कुंडली का फलकथन (कुछ सूत्र):-

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कुंडली का फलकथन करने से पूर्व इन ज्योतिषीय सूत्रों को ध्यान में रखकर फलादेश करना चाहिए :-

1. किसी भी ग्रह की महादशा में उसी ग्रह की अन्तर्दशा अनुकूल फल नहीं देती।

2. योगकारक ग्रह (केन्द्र और त्रकोण का स्वामी ग्रह) की महादशा में पापी या मारक (त्रिषडाय) ग्रह की अन्तर्दशा आने पर प्रारंभ में शुभ फल तथा उत्तरार्द्ध में अशुभ फल मिलता है।

3. अकारक ग्रह की महादशा में कारक ग्रह की अन्तर्दशा आने पर प्रारंभ में अशुभ तथा उत्तरार्द्ध में शुभ फल की प्राप्ति होती है।

4. भाग्य स्थान का स्वामी यदि भाग्य भाव में बैठा हो, और उस पर गुरु की दृष्टि हो तो, ऐसा व्यक्ति प्रबल भाग्यशाली माना जाता है।

5. लग्न का स्वामी सूर्य के साथ बैठकर विशेष अनुकूल रहता है।

6. सूर्य के समीप निम्न अंशों तक जाने पर ग्रह अस्त हो जाते हैं, (चन्द्र-12 अंश, मंगल-17 अंश, बुध-13 अंश, गुरु-11 अंश, शुक्र-9 अंश, शनि-15 अंश) फलस्वरूप ऐसे ग्रहों का फल शून्य होता है। अस्त ग्रह जिन भावों के अधिपति होते हैं, उन भावों का फल शून्य ही समझना चाहिए।

7. सूर्य उच्च का होकर यदि ग्यारहवें भाव में बैठा हो तो ऐसे व्यक्ति अत्यंत प्रभावशाली तथा पूर्ण प्रसिद्धि प्राप्त व्यक्तित्व वाले होते हैं।

8. सूर्य और चन्द्र को छोड़कर यदि कोई ग्रह अपनी राशि में बैठा हो तो, वह अपनी दूसरी राशि के प्रभाव को बहुत अधिक बढ़ा देता है।

9. किसी भी भाव में जो ग्रह बैठा है, इसकी अपेक्षा जो ग्रह उस भाव को देख रहा होता है, उसका प्रभाव ज़्यादा रहता है।

10. जिन भावों में शुभ ग्रह बैठे हों, या जिन भावों पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो, वे भाव शुभ फल देने में सहायक होते हैं।

11. यदि एक ग्रह दो भावों का अधिपति होता है तो, ऐसी स्थिति में वह ग्रह अपनी दशा में लग्न से गिनने पर उस ग्रह की जो राशि पहले आएगी उसका फल वह पहले प्रदान करेगा।

12. दो केन्द्रों का स्वामी ग्रह यदि त्रिकोण के स्वामी के साथ बैठा है तो, उसे केंद्रत्व दोष नहीं लगता, और वह शुभ फल देने में सहायक हो जाता है। सामान्य नियमों के अनुसार यदि कोई ग्रह दो केंद्र भावों का स्वामी होता है तो, वह अशुभ फल देने लग जाता है, चाहे वह जन्म-कुंडली में करक ग्रह ही क्यों न हो।

13. अपने भाव से केन्द्र व त्रिकोण में पड़ा हुआ ग्रह शुभ होता है।

14. केंद्र के स्वामी तथा त्रिकोण के स्वामी के बीच यदि संबंध हो तो, वे एक दूसरे की दशा में शुभ फल देते हैं। यदि संबंध न हो तो, एक की महादशा में जब दूसरे की अंतर्दशा आती है तो, अशुभ फल ही प्राप्त होता है।

15. वक्री होने पर ग्रह अधिक बलवान हो जाता है, तथा वह ग्रह जन्म-कुंडली में जिस भाव का स्वामी है, उस भाव को विशेष फल प्रदान करता है।

16. यदि भावाधिपति उच्च, मूल त्रिकोणी, स्वक्षेत्री अथवा मित्रक्षेत्री हो तो शुभ फल करता है।

