विषयोग

विष योग :-

Dr. R.B.Dhawan :-

ज्योतिषीय मतानुसार जन्म कुंडली में शनि और चंद्रमा का योग जातक के लिए कष्टकारी माना गया है। सिद्धांत यह है कि, शनिदेव अपनी धीमी गति के लिये जाने जाते हैं, और चन्द्रमा अपनी तीव्र गति के लिये, अर्थात शनि अधिक क्षमताशील होने के कारण अक्सर चंद्रमा को प्रताड़ित करते हैं। यदि चंद्र और शनि की युति कुंडली के किसी भी भाव में हो, तो ऐसी कुंडली में उनकी आपस में दशा-अंतर्दशा के दौरान विकट फल मिलने की संभावना होती है। (कुंडली में चंद्राराशि के अनुसार आप का प्रतिदिन ग्रह फल बदलता रहता है, इस ग्रह फल को जानने के लिये आप मेरी daily horoscope prediction app डाउनलोड कर सकते हैं। इससे आप प्रतिदिन अपना चंन्द्र राशि फल जान सकेंगे। Daily horoscope prediction app आपको गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध होगी।)
शनि:-  धीमी गति, लंगड़ापन, शूद्रत्व, सेवक, चाकरी, पुराने घर, खपरैल, बंधन, कारावास, आयु, जीर्ण-शीर्ण अवस्था आदि का कारक ग्रह है।

जबकि चंद्रमा:- मन की चंचलता, माता, स्त्री का सहयोग, तरल पदार्थ, सुख, कोमलता, मोती, दिल से स्नेह सम्मान, आदि का कारक है।

इन दोनो की अपनी-अपनी गति और अपनी-अपनी प्रकृति है, जो कि एक-दूसरे से विपरीत है, उदाहरणार्थ एक साथ रहने वाले दो प्राणी हैं, उन्होंने मिलकर एक कार्य करना है, तो एक सामान्य से जल्दी करेगा ओर दूसरा सामान्य से भी धीरे करेगा। अब दोनों में इसी बात का झगडा हमेशा रहेगा। शनि और चंद्र की युति से बनने वाले योग को विषयोग के नाम से जाना जाता है। यह कुंडली का एक अशुभ योग है। ये विषयोग जातक के जीवन में यथा नाम विषाक्तता घोलने में पूर्ण सक्षम है। जिस भी जातक की कुण्डली में विषयोग का निर्माण होता है, उसे जीवन भर अशक्तता, मानसिक व्याधियां, भ्रम, रोग, बिगड़े दाम्पत्य सुख, आदि का सामना करना पड़ता है। हां, जिस भी भाव में ऐसा विषयोग निर्मित हो रहा हो, उस भाव के अनुसार ही अशुभ फल की प्राप्ति होती है।   
जैसे यदि किसी जातक के लग्न चक्र में शनि-चंद्र की युति हो तो ऐसा जातक शारीरिक तौर पर बेहद अक्षम महसूस करता है। उसे जीवन के कुछ भाग में कंगाली और दरिद्रता का सामना करना पड़ सकता है। 

लग्न में:- शनि-चंद्र की युति हो जाने से उसका प्रभाव सप्तम भाव पर बेहद नकारात्मक होता है, जिससे जातक का दाम्पत्य जीवन बेहद बुरा बीतता है। लग्न शरीर का प्रतिनिधि है, इसलिए इस पर चंद्र और शनि की युति बेहद नकारात्मक असर छोड़ती है। जातक जीवन भर रोग-व्याधि से पीड़ित रहता है।
द्वितीय भाव में:- शनि-चंद्र की युुति बने तो जातक जीवन भर धनाभाव से ग्रसित होता है। 
तृतीय भाव में:- यह युति जातक के पराक्रम को कम कर देती है। 
चतुर्थ भाव में:- सुख और मातृ सुख की न्यूनता तथा ।
पंचम भाव में:- संतान व विवेक का नाश होता है। 
छठे भाव में:- ऐसी युति शत्रु-रोग-ऋण में बढ़ोत्तरी।
सप्तम भाव में:- शनि-चंद्र की युति संयोग पति-पत्नी के बीच सामंजस्य को खत्म करता है। 
अष्टम भाव में:- आयु नाश।
नवम भाव में:- भाग्य हीन बनाता है।
दशम भाव में:- शनि-चंद्र की युति पिता से वैमनस्य व पद-प्रतिष्ठा में कमी करती है।
ग्यारहवें भाव में:- एक्सिडेंट की संभावना बढ़ाने के साथ लाभ में न्यूनता आती है।
बारहवें भाव में:- शनि-चंद्र की युति व्यय को आय से बहुत अधिक बढ़ाकर जातक का जीवन कष्टमय बना देने में सक्षम है।  

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि किसी ज्योतिषी से सलाह लेकर उचित उपाय किए जाये तो ‘विषयोग’ के दु:ष्प्रभाव को कम किया जा सकता है। आगे की पंक्तियों में कुछ सरल उपाय दिए जा रहे हैं, इनका प्रयोग अवश्य ही लाभदायक रहेगा।

