैं, वह सर्वत्र पूजित होते हैं, और अंत समय वे स्वर्ग को प्राप्त होते हैं। चमड़ी के जटिल से जटिल रोगों को दूर करने की इसमें शक्ति है। धारक को आत्मरक्षा करने में समर्थ बनाता है। यह रूद्राक्ष धारक को हानि, दुर्घटना, जटिल रोग, आर्थिक चिन्ता से मुक्त रखकर धारक को सुरक्षा-समृद्धि देता है। वैसे तो यह रूद्राक्ष सभी जटिल रोगों को दूर करने वाला माना गया है, फिर भी Dr.R.B.Dhawan के अनुभव अनुसार इस रूद्राक्ष में पौरुष रोग को दूर करने की महान शक्ति है। इसी लिए दुर्बल पुरुष के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है, और इसीलिये इस की मांग अधिक होने से यह अधिक मूल्यावान भी होता है। वैसे भी यह रूद्राक्ष बहुत ही कम मात्रा में उत्पन्न होता है, और इसकी मांग इसकी उपलब्धता से कहीं अधिक है। पंद्रहमुखी रूद्राक्ष स्वास्थ्य लाभ, रोगमुक्ति और शारीरिक तथा मानसिक-व्यापारिक उन्नति में सहायक होता है। धारण करने पर आध्यात्मिक तथा भौतिक सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। इस रूद्राक्ष को धारण करने से शत्रुओं का नाश होता है, इस लिए यह रूद्राक्ष त्रिकाल सुखदायक है, यह समस्त रोगों का हरण करने वाला, सदैव आरोग्य प्रदान करने वाला है। इसके धारण करने से कुल की मर्यादा और कुल वृद्धि अवश्य होती है। इससे बल और उत्साह का वर्धन होता है, और निर्भयता प्राप्त होती है, तथा संकट काल में सरंक्षण भी प्राप्त होता है। पंद्रहमुखी रूद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति सदा सही निर्णय लेता है, और संकटों, कुपरिस्थितियों एवं चिंताओं से छुटकारा पाता है, धारणकर्ता में विशेष ओजस गुणों का विकास होने लगते हैं। यह शास्त्रोक्त सत्य है कि जिसने पंद्रहमुखी रूद्राक्ष धारण कर लिया, उसेे उत्तम संतान की प्राप्ति होती है, और गृहस्थ जीवन भी अच्छा होता है। गर्भपात रूक जाता है, व गुणवान संतान उत्पन्न होती है।

पंद्रहमुखी रूद्राक्ष धारण का मंत्र है- ॐ पशुपतय नम:’ मंत्र का 108 बार जाप करते हुए धारण करें।
लाभ- अलौकिक मार्गदर्शन, जटिल और पौरुष रोगों की शांति।

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चौदह मुखी रूद्राक्ष, 14 Mukhi Rudraksh

चौदह मुखी रूद्राक्ष, 14 Mukhi Rudraksh Nepal, 14 Mukhi Rudraksh Original Nepal,

Dr.R.B.Dhawan (गुरूजी) Astrologer, Astrological Consultant, specialist : marriage problems, top best astrologer in delhi

असुराचार्य shukracharya के अनुसार- चौदह मुखी रूद्राक्ष अत्यन्त दुर्लभ रूद्राक्षों की श्रेणी में आता है। परम प्रभावशाली तथा अल्प समय में ही शिवजी को प्रसन्न करने वाला यह चौदह मुखी रूद्राक्ष साक्षात् देवमणि है। Dr.R.B.Dhawana जी का कथन है कि- पुराणों में वर्णित है कि यह रूद्राक्ष चौदह विद्या, 14 लोक, 14 मनु का साक्षात् रूप है। इसमें हनुमानजी की शक्ति भी निहित होती है, इसलिये शनि से संबंधित सभी दोष इसे धारण करने मात्र से शांत होते हैं। यह रूद्राक्ष आज्ञाचक्र का नियन्ता है। जो व्यक्ति इस रूद्राक्ष को कपाल के मध्य में धारण करते हैं, उनकी पूजा देवता और ब्राह्यण करते हैं, और वे निर्वाण (स्वर्ग) को प्राप्त हो जाते हैं। यह शिवजी तीसरे नेत्र के समान है, और धारक को आत्म रक्षा एवं कार्य के सही नियोजन में सहायक बनाता है। यह रूद्राक्ष धारक को हानि, दुर्घटना, रोग, चिन्ता से मुक्त रखकर साधक को सुरक्षा-समृद्धि देता है, यह रूद्राक्ष सभी रूद्राक्षों में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है, और इसीलिये यह अधिक मूल्यावान होता है। ये बहुत ही कम संख्याओं में उत्पन्न होता है, और इसकी मांग इसकी उपलब्धता से कहीं अधिक होती है। चौदह मुखी रूद्राक्ष shukracharya संस्थान में उपलब्ध है, क्योंकि इस रूद्राक्ष को स्वयं भगवान शिव ने धारण किया था, इसे धारण करने से परिवार का कल्याण होता है, चतुर्दशमुखी रूद्राक्ष स्वास्थ्य लाभ, रोगमुक्ति और शारीरिक तथा मानसिक-व्यापारिक उन्नति में सहायक होता है। 14 मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से आध्यात्मिक लाभ तथा भौतिक सुख तथा सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। इस रूद्राक्ष को मस्तक पर धारण करना चाहिये। जो मनष्य इसे मंत्र सिद्ध करके धारण करते हैं, वह रूद्रलोक में जाकर बसते हैं। इससे परमपद की प्राप्ति होती है, शत्रुओं का नाश होता है, बैकुंठ की प्राप्ति होती है। यह जेल भय से मुक्ति भी दिलाता है। यह रूद्राक्ष त्रिकाल सुखदायक है, यह समस्त रोगों का हरण करने वाला सदैव आरोग्य प्रदान करने वाला है। इसके धारण करने से वंशवृद्धि अवश्य होती है। इससे बल और उत्साह का वर्धन होता है। इससे निर्भयता प्राप्त होती है, और संकट काल में सरंक्षण प्राप्त होता है। विपत्ति और दुर्घटना से बचाव के लिये हनुमान जी (रूद्र) के प्रतीक माने जाने वाले इस 14 मुखी रूद्राक्ष को अवश्य प्रयोग करना चाहिये। चतुर्दशमुखी रूद्राक्ष धारक को भविष्य देखने की दृष्टि प्रदान करता है, यह ‘देवमणि’ रूद्राक्ष है। चतुर्दशमुखी रूद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति सदा सही निर्णय लेता है, और संकटों, कुपरिस्थितियों एवं चिंताओं से छुटकारा पाता है, तथा भूत-पिशाच, डाकिनी, शाकिनी का प्रकोप उसके निकट भी नहीं आता। धारणकर्ता में विशेष गुण विकसित होने लगते हैं। यह आचार्य shukracharya द्वारा शास्त्रोक्त सिद्ध है कि जिसने 14 मुखी रूद्राक्ष धारण कर लिया, शनि जैसा प्रतिकूल ग्रह भी अनुकूल हो जाता है। चौदह मुखी रूद्राक्ष की माला पुरूष या स्त्री द्वारा धारण करने से उत्तम संतान की प्राप्ति होती है, और गृहस्थ जीवन भी अच्छा होता है। ग्यारह मुखी तथा चौदह मुखी दोनों रूद्राक्ष की माला को पेट पर बांधने से बार-बार हो जाने वाला गर्भपात नहीं होता। और उच्च कोटि की संतान उत्पन्न होती है।