17. यदि केन्द्र का स्वामी त्रिकोण में बैठा हो, या त्रिकोण केंद्र में हो तो, वह ग्रह अत्यन्त ही श्रेष्ठ फल देने में समर्थ होता है। जन्म-कुंडली में पहला, पाँचवा तथा नवाँ स्थान त्रिकोण स्थान कहलाते हैं। परन्तु कोई ग्रह त्रिकोण में बैठकर केंद्र के स्वामी के साथ संबंध स्थापित करता है तो, वह न्यून योगकारक ही माना जाता है।

18. त्रिक स्थान (कुंडली के 6, 8, 12वें भाव को त्रिक स्थान कहते हैं) में यदि शुभ ग्रह बैठे हों तो, त्रिक स्थान को शुभ फल देते हैं परन्तु स्वयं दूषित हो जाते हैं, और अपनी शुभता खो देते हैं।

19. यदि त्रिक स्थान में पाप ग्रह बैठे हों तो, त्रिक भावों को पापयुक्त बना देते हैं, पर वे ग्रह स्वयं शुभ रहते हैं, और अपनी दशा में शुभ फल देते हैं।

19. त्रिक स्थान के स्वामी यदि किसी भी या अन्य त्रिक स्थान में बैठे हों तो, वे त्रिक स्वामी अपनी दशा या अंतरदशा में शुभ रहते हैं।

20. चाहे अशुभ या पाप ग्रह ही हों, पर यदि वह त्रिकोण भाव में या त्रिकोण भाव का स्वामी होता है तो, उसमे शुभता आ जाती है।

21. एक ही त्रिकोण का स्वामी यदि दूसरे त्रिकोण भाव में बैठा हो तो, उसकी शुभता समाप्त हो जाती है और वह विपरीत फल देते हैं। जैसे पंचम भाव का स्वामी नवम भाव में हो तो, संतान से संबंधित परेशानी रहती है, या संतान योग्य नहीं होती।

22. यदि एक ही ग्रह जन्म-कुंडली में दो केंद्र स्थानों का स्वामी हो तो, शुभफलदायक नहीं रहता। जन्म-कुंडली में पहला, चौथा, सातवाँ तथा दसवां भाव केन्द्र स्थान कहलाते हैं।

23. शनि और राहु विछेदात्मक ग्रह हैं, अतः ये दोनों ग्रह जिस भाव में भी होंगे संबंधित फल में विच्छेद करेंगे, जैसे अगर ये ग्रह सप्तम भाव में हों तो, पत्नी से विछेद रहता है। यदि पुत्र भाव में हों तो, पुत्र-सुख में न्यूनता रहती है।

24. राहू या केतू जिस भाव में बैठते हैं, उस भाव की राशि के स्वामी समान बन जाते हैं, तथा जिस ग्रह के साथ बैठते हैं, उस ग्रह के गुण ग्रहण कर लेते हैं।

25. केतु जिस ग्रह के साथ बैठ जाता है, उस ग्रह के प्रभाव को बहुत अधिक बड़ा देता है।

26. लग्न का स्वामी जिस भाव में भी बैठा होता है उस भाव को वह विशेष फल देता है, तथा उस भाव की वृद्धि करता है।

27. लग्न से तीसरे स्थान पर पापी ग्रह शुभ प्रभाव करता है, लेकिन शुभ ग्रह हो तो मध्यम फल मिलता है।

28. तीसरे, छठे और ग्यारहवें भाव में पापी ग्रहों का रहना शुभ माना जाता जाता है।

29. तीसरे भाव का स्वामी तीसरे में, छठे भाव का स्वामी छठे में या ग्यारहवें भाव का स्वामी ग्यारहवें भाव में बैठा हो तो, ऐसे ग्रह पापी नहीं रहते अपितु शुभ फल देने लग जाते हैं।

30. चौथे भाव में यदि अकेला शनि हो तो उस व्यक्ति की वृद्धावस्था अत्यंत दुःखमय व्यतीत होती है।

31. यदि मंगल चौथे, सातवें , दसवें भाव में से किसी भी एक भाव में हो तो, ऐसे व्यक्ति का गृहस्थ जीवन दुःखमय होता है। पिता से कुछ भी सहायता नहीं मिल पाती और जीवन में भाग्यहीन बना रहता है।