1. शनैश्नीचरी अमावस की रात्रि में नीली स्याही से 10 पीपल के पत्तों पर शनि का जाप  करते हुए एक-एक अक्षर लिखें :- 1. ॐ, 2. शं, 3. श, 4. नै, 5. श (यह  अक्षर आधा), 6. च, 7. रा, 8. यै, 9. न, 10. मः इस प्रकार 10 पत्तो में 10 अक्षर लिख कर फिर इन पत्तो को काले धागे में माला का रूप देकर, शनि देव की प्रतिमा या शिला में चढ़ाये। तब  इस क्रिया को करते समय मन ही मन शनि मंत्र का जाप भी करते रहना चाहिए। 

2. पीपल के पेड़ के ठीक नीचे एक पानी वाला नारियल सिर से सात बार उतार कर फोड़ दें और नारियल को प्रसाद के रूप में बॉट दें।

3. शनिवार के दिन या शनि अमावस्या के दिन संध्या काल सूर्यास्त के पश्चात् श्री शनिदेव की प्रतिमा पर या शिला पर तेल चढ़ाए, एक दीपक तिल के तेल का जलाए दीपक में थोड़ा काला तिल एवं थोड़ा काला उड़द डाल दें। इसके पश्चात् 10 आक के पत्ते लें, और काजल में थोड़ा तिल का तेल मिला कर स्याही बना लें, और लोहे की कील के माध्यम से प्रत्येक पत्ते में नीचे लिखे मंत्र को लिखे। यह पत्ते जल में प्रवाहित कर दें।

4. प्रतिदिन रूद्राक्ष की माला से कम से कम पाँच  माला महामृत्युन्जय मंत्र का जाप करें। इस क्रिया को शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार से आरम्भ करें।

5. माता एवं पिता या अपने से उम्र में जो अधिक हो अर्थात पिता माता समान हो उनका चरण छूकर आर्षीवाद ले।

6.  सुन्दर कांड का 40 पाठ करें। किसी हनुमान जी के मंदिर में या पूजा स्थान में शुद्ध घी का दीपक जलाकर पाठ करें, पाठ प्रारम्भ करने के पूर्व अपने गुरू एवं श्री हनुमान जी का आवाहन अवश्य करें।

7. श्री हनुमान जी को शुद्ध घी एवं सिन्दूर का चोला चढ़ाये श्री हनुमान जी के दाहिने पैर का सिन्दूर अपने माथे में लगाए।

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पंचमहापुरुष योग

Dr.R.B.Dhawan

जन्मकुंडली में बनने वाले हजारों योगों में से पंच महापुरुष योग ऐसे योग हैं, जो अपना शुभ फल अवश्य देते हैं, बेशक इन योगों को बनाने वाले ग्रह अस्ट ही क्यों ना हों, या नीच राशि में ही क्यों ना हों। और यह पांच योग अपना न्यूनाधिक फल जीवन भर देते रहते हैं।

1. रूचक योग-

मंगल यदि कुंडली के केंद्र में होकर अपनी ही राशि, अथवा अपनी उच्च राशि का हो तो “रूचक योग” होता है । रूचक योग होने पर जातक बलवान, साहसी, तेजस्वी, उच्च स्तरीय वाहन रखने वाला होता है । इस योग में जन्मा जातक विशेष पद प्राप्त करता है |

2. भद्र योग-

बुद्ध ग्रह कुंडली के केंद्र में स्वगृही अथवा उच्च राशि का हो तो “भद्र योग” होता है । इस योग  में जन्मा जातक उच्च व्यवसाई होता है ।अपने प्रबंधन, कौशल, बुद्धि-विवेक का उपयोग कर व्यवसाय द्वारा धनोपार्जन करता है । ऐसे जातक के जीवन में बुध कि दशा आ जाय तो ऐसा जातक मिट्टी में भी हाथ डालेगा तो वे सोना बन जाएगी । अनेक मार्गों से अर्थोपार्जन करेगा, तथा व्यवसायिक जगत में शिखर पुरुष होता है। यह योग सप्तम भाव में हो तो जाना माना उद्योगपति बन जाता है ।

3. हंस योग-

कुंडली में यदि बृहस्पति किसी केंद्र मैं होकर स्वगृही अथवा उच्च राशि  का हो तब “हंस योग” होता है, यह जातक मानवीय गुणों से ओत-प्रोत, गौर वर्ण, सुन्दर, हसमुख, मिलनसार, विनम्र होने के साथ, अपार धन-सम्पत्तिवान होता है । पुण्य कर्मों में रुचि रखने वाला, दयालु, कृपालु, शास्त्र का ज्ञान रखने वाला होता है ।

4. मालव्य योग-

कुंडली के केंद्र में शुक्र ग्रह यदि स्वगृही उच्च राशि का होकर विराजमान हो तो “मालव्य योग” बनता है | इस योग के जातक सुन्दर, गुणी, तेजस्वी, धैर्यवान, धनी तथा जीवन भर सुख-सुविधा युक्त रहते हैं |

5. शश योग-

शनि ग्रह यदि किसी की कुंडली में स्वराशिस्थ अथवा उच्च राशिस्थ केंद्र भाव में स्थिति हो “शश योग” होता है। यह योग सप्तम भाव या दशम भाव में होता है तो, व्यक्ति विपुल धन-संपत्ति का स्वामी होता है ।व्यवसाय और नौकरी कि कला के क्षेत्र में ख्याति प्राप्त करता है । यह समुदाय का मुखिया जैसे उच्च पद को प्राप्त करता है ।