14 मुखी रूद्राक्ष धारण का मंत्र है- ॐ नमः ॐ हनुमते नमः।
चैतन्य मंत्र- ॐ औं हस्फ्रें हसख्फ्रें। इस मंत्र से रूद्राक्ष को चैतन्य कर धारण करना चाहिये।
उपयोग- यह रूद्राक्ष भविष्य दर्शन, कल्पना शक्ति एवं ध्यान में सहायक है।

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गौरी-शंकर रुद्राक्ष Gori Shankar Rudraksh

गौरी-शंकर रुद्राक्ष, Gori Shankar Rudraksh Nepal, Gori Shankar original Rudraksh Nepal,

Dr.R.R.Dhawan – astrological consultant, top best astrologer in Delhi

Aacharya, shukracharya के अनुसार गौरी शंकर रुद्राक्ष प्राकृतिक रूप से परस्पर जुड़े दो रूद्राक्षों को ही गौरी-शंकर रूद्राक्ष कहा जाता है। गौरी-शंकर रूद्राक्ष gauri Shankar Rudraksha को भगवान् शिव तथा माता गौरी का स्वरूप माना जाता है, इसलिये इसका नाम गौरी शंकर रूद्राक्ष है। यह रूद्राक्ष हर प्रकार की सिद्धियों का दाता है। यह रूद्राक्ष एक मुखी तथा चैदह मुखी की तरह बहुत दुर्लभ तथा विशिष्ट रूद्राक्ष है। कुछ लोग इसे अर्धनारीश्वर रूद्राक्ष भी कहते हैं। यह सुख-शांति, विवाह, संतान, सात्विक शक्ति, धन-धान्य, वैभव, प्रतिष्ठा, दैवीय कृपा और स्थाई लक्ष्मी प्रदाता रूद्राक्ष है। इस gauri Shankar Rudraksha रूद्राक्ष को उपयोग में लाने से भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसमें द्विमुखी रूद्राक्ष के जैसे गुण होते हैं, ऐसी मान्यता है। गौरी-शंकर रूद्राक्ष में एक मुखी रूद्राक्ष और चैदह मुखी रूद्राक्ष दोनों की शक्तियाँ समाहित होती हैं। गौरी-शंकर को पति-पत्नी के बीच, पिता-पुत्र के बीच, या दो मित्रों के बीच सम्बन्ध सुधारने के लिये धारण करते हैं। विवाह के इच्छुक युवक-युवती इसे धारण करते हैं। सामंजस्य, आकर्षण, मंगल कामनाओं की सिद्धि में यह रूद्राक्ष बहुत सहायक है। गौरी-शंकर रूद्राक्ष gauri Shankar Rudraksha सर्वसिद्धि प्रदाता रूद्राक्ष कहा गया है। यह सात्विक शक्ति में वृद्धि करने वाला, मोक्ष प्रदाता है। महिलाओं के लिये गौरी-शंकर रूद्राक्ष सफल वैवाहिक जीवन के लिये लाभकारी माना गया है। यह रूद्राक्ष भगवान शिव और उमादेवी का संयुक्त प्रतिरूप होने के कारण वंशवृद्धि द्वारा सृष्टि का विकास करता है। अतः पारिवारिक शांति एवं एकजुटता के लिये श्रेष्ठ है। गुरू जी Dr.R.B.Dhawan का कहना है की जन्म पत्री में यदि दुःखदायी कालसर्प योग पूर्णरूप से अथवा आंशिक रूप से प्रकट होकर जीवन को कष्टमय बना रहा हो तो, व्यक्ति को अविलम्ब 8 मुखी 9 मुखी और गौरी-शंकर रूद्राक्ष gauri Shankar Rudraksha अर्थात तीनों ही रूद्राक्षों का संयुक्त बन्ध बनवाकर धारण करना चाहिये क्योंकि कालसर्प दोष केवल शिव कृपा से ही दूर होता है, और गौरी-शंकर रूद्राक्ष के साथ राहू एवं केतु के 8 एवं 9 मुखी रूद्राक्ष बन्ध निश्चित रूप से कालसर्प योग से पूर्णतः मुक्ति दिलाने में सर्वश्रेष्ट हैं। गौरी-शंकर रूद्राक्ष धारण करने से पुरूषों को स्त्री सुख प्राप्त होता है, तथा परस्पर सहयोग एवं सम्मान तथा प्रेम की वृद्धि होती है। यह रूद्राक्ष शिव-शक्ति के लिये उपयोगी माना गया है। यह बहुत दुर्लभ रूद्राक्ष है। परंतु shukracharya संस्थान में उपलब्ध है। इस से जीवन सर्वतोन्मुखी विकास की ओर अग्रसर होता है। संक्षेप में यह धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को देने वाला चतुर्वर्ग प्रदाता रूद्राक्ष है, यह ध्यान में भी प्रबल सहायक है। सर्वाधिक गौरी-शंकर में कुल 1, 10 या 11 मुख होते हैं, ऐसे भी गौरी-शंकर है, जिनमें 11 मुख या फिर दोनों दानों में एक-एक मुख होता है। गौरी-शंकर कंठा जिसमें 33 बीज होते हैं, सन्यासी पहनते हैं, जिन्हें अपने ब्रह्यचर्य की रखा करनी होती है। अधिकांशतः लोग इसे पहनने की बजाय इसकी पूजा करते हैं। इसके 33 दानों के कंठे से निसृत ऊर्जा सामान्य व्यक्ति में वैराग्य की भावना पैदा करती है। गौरी शंकर रूद्राक्ष को पूजा स्थान के साथ-साथ तिजोरी, गल्ले, में स्थापित करते हैं। धारण करने के लिये इसे सोने या चांदी में मढ़वा लेना श्रेष्ठ है।

