दीपावली पूजन 2018

दीपावली पूजन के शुभ मुहूर्त:-

(Dr.R.B.Dhawan, Top best Astrologer in Delhi)

इस वर्ष दीपावली पर्व 7 नवम्बर 2018 के दिन है, इस दिन अमावस्या तिथि दिल्ली की गणना अनुसार लगभग 20:32 तक रहेगी। महालक्ष्मी पूजन किसी स्थिर लग्न में होना उचित है, इस दिन वृषभ और सिंह दो स्थिर लग्न होंगी। वृषभ लग्न सांयकाल 17 बजकर 57 मिनट से रात्रि 19 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। और सिंह लग्न मध्य रात्रि को 00 (24) बजकर 27 मिनट से 02 बजकर 54 मिनट तक रहेगी। इन दोनो महूर्त में स्वाती नक्षत्र 19 बजकर 37 मिनट तक, इसके पश्चात विशाखा नक्षत्र पढेगा। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इन दोनो लग्नों का यह समय दिल्ली प्रदेश के लिये है। शेष भारत अथवा विदेशों में रहने वाले पाठक अपने देश या प्रदेश के लिये उपरोक्त स्थिर लग्नों का समय shukracharya कार्यालय से फोन द्वारा पता कर सकते हैं। इन्हीं दो स्थिर लग्न में से किसी लग्न में जब अनुकूल चौघड़िया भी हो तब महालक्ष्मी पूजन किया जा सकता है।

महालक्ष्मी पूजन के लिए पूजा स्थल एक दिन पहले से सजाना चाहिए पूजन के लिए सामग्री दिपावली से पहले ही एकत्रित कर लें। इसमें यदि माता लक्ष्मी के पसंद को ध्यान में रख कर पूजा की जाए तो शुभत्व की वृद्धि होती है। माता के पसंदीदा रंग लाल, व गुलाबी हैं, इसके बाद फूलों की बात करें, तो कमल और गुलाब माता लक्ष्मी के प्रिय फूल हैं। पूजा में फलों का भी खास महत्व होता है। फलों में उन्हें श्रीफल, सीताफल, बेर, अनार व सिंघाड़े पसंद हैं। आप इनमें से कोई भी फल पूजा के लिए प्रयोग कर सकते हैं। अनाज रखना हो तो चावल रखें, वहीं मिठाई में माता लक्ष्मी की पसंद शुद्ध केसर से बनी मिठाई या हलवा, शीरा और नैवेद्य हैं।

माता के स्थान को सुगंधित करने के लिए केवड़ा, गुलाब और चंदन के इत्र का प्रयोग करें। दीये के लिए आप गाय के घी, मूंगफली या तिल्ली के तेल का इस्तेमाल कर सकते हैं। यह माता लक्ष्मी को शीघ्र प्रसन्न करते हैं। पूजा के लिए महत्वपूर्ण दूसरी वस्तुओं में गन्ना, कमल गट्टा, खड़ी हल्दी, बिल्वपत्र, पंचामृत, गंगाजल, ऊन का आसन, रत्न आभूषण, गाय का गोबर, सिंदूर और भोजपत्र शामिल हैं।

चौकी सजाना :-

1. लक्ष्मी-गणेश की चांदी या फिर मिट्टी से बनी छोटी प्रतिमा, 2. चांदी पर उत्कीर्ण महालक्ष्मी यंत्र (पहले से प्राणप्रतिष्ठित)। 3. मिट्टी के बने हुए 21, 31 या 51 छोटे और 3 बड़े दीपक। 4. एक तांबे का कलश जिस पर नारियल रखेंगे, व आचमनी। 5. चांदी और तांबे के सिक्के, बहीखाता, कलम और दवात। 6. नकदी, थालियां, जल पात्र, चावल, फूल, सुपारी, रोली, कलावा, पानी वाला नारियल, लाल वस्त्र,।

1. ग्यारह दीपक, 2. खील, बताशे, मिठाई, वस्त्र, आभूषण, चन्दन का लेप, सिन्दूर, कुंकुम, सुपारी, पान, 3. फूल, दुर्वा, चावल, लौंग, इलायची, केसर-कपूर, हल्दी-चूने का लेप, सुगंधित पदार्थ, धूप, अगरबत्ती, एक दीपक।

सबसे पहले एक लकड़ी की चौकी पर लक्ष्मी व गणेश की मूर्तियां इस प्रकार रखें, कि उनका मुख पूर्व या पश्चिम की ओर रहे। लक्ष्मीजी, गणेशजी की दाहिनी ओर रहें। पूजा करने वाले मूर्तियों के सामने की तरफ बैठें। कलश को लक्ष्मीजी के पास चावलों पर रखें। नारियल को लाल वस्त्र में इस प्रकार लपेटें कि नारियल का अग्रभाग दिखाई देता रहे, व इसे कलश पर रखें। यह कलश वरुण का प्रतीक है। दो बड़े दीपक रखें, एक में घी भरें व दूसरे में तेल। एक दीपक चौकी के दाईं ओर रखें, व दूसरा मूर्तियों के चरणों में। इसके अलावा एक बड़ा दीपक गणेशजी के पास रखें।

मूर्तियों वाली चौकी के सामने छोटी चौकी रखकर उस पर लाल वस्त्र बिछाएं। कलश की ओर एक मुट्ठी चावल से लाल वस्त्र पर नवग्रह की प्रतीक नौ ढेरियां बनाएं। गणेशजी की ओर चावल की सोलह ढेरियां बनाएं। ये सोलह मातृका की प्रतीक हैं। नवग्रह व षोडश मातृका के बीच स्वस्तिक का चिह्न बनाएं।
इसके बीच में सुपारी रखें, व चारों कोनों पर चावल की ढेरी। सबसे ऊपर बीचों बीच ॐ लिखें। छोटी चौकी के सामने तीन थाली व जल भरकर कलश रखें। थालियों की निम्नानुसार व्यवस्था करें- 1. ग्यारह दीपक, 2. खील, बताशे, मिठाई, वस्त्र, आभूषण, चन्दन का लेप, सिन्दूर, कुंकुम, सुपारी, पान, 3. फूल, दुर्वा, चावल, लौंग, इलायची, केसर-कपूर, हल्दी-चूने का लेप, सुगंधित पदार्थ, धूप, अगरबत्ती, एक दीपक।

इन थालियों के सामने पूजा करने वाला बैठे। आपके परिवार के सदस्य आपकी बाईं ओर बैठें। कोई आगंतुक हो तो वह आपके या आपके परिवार के सदस्यों के पीछे बैठे। हर वर्ष दीपावली पूजन में नया सिक्का लें, और पुराने सिक्को के साथ इकट्ठा रख कर दीपावली पर पूजन करें, और पूजन के बाद सभी सिक्को को तिजोरी में रख दें।