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दीपावली तंत्र-मंत्र विशेषांक

संपादक  :- Dr. R.B.Dhawan

“आप का भविष्य” मासिक ज्योतिषीय ई-पत्रिका अक्तूबर 2017 अंक :-  “दीपावली तंत्र-मंत्र विशेषांक” Deepawali tantra mantra viseshank जिसमें आप पाएंगे दीपावली पर सिद्ध किए जाने वाले आर्थिक समृद्धि तथा जीवनोपयोगी अनेक सरल प्रयोग।

इस अंक की विशेष बात यह है कि, ज्योतिष विज्ञान व तंत्र विज्ञान में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह कहना ठीक होगा कि, वे पूरा वर्ष दीपावली पर प्रकाशित होने वाले इस अंक की बेसब्री से प्रतीक्षा करते हैं। इस अक्तूबर आप ई-पत्रिका “आप का भविष्य” Diawali tantra mantra की Subscription ले ही लीजिए, बेशक आप अक्तूबर 2017 अंक से सितम्बर 2018 अंक तक की Subscription ले सकते हैं। Deepawali Tantra Mantra viseshank अक्तूबर अंक केवल तंत्र मंत्र विशेषांक ही नहीं अपितु आप के लिये बहुत उपयोगी भी है। इस अंक में गुरूजी ने आप के लिये अनेक सरल प्रयोग एवं उपाय प्रकाशित किए हैं, जिनमें से एक प्रयोग (सरल उपाय) आपने सिद्ध कर लिया तो आप इस विद्या की प्रशंसा करते नहीं थकेंगे।

तंत्र-मंत्र से संबंधित अनेक कार्य एेसे होते हैं, जो पर्वकाल में ही सिद्ध हो सकते हैं, कुछ समस्याएं होती ही एेसी हैं, जिनकी चर्चा किसी से भी नहीं कर सकते। परंतु उनका जल्दी ही समाधान न किया जाए तो वे और भी जटिल होती चली जाती हैं। आज का युग तड़क-भड़क और दिखावे का युग बनकर रह गया है, इसके प्रभाव वश अनेक युवक किसी सुन्दर युवती को देखकर मचलने लगते हैं, आजकल के हालात को देखकर तो लगता है, कुछ युवतियों का लक्ष्य दूसरी महिला मित्र के पति पर डोरे डालने का ही हो गया है। इस समस्या से पीड़ित अनेक महिलाएं तो किसी को बताना भी ठीक नहीं समझती, और यह ठीक भी है, बताकर भला अपने पति की इज्जत क्यों खराब की जाये?

इसी प्रकार कुछ ईष्यालु लोग व्यापार करने वाले अपने दूसरे प्रतिद्वंद्वी पर कोई एेसा तंत्र कर देते हैं, जिसके प्रभाव से प्रतिद्वंद्वी का व्यापार ठप हो जाता है, नौकरी करने वालों को भी कभी-कभी एेसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

गुरूजी का कहना है, एेसी समस्याओं का समाधान आप स्वयं कर सकते हैं। अक्तूबर 2017 “आप का भविष्य” diwali Tantra Mantra अंक इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए प्रकाशित किया गया है।

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दीपावली मुहूर्त 2017

Diwali muhurt 2017

Dr.R.B.Dhawan

कार्तिक मास kartik की अमावस्या amavasya की रात्रि प्रदोषकाल, स्थिर लग्न में अथवा  महानिशीथ काल, mahanishith kaal स्थिर लग्न में अनुकूल चौघडिया के समय गणेश सहित देवी महालक्ष्मी-महाकाली-महासरस्वती की पूजा-आराधना diwali Pooja करने से यह देवीयां भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करती हैं।

इस वर्ष दीपावली depawli pooja (Laxmi Pooja) का पर्व 19 अक्तूबर 2017 बृहस्पतिवार के दिन होगा। दिल्ली की समय गणना अनुसार इस दिन अमावस्या रात्रि 24:44 तक रहेगी, चित्रा नक्षत्र 07:28 से आरंभ होगा, वृष (स्थिर लग्न) 19:11 से 21:06 तक रहेगी। निशीथ काल nishith kaal 20:20 से 22:54 तक, प्रदोष काल pradosh kaal 17:46 से 20:20 तक रहेगा। दीपावली की शाम प्रदोष काल में स्नान के उपरांत वस्त्राभूषण धारण करके धर्मस्थल पर श्रद्धापूर्वक दीपदान करके शुभ मुहूर्त अनुकूल चौघडिया में अपने निवास स्थान पर श्री गणेश सहित देवी महालक्ष्मी महाकाली महासरस्वती और कुबेर की पूजा diwali pooja करनी चाहिए।

महालक्ष्मी mahalxmi Pooja पूजन विशेष मुहूर्त : (1). सायं 19 : 11 से 20 : 20 तक। (2). रात्रि 20 : 20 से 20 : 59 तक। यह दोनों मुहूर्त वृष लग्न के हैं।