32. यदि चौथे भाव का स्वामी पाँचवे भाव में हो, और पाँचवें भाव का स्वामी चौथे भाव में हो तो, विशेष फलदायक होता है। इसी प्रकार नवम भाव का स्वामी दशम भाव में बैठा हो, तथा दशम भाव का स्वामी नवम भाव में बैठा हो तो, विशेष अनुकूलता देने में समर्थ होता है।

33. अकेला गुरु यदि पंचम भाव में हो तो संतान से न्यून सुख प्राप्त होता है, या प्रथम पुत्र से मतभेद रहते हैं।

34. जिस भाव की जो राशि होती है, उस राशि के स्वामी ग्रह को उस भाव का अधिपति या भावेश कहा जाता है। छठे, आठवें और बारहवें भाव के स्वामी जिन भावों में रहते हैं, उनको बिगाड़ते हैं, किन्तु अपवाद रूप में यदि यह स्वगृही ग्रह हों तो अनिष्ट फल नहीं करते, क्योंकि स्वगृही ग्रह का फल शुभ होता है।

35. छठे भाव का स्वामी जिस भाव में भी बैठेगा, उस भाव में परेशानियाँ रहेगी। उदहारण के लिए छठे भाव का स्वामी यदि आय भाव में हो तो वह व्यक्ति जितना परिश्रम करेगा उतनी आय उसको प्राप्त नहीं हो सकेगी।

36. यदि सप्तम भाव में अकेला शुक्र हो तो उस व्यक्ति का गृहस्थ जीवन सुखमय नहीं रहता और पति-पत्नी में परस्पर अनबन बनी रहती है।

37. अष्टम भाव का स्वामी जहाँ भी बैठेगा उस भाव को कमजोर ही करेगा।

38. शनि यदि अष्टम भाव में हो तो, उस व्यक्ति की आयु लम्बी होती है।

39. अष्टम भाव में प्रत्येक ग्रह कमजोर होता है, परन्तु सूर्य या चन्द्रमा अष्टम भाव में हो तो कमजोर नहीं रहते।

40. आठवें और बारहवें भाव में सभी ग्रह अनिष्टप्रद होते हैं, लेकिन बारहवें घर में शुक्र इसका अपवाद है, क्योंकि शुक्र भोग का ग्रह है, बारहवां भाव भोग का स्थान है। यदि शुक्र बारहवें भाव में हो तो, ऐसा व्यक्ति अतुलनीय धनवान एवं प्रसिद्ध व्यक्ति होता है।

41. द्वादश भाव का स्वामी जिस भाव में भी बैठता है, उस भाव को हानि पहुँचाता है।

42. दशम भाव में सूर्य और मंगल स्वतः ही बलवान माने गए हैं, इसी प्रकार चतुर्थ भाव में चन्द्र और शुक्र, लग्न में बुध तथा गुरु और सप्तम भाव में शनि स्वतः ही बलवान हो जाते हैं, तथा विशेष फल देने में सहायक होते हैं।

43. ग्यारहवें भाव में सभी ग्रह अच्छा फल करते हैं।

44. अपने स्वामी ग्रह से दृष्ट, युत या शुभ ग्रह से दृष्ट भाव बलवान होता है।

45. किस भाव का स्वामी कहाँ स्थित है, तथा उस भाव के स्वामी का क्या फल है, यह भी देख लेना चाहिए।

46. यदि कोई ग्रह जिस राशि में है, उसी नवमांश में भी हो तो, वह वर्गोत्तम ग्रह कहलाता है, और ऐसा ग्रह पूर्णतया बलवान माना जाता है, तथा श्रेष्ठ फल देने में सहायक होता है।

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प्रेम रोग, Prem rog

प्रेम रोग और शुक्र ग्रह (ज्योतिष में प्रेम का कारक ग्रह शुक्र को माना गया है।

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आजकल चारों ओर योग की चर्चा हो रही है। इसके ठीक विपरीत भोग के लिए भी कानून सरल हो गये हैं, विपरीत लिंग के प्रेम पाश में बंधे कुछ युवक-युवती पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित होकर दैहिक सुख के भंवर में फंस जाते हैं, उन्हें लगता है कि जीवन में उसे आत्मसंतुष्टि प्राप्त हो यही जीवन का उद्देश्य है। कुछ लोगों का कहना है की भोग भी इसी योग का ही एक स्वरूप प्रेम है। तर्क दिया जाता है कि भगवत प्राप्ति के लिए भी प्रेम आवश्यक है, कहा भी है –

मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा।
किये जोग तप ग्मान विराग।।

योग, तप, ज्ञान और वैराग्य में भी यदि प्रेम का पुट नहीं हो तो, भगवद् प्राप्ति नहीं होती। प्रेम का जब प्रथम बार हृदय में प्रवेश होता है तो, प्रत्येक जीव एक विशेष ऊर्जा से आहत हो जाता है। अपने प्रेमी के दर्शन न होने पर वह इतना व्याकुल हो जाता है कि, उसे कहीं भी चैन सुख नहीं मिल पाता। चाहे प्रेम का स्वरूप कोई भी हो। मीरा के प्रेम का स्वरूप पूर्णतः आध्यात्मिकता से प्रेरित था फिर भी मीरा कहती थी-

हे री मैं तो प्रेम दिवानी मेरो दरद न जाने कोय।
घायल की गति घायल जाने और न जाने कोय।
मीरा री प्रभु परी मिटेगी जब वैध सांवरो होय।

वर्तमान में भी इस प्रकार के प्रेम का स्वरूप कहीं-कहीं प्रतीत होता है, लेकिन अधिकांश तथा मात्र धोखा ही नजर आता है। पश्चिमी सभ्यता एवं संस्कृति के प्रभाव के कारण वर्तमान में प्रेम सिर्फ दिल्लगी बनकर रह गया है। अर्थात एक से बिछुड़ना दूसरे से जुड़ना, (अफेयर्स और ब्रेकप) इस प्रकार से क्रम चलता रहता है, एवं जिंदगी गुजरती रहती है। पुराने वस्त्र उतार कर जिस प्रकार नये वस्त्र धारण किये जाते हैं, उसी प्रकार इसका स्वरूप भी बन गया है। इसी प्रेम के स्वरूप को समझने हेतु हम ज्योतिष शास्त्र की शरण में जाए तो हमें कुछ संकेत अवश्य प्राप्त होंगे कि जातक का प्रेम स्वच्छ एवं निर्मल है, अर्थात पूर्णतः पवित्र मन से प्रेरित है, या कामवासना से प्रेरित है।
ज्योतिष में शुक्र को प्रेम का स्थायी कारक माना गया है। जन्मांग चक्र का पंचम भाव प्रेम का आधिपत्य की सूचना देता है, पंचम से पंचम अर्थात नवम भी प्रेम का भाव है। चतुर्थ भाव हृदय का, तृतीय भाव जातक की इच्छा का तो एकादश भाव सर्वविधि लाभ का एवं अष्टम कामेन्द्रियों का और द्वादश स्थान काम वासना की संतुष्टि का भाव माना जाता है। ग्रहों में चन्द्र को चंचल एवं मन का कारक भाव माना जाता है। शुक्र प्रेम तथा कामेच्छा को पैदा एवं मंगल काम वासना को ऊर्जा देता है, बृहस्पति शुद्ध आध्यात्मिकता का एवं शनि ग्रह वैराग्य व राहु, केतु विजातीय स्वभाव के ग्रह होने से विजातीय संबंधों को दर्शाते हैं। इन कारकों और कुंडली के ग्रहों की परस्पर युति एवं दृष्टि पर ही शु़क्र अर्थात प्रेम का स्वरूप निर्धारित होता है। शुक्र की युति किस भाव में एवं किस ग्रह के साथ है, शुक्र पर किस ग्रह की दृष्टि है, आदि स्थितियां प्रेम के स्वरूप को नियंत्रित एवं नियमित करती है।