धारण करने के लिये मंत्र- ॐ ऐं हृीं युगलरूपिण्यै नमः। ॐ गौरी-शंकराभ्यां नमः।
चैतन्य मंत्र- ॐ ऐं हृीं क्लीं क्ष्म्यौं स्वाहा।। इस मंत्र से रूद्राक्ष को चैतन्य कर धारण करना चाहिये।
उपयोग- बड़े से बड़ा विघ्न इस रूद्राक्ष को धारण करने से समूल नष्ट होता है, मानसिक शारीरिक रोगों से पीड़ित पुरूषों/स्त्रियों के लिये ये रूद्राक्ष दिव्यौषधि की तरह काम करता है।

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त्रिजुटी रूद्राक्ष, Trijuti Rudraksh

त्रिजुटी रूद्राक्ष – Trijuti Rudraksh Nepal, trijuti original Rudraksh Nepal,

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आचार्य shukracharya के अनुसार – त्रिजुटी एक बहुत ही अलग प्रकार का रूद्राक्ष होता है। इस रूद्राक्ष में तीन रूद्राक्ष एक साथ जुड़े होते हैं, इसे trijuti Rudraksh गौरी पाठ रूद्राक्ष भी कहते हैं। यह शिव-पार्वती-गणेश यानि सम्पूर्ण शिव परिवार के रूप में पाया जाता है। यह रूद्राक्ष अत्यन्त दुर्लभ होता है, कभी-कभी कई साल में भी एक रूद्राक्ष पैदा नहीं होता है। यह रूद्राक्ष प्रजाति का सबसे दुर्लभ रत्न समझा जाता है। जितना फल एक मुखी रूद्राक्ष से, चैदह मुखी रूद्राक्ष, तथा गौरी-शंकर रूद्राक्ष सहित सभी रूद्राक्ष पहनने से मिलता है, उससे करोड़ों गुना फल श्री trijuti Rudraksh गौरी पाठ रूद्राक्ष दर्शन से ही प्राप्त हो जाता है। यह रूद्राक्ष एक तरह से अप्राप्य होता है, इसकी कीमत दो या तीन लाख रूपये तक होती है। गुरू जी Dr.R.B.Dhawan के अनुसार इस के दर्शन भी किसी भाग्य वाले को ही प्राप्त होते हैं, ऐसी ही मान्यता है। त्रिजुटी trijuti Rudraksh रूद्राक्ष प्रकृति का अजूबा है। तीन रूद्राक्ष पेड़ पर ही जुड़ जाते हैं। यानी कि गौरी-शंकर में एक रूद्राक्ष और मिल जाता है। त्रिजुटी के अनेक प्रकार हैं, पर तीनों दानें एक आकार व आकृति के हों, और समान रूप से जुड़े हों, यह दुर्लभ है। ऐसा दाना shukracharya संस्थान में उपलब्ध है। यह रूद्राक्ष कई वर्षों में एक बार उपजता है। यह ब्रह्याण्ड के मूल गुणों का प्रतीक है। इसे धारण करने मात्र से गुरू ब्रह्या, गुरू विष्णु, गुरू महेश की कृपा स्वतः प्राप्त हो जाती है। यह सम्पूर्ण व्यक्तित्व का सूचक है, और धारक को हर कठिनाई के समय पूरा साथ देता है। नेतृत्व एवं यश प्राप्ति में यह बहुत सहायक है। त्रिजुटी में मुख कितने भी हो सकते हैं। यह दिव्य रूद्राक्ष है, और धारक को इसकी विचित्र ऊर्जाओं के साथ तादात्म्य पाने में समय लगता है। विशेष परिस्थितियों में इसे धारण करने के बजाय केवल पूजा स्थान पर ही रख दिया जाता है।