पूजा की संक्षिप्त विधि स्वयं पूजा करने के लिए :- हाथ में पूजा के जलपात्र से थोड़ा सा जल ले लें, और अब उसे मूर्तियों के ऊपर छिड़कें। साथ में नीचे दिया गया पवित्रीकरण मंत्र पढ़ें। इस मंत्र और पानी को छिड़ककर आप अपने आपको पूजा की सामग्री को और अपने आसन को भी पवित्र कर लें।

शरीर एवं पूजा सामग्री पवित्रीकरण मन्त्र :-

ॐ पवित्रः अपवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपिवा।
यः स्मरेत्‌ पुण्डरीकाक्षं स वाह्यभ्यन्तर शुचिः॥

पृथ्वी पवित्रीकरण विनियोग:-

पृथ्वी देवता मंत्रस्य मेरुपृष्ठः ग षिः सुतलं छन्दः
कूर्मोदेवता आसने विनियोगः॥

अब पृथ्वी पर जिस जगह आपने आसन बिछाया है, उस जगह को पवित्र कर लें, और मां पृथ्वी को प्रणाम करके मंत्र बोलें-
पृथ्वी पवित्रीकरण मन्त्र :-

ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता। त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्‌॥ पृथिव्यै नमः आधारशक्तये नमः।

अब आचमन करें :-

पुष्प, चम्मच या अंजुलि से एक बूंद पानी अपने मुंह में छोड़िए और बोलिए-

ॐ केशवाय नमः।

और फिर एक बूंद पानी अपने मुंह में छोड़िए और बोलिए-

ॐ नारायणाय नमः।

फिर एक तीसरी बूंद पानी की मुंह में छोड़िए और बोलिए-

ॐ वासुदेवाय नमः।

इसके बाद संभव हो तो किसी किसी ब्राह्मण द्वारा विधि विधान से पूजन करवाना अति लाभदायक रहेगा। ऐसा संभव ना हो तो सर्वप्रथम दीप प्रज्वलन कर गणेश जी का ध्यान कर अक्षत पुष्प अर्पित करने के पश्चात दीपक का गंधाक्षत से तिलक कर निम्न मंत्र से पुष्प अर्पण करें।

शुभम करोति कल्याणम, अरोग्यम धन संपदा, शत्रु-बुद्धि विनाशायः, दीपःज्योति नमोस्तुते !

पूजन हेतु संकल्प :-

इसके बाद बारी आती है संकल्प की। जिसके लिए पुष्प, फल, सुपारी, पान, चांदी का सिक्का, नारियल (पानी वाला), मिठाई, मेवा, आदि सभी सामग्री थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लेकर संकल्प मंत्र बोलें-

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु:, ऊं तत्सदद्य श्री पुराणपुरुषोत्तमस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय पराद्र्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे सप्तमे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे जम्बुद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गत ब्रह्मवर्तैकदेशे पुण्य (अपने नगर/गांव का नाम लें) क्षेत्रे बौद्धावतारे वीर विक्रमादित्यनृपते : 2070, तमेऽब्दे शोभन नाम संवत्सरे दक्षिणायने/उत्तरायणे हेमंत ऋतो महामंगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमे कार्तिक मासे कृष्ण पक्षे अमावस तिथौ (जो वार हो) रवि वासरे स्वाति नक्षत्रे आयुष्मान योग चतुष्पाद करणादिसत्सुशुभे योग (गोत्र का नाम लें) गोत्रोत्पन्नोऽहं अमुकनामा (अपना नाम लें) सकलपापक्षयपूर्वकं सर्वारिष्ट शांतिनिमित्तं सर्वमंगलकामनया– श्रुतिस्मृत्यो- क्तफलप्राप्तर्थं— निमित्त महागणपति नवग्रहप्रणव सहितं कुलदेवतानां पूजनसहितं स्थिर लक्ष्मी महालक्ष्मी देवी पूजन निमित्तं एतत्सर्वं शुभ-पूजोपचारविधि सम्पादयिष्ये।

गणेश पूजन :-

किसी भी पूजन की शुरुआत में सर्वप्रथम श्री गणेश को पूजा जाता है। इसलिए सबसे पहले श्री गणेश जी की पूजा करें। इसके लिए हाथ में पुष्प लेकर गणेश जी का ध्यान करें। मंत्र पढ़े –

गजाननम्भूतगणादिसेवितं कपित्थ जम्बू फलचारुभक्षणम्। उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्।

गणपति आवाहन:- ॐ गं गणपतये इहागच्छ इह तिष्ठ।। इतना कहने के बाद पात्र में अक्षत छोड़ दे।

इसके पश्चात गणेश जी को पंचामृत से स्नान करवाये पंचामृत स्नान के बाद शुद्ध जल से स्नान कराए अर्घा में जल लेकर बोलें- एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम् ऊं गं गणपतये नम:।

रक्त चंदन लगाएं:- इदम रक्त चंदनम् लेपनम् ऊं गं गणपतये नम:। इसी प्रकार श्रीखंड चंदन बोलकर श्रीखंड चंदन लगाएं। इसके पश्चात सिन्दूर चढ़ाएं :- इदं सिन्दूराभरणं लेपनम् ॐ गं गणपतये नम:। दूर्वा और विल्बपत्र भी गणेश जी को अर्पित करें। उन्हें वस्त्र पहनाएं और कहें – इदं रक्त वस्त्रं ऊं गं गणपतये समर्पयामि।

पूजन के बाद श्री गणेश को प्रसाद अर्पित करें और बोले – इदं नानाविधि नैवेद्यानि ऊं गं गणपतये समर्पयामि:। मिष्ठान अर्पित करने के लिए मंत्र:- इदं शर्करा घृत युक्त नैवेद्यं ॐ गं गणपतये समर्पयामि:। प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन करायें। इदं आचमनयं ऊं गं गणपतये नम:। इसके बाद पान सुपारी चढ़ायें: इदं ताम्बूल पुगीफल समायुक्तं ऊं गं गणपतये समर्पयामि:। अब एक फूल लेकर गणपति पर चढ़ाएं और बोलें: एष: पुष्पान्जलि ऊं गं गणपतये नम:।
इसी प्रकार अन्य देवताओं का भी पूजन करें बस जिस देवता की पूजा करनी हो गणेश जी के स्थान पर उस देवता का नाम लें।