विशेष Diwali muhurt 2017, मध्य रात्रि महानिशीथ काल सिंह लग्न : 25 : 39 से 25 : 48 तक है। 

हर पर्व का महत्व व मुहूर्त तथा अनेक ज्योतिषीय लेख पड़ने के लिए आप हमारी एप डाउनलोड करें, इसका वार्षिक (12 अंक के लिए) subscription केवल 180/- है। “आप का भविष्य” मासिक ज्योतिषीय ई-पत्रिका का लिंक दिया गया है, जिस से आप Aap ka Bhavishya एप डाउनलोड कर सकते हैं।

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शत्रु नाशक मंत्र

         Dr.R.BDhawan

​(श्री दुर्गा सप्तशति बीजमंत्रात्मक साधना) –

इस मंत्र की साधना से शत्रु की शत्रुता नष्ट हो जाती है। (शत्रु नहीं)

ॐ श्री गणेशाय नमः [११ बार]
ॐ ह्रों जुं सः सिद्ध गुरूवे नमः [११ बार]
ॐ दुर्गे दुर्गे रक्ष्णी ठः ठः स्वाहः [१३ बार]

[सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम..]

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल  ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।।

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दीनि। नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दीनि।।

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भसुरघातिनि। जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे।।

ऐंकारी सृष्टीरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका। क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोस्तुते।।

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी। विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि।।

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी। क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुंभ कुरू।।

हुं हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी। भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रै भवान्यै ते नमो नमः।।

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं। धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा।।

पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा। सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे।।

ॐ नमश्चण्डिका:। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
प्रथमचरित्र…

ॐ अस्य श्री प्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा रूषिः महाकाली देवता गायत्री छन्दः नन्दा शक्तिः रक्तदन्तिका बीजम् अग्निस्तत्त्वम् रूग्वेद स्वरूपम् श्रीमहाकाली प्रीत्यर्थे प्रथमचरित्र जपे विनियोगः।

(१) श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं प्रीं ह्रां ह्रीं सौं प्रें म्रें ल्ह्रीं म्लीं स्त्रीं क्रां स्ल्हीं क्रीं चां भें क्रीं वैं ह्रौं युं जुं हं शं रौं यं विं वैं चें ह्रीं क्रं सं कं श्रीं त्रों स्त्रां ज्यैं रौं द्रां द्रों ह्रां द्रूं शां म्रीं श्रौं जूं ल्ह्रूं श्रूं प्रीं रं वं व्रीं ब्लूं स्त्रौं ब्लां लूं सां रौं हसौं क्रूं शौं श्रौं वं त्रूं क्रौं क्लूं क्लीं श्रीं व्लूं ठां ठ्रीं स्त्रां स्लूं क्रैं च्रां फ्रां जीं लूं स्लूं नों स्त्रीं प्रूं स्त्रूं ज्रां वौं ओं श्रौं रीं रूं क्लीं दुं ह्रीं गूं लां ह्रां गं ऐं श्रौं जूं डें श्रौं छ्रां क्लीं

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
मध्यमचरित्र..

ॐ अस्य श्री मध्यमचरित्रस्य विष्णुर्रूषिः महालक्ष्मीर्देवता उष्णिक छन्दः शाकम्भरी शक्तिः दुर्गा बीजम् वायुस्तत्त्वम् यजुर्वेदः स्वरूपम् श्रीमहालक्ष्मी प्रीत्यर्थे मध्यमचरित्र जपे विनियोगः।

(२) श्रौं श्रीं ह्सूं हौं ह्रीं अं क्लीं चां मुं डां यैं विं च्चें ईं सौं व्रां त्रौं लूं वं ह्रां क्रीं सौं यं ऐं मूं सः हं सं सों शं हं ह्रौं म्लीं यूं त्रूं स्त्रीं आं प्रें शं ह्रां स्मूं ऊं गूं व्र्यूं ह्रूं भैं ह्रां क्रूं मूं ल्ह्रीं श्रां द्रूं द्व्रूं ह्सौं क्रां स्हौं म्लूं श्रीं गैं क्रूं त्रीं क्ष्फीं क्सीं फ्रों ह्रीं शां क्ष्म्रीं रों डुं

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(३) श्रौं क्लीं सां त्रों प्रूं ग्लौं क्रौं व्रीं स्लीं ह्रीं हौं श्रां ग्रीं क्रूं क्रीं यां द्लूं द्रूं क्षं ह्रीं क्रौं क्ष्म्ल्रीं वां श्रूं ग्लूं ल्रीं प्रें हूं ह्रौं दें नूं आं फ्रां प्रीं दं फ्रीं ह्रीं गूं श्रौं सां श्रीं जुं हं सं

।ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(४) श्रौं सौं दीं प्रें यां रूं भं सूं श्रां औं लूं डूं जूं धूं त्रें ल्हीं श्रीं ईं ह्रां ल्ह्रूं क्लूं क्रां लूं फ्रें क्रीं म्लूं घ्रें श्रौं ह्रौं व्रीं ह्रीं त्रौं हलौं गीं यूं ल्हीं ल्हूं श्रौं ओं अं म्हौं प्री

।ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
उत्तमचरित्र..