त्रिजुटी रूद्राक्ष के साथ जपने योग्य मंत्र :- ॐ त्र्यंबकम् यजामहे सुगंधि पुष्टिवर्धनम उर्वारुकमिव बंधनान् मृत्योर्मोक्षीय मामृतात्।। (महामृत्युजय मंत्र) तथा ॐ नमः शिवाय।

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गणेश रूद्राक्ष, Ganesh Rudraksh

गणेश रूद्राक्ष – Ganesh Rudraksh nepal, Ganesh Rudraksh Original Nepal,

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गणेश रूद्राक्ष की पहचान यह है कि उस पर प्राकृतिक रूप से एक उभरी हुई सूंड की आकृति बनी रहती है, जैसा कि भगवान गणेश के मुख पर होती है।

सृष्टि का नियम है कि हमेशा से पढ़ने लिखने का युग रहा है, जिसके पास विद्या है, वह सम्माननीय होता है, एवं जिसके पास ज्ञान है वही पूजनीय होता है। समाज में लोग उसे आदर की दृष्टि से देखते हैं, Ganesh Rudraksha की यह विशेषता है की पढ़ने-लिखने वालों के लिये यह वरदान साबित होता है, तथा बच्चों के लिये भी अद्भुत रूप से लाभदायक होता है। आसुर गुरु shukracharya का कथन है कि गणेश रुद्राक्ष को धारण करने से स्मरण शक्ति तीव्र होती है, इस विषय में Dr.R.B.Dhawan का मानना है कि ganesh Rudraksha को धारण करने से विद्यार्थी को पढ़ा-लिखा याद रहता है, तथा बच्चों का पढ़ाई में मन लगता है, जिससे कि वह अच्छे अंकों से पास हो सकते हैं, तथा प्रतियोगिता परीक्षा में भी अद्भुत रूप से सफलता प्राप्त कर सकते हैं।

जो बच्चे प्रतियोगिता परीक्षा में या फिर उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें गणेश रूद्राक्ष ganesh Rudraksha अवश्य ही धारण करना चाहिये, ताकि वे अपने लक्ष्य तक पहुँच सकें, जिससे कि वह अपने जीवन में उच्च पद की प्राप्ति कर सकने में समर्थ हों। Ganesh Rudraksha धारण करने वाले पर श्री गणेश की विशेष अनुकम्पा होती है। धारण करने वाले व्यापारियों को यह बुद्धि, रिद्धि-सिद्धि प्रदान कर व्यापार में आश्चर्यजनक प्रगति देते हैं। यह रूद्राक्ष विघ्न-बाधाओं से रक्षा करता है। गणेश रूद्राक्ष ganesh Rudraksha को धारण करने से धारक का भाग्योदय होता है। सन्तान प्राप्ति में बाधा एवं वैवाहिक विलम्ब दूर हो जाते हैं। गणेश रूद्राक्ष के धारक को इसके चमत्कारी प्रभाव शीघ्र ही दिखाई देते हैं। विघ्न विनाशक गणेश माँ पार्वती एवं देवाधि देव भगवान शंकर की पूर्ण कृपा प्रदायक ये रूद्राक्ष दिव्य है, परम दुर्लभ भी है, विशेष रूप से संतान बाधा child problems एवं पुत्र-पुत्री के विवाह में आ रही बाधा को निश्चित रूप से दूर करके अविलम्ब कार्य सिद्धि प्रदान करता है। यह ‘गणेश रूद्राक्ष’ दुर्लभ होता है। इस रूद्राक्ष में 4, 5, 6, 7 या 8 धारियों के बीच में गणेश जी की शूंड की तरह का आकार बना होता है, अष्टमुखी और एकादश मुखी गणेश रूद्राक्ष का महत्व अधिक है, और इसे विशेष परिस्थितियों में ही धारण किया जाता है। व्यापार के लिए इसे बहुत शुभ मानते हैं। इसलिये यह अष्टमुखी गणेश रूद्राक्ष कहलाता है। इस रूद्राक्ष में अष्टसिद्धियों का एवं अष्टमातृकाओं का वास होता है, एवं नौ ग्रह में राहु देव का प्रतीक होता है, अतः जिस किसी जातक का जब राहु अशुभ हो, अथवा राहु की महादशा चल रही हो, उसे इस अष्टमुखी गणेश रूद्राक्ष को गले में धारण करना चाहिये इससे राहु अनुकूल प्रभाव देने लगता है।