कलश पूजन:- इसके लिए लोटे या घड़े पर मोली बांधकर कलश के ऊपर आम के पत्ते रखें। कलश के अंदर सुपारी, दूर्वा, अक्षत व् मुद्रा रखें। कलश के गले में मोली लपेटे। नारियल पर वस्त्र लपेट कर कलश पर रखें। अब हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर वरुण देव का कलश में आह्वान करें।

ओ३म् त्तत्वायामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो हविभि:। अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुशंस मान आयु: प्रमोषी:। (अस्मिन कलशे वरुणं सांगं सपरिवारं सायुध सशक्तिकमावाहयामि, ओ३म्भूर्भुव: स्व:भो वरुण इहागच्छ इहतिष्ठ। स्थापयामि पूजयामि॥)

इसके बाद इस प्रकार श्री गणेश जी की पूजन की है उसी प्रकार वरुण देव की भी पूजा करें। इसके बाद इंद्र और फिर कुबेर जी की पूजा करें। एवं वस्त्र सुगंध अर्पण कर भोग लगाये इसके बाद इसी प्रकार क्रम से कलश का पूजन कर लक्ष्मी पूजन आरम्भ करें।

लक्ष्मी पूजन:-

सर्वप्रथम निम्न मंत्र कहते हुए माँ लक्ष्मी का ध्यान करें। ॐ या सा पद्मासनस्था, विपुल-कटि-तटी, पद्म-दलायताक्षी। गम्भीरावर्त-नाभिः, स्तन-भर-नमिता, शुभ्र-वस्त्रोत्तरीया।। लक्ष्मी दिव्यैर्गजेन्द्रैः। मणि-गज-खचितैः, स्नापिता हेम-कुम्भैः।नित्यं सा पद्म-हस्ता, मम वसतु गृहे, सर्व-मांगल्य-युक्ता।।

अब माँ लक्ष्मी की प्रतिष्ठा करें, हाथ में अक्षत लेकर मंत्र कहें – “ॐ भूर्भुवः स्वः महालक्ष्मी, इहागच्छ इह तिष्ठ, एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम्।”

प्रतिष्ठा के बाद स्नान कराएं और मंत्र बोलें – ॐ मन्दाकिन्या समानीतैः, हेमाम्भोरुह-वासितैः स्नानं कुरुष्व देवेशि, सलिलं च सुगन्धिभिः।। ॐ लक्ष्म्यै नमः।। इदं रक्त चंदनम् लेपनम् से रक्त चंदन लगाएं। इदं सिन्दूराभरणं से सिन्दूर लगाएं। ‘ॐ मन्दार-पारिजाताद्यैः, अनेकैः कुसुमैः शुभैः। पूजयामि शिवे, भक्तया, कमलायै नमो नमः।। ॐ लक्ष्म्यै नमः, पुष्पाणि समर्पयामि।’

इस मंत्र से पुष्प चढ़ाएं फिर माला पहनाएं। अब लक्ष्मी देवी को इदं रक्त वस्त्र समर्पयामि कहकर लाल वस्त्र पहनाएं। इसके बाद मा लक्ष्मी के क्रम से अंगों की पूजा करें। माता लक्ष्मी की अंग पूजा बाएं हाथ में अक्षत लेकर दाएं हाथ से थोड़े थोड़े छोड़ते जाए और मंत्र कहें :–

ॐ चपलायै नम: पादौ पूजयामि ॐ चंचलायै नम: जानूं पूजयामि, ॐ कमलायै नम: कटि पूजयामि, ॐ कात्यायिन्यै नम: नाभि पूजयामि, ॐ जगन्मातरे नम: जठरं पूजयामि, ॐ विश्ववल्लभायै नम: वक्षस्थल पूजयामि, ॐ कमलवासिन्यै नम: भुजौ पूजयामि, ॐ कमल पत्राक्ष्य नम: नेत्रत्रयं पूजयामि, ॐ श्रियै नम: शिरं: पूजयामि।

अष्टसिद्धि पूजा :-

अंग पूजन की ही तरह हाथ में अक्षत लेकर मंतोच्चारण करते रहे। मंत्र इस प्रकर है – ॐ अणिम्ने नम:, ॐ महिम्ने नम:, ॐ गरिम्णे नम:, ॐ लघिम्ने नम:, ॐ प्राप्त्यै नम: ॐ प्राकाम्यै नम:, ॐ ईशितायै नम: ॐ वशितायै नम:।

अष्टलक्ष्मी अंग पूजन :-

अंग पूजन एवं अष्टसिद्धि पूजा की ही तरह हाथ में अक्षत लेकर मंत्रोच्चारण करें। ॐ आद्ये लक्ष्म्यै नम:, ॐ विद्यालक्ष्म्यै नम:, ॐ सौभाग्य लक्ष्म्यै नम:, ॐ अमृत लक्ष्म्यै नम:, ॐ लक्ष्म्यै नम:, ॐ सत्य लक्ष्म्यै नम:, ॐ भोगलक्ष्म्यै नम:, ॐ योग लक्ष्म्यै नम:।

नैवैद्य अर्पण :-

पूजन के बाद देवी को “इदं नानाविधि नैवेद्यानि ॐ महालक्ष्मियै समर्पयामि” मंत्र से नैवैद्य अर्पित करें। मिष्टान अर्पित करने के लिए मंत्र: “इदं शर्करा घृत समायुक्तं नैवेद्यं ॐ महालक्ष्मियै समर्पयामि” बालें। प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन करायें। इदं आचमनयं ऊं महालक्ष्मियै नम:। इसके बाद पान सुपारी चढ़ायें: इदं ताम्बूल पुगीफल समायुक्तं ॐ महालक्ष्मियै समर्पयामि। अब एक फूल लेकर लक्ष्मी देवी पर चढ़ाएं और बोलें: एष: पुष्पान्जलि ऊं महालक्ष्मियै नम:।
माँ को यथा सामर्थ वस्त्र, आभूषण, नैवेद्य अर्पण कर दक्षिणा चढ़ाए दूध, दही, शहद, देसी घी और गंगाजल मिलकर चरणामृत बनाये और गणेश लक्ष्मी जी के सामने रख दे। इसके बाद 5 तरह के फल, मिठाई खील-पताशे, चीनी के खिलोने लक्ष्मी माता और गणेश जी को चढ़ाये और प्राथना करे की वो हमेशा हमारे घरो में विराजमान रहे। इनके बाद एक थाली में विषम संख्या में दीपक 11, 21 अथवा यथा सामर्थ दीप रख कर इनको भी कुंकुम अक्षत से पूजन करे इसके बाद माता लक्ष्मी को श्री सूक्त अथवा ललिता सहस्त्रनाम का पाठ सुनाये पाठ के बाद माँ से क्षमा याचना कर माँ लक्ष्मी जी की आरती कर बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लेने के बाद थाली के दीपो को घर में सब जगह रखे। लक्ष्मी-गणेश जी का पूजन करने के बाद, सभी को जो पूजा में शामिल हो, उन्हें खील, पताशे, चावल दें। सब फिर मिल कर प्राथना करे की माँ लक्ष्मी हमने भोले भाव से आपका पूजन किया है ! उसे स्वीकार करें और गणेशा, माँ सरस्वती और सभी देवताओं सहित हमारे घरों में निवास करें, प्रार्थना करने के बाद जो सामान अपने हाथ में लिया था वो मिटटी के लक्ष्मी गणेश, हटड़ी और जो लक्ष्मी गणेश जी की फोटो लगायी थी उस पर चढ़ा दे।