विभिन्न ग्रहों की शुक्र से युति एवं प्रेम का स्वरूप :-

सूर्य एवं शुक्र की युति होने पर जातक अपने प्रेम में प्रतिष्ठा को महत्वपूर्ण मानता है। उसका प्रेम हमेशा अपने से उच्च स्तर के लोगों से प्रेरित होता है, उनसे सुख प्राप्त करने की कोशिश भी करता है। लग्न से पंचम, नवम या दशम से युति होने पर प्रेमी से मान- सम्मान एवं सुख की प्राप्ति बिना किसी परेशानी के प्राप्त हो जाती है, लेकिन अन्य भावों में युति होने पर संघर्ष प्रेम प्राप्ति हेतु बना रहता है।
चन्द्र एव शुक्र की युति होने पर जातक प्रेम के मामले में चंचल रहता है। विशेष रूप से जब दोनों में से कोई एक लग्नेश हो या लाभ भाव में युति हो। लाभ भाव में युति होने एवं दोनों में से कोई एक अष्टम या द्वादश का स्वामी भी हो तो ऐसा जातक शारीरिक सुखी की प्राप्ति होने तक ही प्रेम संबंध रखता है। अन्य भावों में युति होने पर भी जातक प्रेम संबंधाें को स्थायी नहीं रख पाता दशम या द्वादश से युति हो तो, विदेशी स्त्रियों से प्रेम करवाकर आर्थिक सुख भी देता है।
मंगल व शुक्र की युति होने पर जातक का प्रेम वासना से युक्त होता है। वासना पूर्ति हेतु प्रेम परिवर्तन होता रहता है, लग्न में यदि युति बन रही हो तो, ऐसा जातक सभी सीमाएं पार कर व्याभिचारी बन जाता है। सप्तम या अष्टम में होने पर वासना पूर्ति हेतु अपने चारित्रिक पतन को बढ़ाता है एवं दु:ख प्राप्त करता है।
बुध व शुक्र की युति होने पर जातक-जातिका का प्रेम राजकुमार की भांति होता है। ऐसा जातक प्रेम के मामले में किसी की दखलांदाजी पसंद नहीं करता है, एवं प्रेम की स्थिति अनुसार परिवर्तित भी कर लेता है। ऐसे जातक रोमांटिक प्रेमी होते हैं। प्रेम को रोमांच मानकर चलना इनकी नियति बन जाती है। सप्तम में युति होने पर जातक अपनी महिला मित्र का पूर्णतया सुखोपभोग करने में कुशल रहता है।
बृहस्पति एवं शुक्र की युति होने पर प्रेम में सौंदर्य, सौशिष्यता, आध्यात्मिकता व दार्शनिकता का प्रभाव देखने को मिलता है। बृहस्पति व शुक्र दोनों धन के कारक हैं। इसलिए आर्थिक स्तर, ज्ञान से प्रभावित होकर प्रेम का आविर्भाव होता है। इस प्रकार की युति जातक को पूर्णतः धन, मान, सम्मान एवं आत्म स्वाभिमान को जागृत करने वाली होती है।
शनि, राहु व केतु से यदि शुक्र की युति बन रही हो तो, प्रेम अन्य वर्गों से होता है। प्रेम विजातीय स्वरूप का हो जाता है। ऐसा जातक भोगी एवं व्याभिचारी होता है। विषय लाभ की प्राप्ति के लिए हमेशा आतुर रहता है। उसका प्यार बिना द्वंद्व वाला एवं जल्दी ही प्रचारित हो जाता है। राहु की युति प्रेम के लिए पृथक्कता का वातावरण निर्मित करवाती है, तो केतु से युति होने पर प्रेम संबंध घनिष्ठ बनाने हेतु जातक को प्रेरित करती है।
इन युतियों के होने पर भी पूर्णतः प्रभाव कभी कभार नहीं दिखता क्योंकि जब शुक्र से युति कारक ग्रह की शुक्र से अंशात्मक दूरी अधिक हो तो, जातक के प्रेम में उस ग्रह संबंधी भावों, विशेषताओं का स्पष्ट एवं पूर्णतः प्रभाव दृष्टिगोचर होगा। लेकिन दूरी होने पर प्रभाव का असर तो रहेगा, लेकिन जातक की प्रेम को अभिव्यक्त करने की क्षमता कम होगी। प्रेम के स्वरूप को पूर्णतया प्रकट करने की जातक की अभिलाषा मूर्त रूप नहीं ले पाएगी। जातक के अन्तर्मन पर ही इसका प्रभाव अधिक होगा। बाह्य मन पर एवं व्यवहार पर नहीं।

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गुरू पूर्णिमा

जब महादेवजी ने बताई पार्वतीजी को गुरु की महिमा :- (गुरू पूर्णिमा पर विशेष) :-

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गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वर:।

गुरु: साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नम:।।

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।

तत्पदं दर्शितं येनं तस्मै श्रीगुरवे नम:।।

एक बार पार्वतीजी ने महादेवजी से गुरु की महिमा बताने के लिए कहा। तब महादेवजी ने कहा :-

गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु, गुरु ही शिव और गुरु ही परमब्रह्म है; ऐसे गुरुदेव को नमस्कार है। अखण्ड मण्डलरूप इस चराचर जगत में व्याप्त परमात्मा के चरणकमलों का दर्शन जो कराते हैं; ऐसे गुरुदेव को नमस्कार है।

ध्यानमूलं गुरोर्मूर्ति: पूजामूलं गुरो: पदम्। मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरो: कृपा।।

अर्थात्– गुरुमूर्ति का ध्यान ही सब ध्यानों का मूल है, गुरु के चरणकमल की पूजा ही सब पूजाओं का मूल है, गुरुवाक्य ही सब मन्त्रों का मूल है, और गुरु की कृपा ही मुक्ति प्राप्त करने का प्रधान साधन है। गुरु शब्द का अभिप्राय जो अज्ञान के अंधकार से बंद मनुष्य के नेत्रों को ज्ञानरूपी सलाई से खोल देता है, वह गुरु है। जो शिष्य के कानों में ज्ञानरूपी अमृत का सिंचन करता है, वह गुरु है। जो शिष्य को धर्म, नीति आदि का ज्ञान कराए, वह गुरु है। जो शिष्य को वेद आदि शास्त्रों के रहस्य को समझाए, वह गुरु है।

गुरुपूजा का अर्थ :-
गुरुपूजा का अर्थ किसी व्यक्ति का पूजन या आदर नहीं है वरन् उस गुरु की देह में स्थित ज्ञान का आदर है, ब्रह्मज्ञान का पूजन है।

गुरुपूर्णिमा मनाने का कारण :-
वैसे तो गुरू सदा पूजनीय हैं, परंतु आषाढ़ पूर्णिमा के दिन सभी अपने-अपने गुरु की पूजा विशेष रूप से करते हैं। यह सद्गुरु के पूजन का पर्व है, इसलिए इसे गुरुपूर्णिमा कहते हैं। जिन ऋषियों-गुरुओं ने इस संसार को इतना ज्ञान दिया, उनके प्रति कृतज्ञता दिखाने का, ऋषिऋण चुकाने का और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का पर्व है गुरुपूर्णिमा। यह श्रद्धा और समर्पण का पर्व है। गुरुपूर्णिमा का पर्व पूरे वर्षभर की पूर्णिमा मनाने के पुण्य का फल तो देता ही है, साथ ही मनुष्य में कृतज्ञता का सद्गुण भी भरता है। गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय।।
माता-पिता जन्म देने के कारण पूजनीय हैं, किन्तु गुरु धर्म और अधर्म का ज्ञान कराने से अधिक पूजनीय हैं। इष्टदेव के रुष्ट हो जाने पर तो गुरु बचाने वाले हैं,‌ परन्तु गुरु के अप्रसन्न होने पर कोई भी बचाने वाला नहीं हैं। गुरुदेव की सेवा-पूजा से जीवन जीने की कला के साथ परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग भी दिखाई पड़ जाता है। कवच अभेद विप्र गुरु पूजा। एहि सम विजय उपाय न दूजा।।

अर्थात् :- वेदज्ञ ब्राह्मण ही गुरु है, उन गुरुदेव की सेवा करके, उनके आशीर्वाद के अभेद्य कवच से सुरक्षित हुए बिना संसार रूपी युद्ध में विजय प्राप्त करना मुश्किल है।