देवगुरु बृहस्पति ओर आसुर गुरु shukracharya के अनुसार – अष्ठ मुखी गणेश रूद्राक्ष अत्यंत ही दुर्लभ एवं अद्भुत रूप से भाग्योदय कारक रूद्राक्ष होता है। अष्टमुखी रूद्राक्ष में गणेश रूद्राक्ष मिलना काफी कठिन होता है, अगर जिस किसी को यह प्राप्त हो जाये तो समझो उसके सौभाग्य का द्वार खोलने से उसे कोई नहीं रोक करता है तथा अद्भुत रूप से भाग्य उसका साथ देने लगता है। गणेश जी की कृपा से धारक को ऋद्धि-सिद्धि, बुद्धि, बल, चतुर्य की प्राप्ति एवं समस्त शत्रुओं का नाश होता है। पर सभी रूद्राक्ष उपलब्ध हैं।

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अंक ज्योतिष

कीरो गोल्ड सॉफ्टवेयर (हिन्दी और अंग्रेजी दो भाषाओं में) :-

Dr.R.B.Dhawan

(Top best astrologer in Delhi)

कहा जाता है कि आज तक के मानव इतिहास में सम्पूर्ण विश्व में भविष्य बताने वाली लगभग 160 विद्यायें खोजी गई हैं। इनमें अनेको विद्यायें तो ऐसी हैं, जिनका प्रचार तथा उपयोग केवल उसी देश तक ही सामित होकर रह गया, जिसमें वे खोजी गई हैं। कुछ ऐसी भी हैं जिनका प्रचार और भी सीमित छेत्र लगभग प्रदेश विशेष तक ही सीमित रह गया, और धीरे-धीरे यह विद्यायें अधिक प्रचलन में न आने के कारण लुप्त सी हो गई। ऐसा नहीं है की यह लुप्त हुई विद्याओं की प्रमाणिकता कम थी, बल्कि ऐसा इसलिये हुआ क्यों कि इनको उचित प्रचार ही नहीं मिला या फिर इनमें से कुछ को छिपाकर रखने की प्रवृति कारण बनी थी।

भविष्य का ज्ञान देने वाली जो तीन विद्यायें सम्पूर्ण विश्व में अधिक प्रसिद्ध हुई हैं- 1. हस्तरेखा विज्ञान, जो कि समुद्रिक विज्ञान का एक भाग है। 2. अंक ज्योतिष Numerology तथा 3. जन्मकुण्डली द्वारा भविष्य कथन। देखा जाये तो तीनों ही विद्याओं के जनक भारतीय विद्धान थे। भारत के 18 ऋषियों ने अपने-अपने समय में इन विद्याओं को खोजा तथा प्रस्तुत किया था। इसके अतिरिक्त भारत में भी भविष्य का ज्ञान देने वाली अनेक अन्य विद्यायें उचित प्रचार न पाने तथा छिपाकर रखने की प्रवृति के कारण लुप्त हांकर रह गई या कह सकते हैं, वह स्थान न पा सकी जैसा इन तीन विद्याओं ने प्राप्त किया। भारत में इन में से एक विद्या ‘जन्मकुण्डली द्वारा फलादेश’ पर महर्षि पराशर, का योगदान सर्वाधिक उल्लेखनीय था, इसके उपरांत विक्रमादित्य के शासनकाल में महर्षि वराहमिहिर ने इसमें बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, इस के अतिरिक्त भी बहुत से विद्वानों ने अपना-अपना योगदान समय-समय पर दिया है। वराहमिहिर ने केवल कुण्डली विज्ञान पर ही नहीं अपितु अंक ज्योतिष तथा सामुद्रिक विज्ञान पर भी अनेक ग्रंन्थों की रचना की है। युरोप के विद्वान कीरो, पैथागोरस, स्फेरियल, हिब्रयू ने अंक ज्योतिष तथा सामुद्रिक शास्त्र के एक भाग ‘हस्तरेखा विज्ञान’ पर तो बहुत परिश्रम किया और प्रसिद्धि भी पाई अनेक अंग्रेजी के ग्रन्थ भी लिखे परंतु जन्मकुण्डली विज्ञान के रहस्यों को अधिक नहीं समझ पाये। कहा जाता है पैथागोरस और कीरो भविष्य ज्ञान की विद्याओं की शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से कई वर्ष तक भारत में भारतीय विद्वानों के साथ रहे थे और अनेक विद्यायें यहां से सीखकर गये थे। यह सच है की कीरो ने अंकविद्या ‘अंक ज्योतिष’ पर बहुत सूक्षम अध्ययन किया और इसी लिये अपने क्षेत्र (देश) में बहुत प्रसिद्धि भी पाई थी। यहां तक की इस विद्या के जनक ‘सामुद्र ऋषि’ को बहुत अधिक विद्वान नहीं जानते परंतु कीरो का नाम सभी की जुबान पर रहा है। विद्वान चाहे भारतीय हो या विदेशी सम्मान पाने का अधिकारी तो बराबर है। यहां आपका ध्यान अब Shukracharya संस्थान द्वारा कडे परिश्रम द्वारा बनाया गया Keero Gold की ओर ले जाना चाहता हूं। कीरो गोल्ड एक साॅफ्टवेयर है, जो शुद्ध अंक ज्योतिष पर आधारित है।