लक्ष्मी पूजन के बाद आप अपनी तिजोरी की पूजा भी करें :- रोली को देसी घी में घोल कर स्वस्तिक बनाये और धुप दीप दिखा करें, मिठाई का भोग लगाए।

लक्ष्मी माता और सभी भगवानों को आपने अपने घर में आमंत्रित किया है, अगर हो सके तो पूजन के बाद शुद्ध बिना लहसुन-प्याज़ का भोजन बना कर गणेश-लक्ष्मी जी सहित सबको भोग लगाए। दीपावली पूजन के बाद आप मंदिर, गुरद्वारे और चौराहे में भी दीपक और मोमबतियां जलाएं।

रात को सोने से पहले पूजा स्थल पर मिटटी का चार मुहं वाला दिया सरसों के तेल से भर कर जगा दें, और उसमे इतना तेल हो की वो सुबह तक जग सके।

माँ लक्ष्मी जी की आरती :-

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता तुम को निस दिन सेवत, मैयाजी को निस दिन सेवत, हर विष्णु विधाता …..

ॐ जय लक्ष्मी माता …
उमा रमा ब्रह्माणी, तुम ही जग माता ओ मैया तुम ही जग माता, सूर्य चन्द्र माँ ध्यावत, नारद ऋषि गाता…

ॐ जय लक्ष्मी माता ..
दुर्गा रूप निरन्जनि, सुख सम्पति दाता ओ मैया सुख सम्पति दाता …. जो कोई तुम को ध्यावत, ऋद्धि सिद्धि धन पाता।

ॐ जय लक्ष्मी माता ..
तुम पाताल निवासिनि, तुम ही शुभ दाता ओ मैया तुम ही शुभ दाता …. कर्म प्रभाव प्रकाशिनि, भव निधि की दाता …

ॐ जय लक्ष्मी माता ..
जिस घर तुम रहती तहँ सब सद्गुण आता ओ मैया सब सद्गुण आता … सब संभव हो जाता, मन नहीं घबराता…

ॐ जय लक्ष्मी माता …
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता ओ मैया वस्त्र न कोई पाता … ख़ान पान का वैभव, सब तुम से आता..

ॐ जय लक्ष्मी माता ..
शुभ गुण मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि जाता.. ओ मैया क्षीरोदधि जाता … रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता..

ॐ जय लक्ष्मी माता ..
महा लक्ष्मीजी की आरती, जो कोई जन गाता ओ मैया जो कोई जन गाता … उर आनंद समाता, पाप उतर जाता

ॐ जय लक्ष्मी माता ..।।

7 नवम्बर 2018 के चौघड़िया मुहूर्त-

दिन की चौघड़िया:-
लाभ 06:42 से 08:02
अमृत 08:02 से 09:22
काल 09:22 से 10:42
शुभ 10:42 से 12:02
रोग। 12:02 से 13:21
उद्वेग 13:21 से 14:40
चर 14:40 से 16:00
लाभ 16:00 से 17:20

रात्रि की चौघड़िया:-
उद्वेग 17:10 से 19:00
शुभ 19:00 से 20:41
अमृत 20:41 से 22:22
चर 22:22 से 24:02
रोग 24:02 से 25:42
काल 25:42 से 27:22
लाभ 27:22 से 29:02
उद्वेग 29:02 से 30:42

1. चर, लाभ, अमृत और शुभ की चौघड़िया पूजन के समय होनी चाहिये। इस प्रकार शुद्ध ज्योतिषीय गणनाओं तथा विशेष दृष्टिकोंण से यह स्पष्ट होता है, कि साधना व पूजन के लिये 7 नवम्बर 2018 की रात्रि 19:00 से 19:52 वृषभ लग्न के साथ साथ शुभ का चौघडिया भी अत्यन्त विशेष फलदायक तथा सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त हैं। अतः सभी गृहस्थ तथा साधक-साधिकाओं से मेरा यही आग्रह है की वे इस वर्ष इसी मुहूर्त में दीपावली पूजन अथवा तंत्र-मंत्र सम्बंधी साधनायें सम्पन्न करें।

शुभ स्थिर लग्न :-

महालक्ष्मी पूजन किसी स्थिर लग्न में होना उचित है, इस दिन वृषभ और सिंह दो स्थिर लग्न होंगी। वृषभ लग्न सांयकाल 19 बजकर 00 मिनट से रात्रि 19 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। और सिंह लग्न मध्य रात्रि को 00 (24) बजकर 27 मिनट से 02 बजकर 54 मिनट तक रहेगी।

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अधिक जानकारी के लिए अथवा ज्योतिषीय परामर्श के लिए :- गुरू जी के कार्यालय में सम्पर्क करें :- 011-22455184, 09810143516

गुरू जी के लेख देखें :- astroguruji.in, aap ka bhavishya.in, rbdhawan@wordpress.com, guruji ke totke.com.

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करवा चौथ

करवा चौथ 27 अक्तूबर 2018

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in delhi)

करवा चौथ भारतीय नारियों के लिए एक मंगल पर्व है। इस दिन विवाहित स्त्रीयाँ अपने पति की दीर्घायु के लिए निर्जल व्रत रखती हैं। इस व्रत को सौभाग्यवती स्त्रियाँ एवं उसी वर्ष विवाहित हुई लड़कियाँ करती हैं। इस व्रत में प्रमुखतः गौरी व गणेश का पूजन किया जाता है। शिव-कार्तिकेय व चंद्रमा का पूजन भी प्रशस्य है। करवा चौथ के व्रत में कथा कहने या सुनने का विधान है। हांलाकि क्षेत्र के अनुसार कथाओं में थोड़ा बहुत परिवर्तन होता है, लेकिन सभी कथाओं का सार सौभाग्य वृद्धि से जुड़ा है। हम यहाँ करवा चौथ की अलग-अलग क्षेत्रों में कही जाने वाली प्रमुख कथाओं का उल्लेख कर रहे हैं।