ॐ अस्य श्री उत्तरचरित्रस्य रुद्र रूषिः महासरस्वती देवता अनुष्टुप् छन्दः भीमा शक्तिः भ्रामरी बीजम सूर्यस्तत्त्वम सामवेदः स्वरूपम श्री महासरस्वती प्रीत्यर्थे उत्तरचरित्र जपे विनियोगः।

(५) श्रौं प्रीं ओं ह्रीं ल्रीं त्रों क्रीं ह्लौं ह्रीं श्रीं हूं क्लीं रौं स्त्रीं म्लीं प्लूं ह्सौं स्त्रीं ग्लूं व्रीं सौः लूं ल्लूं द्रां क्सां क्ष्म्रीं ग्लौं स्कं त्रूं स्क्लूं क्रौं च्छ्रीं म्लूं क्लूं शां ल्हीं स्त्रूं ल्लीं लीं सं लूं हस्त्रूं श्रूं जूं हस्ल्रीं स्कीं क्लां श्रूं हं ह्लीं क्स्त्रूं द्रौं क्लूं गां सं ल्स्त्रां फ्रीं स्लां ल्लूं फ्रें ओं स्म्लीं ह्रां ऊं ल्हूं हूं नं स्त्रां वं मं म्क्लीं शां लं भैं ल्लूं हौं ईं चें क्ल्रीं ल्ह्रीं क्ष्म्ल्रीं पूं श्रौं ह्रौं भ्रूं क्स्त्रीं आं क्रूं त्रूं डूं जां ल्ह्रूं फ्रौं क्रौं किं ग्लूं छ्रंक्लीं रं क्सैं स्हुं श्रौं श्रीं ओं लूं ल्हूं ल्लूं स्क्रीं स्स्त्रौं स्भ्रूं क्ष्मक्लीं व्रीं सीं भूं लां श्रौं स्हैं ह्रीं श्रीं फ्रें रूं च्छ्रूं ल्हूं कं द्रें श्रीं सां ह्रौं ऐं स्कीं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(६) श्रौं ओं त्रूं ह्रौं क्रौं श्रौं त्रीं क्लीं प्रीं ह्रीं ह्रौं श्रौं अरैं अरौं श्रीं क्रां हूं छ्रां क्ष्मक्ल्रीं ल्लुं सौः ह्लौं क्रूं सौं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(७) श्रौं कुं ल्हीं ह्रं मूं त्रौं ह्रौं ओं ह्सूं क्लूं क्रें नें लूं ह्स्लीं प्लूं शां स्लूं प्लीं प्रें अं औं म्ल्रीं श्रां सौं श्रौं प्रीं हस्व्रीं।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(८) श्रौं म्हल्रीं प्रूं एं क्रों ईं एं ल्रीं फ्रौं म्लूं नों हूं फ्रौं ग्लौं स्मौं सौं स्हों श्रीं ख्सें क्ष्म्लीं ल्सीं ह्रौं वीं लूं व्लीं त्स्त्रों ब्रूं श्क्लीं श्रूं ह्रीं शीं क्लीं फ्रूं क्लौं ह्रूं क्लूं तीं म्लूं हं स्लूं औं ल्हौं श्ल्रीं यां थ्लीं ल्हीं ग्लौं ह्रौं प्रां क्रीं क्लीं न्स्लुं हीं ह्लौं ह्रैं भ्रं सौं श्रीं प्सूं द्रौं स्स्त्रां ह्स्लीं स्ल्ल्रीं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।

(९) रौं क्लीं म्लौं श्रौं ग्लीं ह्रौं ह्सौं ईं ब्रूं श्रां लूं आं श्रीं क्रौं प्रूं क्लीं भ्रूं ह्रौं क्रीं म्लीं ग्लौं ह्सूं प्लीं ह्रौं ह्स्त्रां स्हौं ल्लूं क्स्लीं श्रीं स्तूं च्रें वीं क्ष्लूं श्लूं क्रूं क्रां स्क्ष्लीं भ्रूं ह्रौं क्रां फ्रूं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।

(१०) श्रौं ह्रीं ब्लूं ह्रीं म्लूं ह्रं ह्रीं ग्लीं श्रौं धूं हुं द्रौं श्रीं त्रों व्रूं फ्रें ह्रां जुं सौः स्लौं प्रें हस्वां प्रीं फ्रां क्रीं श्रीं क्रां सः क्लीं व्रें इं ज्स्हल्रीं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(११) श्रौं क्रूं श्रीं ल्लीं प्रें सौः स्हौं श्रूं क्लीं स्क्लीं प्रीं ग्लौं ह्स्ह्रीं स्तौं लीं म्लीं स्तूं ज्स्ह्रीं फ्रूं क्रूं ह्रौं ल्लूं क्ष्म्रीं श्रूं ईं जुं त्रैं द्रूं ह्रौं क्लीं सूं हौं श्व्रं ब्रूं स्फ्रूं ह्रीं लं ह्सौं सें ह्रीं ल्हीं विं प्लीं क्ष्म्क्लीं त्स्त्रां प्रं म्लीं स्त्रूं क्ष्मां स्तूं स्ह्रीं थ्प्रीं क्रौं श्रां म्लीं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(१२) ह्रीं ओं श्रीं ईं क्लीं क्रूं श्रूं प्रां स्क्रूं दिं फ्रें हं सः चें सूं प्रीं ब्लूं आं औं ह्रीं क्रीं द्रां श्रीं स्लीं क्लीं स्लूं ह्रीं व्लीं ओं त्त्रों श्रौं ऐं प्रें द्रूं क्लूं औं सूं चें ह्रूं प्लीं क्षीं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
(१३) श्रौं व्रीं ओं औं ह्रां श्रीं श्रां ओं प्लीं सौं ह्रीं क्रीं ल्लूं ह्रीं क्लीं प्लीं श्रीं ल्लीं श्रूं ह्रूं ह्रीं त्रूं ऊं सूं प्रीं श्रीं ह्लौं आं ओं ह्रीं ।