कीरो गोल्ड की विशेषतायें-
सर्व प्रथम कीरो-06 नाम से अंक शास्त्र का साॅफ्टवेयर तैयार किया गया था, जो कि वर्तमान कीरो गोल्ड का आधार है। जिसको Keero Gold प्रोफेशनल संस्करण के नाम से जाना जाने लगा। जिसमें व्यक्ति अपनी अंक ज्योतिष से संबंधित अधिकतम आवश्यकताओं को देख व प्रिंट कर सकता है। आप इसके नाम से ही समझ सकते हैं, इस संस्करण का उदेश्य है अंक ज्योतिष द्वारा अंक जन्मपत्री छापकर व विस्तृत फलादेश व गणना देखकर व्यापारिक दृष्टि से प्रयोग करना। किसी भी एडवांस चीज की आवश्यकता तब तक महसूस नहीं होती जब तक कि उसके द्वारा प्राप्त होने वाली सारी सुविधाओं का पता न चले। यह ठीक उसी प्रकार है, जैसे काम तो तब भी चल जाया करता था जब संचार माध्यम सीमित थे, केवल डाक द्वारा पत्र भेजे और पढ़े जाते थे, परंतु आज के आधुनिक समय में ई-मेल, एस. एम. एस. आदि द्वारा संदेश भेजे व प्राप्त किये जाते हैं। आज इन आधुनिक चीजों के बिना जीवन यापन संभव नही लगता है।

कीरो गोल्ड की विशेषतायें :-
यह संस्करण हिन्दी और अंग्रेजी दो भाषाओं में उपलब्ध है। यह संस्करण मुख्यतः पाँच भागों में संगठित है।
1. प्रश्न खण्ड
2. अंक कुण्डली खण्ड
3. मिलापक खण्ड
4. राम शलाका
5. बायोरिद्म

1. प्रश्न खण्ड :-
प्रश्न खण्ड में ‘प्रश्न अंक ज्योतिष’ की पद्धतियों के द्वारा गणना और उसके के फल (उत्तर) उपलब्ध हैं। जैसे कभी-कभी जतक के मन में ऐसे प्रश्न होते हैं, जिनका उत्तर एक शब्द में ही होता है (हाँ, ना, शुभ, सम, अशुभ आदि) इसमें इस प्रकार के प्रश्नों के उत्तर देने वाली विशेषतायें उपलब्ध हैं।

इसमें 7 विभाग हैं-

पहला- नाम सुधारक :-
इस विभाग में आप अपने नाम की त्रुटियां सुधार कर, इसे अपने भाग्यांक के अनुकूल बना सकते हैं, जिससे आपका नाम आपके लिये भाग्य वृद्धि करने वाला हो जायेगा। इनमें से कुछ स्पेलिंग प्रयोग करने योग्य नहीं होते, इस लिये इस के उत्तर में एक से अधिक उत्तर मिलेंगे, यह उत्तर 100 प्रतीशत या 50 प्रतीशत के पैमाने में अनुकूलता के रूप में मिलेंगे।

दूसरा- व्यक्तिगत शुभ घंटे :-
यह होरा शास्त्र पर आधारित गणना आपको किसी भी दिन के शुभ घंटों का ज्ञान देगी, जो की आपके लिये शुभ घंटे होंगे। इन शुभ घंटों में आप अपना कोई भी शुभ कार्य आरम्भ कर सकते है।

तीसरा- ग्राफ :-
इस सुविधा में आप अपने भाग्य स्तर और ऊर्जा स्तर तथा समय (दिन) के बीच बनता हुआ ग्राफ देख सकते हैं, जिससे आपको प्रतिदिन के लिये दिनचर्या बनाने में मदद मिलेगी। भाग्य ग्राफ में आप अपने भाग्य के स्तर का अवलोकन दिन, महीने, वर्ष के रूप में कर सकते हैं। ऊर्जा ग्राफ में आप अपने भाग्य के स्तर का अवलोकन दिन, महीने, वर्ष के रूप में कर सकते हैं। यह सभी गणनायें आपके वर्षांक, मासांक और दैनिकांक पर आधारित होगी।

चौथा- अंक गोचर :-
इस सुविधा में आप अपना वर्तमान, व्यक्तिगत अंक गोचर घडी के आकार में मनचाही गति से देख सकते हैं। साथ में निर्देशरूप में शुभाशुभ समय की जानकारी दी गई है। यह जानकारी आपको अति-उत्तम, उत्तम, मध्यम, कठिन तथा अशुभादि के रूप में मिलेगी। यह गणना व्यक्तिगत वर्षांक, मासांक और दिनांक के पारवहन चक्र पर आधारित है।

पाँचवा- प्रवासी आगमन :-
इस सुविधा में प्रवासी के विषय में जानकारी मिलेगी। जैसे प्रवासी सुरक्षित है या नहीं, किस दिशा में, कम, मध्यम या अधिक दूरी पर है, अथवा वह कितने समय में लौटेगा इत्यादि।

छटा- खोई पाई वस्तु ज्ञान :-
कभी-कभी घर की कोई वस्तु खो जाती है, उस स्थिति में वस्तु की प्राप्ति या ना प्राप्ति की जानकारी मिलती है। यदि मिलेगी तो कैसी अवस्था में, किस ओर मिलेगी।

सातवां- नाम, फोन या वाहन नम्बर जांचना :-
इसमें आपके भाग्यांक के अनुसार आपके लिये आपके फोन, घर, कार्यस्थान या वाहन का नम्बर जांचने की सुविधा शुभ (भाग्यशाली) प्रतीशत में मिलेगी।

2. अंक कुंडली खण्ड :

इस खण्ड में अंक कुंडली के सभी प्रकार का विस्तृत फलादेश रिपोर्ट के रूप में प्रिंटाऊट लेने की सुविधा है। सभी रिपोर्ट के प्रिंटाऊट हिन्दी व अंग्रेजी दोनो भाषाओं में लिये जा सकते हैं।