करवा चौथ कथा -(1):-
बहुत समय पहले की बात है, एक साहूकार के सात बेटे और उनकी एक बहन करवा थी। सभी सातों भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। यहाँ तक कि वे पहले उसे खाना खिलाते और बाद में स्वयं खाते थे। एक बार उनकी बहन ससुराल से मायके आई हुई थी। शाम को भाई जब अपना व्यापार-व्यवसाय बंद करके घर आए तो देखा उनकी बहन बहुत व्याकुल थी। सभी भाई खाना खाने बैठे और अपनी बहन से भी खाने का आग्रह करने लगे लेकिन बहन ने बताया कि आज उसका करवा चौथ का निर्जल व्रत है, और वह खाना सिर्फ चंद्रमा को देखकर उसे अर्घय देकर ही खा सकती है। चूँकि अभी चंद्रमा नहीं निकला है, इसलिये वह भूख-प्यास से व्याकुल हो उठी है। सबसे छोटे भाई को अपनी बहन की हालत देखी नहीं गई और दूर पीपल के पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है। दूर से देखने पर वह ऐसा प्रतीत होता जैसे चतुर्थी का चाँद निकल रहा हो। इसके बाद भाई अपनी बहन को बताता है कि चाँद निकल आया है, तुम उसे अर्घय देने के बाद भोजन कर सकती हो। बहन खुशी के मारे सीढ़ियों पर चढ़कर चाँद को देखती है, उसे अर्घय देकर खाना खाने बैठ जाती है। वह पहला टुकड़ा मुँह में डालती है तो उसे छींक आ जाती है। दूसरा टुकड़ा डालती है, तो उसमें बाल निकल आता है, और जैसे ही तीसरा टुकड़ा मुँह में डालने की कोशिश करती है तो उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिलता है। वह बौखला जाती है। उसकी भाभी उसे सच्चाई से अवगत कराती है। कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ। करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से टुटने के कारण देवता उससे नाराज हो गये हैं, उन्होंने ऐसा किया है। सच्चाई जानने के बाद करवा निश्चय करती है कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी और अपने सतीत्व से उन्हें पुर्नजीवन दिलाकर रहेगी। वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रहती है। उसकी देखभाल करती है। उसके ऊपर उगने वाली सूईनुमा घास को वह एकत्रित करती जाती है। एक साल बाद फिर करवा चैथ का दिन आता है। उसकी सभी भाभियाँ करवा चौथ का व्रत रखती हैं। जब भाभियाँ उससे आशीर्वाद लेने आती हैं तो वह प्रत्येक भाभी से ‘यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो’ मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो ऐसा आग्रह करती है, लेकिन हर बार भाभी उसे अगली भाभी से आग्रह करने को कहकर चली जाती है। इस प्रकार जब छठे नंबर की भाभी आती है तो करवा उससे भी यही बात दोहराती है। यह भाभी उसे बताती है कि चूँकि सबसे छोटे भाई की वजह से उसका व्रत टूटा था अतः उसकी पत्नी में ही शक्ति है कि वह तुम्हारे पति को दोबारा जीवित कर सकती है, इसलिये जब वह आए तो तुम उसे पकड़ लेना और जब तक वह तुम्हारे पति को जिंदा न कर दे तब तक उसे नहीं छोड़ना। ऐसा कहकर वह चली जाती है। सबसे अंत में छोटी भाभी आती है। करवा उनसे भी सुहागिन बनने का आग्रह करती है लेकिन वह टाल-मटोल करने लगती है। इसे देख करवा उसे जोर से पकड़ लेती है, और अपने सुहाग को जिंदा करने के लिये कहती है। भाभी उससे छुड़ाने के लिये नोचती-खसोटती है लेकिन करवा नहीं छोड़ती है। अंत में उसकी तपस्या को देख भाभी पसीज जाती है, और अपनी छोटी अँगुली को चीरकर उसमें से अमृत उसके पति के मुँह में डाल देती है। करवा का पति तुरंत श्रीगणेश-श्रीगणेश कहता हुआ उठ बैठता है। इस प्रकार प्रभुकृपा से उसकी छोटी भाभी के माध्यम से करवा को अपना सुहाग वापस मिल जाता है। हे श्री गणेश माँ गौरी जिस प्रकार करवा को चिर सुहागन का वरदान आपसे मिला है, वैसा ही सब सुहागिनों को मिले।

करवा चौथ कथा – (2) :-
एक के सात लड़के और एक लड़की थी। सेठानी सहित उसकी बहुओं और बेटी ने करवा चौथ का व्रत रखा था। रात्रि को साहूकार के लड़के भोजन करने लगे तो उन्होंने अपनी बहन से भोजन के लिये कहा। इस पर बहन ने उत्तर दिया भाई ! चाँद नहीं निकला है। उसके निकलने पर अर्घ्य देकर भोजन करूँगी, बहन की बात सुनकर भाईयों ने नगर के बाहर जाकर अग्नि जला दी और छलनी लेकर उसमें से प्रकाश दिखाते हुए उन्होंने बहन से कहा बहन! चाँद निकल आया है। अर्घ्य देकर भोजन कर लो। यह सुन उसने अपनी भाभियों से कहा कि आओ तुभ भी चंद्रमा को अर्घ्य दे लो, परंतु वे इस काण्ड को जानती थीं। उन्होंने कहा बहनजी! अभी चाँद नहीं निकला, तेरे भाई तेरे साथ धोखा करते हुए अग्नि का प्रकाश छलनी से दिखा रहे हैं। भाभियों की बात सुनकर भी उसने कुछ ध्यान न दिया और भाइयों द्वारा दिखाए प्रकाश को ही अध्र्य देकर भोजन कर लिया। इस प्रकार व्रत भंग करने से गणेशजी उस पर अप्रसन्न हो गये। इसके बाद उसका पति बीमार हो गया और जो कुछ घर में था, उसकी बीमारी में लग गया। जब उसे अपने किये हुए दोषों का पता लगता है, तो उसने पश्चाताप किया। गणेशजी की प्रार्थना करते हुए। विधि-विधान से पुनः चतुर्थी का व्रत करना आरंभ कर दिया। श्रद्धानुसार सबका आदर करते हुए सबसे आशीर्वाद ग्रहण करने में ही मन को लगा दिया। इस प्रकार उसके श्रद्धा-भक्ति सहित कर्म को देखकर भगवान गणेश उस पर प्रसन्न हो गये और उसके पति को जीवनदान देकर उसे आरोग्य प्रदान करने के पश्चात् धन-संपत्ति से युक्त कर दिया। इस प्रकार जो कोई छल-कपट को त्यागकर श्रद्धा-भक्ति से चतुर्थी का व्रत करेंगे, वे सब प्रकार से सुखी होते हुये क्लेशों से मुक्त हो जायेंगे।