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।।
दुर्गा दुर्गर्तिशमनी दुर्गापद्विनिवारिणी ।

दुर्गमच्छेदिनी दुर्गसाधिनी दुर्गनाशिनी ।।

दुर्गनिहन्त्री दुर्गमापहा ।

दुर्गमग्यानदा दुर्गदैत्यलोकदवानला ।।

दुर्गमा दुर्गमालोका दुर्गमात्मस्वरूपिणी ।

दुर्गमार्गप्रदा दुर्गमविद्या दुर्गमाश्रिता ।।

दुर्गमग्यानसंस्थाना दुर्गमध्यानभासिनी ।

दुर्गमोहा दुर्गमगा दुर्गमार्थस्वरूपिणी ।।

दुर्गमासुरसंहन्त्री दुर्गमायुधधारिणी ।

दुर्गमाँगी दुर्गमता दुर्गम्या दुर्गमेश्वरी ।।

दुर्गभीमा दुर्गभामा दुर्गभा दुर्गदारिणी ।।

[३ बार]

ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ दुर्गार्पणमस्तु।।
नमः शिवाय् 
॥ चण्डिकाहृदयस्तोत्रम् ॥
अस्य श्री चण्डिका हृदय स्तोत्र महामन्त्रस्य ।

मार्क्कण्डेय ऋषिः, अनुष्टुप्च्छन्दः, श्री चण्डिका देवता ।

ह्रां बीजं, ह्रीं शक्तिः, ह्रूं कीलकं,

अस्य श्री चण्डिका प्रसाद सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।

ह्रां इत्यादि षडंग न्यासः ।
ध्यानं ।

सर्वमंगळ मांगल्ये शिवे सर्वार्त्थ साधिके ।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते ॥
ब्रह्मोवाच ।