इसमें 9 विभाग हैं-
पहला- विभाग मूलांक विचार :-
इस अंक पत्रिका में जातक के मूलांक पर आधारित वितृत फलादेश किया गया है। इस के साथ-साथ जातक के भयांक, नामांक, शुभांक, शुभ दिन, शुभ तारीख, शुभ वार, शुभ माह, शुभ वर्ष, अंकों द्वारा स्वास्थ्य, अंकों द्वारा आजीविका के साधन, मित्रांक, शत्रु अंक, महत्वपूर्ण वर्ष, शुभ रंग, शुभ यंत्र, शुभ व्रत आदि का विस्तृत विवरण फलादेश सहित उपलब्ध है। सामान्यतः 8 से 10 पृष्ठ का प्रिंटाऊट इसमें मिलता है।

दूसरा- विभाग अंक कुण्डली :-
इस कुण्डली में जातक की अंक कुण्डली पर आधारित फलित कथन किया गया है। इसके साथ जातक की अंक दशाओं का भी विवरण आरम्भ और समाप्तिकाल सहित हैै। इस कुंडली में जातक की अंक कुंडली में बनने वाले विभिन्न अंक योगों का भी विस्तृत फलादेश है।

तीसरा- विभाग नाम कुण्डली :-
इस कुंडली में जातक के अंग्रेजी नामाक्षरों की विस्तृत फलकथन की सुविधा उपलब्ध है।

चौथा- विभाग वार्षिक फलादेश :-
इस कुण्डली में जातक के 9-10 वर्षो का सामान्य फलादेश किया गया है। यह कुंडली जातक के वर्षांक पर आधारित बनाई जाती है।

पाँचवा- विभाग मासिक फलादेश :-
इस कुण्डली में जातक के 12 महीने का सामान्य फलादेश किया गया है। यह कुण्डली जातक के व्यक्तिगत मासांक पर आधारित बनाई जाती है।

छटा- विभाग दैनिक फलादेश :-
इस कुण्डली में जातक का दैनिक सामान्य फलादेश किया गया है। यह कुण्डली जातक के व्यक्तिगत दैनिक फल पर आधारित बनाई जाती है।

सातवां- विभाग वार्षिक व मासिक फलादेश :-
इस कुण्डली में जातक के वर्ष तथा मास का संयुक्त सामान्य फलादेश किया गया है। यह कुण्डली जातक के वर्षांक व मासंक पर आधारित है।

आठवां- विभाग मासिक फलादेश व दैनिक फलादेश :-
इस कुण्डली में जातक के मासिक तथा दैनिक संयुक्त सामान्य फलादेश किया गया है। यह कुण्डली जातक के मासांक व दैनिक अंक पर आधारित है।

नौवां- विभाग लोशु चक्र (चायनीज अंक शास्त्र) फलादेश :-
इस रिपोर्ट में जातक के लिये लोशु चक्र द्वारा फल कथन किया गया है। डेस्टिनेशन नम्बर का भी विस्तृत फलादेश है। इस के साथ दिनांक का फल सशक्त प्लेन और बनने वाले ऐरो का विस्तृत फलादेश है। व्यक्तिगत लोशु वर्षांक, एवं व्यक्तिगल लोशु मासांक का भी फलादेश है।

3. मेलापक खण्ड :-
इस खण्ड में अंक शास्त्र के आधार पर किन्ही दो व्यक्तियों का मेलापक फल दिया गया है। यह फलादेश प्रतिशत में दिया गया है। इसकी गणना का आधार मूलांक, भाग्यांक और नामांक है, यह इनकी परस्पर अनुकूलता पर आधारित है।

4. राम शलाका :
जीवन में अनेक अवसर ऐसे आते हैं, जब किसी प्रश्न के उत्तर को लेकर दुविधा की स्थिति हो, और आप प्रभु श्रीराम के संकेतात्मक उत्तर चाहते हों, या आप कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेने जा रहे हैं, तथा यह तय नहीं कर पा रहे कि क्या किया जाये, क्या नहीं किया जाये? ऐसी स्थिति में अपनी दुविधा भगवान राम को सौंप दीजिये। समझ लीजिये आपका यह उत्तर तो भगवान के द्वार से आ गया। क्या करें और क्या नहीं करें? ऐसी भटकाव वाली स्थिति से उबरने के लिये ही तुलसीदास जी ने इस शलाका की रचना की है। आप मान सकते हैं कि श्री राम शलाका प्रश्नावली के रूप में एक मूल्यवान चाबी हमें हमारी ऋषि परम्परा से प्राप्त हुई है, इसकी उपयोग विधि बिलकुल सरल है-

श्री राम शलाका एक ऐसी प्रश्नावली है, जो गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित ‘श्री राम चरित मानस’ पर आधारित है। इस प्रश्नावली का प्रयोग कर आप जीवन के कई उपयोगी तथा महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रश्नावली का प्रयोग करना बेहद सरल है। सबसे पहले अपने नेत्र बंद करके भगवान श्री राम का स्मरण करते हुये अपने प्रश्न को अपने मन में अच्छी तरह विचार लें। इसके बाद इस में दिये गये किसी भी एक अक्षर पर अपने नेत्र बंद किये हुये ही क्लिक करें। आपके द्वारा क्लिक किये हुये अक्षर से प्रत्येक 9वें नम्बर के अक्षर को जोड़कर एक चैपाई बनेगी, जो की आपके प्रश्न का उत्तर होगी।