श्री गणेश विनायकजी की कथाः-
एक अंधी बुढ़िया थी, जिसका एक लड़का और बहू थी। वह बहुत गरीब थी। वह अंधी बुढ़िया नित्य प्रति गणेशजी की पूजा किया करती थी। गणेशजी साक्षात् सम्मुख आकर कहते थे कि बुढ़िया माई तू जो चाहे माँग ले। बुढ़िया कहती है मुझे माँगना नहीं आता सो कैसे और क्या माँगू। तब गणेशजी बोले कि अपने बहू-बेटे से पूछकर माँग ले। तब बुढ़िया ने अपने पुत्र और बहू से पूछा तो बेटा बोला कि धन माँग ले और बहू ने कहा कि पोता माँग ले। तब बुढ़िया ने सोचा कि बेटा-बहू तो अपने-अपने मतलब कि बातें कर रहे हैं। अतः उस बुढ़िया ने पड़ोसियों से पूछा तो पड़ोसियों ने कहा कि बुढ़िया तेरी थोड़ी-सी जिंदगी है। क्यों माँगे धन और पोता, तू तो केवल अपने नेत्र माँग ले, जिससे तेरी शेष जिंदगी सुख से व्यतीत हो जाए। उस बुढ़िया ने बेटे, बहू तथा पड़ोसियों की बात सुनकर घर में जाकर सोचा, जिससे बेटा-बहू और मेरा सबका ही भला हो वह भी माँग लूँ और अपने मतलब की चीज भी माँग लूँ। जब दूसरे दिन गणेशजी आये और बोले, बोल बुढ़िया क्या माँगती है। हमारा वचन है जो तू माँगेगी सो ही पाऐगी। गणेशजी के वचन सुनकर बुढ़िया बोली हे गणराज यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे नौ करोड़ की माया दें, निरोगी काया दें, अमर सुहाग दें, आँखों में प्रकाश दें, नाती-पोता दें और समस्त परिवार को सुख दें और अंत में मोक्ष दें। बुढ़िया की बात सुनकर गणेशजी बोले बुढ़िया माँ तूने तो मुझे ठग लिया। खैर, जो कुछ तूने माँग लिया वह सब तुझे मिलेगा। ये कहकर गणेशजी अंर्तध्यान हो गये। हे गणेशजी जैसे बुढ़िया माँ के माँगने पर आपने सब कुछ दिया है। वैसे ही सबको देना और हमको भी देने की कृपा करना।

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सौभाग्य लक्ष्मी प्रयोग

सौभाग्य-लक्ष्मी दीपावली सिद्ध प्रयोग-2018

Dr.R.B.Dhawan (top best astrologer in delhi)

सौभाग्य लक्ष्मी उपनिषद में भगवान आदिनारायण देवताओं को सौभाग्यलक्ष्मी साधना का उपदेश देतु हुये कहते हैं- सौभाग्यलक्ष्मी स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण रूप तीनों अवस्थाओं से परे तुरियस्वरूपा हैं। सभी मंत्रों को अपना आसन बनाकर उन पर विराजमान हैं। इस प्रकार सौभाग्यलक्ष्मी के इस महत्वपूर्ण यंत्र की परिभाषा और निर्माण की पूर्ण प्रक्रिया पूर्णतः समझाई है, उनका कहना है कि ऐसा महायंत्र निर्माण करना अत्यंत ही कठिन है, क्योंकि इस महायंत्र का निर्माण केवल एक विशेष मुहूर्त में ही सम्पन्न किया जाना चाहिये। और फिर सौभाग्यलक्ष्मी का सिद्ध यंत्र यदि साधक के पास होता है, तो वास्तव में ही वह समस्त भू-सम्पदा का स्वामी होता है, केवल मात्र घर में यंत्र रखने से ही उसे धर्म-अर्थ-काम, और मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। यह यंत्र अन्धकार में प्रकाश की तरह है, मध्य रात्रि में सूर्य की तरह तेजस्वी है।

दीपावली के पर्व पर रात्रि काल में साधक अपने घर में पूजा स्थान में इस अद्वितीय महायंत्र की स्थापना कर सौभाग्यलक्ष्मी मंत्र से साधना करता है, तो वह साधक वास्तव में ही सौभाग्यशाली माना जाता है, सौभाग्यलक्ष्मी अवश्य उसके घर में निवास करती हैं, यह वास्तव में ही उसके घर में लक्ष्मी को आना ही पड़ता है, और जब तक वह महायंत्र घर में स्थापित होता है, तब तक उस घर में सौभाग्य सहित लक्ष्मी का निवास हमेशा बना रहता है।

दीपावली की रात्रि में मंत्रों द्वारा सिद्ध करके यह महायंत्र घर में स्थापित होने पर न केवल कर्ज, मिट जाता है, अपितु घर के लड़ाई झगड़े भी समाप्त हो जाते है, व्यापार में वृद्धि होने लगती है, आर्थिक उन्नति और राज्य से सम्मान प्राप्ति होती है, और उसके जन्म जन्म के दुःख और दारिद्रय समाप्त हो जाते हैं। इस महायंत्र की जितनी प्रशंसा सौभाग्यलक्ष्मी उपनिषद में की है, और आगे के ऋषियों ने इस महायंत्र की जितनी विशेषतायें बतलाई हैं, वे अपने आप में अन्यतम है वशिष्ठ, विश्वामित्र, आदि ऋषियों ने इस प्रकार के महायंत्र को कामधेनु की संज्ञा दी है। गौतम और कणाद जैसे ऋषियों ने इस महायंत्र को कल्पवृक्ष के समान फलदायक बताया है। स्वयं शंकराचार्यजी ने इस महायंत्र को स्थापित कर, इससे संबंधित मंत्र सिद्धि के द्वारा असीम लक्ष्मी भण्डार प्राप्त कर जीवन की पूर्णता प्राप्त की थी। स्वयं तंत्रगुरू गोरखनाथ ने स्वीकार किया है, कि इस यंत्र में तांत्रिक और मांत्रिक दोनों विधियों का पूर्ण रूप से समावेश है। यह महायंत्र अपने आप में देवताओं के समान फलदायक है। आगे के विद्वानों ने भी यह स्वीकार किया है कि यदि साधक इस साधना को सम्पन्न कर लें और घर में ऐसा महायंत्र स्थापित कर लें, तो फिर उसके जीवन में किसी प्रकार की न्यूनता नहीं रह सकती, जीवन में किसी प्रकार का अभाव नहीं रह सकता, उसके जीवन में असफलता नहीं रह सकती।