अथातस्सं प्रवक्ष्यामि विस्तरेण यथातथं ।

चण्डिका हृदयं गुह्यं शृणुष्वैकाग्रमानसः । ।

ॐ ऐं ह्रीं क्ळीं, ह्रां, ह्रीं, ह्रूं जय जय चामुण्डे,

चण्डिके, त्रिदश, मणिमकुटकोटीर संघट्टित चरणारविन्दे,

गायत्री, सावित्री, सरस्वति, महाहिकृताभरणे, भैरवरूप

धारिणी, प्रकटित दंष्ट्रोग्रवदने,घोरे, घोराननेज्वल

ज्वलज्ज्वाला सहस्रपरिवृते, महाट्टहास बधरीकृत दिगन्तरे,

सर्वायुध परिपूर्ण्णे, कपालहस्ते, गजाजिनोत्तरीये,

भूतवेताळबृन्दपरिवृते, प्रकन्पित धराधरे, 

मधुकैटमहिषासुर, धूम्रलोचन चण्डमुण्डरक्तबीज 

शुंभनिशुंभादि दैत्यनिष्कण्ढके, काळरात्रि, 

महामाये, शिवे, नित्ये, इन्द्राग्नियमनिरृति वरुणवायु 

सोमेशान प्रधान शक्ति भूते, ब्रह्माविष्णु शिवस्तुते, 

त्रिभुवनाधाराधारे, वामे, ज्येष्ठे, रौद्र्यंबिके, 

ब्राह्मी, माहेश्वरि, कौमारि, वैष्णवी शंखिनी वाराहीन्द्राणी

चामुण्डा शिवदूति महाकाळि महालक्ष्मी, महासरस्वतीतिस्थिते, 

नादमध्यस्थिते, महोग्रविषोरगफणामणिघटित 

मकुटकटकादिरत्न महाज्वालामय पादबाहुदण्डोत्तमांगे, 

महामहिषोपरि गन्धर्व विद्याधराराधिते,

नवरत्ननिधिकोशे तत्त्वस्वरूपे वाक्पाणिपादपायूपस्थात्मिके,

शब्दस्पर्शरूपरसगन्धादि स्वरूपे,

त्वक्चक्षुः श्रोत्रजिह्वाघ्राणमहाबुद्धिस्थिते, 

ॐ ऐंकार ह्रीं कार क्ळीं कारहस्ते आं क्रों आग्नेयनयनपात्रे प्रवेशय, 

द्रां शोषय शोषय, द्रीं सुकुमारय सुकुमारय, 

श्रीं सर्वं प्रवेशय प्रवेशय, त्रैलोक्यवर वर्ण्णिनि 

समस्त चित्तं वशीकरु वशीकरु मम शत्रून्,

शीघ्रं मारय मारय, जाग्रत् स्वप्न सुषुप्त्य वस्थासु अस्मान् 

राजचोराग्निजल वात विषभूत-शत्रुमृत्यु-ज्वरादि स्फोटकादि 

नानारोगेभ्योः नानाभिचारेभ्यो नानापवादेभ्यः परकर्म मन्त्र 

तन्त्र यन्त्रौषध शल्यशून्य क्षुद्रेभ्यः सम्यङ्मां 

रक्ष रक्ष, ॐ ऐं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रः, 

स्फ्रां स्फ्रीं स्फ्रैं स्फ्रौं स्फ्रः – मम सर्व कार्याणि 

साधय साधय हुं फट् स्वाहा –

राज द्वारे श्मशाने वा विवादे शत्रु सङ्कटे ।

भूताग्नि चोर मद्ध्यस्थे मयि कार्याणि साधय ॥ स्वाहा ।

चण्डिका हृदयं गुह्यं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः ।

सर्व काम प्रदं पुंसां भुक्ति मुक्तिं प्रियच्चति ।

(देवी के नौ रूपों का एक स्वरूप दक्षिण भारतीय परम्परा में निम्न प्रकार से उपलब्ध होता है) –

प्रथमा वन -दुर्गेति द्वितीया शूलिनी माता।

तृतीया जातवेदा च चतुर्थी शान्तिरिष्यते।।

पंचमी शबरी चैव षष्ठी ज्वालेति गीयते।

सप्तमी लवणा चेति अष्टम्यां आसुरी माता।।

नवमी दीपदुर्गेति नव दुर्गा प्रकीर्तिता।।
महा नवार्ण मंत्र:- 

ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं महादुर्गे नवाक्षरी नवदुर्गे नवात्मिके नवचण्डी महामाये महामोहे महायोगनिद्रे जये मधुकैटभ विद्राविणी महिषासुर मर्दिनी धूम्रलोचन संहन्त्रि चण्डमुण्ड विनाशिनी रक्तबीजान्तके निशुम्भध्वंसिनी शुम्भदर्पघ्नि देवि अष्टादश बाहुके कपाल- खट्वांग शूल खड्ग खेटक धारिणी छिन्न मस्तक धारिणी रूधिर मांस भोजिनी समस्त भूत प्रेतादि योग ध्वंसिनी ब्रह्मेन्द्रादि स्तुते देवि मां रक्ष रक्ष मम शत्रून् नाशय नाशय ह्रीं फट् ह्रूं फट् ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।।

यह एक गोपनीय साधना विधान है, इस से अधिक विवरण प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। 

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वशीकरण

वस्तुत: वशीकरण vashikaran एक ऐसा शब्द है, जो रहस्यमय लगता है, शायद इसी लिए हर कोई इसका प्रयोग कर अपना कार्य सिद्ध करना चाहता है। आज के युग में अधिकांश लोग इसे बकवास मानते हैं।

पौराणिक काल में इस विद्या का मानव जीवन पर कितना प्रभाव रहा है ? या इसका भी कोई विज्ञान है ? यही जानने का प्रयास करते है : – वशीकरण vashikaran क्रिया का ये रहस्य समझने के लिए सबसे पहले अपने शारीरिक, अपने मन तथा अपने मस्तिष्क की कार्यपद्धति के रहस्य को समझना होगा, जिसके द्वारा हम सोचने और समझने की शक्ति रखते है, और हम कल्पना करने की क्षमता रखते है, अपने मन में शुभ या अशुभ विचार लाते हैं। तो ऐसी कौन सी शक्ति या क्रिया है, जिसके द्वारा हम लोगों के मन पर अपना प्रभाव डाल सकते हैं, अथवा ऐसी क्षमता प्राप्त करके दूसरों को वशीभूत vashibhut कर सकते हैं। आइए इस विज्ञान को समझें :- 

पहले तो ये जान लीजिए “वशीकरण” शब्द अधूरा है, पूर्ण शब्द “वशीभूत” है, वशीकरण vashikran शब्द तो वशीभूत vashibhut क्रिया के लिए के लिए प्रयोग होता है। किसी दूसरे मनुष्य या प्राणी को वशीभूत करने के लिए पंचभूत सिद्धांत को समझना होगा, क्योंकि मनुष्य शरीर पांच भूतों से बना है, 1. पृथ्वी 2. अग्नि 3. वायु  4. जल और 5. आकाश, ये सभी पंचभूत हैं। ये सभी परस्पर बलवान हैं, इनमें सबसे बलवान आकाश भूत है, आकाश अर्थात आत्मा (आत्मा का निवास मस्तिष्क भाग में है)। वशीभूत vashikrat होने के पश्चात वशीभूत vashibhut होने वाले मनुष्य या प्राणी के मस्तिष्क पर वशीभूत करने वाले मनुष्य का आकाश भूत अपना अधिकार कर लेता है, और वे वशीभूत vashikrat करने वाले की किसी निश्चित समय के लिए संबंधित (केवल प्रयोजन से संबंधित) आज्ञा का पालन करने लगता है, अर्थात यह अधिकार वशीकृत करने वाले को पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं होता, अपितु जिस स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए वशीकृत किया जाता है, केवल उसी विशेष प्रयोजन के लिए जितना भाग (आकाश तत्व का भाग) ही वशीकृत होता है। किसी विशेष प्रयोजन, कर्म या क्रिया के लिए,और किसी निश्चित अवधि के लिए ही किसी को वशीकृत किया जा सकता है। पूरी तरह इस विज्ञान को (इस पद्धति को) बिना समझे हम वशीकरण vashikaran की क्रिया को नहीं समझ सकते है, ना ही इस क्रिया को सफल बना सकते है।