5. बायोरिद्म ग्राफ :-
बायोरिद्म ग्राफ बायोरिद्म सिद्धांत पर आधारित है, इस में जिस समय गणना की जा रही है, उस दिन से 30 दिन पूर्व तथा 30 दिन आगे तक का यह ग्राफ अंकित हो जाता है। इस के अलावा आप इस ग्राफ को कम्प्यूटर स्क्रीन पर भी देख सकते हैं। इमेज के रूप में सहेज सकते हैं, प्रिटर से प्रिट कर सकते हैं। इस में तीत रेखायें दिखई गई हैं, प्रथम रेखा जातक की शारीरिक स्थिति को ग्राफ के रूप में दर्शाती है, इसी प्रकार दूसरी रेखा मन की स्थिति को ग्राफ के रूप में दिखाती है, तथा तीसरी रेखा बौद्धिक स्तर को ग्राफ के रूप में दर्शाने वाली रेखा है।

अन्य विशेषतायें-
1. यह साॅफ्टवेयर windows Pc और Laptop पर compatible है। window XP/7/8/10 आॅपरेटिंग सिस्टम के लिये तैय्यार किया गया है।

2. यह (Numerology Software) अंक ज्योतिष पर आधारित साॅफ्टवेयर Singale user licence पर आधारित है।

3. इस Numerology Software में वैदिक सूर्यांक, वैदिक चंद्रांक, कीरो, सिफेरियल, हिब्रयु, पाईथागोरस द्वारा दी गई अंक-शास्त्र पद्धतियाँ सम्मिलित हैं।

4. यह Numerology Software हिन्दी व अंग्रेजी दोनो भाषाओं में उपलब्ध है।

5. यह Keero Gold साॅफ्टवेयर विख्यात अंक-शास्त्रीयों द्वारा सत्यापित व परिक्षित है।

6. यह साॅफ्टवेयर (Numerology Software) अंक-शास्त्र की विविध पद्धतियों पर आधारित अंकशास्त्र का विस्तृत व विशालतम संस्करण है।

7. A-4 Size में अनेक प्रिंटर्स से प्रिंटिग की व्यवस्था है।
8. MS word में html में Export कर E-Mail भेजने की सुविधा इस साॅफ्टवेयर में है।

9. सभी विद्वान अपने लिये अपने तरीके से या अपने अनुकूल साॅफ्टवेयर बनवाने के लिये भी सम्पर्क कर सकते हैं।

10. प्रिंट की जाने वाली सभी रिर्पोट में सम्पर्क स्थान पर, प्रयोग कर्ता अपना नाम डाल सकता है, यह सुविधा साॅफ्टवेयर में User management के रूप में उपलब्ध है।

11. Numerology पर आधारित इस Keero Gold साॅफ्टवेयर में जातक के जन्म विवरण को Save करने की सुविधा और भविष्य में किसी भी समय उस विवरण को प्रयोग में लाने की सुविधा भी उपलब्ध है।

Numerology पर आधारित सॉफ्टवेयर का मूल्य 6000/- Rs. है। विशेष छूट के साथ यह सॉफ्टवेयर अभी केवल 4500/- में उपलब्ध है।

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गुरूजी के टोटके (पुस्तक)

Dr.R.B.Dhawan

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किसी भी पर्वकाल होली/दिवाली/ग्रहण में करें धन प्राप्ति के यह टोटके : –

(1) सोमवार को शिव-मंदिर में जाकर दूध मिश्रित जल शिवलिंग पर चढ़ाएं तथा रूद्राक्ष की माला से ‘ऊँ सोमेश्वराय नम:’ का 108 बार जप करें। साथ ही पूर्णिमा को जल में दूध मिला कर चन्द्रमा को अर्ध्य देकर व्यवसाय में उन्नति की प्रार्थना करें, तुरन्त ही असर दिखाई देगा।

(2) यदि बहुत प्रयासों के बाद भी घर में पैसा नहीं रूकता है, तो एक छोटा सा उपाय करें। सोमवार या शनिवार को थोड़े से गेहूं में 11 पत्ते तुलसी तथा 2 दाने केसर के डाल कर पिसवा लें। बाद में इस आटे को पूरे आटे में मिला लें। घर में बरकत रहेगी और लक्ष्मी दिन दूना रात चौगुना बढऩे लगेगी।

(3) घर में लक्ष्मी के स्थाई वास के लिए एक लोहे के बर्तन में जल, चीनी, दूध व घी मिला लें। इसे पीपल के पेड़ की छाया के नीचे खड़े होकर पीपल की जड़ में डाले। इससे घर में लक्ष्मी का स्थाई वास होता है।

(4) घर में सुख-समृद्धि लाने के लिए एक मिट्टी के सुंदर से बर्तन में कुछ सोने-चांदी के सिक्के लाल कपड़े में बांधकर रखें। इसके बाद बर्तन को गेहूं या चावल के भर कर घर के वायव्य (उत्तर-पश्चिम) कोने में रख दें। ऐसा करने से घर में धन का कभी कोई अभाव नहीं रहेगा।

“गुरुजी के टोटके” पुस्तक से (गुरु जी द्वारा लिखित इस पुस्तक में लगभग 1500 totke हैं)। यह पुस्तक shukracharya karyalaya से अथवा shukracharya.com पर आर्डर करके मंगवा सकते हैं।

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