महायंत्र की रचना- इस महायंत्र की रचना गुरुपुष्य योग में शुद्ध चांदी के पतरे पर करनी चाहिये। ऊपर की पंक्ति में 22 अंक से आरम्भ कर अंतिम पंक्ति में 4 अंक तक उत्कीर्ण करना चाहिये। और फिर रविपुष्य योग में इस यंत्र की प्राणप्रतिष्ठा करनी चाहिए।

दीपावली सिद्ध प्रयोग- 2018 :- यद्यपि शास्त्रों में बताया गया है, कि एक बार ऐसा महायंत्र सिद्ध करके स्थापित होने के बाद इससे संबंधित किसी भी प्रकार की साधना करने की आवश्यक नहीं होती। यह प्रयोग केवल एक ही दिन का है, जो कि दीपावली की रात्रि में सम्पन्न किया जाता है। सबसे पहले साधक दीपावली के दिन सांयकाल स्नानादि से शुद्ध होकर अपने पूजा स्थान में बैठ जाये और सामने एक लकड़ी के तख्ते पर पीला रेशमी वस्त्र बिछा कर उस पर प्राणप्रतिष्ठित महायंत्र स्थापित कर फूल, अक्षत्, नवैद्य, धूप-दीप से इसकी पूजा करें। पूजा के उपरांत इस महायंत्र को स्थापित कर दें। इससे पहले एक अलग पात्र में इस महायंत्र को जल से तथा दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से स्नान कराकर इसे पीले रेशमी वस्त्र पर स्थापित कर दें, और केसर से इस महायंत्र के बाहर नौ बिन्दियां लगायें जो नव निधि की प्रतीक हैं, इसके बाद हाथ में जल ले कर विनियोग करे-

विनियोग-
अस्य श्री सौभाग्यलक्ष्मी मंत्रस्य भृगु ऋषिः आद्यादि श्री महालक्ष्मी देवता, नीचृद्रगायत्रीछन्दांसि, श्रीं बीजम् श्रीं शक्तिः, श्रीं कीलकम् श्री महालक्ष्मी प्रसाद सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।

इसके बाद साधक हाथ में जल ले कर संकल्प करें कि मैं अमुक गौत्र अमुक पिता का पुत्र, अमुक नाम का साधक दीपावली पर्व पर भगवती सौभाग्यलक्ष्मी को नवनिधियों के साथ अपने घर में स्थापित करने के लिये यह सिद्ध प्रयोग सम्पन्न कर रहा हूं, ऐसा कह कर हाथ में लिया हुआ जल भूमि पर छोड़ दे, और फिर प्राण प्रतिष्ठित यंत्र के सामने शुद्ध घृत के पांच दीपक लगावे, सुगन्धित अगरबत्ती प्रज्वलित करें, गुलाब तथा संभव हो तो कमल का भी एक पुष्प चढावें, थोडे चावल, रोली, कलावा, पान तथा साबुत सुपारी चढाकर पूजा करें, और दूध के बने हुए प्रसाद का नैवेद्य समर्पित करें, इसके बाद हाथ में जल लेकर अंगन्यास करें-

अंगन्यास-
श्रां हृदयायनमः। श्रीं शिरसे स्वाहा। श्रूं शिखाये वषट्। श्रैं कवचाय हुम्। श्रौं नेत्रत्रयाय वौष्ट्। श्रःअस्त्राय फट्। इसके बाद हाथ जोड़ कर ध्यान का पाठ करें-

ध्यान-
भुयादभुयो द्विपद्मभयवरदकरा तत्पकार्तस्वराभ शुभ्राभ्राभेभयुग्मद्वयकर धृतकुम्भादिभरासिच्यमाना।
रक्तौघाबद्धमौलिर्विमलतरदुकूलार्तवालेपनाढया पद्मक्षी पद्मनाभोरसि कृतवसतिः पद्मगा श्रीः श्रियै नः।।

इसके बाद साधक सिद्ध सौभाग्यलक्ष्मी माला (कमलगट्टे की सिद्ध माला) से एकाक्षरी मंत्र की 51 माला जप करें, इसमें सौभाग्यलक्ष्मी माला’ का ही प्रयोग होता है। एकाक्षरी महामंत्र- ‘श्रीं’ 51 माला मंत्र जप के बाद साधक सौभाग्यलक्ष्मी की आरती करें और यंत्र को प्रातः अपनी तिजोरी में रख दें या पूजा स्थान में रहने दें, तथा प्रसाद को घर के सभी सदस्यों में वितरित कर दे, इस प्रकार यह साधना सम्पन्न होती है जो कि वर्ष की श्रेष्ठतम और अद्वितीय साधना कही जाती है।

साधना सामग्री में:- एक प्राणप्रतिष्ठित सौभाग्यलक्ष्मी यंत्र जो कि शुद्ध चांदी पर उत्कीर्ण तथा प्राणप्रतिष्ठित हो और सौभाग्यलक्ष्मी माला (कमलगट्टे की सिद्ध माला) की आवश्यकता होगी।

यदि आप यह प्रयोग नहीं कर सकते:-

यदि आप ‘सौभाग्य लक्ष्मी प्रयोग’ सम्पन्न नहीं कर सकते, अथवा आप को साधना पद्धति जटिल लगती है, तब एेसी स्थिति में आप दीपावली की रात्रि सिद्ध मुहूर्त में सिद्ध किया गया ‘सौभाग्य लक्ष्मी यंत्र’ तथा कमलगट्टे की माला हमारे कार्यालय में सम्पर्क करके आर्डर कर सकते हैं। ——————————————————————————–

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सावधान, यह राहु है

राहु ग्रह के कितने रूप :-

Dr.R.B.Dhawan

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राहू और केतु का नाम तो आपने सुना ही होगा। नवग्रह में राहू को क्रूर ग्रह कहा जाता है। शनि की तरह ही राहू भी बेहद परेशान करता है। यदि राहू के उपाय किए जाए तो यह शांति भी प्रदान करता है। लेकिन आज हम आपको राहू के उन रूपों के बारे में जानकारी देंगे, जिन्हें सुनकर आप दंग रह जाएंगे या फिर ये कहें कि इन रूप में आपको राहू परेशान कर सकता है। राहू के अनेकों रूप है। किसी भी जातक पर जब राहू की कुदृष्टि पड़ती है तो पता नहीं चलता कि राहू किस रूप में आपको परेशान करने के लिए आ जाए। इसलिए यदि आपकी कुंडली अथवा राशि में राहू दोष है तो जरा सावधान रहें। राहू आपको किस रूप में मिल सकता है, वह आप इस लेख के द्वारा जान पाएंगे –