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ज्योतिष शास्त्र

ज्योतिष शास्त्र हमें कर्मशील बनने में विरोधी नहीं है, अपितु ये प्रारब्ध को कर्म का ही परिणाम मानता है। और जन्म के ग्रहों के आधार पर समय-समय पर मिलने वाले अवसरों का ज्ञान करवाकर भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए सार्थक कर्म करने की सलाह देता है। अतः भविष्य को सुधारना है तो, वर्तमान को सुधारो, अच्छे कर्म करो। संसार में आए हो तो निस्वार्थ भाव से सबकी सेवा करो, क्योंकि तुम अपने कर्मो के भोक्ता स्वयं हो, स्वयं को उसका जिम्मेदार या करता मानो। सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि और राहु-केतु तो केवल तुम्हारे द्वारा किए गए कर्मफल की सूचना देते हैं।

अपने द्वारा किए हुए अच्छे या बुरे कर्म जब परिपक्व हो जाते हैं (फल प्राप्त होने का समय जब आ जाता है) तो ग्रह-नक्षत्र निमित बनकर फलीभूत होने लगते हैं। इसी लिए जीवन में सुख-शांति प्राप्त करने और भविष्य सुधारने के लिए ज्योतिष शास्त्र की सहायता लेनी ही चाहिए।

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​रक्षाबंधन 2017, शुभ मुहूर्त:-

दिनांक 07-08-2017 को चन्द्रग्रहण और रक्षाबंधन दोनों हैं, तथा भद्रा सुबह 11:06 तक है। ग्रहण का सूतक दोपहर 01:44 पर लगेगा तथा शुद्ध रात्रि को 12:43 पर होगा । इसलिए रक्षाबंधन का कार्य 11:07 से 01:43 के बीच करना अति शुभ रहेगा ।

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मंगल ग्रह

By experience astrologer in Delhi :- मंगल mangal एक अत्यधिक ऊर्जा (अग्नि) प्रधान ग्रह है, मनुष्य शरीर पर जब इसका अधिक प्रभाव होता है, तो यह उसे बलशाली बना देता है। मनुष्य के मस्तिष्क पर जब इसका प्रभाव होता है, तो उसे ये क्रूर वा अत्यंत बलशाली और शीघ्र गति से कार्य करने वाला बना देता है। मनुष्य के रक्त पर जब इसका प्रभाव होता है, तो रक्तचाप अधिक रहता है। अर्थात शरीर के जिस अंग पर अपना प्रभाव डालता है, उसी अंग को असामान्य गति से कार्य करने को विवश कर देता है। इसी लिए अधिक गति के कारण एक्सिडेंट होने के कारण बनते हैं। मानसिक ऊर्जा, शारीरिक ऊर्जा, अग्नि, झगडे़-फसाद, दंगे और उन्माद ये ग्रह जब विपरीत होता है तो, मनुष्य की भावनाओ को भडका देता है जिसके कारण ये सभी होते हैं।

मंगल mangal आजीविका में सेना, पुलिस, बिजली (ऊर्जा), अग्नि, आर्म्स, रेस्टोरंट, फर्निश इत्यादि से देता भी है।

इस ग्रह को जब शुक्र का साथ मिल जाए तो मनुष्य को अत्यंत भोगी अनेक स्त्रीयो का भोगी बना देता है। वह व्यक्ति अत्यंत प्रभावशाली हो जाता है।

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कर्म एवं भाग्य

अनेक लोग कुण्डली दिखाते समय प्रश्न करते है कि मेरी किस्मत खराब है, कब और कैसे अच्छी होगी, कब अच्छा समय आयेगा ॽ

इसके लिये दो सिद्धांत कार्य करते है-1. एक तरफ कर्मफल “भाग्य” का चक्र। 2. दूसरा जीवन का चक्र। 

कर्म फल “भाग्य” का चक्र अनंतकाल का तथा जीवन चक्र सीमित वर्ष का होता है।

मित्रो हम जो भी कर्म करते हैं, प्रकृति उस कर्म की प्रतिक्रिया करती है, इसी को कर्मफल कहते हैं। “क्रिया की प्रतिक्रिया” या कर्म और कर्म का फल।

इस प्रकार मनुष्य अपने जीवनकाल में कुछ कर्मों का फल इस जीवन तथा शेष कर्मों का फल पुनर्जन्म प्राप्त होने पर भोगता है।

एक तरफ मनुष्य कर्म करता है, दूसरी ओर भाग्य (कर्मफल) भोगता है। अर्थात् कर्म भी करता चला जाता है, दूसरी और भाग्य का भोग भोगता है।

इस लिये मनुष्य यदि भाग्य को जानकर कर्म करे तभी हर प्रकार से सफल जीवन व्यतीत करता है।

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