गुरुपूर्णिमा को व्यासपूजा क्यों कहते हैं? :-
आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को भगवान वेदव्यास का अवतरण पृथ्वी पर हुआ था इसलिए यह व्यासपूजा या व्यासपूर्णिमा कहलाती है। व्यासजी ऋषि वशिष्ठ के पौत्र व पराशर ऋषि के पुत्र हैं। व्यासदेवजी गुरुओं के भी गुरु माने जाते हैं। वेदव्यासजी ज्ञान, भक्ति, विद्वत्ता और अथाह कवित्व शक्ति से सम्पन्न थे। इनसे बड़ा कवि मिलना मुश्किल है। उन्होंने ब्रह्मसूत्र बनाया, संसार में वेदों का विस्तार करके ज्ञान, उपासना और कर्म की त्रिवेणी बहा दी, इसलिए उनका नाम ‘वेदव्यास’ पड़ा। पांचवा वेद ‘महाभारत’ और श्रीमद्भागवतपुराण की रचना व्यासजी ने की। अठारह पुराणों की रचना करके छोटी-छोटी कहानियों द्वारा वेदों को समझाने की चेष्टा की। संसार में जितने भी धर्मग्रन्थ हैं, चाहे वे किसी भी धर्म या पन्थ के हों, उनमें अगर कोई कल्याणकारी बात लिखी है तो वह भगवान वेदव्यास के शास्त्रों से ली गयी है। इसलिए कहा जाता है–‘व्यासोच्छिष्टं जगत्सर्वम्’ अर्थात् जगत में सब कुछ व्यासजी का ही उच्छिष्ट है।
विलक्षण गुरु समर्थ रामदास के अदम्य साहसी शिष्य छत्रपति शिवाजी छत्रपति शिवाजी महाराज समर्थ गुरु रामदास स्वामी के शिष्य थे। एक बार सभी शिष्यों के मन में यह बात आयी कि शिवाजी के राजा होने से समर्थ गुरु उन्हें ज्यादा प्यार करते हैं। स्वामी रामदास शिष्यों का भ्रम दूर करने के लिए सबको लेकर जंगल में गए और एक गुफा में जाकर पेटदर्द का बहाना बनाकर लेट गए। शिवाजी ने जब पीड़ा से विकल गुरुदेव को देखा तो पूछा– ‘महाराज! इसकी क्या दवा है?’
गुरु समर्थ ने कहा – शिवा! रोग असाध्य है। परन्तु एक दवा काम कर सकती है, पर जाने दो।
शिवा ने कहा ‘गुरुदेव दवा बताएं, मैं आपको स्वस्थ किए बिना चैन से नहीं रह सकता।’
गुरुदेव ने कहा इसकी दवा है– सिंहनी का दूध और वह भी ताजा निकला हुआ; परन्तु यह मिलना असंभव सा है।
शिवा ने पास में पड़ा गुरुजी का तुंबा उठाया और गुरुदेव को प्रणाम कर सिंहनी की खोज में चल दिए। कुछ दूर जाने पर उन्हें एक सिंहनी अपने दो शावकों (बच्चों) के साथ दिखायी पड़ी। अपने बच्चों के पास अनजान मनुष्य को देखकर वह शिवा पर टूट पड़ी और उनका गला पकड़ लिया। शूरवीर शिवा ने हाथ जोड़कर सिंहनी से विनती की– ‘गुरुदेव की दवा के लिए तुम्हारा दूध चाहिए’ उसे निकाल लेने दो। गुरुदेव को दूध दे आऊँ, फिर तुम मुझे खा लेना।’ ऐसा कहकर उन्होंने ममता भरे हाथों से सिंहनी की पीठ सहलाई। मूक प्राणी भी ममता की भाषा समझते हैं। सिंहनी ने शिवा का गला छोड़ा और बिल्ली की तरह शिवा को चाटने लगी। मौका देखकर शिवा ने उसका दूध निचोड़कर तुंबा में भर लिया और सिंहनी पर हाथ फेरते हुए गुरुजी के पास चल दिए।
उधर गुरुजी सभी शिष्यों को आश्चर्य दिखाने के लिए शिवा का पीछा कर रहे थे। शिवा जब सिंहनी का दूध लेकर लौट रहे थे तो रास्ते में गुरुजी को शिष्यों के साथ देखकर शिवा ने पूछा– ‘गुरुजी, पेटदर्द कैसा है?’
गुरु समर्थ ने शिवा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा– ‘आखिर तुम सिंहनी का दूध ले आए। तुम्हारे जैसे शिष्य के होते गुरु की पीड़ा कैसे रह सकती है?’
भारतीय परम्परा में गुरुसेवा से ही भक्ति की सिद्धि हो जाती है। गुरु की सेवा तथा प्रणाम करने से देवताओं की कृपा भी मिलने लगती है।
‘गुरु को राखौ शीश पर सब विधि करै सहाय।’
कलिकाल में सद्गुरु न मिलने पर भगवान शिव ही सभी के गुरु हैं क्योंकि ‘गुरु’ शब्द से जगद्गुरु परमात्मा ईश्वर का ही बोध होता है; इसलिए कहा भी गया है :-

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूर मर्दनम्। देवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।।

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