सब से पहले तो यह जान लीजिए की आप के हाथ का मोबाइल फोन ही राहु है, यह वह राक्षस ग्रह है जो धीरे धीरे आप और आपके परिवार में परस्पर दूरियां बनाकर आपसी सम्बन्ध बिगाड़ रहा है, न केवल दूरियां बल्कि परिवार में लगाव, मधुर सम्बन्ध और बड़ों से मिलने वाले संस्कार भी धूमिल हो रहे हैं। चाहे वह सम्बंध मां बेटे, मां बेटी, पिता पुत्र या पुत्री, भाई बहन और पति पत्नी के संबंध हों। यदि आपका संयुक्त परिवार है तो आप देखें, आप जब घर पर होते हैं तब, और जब आप फ्री हैं तब भी, दोनों समय आप बहुत बीजी हैं। क्योंकि आपको अपने मोबाइल से ही फुर्सत नहीं है। ऐसे में न तो कोई आपसे अपने मन की बात करने की साहस करेगा और न ही आपको परिवार के दु:ख सुख सुनने की टेंशन होगी। इसके अलावा राहू ससुराल है। राहू वह धमकी है जिससे आपको डर लगता है । जेल में बंद कैदी भी राहू है। राहू सफाई कर्मचारी है। स्टील के बर्तन राहू के अधिकार में आते हैं। बेटी को स्टील के बर्तन अपने मायके से नहीं ले जाने चाहिए । हाथी दान्त की बनी सभी वस्तुए राहू के रूप हैं । राहू वह मित्र है जो पीठ पीछे निंदा करता है ! दत्तक पुत्र भी राहू की देन होता है। नशे की वस्तुएं राहू हैं। दर्द का टीका राहू है। राहू मन का वह क्रोध है जो कई साल के बाद भी शांत नहीं हुआ है, न लिया हुआ बदला भी राहू है। शेयर मार्केट की गिरावट राहू है, उछाल केतु है। बहुत समय से ताला लगा हुआ मकान राहू है। बदनाम वकील भी राहू है। मिलावटी शराब राहू है। राहू वह धन है जिस पर आपका कोई हक़ नहीं है या जिसे अभी तक लौटाया नहीं गया है। ना लौटाया गया उधार भी राहू है। उधार ली गयी सभी वस्तुएं राहू खराब करती हैं। यदि आपकी कुंडली में राहू अच्छा नहीं है तो किसी से कोई चीज़ मुफ्त में न लें क्योंकि हर मुफ्त की चीज़ पर राहू का अधिकार होता है। लेने वाले का राहू और खराब हो जाता है और देने वाले के सर से राहू उतर जाता है।

राहू ग्रह का कुछ पता नहीं कि कब बदल जाए जैसे कि आप कल कुछ काम करने वाले हैं लेकिन समय आने पर आपका मन बदल जाए और आप कुछ और करने लगें तो इस दुविधा में राहू का हाथ होता है। किसी भी प्रकार की अप्रत्याशित घटना का दावेदार राहू ही होता है। आप खुद नहीं जानते की आप आने वाले कुछ घंटों में क्या करने वाले हैं या कहाँ जाने वाले हैं तो इसमें निस्संदेह राहू का आपसे कुछ नाता है। या तो राहू लग्नेश के साथ है या लग्न में ही राहू है।यदि आप जानते हैं की आप झूठ की राह पर हैं परन्तु आपको लगता है की आप सही कर रहे हैं तो यह धारणा आपको देने वाला राहू ही है ! किसी को धोखा देने की प्रवृत्ति राहू पैदा करता है यदि आप पकडे जाएँ तो इसमें भी आपके राहू का दोष है और यह स्थिति बार बार होगी इसलिए राहू का अनुसरण करना बंद करें क्योंकि यह जब बोलता है तो कुछ और सुनाई नहीं देता। जिस तरह कर्ण पिशाचिनी आपको गुप्त बातों की जानकारी देती है उसी तरह यदि राहू आपकी कुंडली में बलवान होगा तो आपको सभी तरह की गुप्त बातें बैठे बिठाए ही पता चल जायेंगी। यदि आपको लगता है की सब कुछ गुप्त है और आपसे कुछ छुपाया जा रहा है या आपके पीठ पीछे बोलने वाले लोग बहुत अधिक हैं तो यह भी राहू की ही करामात है।

राहू रहस्य कारक ग्रह है और तमाम रहस्य की परतें राहू की ही देन होती हैं। राहू वह झूठ है जो बहुत लुभावना लगता है। राहू झूठ का वह रूप है जो झूठ होते हुए भी सच जैसे प्रतीत होता है। राहू कम से कम सत्य तो कभी नहीं है। जो सम्बन्ध असत्य की डोर से बंधे होते हैं या जो सम्बन्ध दिखावे के लिए होते हैं वे राहू के ही बनावटी सत्य हैं। राहू व्यक्ति को झूठ बोलना सिखाता है। बातें छिपाना, बात बदलना, किसी के विशवास को सफलता पूर्वक जीतने की कला राहू के अलावा कोई और ग्रह नहीं दे सकता। राहू वह लालच है जिसमे व्यक्ति को कुछ अच्छा बुरा दिखाई नहीं देता केवल अपना स्वार्थ ही दिखाई देता है। क्यों न हों ताकतवर राहू के लोग सफल? क्यों बुरे लोग तरक्की जल्दी कर लेते है। क्यों झूठ का बोलबाला अधिक होता है और क्यों दिखावे में इतनी जान होती है ? क्योंकि इन सबके पीछे राहू की ताकत रहती है। मांस मदिरा का सेवन, बुरी लत, चालाकी और क्रूरता, अचानक आने वाला गुस्सा, पीठ पीछे की वो बुराई, जो ये काम करे ये सब राहू की विशेषताएं हैं। असलियत को सामने न आने देना ही राहू की खासियत है!

उपाय– यदि आपके जीवन में ये सब बातें हैं तो जाहिर है कि आपका राहु अशुभ है। इसे शुभ करने के लिए Rahu silver yantra locket धारण करें। अथवा “सिद्ध गोमेद लॉकेट” (गुरूजी द्वारा सिद्ध किया हुआ) shukracharya.com पर ऑर्डर करके मंगवा लीजिए। सर्प गायत्री मन्त्र का नित्य जाप करें। शनिवार सन्ध्या के वक्त काले कपड़े में लोहे की कीलें तथा कच्चा कोयला बांध कर बहते जल में बहाएं। किसी मन्दिर या पवित्र जगह पर मूली का दान करें। इन उपायों से राहु के अशुभ फल में कमी होती है।

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